बिचौलिया


आजकल बिचौलियों के विरोध में बात की आने लगी है| हर कंपनी का नारा है¸ बिचौलिया हटाओ| सरकार भी यही कहती है| आपूर्तितंत्र में बिचौलियों का बड़ा योगदान रहता है| उत्पादक कंपनी माल को अपने थोक-वितरक को बेचती है जो आगे वितरक और उप-वितरक के माध्यम से थोक विक्रेता और उप विक्रेता को बेच देता है| इस आपूर्तितंत्र में थोकवितरक, वितरक, उप वितरक, थोक विक्रेता और विक्रेता सब बिचौलिए हैं| इन सबको अपना खर्च और लाभांश निकलना होता है| अगर उत्पाद उत्पादक के यहाँ एक रुपये में बनता है, तो थोक वितरक से लेकर वितरक तक पूरे तंत्र को इस उत्पाद को उपभोक्ता को पहुँचाने में लगभग दो से पांच रुपए तक की लागत आती है और उन्हें इतना ही लाभ भी चाहिए| इस लाभ में से लगभग तिहाई हिस्सा सरकार के आयकर विभाग के पास जाता है और बीस प्रतिशत वस्तु व् सेवा कर विभाग के पास|

मगर यहाँ एक विशेष बात मन में आती है| उत्पादक कंपनी का कर्त्तव्य है कि अपना लाभ बढाये जिससे अंशधारक को अधिक लाभांश मिल सकते| तो कंपनी की निगाह में आता है बिचौलिया| इस को हटाने के दो मार्ग हैं; बिचौलिए का काम कंपनी का कोई विभाग करे या कंपनी की कोई औलाद – जिसे सब्सिडियरी कहते हैं| इस से जनता को लगता है कि बीच से बिचौलिए कम हो गए मगर क्या तंत्र बदलता है? थोड़ा बहुत|

उपरोक्त दोनों माध्यम से कंपनी अपना वितरण तंत्र बनाती है तो इसमें एक तो स्तर कम हो सकते हैं समाप्त नहीं| प्रायः कंपनियां कई वितरण केंद्र बनातीं है और वहां से यह थोक विक्रेता और फिर विक्रेता के पास जाता है| यह वितरण केंद्र, थोक विक्रेता और विक्रेता बिचौलिया के रूप में बने रहते हैं|

सीधी बिक्री के मामले में भी एक बिचौलिया रहता है: कूरियर कंपनी – जिसका तंत्र भी लगभग उसी तरह काम करता है जैसे कोई और वितरण तंत्र|

कॉर्पोरेट के लिए बिचौलिया हटाने का एक और माध्यम है कि विक्रेता कंपनियां| मेगा स्टोर श्रृंखलाएं इसका उदहारण हैं| यह उत्पादक से सीधे माल खरीदकर सीधे उपभोक्ता को बेच देतीं हैं| पुनः इनका अपना अंदरूनी वितरण तंत्र होता है| सोचना यह है कि पुराने बिचौलियों का क्या होता है? वह स्वरोजगार छोड़ कर या तो कंपनी के बिचौलिया तंत्र का नौकर बन जाते हैं या बेरोजगार हो जाते हैं| बाद बाकि तो “शेष कुशल है” ही रहता है|

उपचार-विराम


मन में बहुत दिन से बात घूम रही है|

क्या कठिन रोग के रोगी का उपचार धन-अभाव में रुकना चाहिए? अगर रोगी के परिवार के पास धन न हो तो क्या सरकारी या सामाजिक मदद होनी चाहिए? आखिर किसी रोगी के लिए उपचार का अभाव होना ही क्यों चाहिए?

अपने जीवन में तीमारदर के तौर पर लगभग पंद्रह वर्ष चिकित्सालयों के चक्कर काटने के दौरान मैंने परिवारों को इस यक्षप्रश्न का सामना करते देखा है|

कुछ विचारणीय स्तिथि इस प्रकार हैं:

  • उपचार से लाभ की कोई चिकित्सीय आशा न हो|
  • उपचार से लाभ की कोई वास्तविक चिकित्सीय आशा न हो, परन्तु चिकित्सक कुछ परीक्षण आदि करना चाहें| यह रोगी और परिवार के लिए कष्टकर और बाद में लाभप्रद भी हो सकता है| परन्तु नए चिकत्सकीय अनुसन्धान के लिए आवश्यक है| इस के लिए प्रायः लिखित अनुमति ली जाती है परन्तु वास्तव में यह एक तरफ़ा होता है| अनुमति न देने पर चिकित्सक और चिकित्सालय गलत व्यवहार करते देखे जाते हैं| समाज भी परिवार का साथ नहीं देता|
  • उपचार मंहगा हो और रोगी के परिवार के लिए आर्थिक समस्या पैदा करता हो| हो सकता है कि परिवार के बाद धन न बचा हो, खर्च बीमा की सीमा से ऊपर निकल गया हो और अब उधार की नौबत हो| इस परिस्तिथि में रोगी के बचने के बाद भी परिवार का आर्थिक/सामाजिक रूप   से बचना कठिन हो जाता है| अगर रोगी ही परिवार का कमाऊ व्यक्ति हो तो जीवन  कठिन परीक्षा लेता है|
  • वर्तमान स्थान पर उपचार न हो परन्तु कहीं और उपचार संभव हो परन्तु रोगी को ले जाने के साधन या क्षमता न हों|
  • रोगी का पूर्ण उपचार संभव न हो परन्तु जीवन लम्बा किया जा सकता हो, हो सकता है कि उसके इस अतिरिक्त जीवन कला में रोग का निदान संभव हो जाए|

किसी भी मानवीय दृष्टिकोण से यह उचित नहीं जान पड़ता कि रोगी को उपचार के अभाव में मरना पड़े| परन्तु मुझे यह दृष्टिकोण, अंध-मानवीय दृष्टिकोण लगता है| हमें रोगी और परिवार के बारे में भी सोचना चाहिए|

कोई भी अच्छा चिकित्सक किसी रोगी को मरते नहीं देखना चाहता| इसलिए मैं कभी चिकित्सक से सलाह नहीं लेना चाहूँगा| अनुभव के आधार पर कहूँगा कि बीस वर्ष से कम अनुभव वाले चिकित्सक इस तरह के मामलों के राय कम आदेश अधिक देते हैं| इसके बाद, चिकत्सकीय अनुसन्धान संस्थाओं में, मैं यह देखता हूँ कि अगर चिकित्सालय सम्पूर्ण जानकारी दिए बिना कहीं भी तीमारदार से हस्ताक्षर कराए  तो भाग निकलें|  आपके रोगी के बचने की सम्भावना कम ही है| परन्तु यदि सम्पूर्ण जानकारी मिले तो सभी कष्टों के बाद भी अनुसन्धान में भाग लेने की अनुमति दी जा सकती है| जानकारी देने वाले संस्थान और चिकित्सक अपनी तरफ से गलत अनुसन्धान में रोगी को नहीं धकेलेंगे| चिकित्सा विज्ञान को लाभ होगा|

धनाभाव की स्तिथि में निर्णय बेहद कठिन है| अच्छे चिकित्सक अक्सर रोगी के सम्पूर्ण इलाज और अनुमानित खर्च के बारे में सही राय देते हैं और शेष निर्णय परिवार पर छोड़ देते हैं|  अगर परिवार इलाज को जारी न रखने का निर्णय लेता है तो यह निर्णय ख़ुशी से नहीं होता| यह देखने में आता रहा है कि इलाज जारी रखने का निर्णय कई बार शेष परिवार के लिए जमा-पूँजी, संपत्ति, वर्तमान आय, भविष्यत आय ही नहीं कई बार मान मर्यादा को भी दाँव पर लगाना पड़ता है| यद्यपि यह ऐसा दुःख है जिसे सामान्य समाज समझ नहीं पाता| ऐसे समय में मुझे लगता है कि परिवार यह निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए कि परिवार को बचाया जाए या रोगी को| यह दुःखद बात कहते समय मुझे भुवनेश्वर की कहानी भेड़िये याद आ रही है फिर भी मैं यह बात कह रहा हूँ|

एक कल्याणकारी राज्य व्यवस्था के नागरिक होने के नाते हम सरकार और समाज से हम बहुत सी आशाएं कर सकते हैं परन्तु उनकी भी अपनी सीमाएं हैं|

कानून निर्माण प्रक्रिया


विद्यालय में नागरिक शास्त्र हाशिये पर रहने वाला विषय है| इन किताबों में विधि निर्माण की जो प्रक्रिया हम पढ़ते हैं वह बहुत किताबी है: निर्वाचित सरकार संसद या विधान सभा में कानून का मसौदा रखती है; संसद या विधानसभा उस पर चर्चा (बहस नहीं होती, अब) करती है और मतदान के बाद कानून बन जाता है| मगर यह सतही जानकारी है|

सेवा और वस्तु कर, आधार, दिवालिया एवं शोधन अक्षमता, खेती किसानी के नए कानून एक दिन में नहीं आए| इन में से कुछ पर चाय-चौपालों में चर्चा हुई तो कुछ वातानुकूलित कक्षों से अवतरित हुए| कानून सरकार के सपनों में अवतरित नहीं होते| यह देशकाल में प्रचलित विचारों की प्रतिध्वनि होते हैं| हर पक्ष का अलग विचार होता है| सबको साथ लेकर चलना होता है| सोचिए, एक घर में छोटा बच्चा, मधुमेह मरीज, रक्तचाप मरीज, अपच मरीज, चटोरा, मिठौरा, अस्वादी, आस्वादी, दंतहीन, सभी लोग हों तो अगले रविवार दोपहर को रसोई में क्या (और क्या क्या) पकेगा|

अधिकतर कानून सोच-विचार से उपजते हैं| उदहारण के लिए जब दस हजार साल से खेती किसानी हो रही है तो कानून की क्या जरूरत, परम्पराओं से चीजें चलती रही हैं| परन्तु हर सौ दो सौ साल में खेती, खेती की जमीन, खरीद-फ़रोख्त आदि पर कानून बनते रहे हैं|

जब भी कोई पक्ष यह सोचता है कि स्थापित प्रक्रिया में कुछ गलत है या और बेहतर हो सकता है तो वह तत्कालीन कानून में सुधार बिंदु खोजता है| इसके बाद कोई यह सोचता है कि यह सुधार आखिर क्या हो तो कोई यह कि इस सुधार को किस प्रकार शब्द दिए जाएँ| जब यह सब हो जाए तो लिखत के हर शब्द के मायने पकड़ने होते हैं| कई बार शब्दों को नए मायने दिए जाते हैं| यहाँ विराम और अर्धविराम का संघर्ष प्रारंभ हो जाता है| अंग्रेजी के मे may और shall जैसे शब्द तो बंटाधार भी कर सकते हैं| परन्तु मेरी चर्चा या चिंता का विषय नहीं है|

किसी भी कानून निर्माण प्रक्रिया में होती है गुटबंदी, तरफ़दारी, ध्यानाकर्षण, शिकवे-शिकायत, और भी बहुत कुछ| जिस समय हम दिल्ली भौतिक सीमा पर बैठे हजारों किसानों को देख रहे हैं, मैं राजधानी की प्रभामंडलीय सीमा के अन्दर व्यवसायिक लॉबी समूहों, पेशेवर सलाहकारों, चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स, किसान संघों, नोटबैंकों, वोटबैंकों, राजनैतिक पैतरेबाज़ों, उपभोक्ता समूहों, वितरकों, निर्यातकों, विदेशी आयातकों, लंगर-भंडारा चलाने वाले दानशीलों, ढाबे वालों, नामीगिरामी रेस्तरो, शेयर बाजारों, सरकारी अधिकारीयों कर्मचारियों आदि को देख पा रहा हूँ और यह सूची पूरी नहीं है| इसके साथ हैं एडवोकेसी समूह जो किसी भी कानून और कानूनी प्रक्रिया के बारे में जनता के मध्य जागरूकता फैलाते हैं| परन्तु यह काम कानून बनने से बहुत पहले शुरू हो जाता है| इन्हीं लोगों का काम है कि कम स्वीकार्य कानून को भी जनता के बीच लागू कराये| लगातार जटिल होते जा रहे समाज में कई बार कानून के पक्ष या विपक्ष में  समर्थन जुटाने के स्थान पर विरोधियों के विरूद्ध विरोध जुटाने का काम भी होता है| जैसे निजीकरण विरोधियों के विरोध में आप उलटे सीधे तर्क सुन सकते हैं| इस प्रोपेगंडा का मकसद कानून के पक्ष-विपक्ष में बात करने के स्थान पर अपने हित-विरोधियों को बदनाम करने का होता है|

किसी भी कानून के लिखने में सभी पक्षों के विचार सुने गए, सरकारी अधिकारीयों, मंत्रियों और विपक्षियों ने उन्हें अपने मन में गुना, सत्ता के  ने इन पर अपने निजी समीकरण लगाए, फिर विचारों का एक खाका बना| यह खाका किसी संस्था या समूह को लिखत में बदलने के लिए दिया| उन्होंने अपना हित और हृदय लगाया| सरकारी नक्कारखाने में तूती और तुरही कितना बोली, कितना शहनाई और ढोल बजा, किसे पता? यह लिखत किसी बड़े सलाहकार समूह के सामने जाँच के लिए रख दी जातीं हैं| जैसे दिवालिया कानून विधि लीगल ने लिखा तो  वस्तु और सेवाकर का खाका बिग-फोर ने खींचा| अगर आप पिछले बीस वर्षों की बात करें तो शायद हो कोई कानून संसद में बहस का मुद्दा बना हो या उस पर बिंदु वार विचार हुआ हो| संसद के पास समय नहीं है| उदहारण के लिए कंपनी कानून को उर्जे-पुर्जे समझने के लिए बीस विशेषज्ञ के दल को पूरे बारह माह लग गए थे जबकि संसद में इसपर बीस घंटे भी चर्चा नहीं हुई| परदे के पीछे संसदीय समितियाँ चर्चा तो करतीं हैं, परन्तु उनकी बातें बाध्यकर नहीं होतीं है| यही कारण है कि इस कानून से भी कोई संतुष्ट नहीं हुआ (कंपनी धरना नहीं देतीं – लॉबी करती हैं)| यह ही हाल अन्य कानूनों का है|

यह ध्यान रखने की बात है कि किसी भी कानून से सब संतुष्ट नहीं हो सकते| कोई भी कानून स्थायी नहीं होता| हमें प्रक्रियात्मक कानून किसी भी क्षण पुराने हो सकते हैं, जबकि विषय-विवेचना सम्बन्धी कानून थोड़ा लम्बे समय तक बने रहते हैं|

जब भी हम किसी कानून पर बात करते हैं तो हमारा नजरिया शास्त्रार्थ वाला होना चाहिए| सुधार होते रहना चाहिए| कानून का मूल किसके मन में जन्मा, किसने शब्द दिए किसने संसद में पेश किया, यह सब बेमानी बातें हैं| मूल बात यह कि सभी अधिकतम सुविधा, सभी को न्यूनतम असुविधा के साथ कैसे मिले|

वर्तमान में भी मुद्दा यह नहीं कि विरोध करने वाले किसान हैं या नहीं, मुद्दा है कि कानून हित में है या नहीं|