विश्व-बंदी १२ मई


उपशीर्षक – वसीयतें लिख ली जाएँ

वक्त आ गया है कि वसीयतें लिख ली जाएँ – त्रियोदशी कर कर निपटा दी जाए| पितृपक्ष छोडिए – आए न आए!!

नहीं, मैं नकरात्मक नहीं हूँ| मेरे लिए न मौत नकरात्मक है न वसीयत, बीमारी को जरूर मैं नकारात्मक समय समझता हूँ और मानता हूँ| वसीयत अपने बच्चों और शेष परिवार में भविष्य में होने वाले किसी भी झगड़े की सम्भावना को समाप्त करने की बात है|

इस समय वसीयत का महत्त्व बढ़ जाता है| किसी भी होनी-अनहोनी से समय परिवार के लिए बहुत कुछ जानना समझना और बचाना जरूरी है| साथ ही यह भी जरूरी है कि अपना जीवन भी ख़तरे में न पड़े|

सबसे पहले एक अपनी सारी संपत्ति और उधारियों का हिसाब लगाएं| अगले एक वर्ष के हिसाब से उधारियों के चुकाने का इंतजाम करने और घर खर्च का हिसाब करें| इस के साथ अन्य जरूरी जिम्मेदारियों के खर्च का बजट तैयार कर लें| बची संपत्ति के स्वमित्व तय कर दें| मैं सिर्फ़ सामान्य जानकारी लायक बात ही यहाँ कह रहा हूँ| अगर आप किसी प्रकार की दुविधा में हैं तो किसी विशेषज्ञ की सलाह ले सकते हैं| यह भी तय करें वसीयत का पता किसे हो और किसे न हो|

ध्यान दें आपके सभी ईमेल, सोशल मीडिया आदि एकाउंट्स भी आपकी संपत्ति हैं| आपकी मृत्यु के बाद इनका क्या करना है, यह बहुत जरूरी है| सभी सेवा प्रदाता आपके निर्णय को सुरक्षित रखते हैं और आपके अकाउंट को आपके जाने के बाद आर्काइव या बंद करने जैसे विकल्प आपके सामने रखते हैं| ध्यंद दें आपके एकाउंट्स में बहुत सी ऐसी जानकारी होती हैं जो बात में घर परिवार के लिए जरूरी हो|

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विश्व-बंदी ११ मई


उपशीर्षक – मौत का मार्ग

हमेशा से पक्का विचार रहा है है कि मजदूर किसान को सड़क या सार्वजनिक जगहों पर नज़र नहीं आना चाहिए| वास्तव में, इनको दिन में नज़र ही नहीं आना चाहिए| पहले ज़माने में निपट मजदूरों के एक तबके को फटा हुआ बाँस लेकर चलना होता था जो इंसानों को बताता कि फलां तबके का मजदूर आ रहा है| उस व्यवस्था की निंदा होनी चाहिए| उन्हें दिन में निकलने की जरूरत ही क्या थी?

चलिए महान राज्य आ गया है| सरकार ने आदेश दिया है – श्रमिकों को  सड़क और पटरियों पर चलने से रोकें| कितनी मज़ेदार बात है| माफ़ कीजिए – सरकार ट्रेन चला दी हैं – मजदूर अब घर जा सकते हैं| यह अलग बात है कि श्रमिक स्पेशल ट्रेन के लिए भी कुछ लोगों के पास पैसे नहीं हैं और उन्हें शौक लगा है कि मरेंगे मगर पैदल ही घर पहुचेंगे|

आज से तो और भी ट्रेन चलाई गई हैं – वातानुकूलित| और अगले छः दिन की वातानुकूलित ट्रेन पहले आधा घंटे में पूरी बुक हो चुकी है| ट्रेन में न खाना, न कम्बल, न चादर – मगर लोग जा रहे हैं| और वो लोग जा रहे हैं जो लॉक डाउन हो या न हो, जहाँ हो वहीँ रुको का उपदेश दे रहे थे| यह उच्च मध्य वर्ग है – वह वर्ग जो धर्म जाति के भेदभाव के बिना देश में करोना फ़ैलाने के लिए बेहिचक जिम्मेदार है| जाने की शर्त भी तो सामान्य है – लक्षण न दिखाई दें तो चले जाइएगा|

कई लोग पूछते हैं आखिर इतने सारे सरकारी, खैराती, निजी अस्पतालों, मकानों, दुकानों और जमीन ज़ायदाद के बाद भी सरकार बहादुर ने वातानुकूलित ट्रेनों को ही एकांतवास केंद्र में क्यों बदला? यह अंदाज लगाना अब कठिन नहीं रहा| ट्रेन उन्हें हवा खाने ले जाया करेगी – सरसों के खेत, नारियल के पेड़, चम्बल को बीहड़, हिमालय के हिमयोगी सब धाम के दर्शन होंगे|

वक्त आ गया है कि वसीयतें लिख ली जाएँ – त्रियोदशी कर कर निपटा दी जाए| पितृपक्ष छोडिए – आए न आए!!

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विश्व-बंदी १० मई


उपशीर्षक – श्रमिकविरोधी पूंजीपशुवाद  

देश के कथित पूंजीवादी शासक एक एक कर लगातार श्रमिक कानूनों को रद्द कर रहे हैं| एक विधि-सलाहकार होने के नाते मैं वर्तमान कानूनों का समर्थक नहीं हूँ, परन्तु इस प्रकार रद्द किए जाने का स्पष्ट नुक्सान देखता हूँ| पूंजीवादी दुर्भाग्य से यह गलत कदम उस समय उठाया जा रहा है, जिस समय उद्योगों के लिए श्रमिकों की जरूरत बढ़ रही है और जिन स्थानों पर उद्योगों की भीड़ हैं वहां श्रमिकों की भारी कमी है| ऊपर से देखने में लग सकता है कि अगर ऐसे में मजदूरों को रोका जाता है तो उद्योग को लाभ होगा| परन्तु दुर्भाग्य से रूकने के लिए मजदूर हैं ही नहीं| हर बीतते हुए दिन या तो वो लौट कर अपने गाँव घर जा रहे हैं, या असुरक्षित स्तिथियों में संक्रमण का बढ़ता ख़तरा उठा रहे हैं| साथ में महामारी और मृत्यु के नृत्य को पूँजीपशुओं की मानसिकता तांडव में बदल रही है|

यह सभी कानून इस लिए गलत नहीं हैं कि यह मजदूरों को कोई खास लाभ दे रहे हैं, न इसलिए कि मजदूर संगठनों पर कमुनिस्ट का कब्ज़ा है, यह इसलिए गलत हैं कि इनको न उद्योगपति समझ पाते हैं और न श्रमिक| ये पुराने श्रमिक कानून उस तरह का धर्म हैं जिसमें समस्त निष्ठा  ईश्वर को भुला कर कर्मकाण्डों पर टिका दी गई ही| यह क़ानून सिर्फ़ नौकरशाही के कागज़ों का पुलंदा मोटा करते हैं| इनमें सुधार के लिए, इन्हें सरल, समझने योग्य, पालन योग्य बनाने की आवश्यकता थी, न कि रद्द करने की|

वर्तमान में उद्योगों के वेतनदेय क्षमता नगण्य है, साथ ही वो मजदूरों को कोई अन्य लाभ – इज्जत, सुरक्षा, रोजगार गारंटी, स्वास्थ्य सुविधा या बीमा – कुछ देने के लिए न तो बाध्य हैं और न देने जा रहे हैं| पूँजीपशुओं की पूरी ताकत उन्हें गुलाम की तरह रखने में लगी हुई है| मगर गुलाम बनने के लिए आएगा कौन?

अगर मजदूरों का रोजगार प्रदाता उद्योग के आसपास रहने- खाने के बाद घर भेजने लायक बचत न हो, इज्जत न मिले और अगर उसे अपने गाँव के छोटे मोटे रोजगार में जीवन यापन संभव रहे और कम ख़तरा उठाना पड़े तो वो वापिस क्यों लौटेंगे|

हर बात का उचित लाभ भी होता है, अगर श्रमिक कानूनों के रद्द किए जाने के बाद भी यदि श्रमिक नहीं मिलते तो उद्योगों के लिए पूंजीपति के घर से दूर श्रमिक के द्वार पहुंचना होगा और महाराष्ट्र गुजरात की जगह अवध-मगध आना होगा

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