आमजन से दूर होती रेल


वर्षों पहले जब पहली बार रेलवे के निजीकरण की बात उठी थी, तभी मुझे लगा था कि सरकार निजीकरण को गलत दिशा में लेकर जाने वाली है| यह होने लगा है| आशंका है, रेलवे आम जनता से दूर होने जा रही है|

फिलहाल रेल किराये बढ़ने की खबर है| यह विमान उड्डयन उद्योग के लिए बढ़िया खबर है और रेलवे खरीदने के इच्छुक किसी भी गंभीर व्यवसायी बुरी खबर है| विमान उद्योग में बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा उसके किरायों को कम स्तर पर बनाये रखती है| विमान किराये यह तय करते हैं कि लोग रेलवे की महँगी सेवाओं में कितनी रूचि लेंगे| वास्तव में प्रथम श्रेणी या उससे ऊपर की किसी भी सेवा को लाभ में नहीं चलाया जा सकता| पिछले कई वर्षो में राजधानी और प्रथम श्रेणी डिब्बों की यात्री संख्या में प्रायः गिरावट आई है| यह सेवायें उन्हीं शहरों के बीच सफल है जहाँ अभी विमान सेवाओं का विकल्प नहीं है|

यदि भारतीय रेल प्रथम या विलासिता श्रेणी की सेवाओं में निवेश करती है तो उसका हाल जल्दी ही उच्च और उच्च मध्यवर्ग के लिए मकान बनाए चले जाने वाले अचल सम्पति निर्माताओं की तरह होगा और रेलवे दिवालियापन की ओर बढ़ेगी|

रेलवे के लिए लाभ देने के लिए मध्यम स्तर की सेवाएं जैसे तीनस्तरीय वातानुकूलित शयनयान का प्रयोग किया जा सकता है| परन्तु इनका बढ़ता हुआ बाजार भी सीमित है| इसके किराये को भी विमान किरायों से स्पर्धा में देखा जाना चाहिए| पिछले दिनों में देखा गया कि इस स्तर की तत्काल टिकट सेवाएं विमान किराये के काफी निकट पहुंची और यात्रियों ने इनका उपयोग कम कर दिया| सरकार को वातानुकूलित कक्ष में बैठकर योजना बनाने की पिछले पचास वर्षों की परम्परा को तोड़कर सोचना होगा|

भारत में रेल के लिए मुख्य बाजार अनारक्षित या सामान्य श्रेणी के कुर्सीयान और शयनयान हैं| परन्तु जमीन से दूर रहने वाले अधिकारीयों और सलाहकारों के समुदाय ने यह मान लिया गया है यह लोग लाभ नहीं दे सकते| ध्यान दें तो मुख्यतः यही वर्ग मोबाइल और खाद्य उद्योगों को लाभ देता है| परन्तु इस वर्ग के उत्पाद में आपका लाभांश प्रतिशत निश्चित ही कम होता है| आप दो से पांच प्रतिशत से अधिक लाभ नहीं कमा सकते| परन्तु आप “न्यूनतम आवश्यक सेवाओं” के साथ खर्च में कटौती कर सकते हैं| हम सामान्य कुर्सीयान बढ़ा सकते हैं|

यह ध्यान रखना चाहिए कि सामान्य रेलयात्री भले ही सीधे ही रेलवे को लाभ न दें परन्तु उनका गतिशील बने रहना देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत आवश्यक है|

ऐश्वर्य मोहन गहराना 

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हिन्दू मुस्लिम विवाह


“लव जिहाद” चर्चा में है| लव जिहाद का मुद्दा उठाने वालों को मात्र और मात्र हिन्दू लड़कियों की चिंता है| लवजिहाद्वादियों को लगता है कि मुस्लिम लड़के हिन्दू लड़कियों को फंसाते हैं| यह अलग बात है कि जब हिन्दू लड़कियों से बलात्कारों की ख़बरें आतीं हैं तो यह लोग मानते हैं कि हिन्दू लड़कियां ही सीधे साधे हिन्दू लड़कों को फँसातीं है और बलात्कार का आरोप लगातीं हैं| हाल में तो एक हिन्दू लड़की पर इनका आरोप था कि उसने एक बड़े नामधारी अभिनेता को प्रेम, वासना और नशे में फंसा कर मरने के लिए मजबूर कर दिया|

सरलता के लिए यह मान सकते हैं कि हिन्दू लडकियाँ अपने बलात्कारी हिन्दू लड़कों को फँसातीं फंसाती हैं परन्तु मुस्लिम लड़कों को नहीं फंसाती बल्कि उनके प्रेम में फंस जाती हैं| इस दोहरी प्रक्रिया को स्त्रीवाद और लव जिहाद के नाम से जाना जाता है|

इसके साथ ही यह भी माना जाता है कि हिन्दू लड़के मुस्लिम लड़कियों से सच्चा प्रेम करते हैं| पिछले साल जब जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के विशेष संवैधानिक अधिकार समाप्त किय गए तो सोशल मीडिया पर विशेष प्रकार के विवाह संबंधों के प्रस्ताव हिन्दू लड़कों ने प्रस्तुत किये थे –  जिन्हें हिन्दू धर्म में पिशाच विवाह कहा जाता है|

खैर, हिन्दू मुस्लिम विवाह कोई नई बात नहीं| यह आम राय है कि हिन्दू लड़कियों और मुस्लिम लड़कों के विवाह आम है, जिसका एक कारण मुस्लिम लड़कियों पर कड़े सामाजिक नियंत्रण माना जाता है|

परिवार वधु को स्वीकार करने का कितना भी दावा करें, हिन्दू या मुस्लिम, उसे सांस्कृतिक विविधता के साथ खुद को ढालने में संघर्ष करना होता है| पीठ पीछे हिन्दूड़ी या मुल्ली जैसे अपशब्दों को सुनना आम बात होती है| इसके मुकाबले, यदि कन्या पक्ष ने विवाह को स्वीकार कर लिया हो तो लड़के मात्र सामान्य अभिवादन और लगभग किताबी बातों से अपनी ससुराल को प्रसन्न करने में सफल रहते हैं| लड़कियों में पारिवारिक समारोह में कई वर्षों तक अकेलेपन का सामना करना रहता है| सबसे अधिक संघर्ष इस बात का होता है कि उन्हें ससुराल की संस्कृति ही बच्चों को सिखानी होती है| यह समस्या सजातीय विवाह में भी होती है, परन्तु हिन्दू मुस्लिम विवाह में सम्बन्ध यह विकराल रूप लेती है| बच्चों को माता के धर्म संस्कृति के बारे में उन प्रश्नों का सामना करना होता है जिनके बारे में उन्हें नहीं पता होता|
माता या पिता का धर्म कुछ भी हो, एक प्रश्न का उत्तर हर बच्चे को देना ही होता है – झटका या हलाल? नहीं, यह हमेशा मांसाहारी भोजन के बारे में नहीं होता| एक बच्चे को स्पष्ट पूछा गया था – झटके की औलाद हो या हलाल की| यह प्रश्न करने वालों के मानसिक दिवालियापन की ही नहीं, समाज के दिवालियेपन का संकेत है| यह बलात्कार और सम्भोग में विभेद न कर सकने वाले समाज का प्रतिबिम्ब है|

मुस्लिम लड़की और हिन्दू लड़कों का विवाह कट्टर हिंदुत्व वादियों की प्रमुख चाहत की तरह उभर कर सामने आती रही है| मगर क्या होता है, जब इस प्रकार के हिन्दूमुस्लिम विवाह होते हैं? अक्सर सांस्कृतिक शुद्धता समाप्त होती है, मिश्र भारतीय संस्कृति का विकास होता है| यह किसी कट्टरपंथी को पसंद नहीं आता – हिन्दू हो या मुस्लिम|   

ऐश्वर्य मोहन गहराना

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कोविड की अफ़वाह


दिन प्रतिदिन मुझे इस बात का विश्वास होता जा रहा है कि कोविड की बीमारी एक अफवाह से अधिक कुछ नहीं| हमारे थाली थाली ढोल नगाड़ों के चलते यह बहरा होकर बहुत पहले ही पाताललोक जाकर छिप गया है अथवा जनता कर्फ्यू के समय ही यह बेमौत मारा जा चुका है|

हम अर्थ-व्यवस्था के नाम पर सड़कों पर दौड़ रहे हैं| निजी और सरकारी कार्यालय से लेकर दुकान मकान तक सब अपने अपने कर्मचारियों को काम पर आने के लिए विवश कर रहे हैं| इन में से मैं भी एक हूँ| आखिर आप अर्थतंत्र में सबसे नीचे पायदान पर मौजूद घरेलू नौकरानी को तो बिना काम के लम्बे समय तक पैसा नहीं दे सकते| खासकर अगर आप घर से काम करते हैं, उसका होना जरूरी है| आप कारखाने दुकान मकान भी बंद नहीं कर सकते| परन्तु लिपिक को कार्यालय बुलाने की जरूरत नहीं है|

मैं तालाबंदी का कोई प्रसंशक नहीं रहा, परन्तु उसका सीमित समर्थन किया था| मुझे लगता था कि हमारी केंद्र और राज्य सरकारें बेहतर योजना बनाने के लिए समय लेना चाहती हैं| छः महीने के बाद आजतक हमारे पास न चिकित्सालय का तंत्र बना, न कोई दवा है, न कोई वैकल्पिक अर्थतंत्र| परन्तु सरकार के साथ साथ मुझे पढ़े लिखे तबके ने भी मुझे बहुत निराश किया है| हम अपनी जड़े काटने वाले समाज के रूप में सदा ही जाने जाते रहे हैं| 

हम कार्यालयों में अवांछनीय उपस्तिथि को कम करने के स्थान पर सभी को कार्यालय आने ले किये विवश कर रहे हैं| बहुत से लोग जो घर से काम करने की स्थिति में हैं, उन्हें भी कार्यालय आने को कहा जा रहा है| कार्यालयों में लिपिकों और बहुत से अधिकारीयों को उपस्तिथि आवश्यक नहीं होती – वो अपनी जरूरी कागजात घर ले जाकर काम कर सकते हैं| गैर जरूरी व्यवसायों को खोला गया है जबकि इनमें से बहुतों को खोलने का खर्च आय से बहुत कम हैं| बड़े भोजनालय, केशसज्जा केंद्र, आदि कई धंधे अभी तक लाभ-बिंदु तक नहीं पहुँच पाए परन्तु सामूहिक घाटे के साथ काम करने के लिए विवश है|

दुःख है कि शपथ जैसे नाटकों को हम पूरी निष्ठा से निभा रहे हैं, परन्तु अपने सुरक्षापर्दे (मास्क) को अपनी नाक पर नहीं बिठा पा रहे| सामाजिक या व्यक्तिगत दूरी को तो मैं दिल्ली में अवांछनीय मानता हूँ – बड़े शहरों का जनसँख्या घनत्व इस प्रकार की दूरी को अव्यवहारिक बनाता है| राजधानी दिल्ली तक में बैंको, डाकघरों से लेकर हाट बाजारों तक लोग अपने सुरक्षा परदे का प्रयोग ठीक से नहीं कर पा रहे|

मैं कई बार सोचता हूँ यदि प्रधानमंत्री जी ताली बजाने, दिए जलाने और फूल बरसाने जैसे प्रतीकों से आगे बढ़ पाते तो आज उनकी बात मानकर हर नाक पर सुरक्षापर्दा होता| पर भारत का मध्यवर्ग शायद ऐसा न होने देता – उसे तो भक्ति आती हैं, समझ नहीं|

ऐश्वर्य मोहन गहराना

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