विश्व-बंदी २५ मार्च


उपशीर्षक – पहला दिन 

नवसंवत्सर, नवरात्रि, गुड़ी पड़वा, उगाडी, नवरेह, सजिबू चेइरावबा कितने त्यौहार हैं आज? शांति बनी हुई है| अजान और घंटे की आवाज औपचारिकता कर कर रह गई| सड़क सूनी थीं और बहुत कम लोग निकल रहे थें| मगर बाजारों में गुपचुप भीड़ इक्कट्ठी हो रही थी|  भीड़ यानि राष्ट्रीय पराजय| पढ़े लिखों की नासमझी अभी भी नहीं थमी थी| पुलिस के अपनी फेरी निकालनी पड़ी| बाजार बार बार बंद कराने पड़े|

दोपहर बाद सब्जी बेचने वाले से थोड़ी सब्जी ख़रीदी| बताता था कि बाजार में हालत अच्छे नहीं हैं| पुलिस की सख्ती ने बाद भी भीड़ जुट रही है| सरकार में दिशा नहीं, जनता में कोई समझ नहीं|

बैंक खातों का हिसाब लगते हुए वस्तु एवं सेवाकर के तौर पर दिया गया वह पैसा बहुत अखरा जिनके बिलों पर पैसे नहीं आयें हैं| सरकार को निजी दुःख में मेरी गालियाँ इसी कर को लेकर निकलतीं रहीं हैं| आज मन बहुत कसैला हुआ| ग्राहक पैसा न दे तो सरकार से यह पैसा वापिस पाना सरल नहीं|

देर शाम पड़ौस के पार्क में कुछ युवा फ़ुटबाल खेल रहे थे और बीच बीच में जय श्रीराम का नारा लगा देते थे| शाम को टहलते लोग भी दिखाई दिए| दोपहर को भीड़ नहीं थी मगर रात ग्यारह बजे आज दिनों के बराबर ही लोग थे|

पत्नी के मुख पर चिंता की लकीरें थीं| आस्तिक ईश्वर, भाग्यवादी भाग्य और मोदीवादी मोदी पर भरोसा नहीं कर रहे| मैं संकट को स्वीकार कर चुका हूँ| न आना, शायद बहुत बढ़िया स्तिथि में संभव है| हम गंभीरता का दिखावा और अपने से खिलवाड़ कर रहे हैं|

मैं सोच रहा हूँ: एकांतवास का अर्थ भी दुनिया से कटना नहीं, वसुधैव कुटुम्बकम् पर विश्वास रखिए| पाण्डवों का एकांतवास सामाजिक दूरी का उचित उदहारण है| अहिल्या न बनें|

जनता कर्फ्यू और लॉकडाउन के बीच


रविवार को रात उतरते उतरते जनता कर्फ्यू की सफलता का जोश उतरने लगा था| बहुत कम होता है सरकार गंभीर और जनता अधीर हो| कहाँ कर्फ्यू कहाँ लॉकडाउन है, यह चर्चा का विषय है| जनमानस में वास्तविकता तस्वीर ले चुकी है|

क्या समय है यह? कश्मीर के बाहर लॉकडाउन और कर्फ्यू के अंतर को किसी भारतीय ने अनुभव नहीं किया था| ऑडियो या विडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के साथ सब के दफ़्तर बैठकों, दस्तरखानों और ख़्वाबगाहों में सज गए हैं| मैं अपने मुवक्किल कंपनियों के लिए ‘कोविद-१९ के प्रति लड़ने के तैयारी के घोषणापत्र” भर कर ऑनलाइन जमा कर रहा हूँ| क़ानून, सरकार और मुवक्किल करवट बदल रहे हैं| कुछ देर पहले अनिवार्य बताया गया यह घोषणापत्र अब मर्जी का मालिक हो गया है| राज आग्रह को भी राजहठ मानकर उसे जमा किया जा रहा है|

खबरें अच्छी नहीं हैं| शेयर बाजार लुढ़कने और गिरने की बात आज पुरानी हो चुकी थी – लगता था कि तीसवें माले के कूदने वाले को छब्बीसवें माले पर जैसे तैसे रोका गया है| महीने भर में बाजार चालीस हजार से छब्बीस हजार पर हैं| शेयर बाजार में लगा बहुत सारा पैसा डूब चुका है|

पिछले एक महीने में बहुत कुछ बदल चुका था और अब यह सुबह से शाम बदल जाता है| माहौल में अंदेशा था और सरकार राहत देने के लिए सुझाव मांग रही थी| राज्य सरकारें अपने आपातकालीन प्रयासों को युद्ध मान चुकी थीं| अगर सख्ती नहीं की तो देश बचाना मुश्किल होगा|

जिन्हें पैसे से सब कुछ खरीदने की आदत थी या जिन्हें हर रोज पानी पीने के लिए कूआँ खोदना था – अब भी गंभीरता समझने में नाकाम लगते थे| हर कोई मुख पर डर और दर्द लाने से बच रहा था| अभी भी नकारात्मक को नकार देने की सकारात्मकता चरम पर है| या शायद उम्मीद पर अभी भी दुनिया कायम थी|

यह एक भावहीन रात थी|

मंगलकामना मंगलवार का प्रारंभ हुआ और बाजार में कुछ होने की उम्मीद थी| वित्तमंत्री को दोपहर और प्रधानमंत्री को शाम को देश में बात करनी थी| वित्तमंत्री के संयत और शान्त शब्दों में लम्बी लड़ाई के ठंडी आह थी| बहुत सारे पत्र-प्रपत्र भरने से राहत दे दी गई थी|

शाम होने को थी और मौसम ख़राब हो रहा था| ठंडी हवाओं वाली आंधी और उसके बाद बारिश| प्रधानमंत्री आठ बजे राष्ट्र के सामने थे| देश अपने आप को इक्कीस दिन के लिए बंद कर रहा रहा था| यह जनता कर्फ्यू नहीं, सरकारी लॉक डाउन है| अगर आप इक्कीस दिन घर में बंद नहीं रहते तो देश इक्कीस साल पीछे चला जाएगा| शांत संयत गंभीर शब्दों में इस दशक का सबसे प्रभावी वक्ता गंभीरतम खतरे से आगाह कर रहा था| परन्तु मन में एक टीस थी – अगर आप अनुशासित नहीं हुए तो और गंभीर कदम उठाने होंगे|

इस रात सम्वत्सर २०७६ दबे कदम इतिहास के काले पन्नों में गुम हो गया|

करोना कर्फ्यू दिवस


करोना का विषाणु और उस से अधिक उसका अग्रदूत भय हमारे साथ है| स्तिथि नियंत्रण में बताई जाती है, इस बात से सब धीरज धरे हुए हैं|

शीतला माता के पूजन का समय बीत गया है| किसी को याद नहीं कब शीतला माता आईं और गईं| कुछ बूढ़ी औरतों ने उन्हें भोग लगाया और कुछ भोग उन्होंने किए| संख्या बढ़ गई है| “रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ”|

अचानक भाषण कैसे लिखा जाए? समय तो चाहिए| जनसंपर्क विशेष अधिकारी ने समय माँगा तो सारे हाकिम ने हौले से साँस ली| चलो आठ पहर, चौबीस घंटा, साठ घड़ी का वक़्त मिला| सबने धीरज धरा|

घंटा बजा| सरकार ने भाषण दिया| अमीरों ने साजोसामान अपने गोदाम में भरे और गरीबों ने हिम्मतोहौसला अपनी अपनी गाँठ में बांध लिए| जनता ने ताली बजाई| शीतला माता मुस्कुराई, विषाणु ने धीरज धरा|

ऋतुराज ने भी धीरज धरा हुआ है| ऋतुराज बसंत ठिठका हुआ सा है| देर से आया इस बार| जाने का सोचता था रुक गया| विषाणु का डर है| मगर ऋतुराज की उपस्तिथि मात्र से माहौल में एक रूमानियत है|

भय और रूमानियत का पुराना रिश्ता है|

सुहानी सी सुबह है| इतना नीला आसमान – शायद वर्षों बाद देखा| हर हृदय निर्लिप्त है| न काम न भ्रमण न मौज मस्ती – केवल पस्ती| आलस्य भी नहीं| नेति नेति कह वेद पुकारा| उस से पहले कुछ नहीं भी नहीं था| मृत्यु प्रथम सत्य है|

साँसों में वायु प्रदूषण प्रदूषण का कोई अहसास नहीं| कहीं कोई ध्वनि प्रदूषण नहीं| आसपास ही नहीं दूर से भी परिंदों की आवाज़े आ रहीं है| आरती और अजान के बाद से कुछ नहीं सुनाई दिया| दूर रेलवे स्टेशन से आती आवाज भी दम तोड़ चुकी है| आज स्वतः ध्यान देर तक लगा|

दुनिया अपने अपने घरों में सिमट गई है| सड़कों पर शांति पसरी है और माथे पर अनागत चिंता की लकीरें| छः दूर घर से रोते बच्चे की आवाज भी स्पष्ट सुनाई देने लगी है| परिंदे अनजान आशंका के गीत गा रहे हैं| उन्हें नहीं पता शहरी सा दिखाई देने वाला मूर्ख इंसान कहाँ छिप गया है| गली के कुत्ते भी नहीं भौंक रहे| कोई सूखी रोटी फैंकने भी नहीं निकल रहा| आवारा गायें अपने भक्तों की राह जोहते हुए उदास बैठीं हैं|

लगता नहीं कोई टेलीविज़न भी देख रहा हो| जो बाहर झांक भी रहा है तो पड़ौस में आशंका की लहर दौड़ जा रही है| गुनगुनी धूप और हल्कापन लिए हुए मध्यम हवा – आनंद नहीं आध्याम का आभास दे रही है|

जिन्होंने घरों में जीवन भर का खाद्य भर लिया था, उन्हें भूख नहीं लग रही| भूखों को भोजन का पता नहीं|

दोपहर होते होते सड़क एकदम वीरान होने लगी है| बच्चे नियंत्रण में हैं| जनता कर्फ्यू के समर्थन में घुमने वाले भी शायद थक गए हैं|

पांच बजने को हैं| जनता धन्यवाद ज्ञापन की तैयारी कर रही हैं| धर्म के नाम पर वोट देने वालों के लिए विषाणु मर चुका है| ढोल मंजीरे ताशे और आधुनिक वाद्य सजने लगे हैं| पहले पांच मिनट के धन्यवाद ज्ञापन के बाद फूहड़ नाच गाना शुरू ही हुआ है कि समाचार आने लगे – सरकार वह सब कर रही है जो सरकार के आलोचक सरकार से चाहते थे| मूर्खता पर लगाम लग गई है| जितनी तेजी से नाच गाना शुरू हुआ उतनी तेजी से ख़त्म भी| मगर फिर भी कुछ नाच और नारे लग रहे हैं – मोदी है तो मुमकिन है| मोदी जी शायद सर पटकने के लिए दीवार खोज रहे हैं|

दिन शांति से ढल रहा है| शाम चुपके से उतर रही है| पर इस वक़्त पक्षी शांत हैं वो दिन भर के सन्नाटे के बाद अचानक हुए शोर शराबे से घबराये हुए हैं| झींगुर और क्षुद्र कीटों का गान सुनाई दे रहा है|

जनता कल की रोजी रोटी का हिसाब बना रही है| गरीब सोचता है कि पढ़े लिखे अमीर मालिक लोग हवाई जहाज से बीमारी लादकर क्यों ले आये| अमीर हिसाब लगा रहे हैं – इलाज कहाँ खरीदेंगे|

ट्रेन, मेट्रो , बस, दफ्तर बंद हैं| बकवास चालू है|