कर्बला दर कर्बला


मैं इतना कायर हूँ कि दंगे के बीच से गुजर जाऊँ, चाकू छुरे के सामने खड़ा हो जाऊँ, मगर दंगे के बारे में सुनने,  देखने, लिखने और पढ़ने में दिल बैठ जाता है| शहर अलीगढ़ में रहकर दंगा जीना पड़ता है, मगर हर दिन उन्हें जीना मेरे बस के बाहर है|
उस दिन रतौल के स्वादिष्ट आम खाते हुये, सोचा न था कि गौरीनाथ अनर्थ कर रहे हैं| बोले “कर्बला दर कर्बला” भेज रहा हूँ| दिमाग़ कुंद हुआ तो बोल दिया, जी भेज दीजिए पढ़कर बताता हूँ| 

एक दंगा होता तो झेल जाता, यहाँ तो दंगे ही दंगे थे| मगर जब किताब उठाई तो फिर छोड़ी न गई सिवा इसके कि बीच बीच में दिल को दिलासा दिया जाए, कि आगे कोई दंगा न होगा, न किताब में न देश में| वैसे अब दंगे कहाँ होते हैं, नरसंहार को दंगा कह देना सरकारी प्रपंच है, तथ्य नहीं| किताब पर अपनी बात कहने से पहले एक प्रशासनिक कहावत याद आई, जब बरामद चाकू और छुरे का अनुपात तीन-एक या एक-तीन से अधिक होने लगे तो उसे दंगा कहते हुए थोड़ा आँख चुरा लेनी चाहिए| 

वह दिन मुझे आज भी दहला देता है तब तक मैंने सिख सिर्फ चित्रों में देखे थे और मेरे हाथ में एक चाबुक था, उम्र आठ साल, स्कूल या मोहल्ले में किसी को तंग करने की कोई शिकायत मेरे विरुद्ध नहीं थी| उस दिन माँ ने गाल पर चांटा रसीद किया था| दिन, तारीख़, वक़्त और मौका बताने की कोई जरूरत नहीं है| यह उन दंगों से अलग था जो शहर अलीगढ़ में देखते हुए हम बड़े हुए|

हर उपन्यास की पृष्ठभूमि में देशकाल होना आवश्यक है, यह देशकाल इतिहास बनाता है| हर उपन्यास अपने समाज और समय का प्रछन्न इतिहास होता है| ऐतिहासिक तथ्यों को कथा वस्तु में पिरोते चले जाना गज़ब संतुलन मांगता है| गौरीनाथ इस संतुलन को साधने में असुंतलन की सीमा तक जाते हैं| साहित्यिक संतुलन और कथावस्तु पृष्ठ 238 पर साथ छोड़ देते हैं, पठनीयता, पत्रकारिता, पाठकीय रुचि शेष रहती हैं। अंत में बचता है, शेषनाग की तरह कुंडली मार कर बैठा एक रक्तरंजित प्रश्नचिन्ह|

मैं पहला वाक्य पढ़ रहा हूँ: “पानी, दूब और धान लेकर खड़े होने की हैसियत सब के पास थी|” यह “थी” मुझे हिला देता है| इस उपन्यास इस वाक्य पर दोबारा बात नहीं हुई मगर यह पानी, दूब और धान के हमारे मन-आँगन में न बचने के क्रम की कथा है| अस्सी का दशक वह दशक है जो विमर्श, विचार, आचार आदि से पानी, दूब और धान को निकाल देने का प्रारम्भ करता है| विभाजन के समय जो कुछ हुआ, उसने पानी को हमारे मन से मिटाया और हम दूब और धान बने रहे|

यद्यपि पानी, दूब और धान लेकर खड़े हो सकने की हमारी क्षमता नष्ट होने का प्रारम्भ सत्तर के दशक में प्रारम्भ हो जाता है, पर अस्सी की राजनीति पानी, दूब और धान को नष्ट कर गई| सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, आतंकित, रोजगारित कारणों से अस्सी का दशक, जड़ से कटने की कथा है| अस्सी की इस राजनीति को समझने का एक बड़ा दरवाजा इस उपन्यास से खुलता है|

हिन्दू मुस्लिम दंगों को प्रायः तथाकथित विदेशी आक्रमणों की पृष्ठभूमि में देखा जाता है| जिन विदेशी आक्रमणों की हम बात करते हैं प्रायः वह या तो आर्यवृत्त के अपने इलाकों से हुए हैं या एकदम पड़ौस से| जब इन आक्रमणकारियों के धर्म हमारे वर्तमान धर्म से मिलते जुलते हैं, हम गर्व से उन्हें पढ़ते पढ़ाते हैं जैसे कुषाण वंश| यहाँ तक कि सिकंदर के साथ आए यूनानियों, बाद में मध्य एशिया से आए शक हूणों और लूटपाट, शोषण आदि कर कर चले गए पश्चिमी यूरोपियों से हमें कोई कष्ट नहीं होता| 

हमारी कहानी बिगड़ती है मुस्लिमों के साथ| पुरानी कहावत है जो बर्तन पास रहेंगे वहीं आपस में बजेंगे| यहाँ तो बनते बिगड़ते रिश्तों का लंबा सामाजिक आर्थिक राजनैतिक, कूटनैतिक इतिहास है, वह इतिहास जिसमें अंग्रेजों ने अतिरिक्त खादपानी लगाया है| उस फसल ने अस्सी में कुल्ले देना शुरू किया और अब फसल पकने लगी है|

बदलते आर्थिक राजनैतिक, कूटनैतिक और तकनीकि समीकरणों ने निश्चित ही मुस्लिमों की आर्थिक और सामाजिक आदान-प्रदान क्षमता में उनका पक्ष कमजोर किया है| उदाहरण के लिए यदि हथकरघों को विद्युतकरघों ने निवृत्त न किया होता तो क्या इस उपन्यास के लिए विषयवस्तु पैदा होती? क्या पसमांदा और पिछड़े वर्ग के मुस्लिमों के मुक़ाबले हिन्दू दलितों और पिछड़ों की स्थिति में सामाजिक और आर्थिक सुधार न आया होता तो क्या उनमें सिर उठाने और दंगा करने की हिम्मत जुट पाती? आगरा मथुरा जिले के जाट-जाटव दंगे अपनी लंबी अवधियों के बाद भी वास्तव में दंगे बने रहे रहे| यह दोनों पक्षों के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक संतुलन के कारण हुआ और किसी एक पक्ष में खड़ा हो पाना किसी भी राजनीति के लिए लाभकारी न रहा| 

स्थानापन्न कर पाने की क्षमता और उस क्षमता को प्रयोग कर पाने की इच्छाशक्ति का पैदा होना किसी भी दंगे के लिए पैदल सेना तैयार करता है| दंगों को नरसंहार में बदलने के लिए रणनीति और राजनीति उसके बाद पैदा होती है|

यह उपन्यास दंगों के आर्थिक पहलू को भली भांति छूता और यथोचित विवेचना करता है| इन विवेचनाओं को बहुत खूबसूरती से कथावस्तु में पिरोया गया है| कई बार लगता है समस्त विवेचना बहुत ही “सांप्रदायिकनिरपेक्षतावादी” और दोनों पक्षों के सांप्रदायिकतावाद को हाशिये पर रख देती है| वैसे भी घृणा, आरोप-प्रत्यारोप और पुरानी रंजिशों के आलवा सांप्रदायिकतावाद के पास होता क्या है?

जहाँ इस उपन्यास में बिगड़ता हुआ सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक ढाँचा मानवीय त्रासदी के रूप में हमारे सामने खड़ा होता है वहीं इसी कथा के हाशिए पर बनते बिगड़ते पारवारिक व सामाजिक संबंध एक नए समाज की नींव रख रहे हैं| यह सब इस समाज और इस उपन्यास की उपधारा में हो रहा है| उम्मीद की जा सकती है यह उपधारा धीरे धीरे ही सही मगर समाज की मुख्यधारा बनेगी और उससे भी अधिक अपने को मुख्यधारा कहने का साहस जुटाएगी| 

यदाकदा तथ्यपूर्ण बोझिल हो जाने के कारण गंभीर पाठक के लिए इस उपन्यास की पठनीयता बढ़ी है| फुटनोट भी बिना पढ़े समझे नहीं रहा जाता| 

पुस्तक: कर्बला दर कर्बला
विधा: उपन्यास,
लेखक: गौरीनाथ
संस्कारण: दूसरा पेपरबैक, फरवरी 2022 
प्रकाशक: अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद
पृष्ठ संख्या: 256 मूल्य: 295.00
आईएसबीएन: 978-93-91925-65-9
http://www.antikaprakashan.com/index.php

दिल्ली में गर्मी के रंग


दिल्ली में गर्मी का बड़ा रंग रहता है| 

छब्बीस जनवरी को दिल्ली में गर्मी का डर किसी इल्ली की तरह तितली बनने के लिए जोर मारने लगता है| उसके दो चार दिन बाद बीटिंग रिट्रीट तो खैर होती ही सर्दी की विदाई के लिए है| दिल तय नहीं करता कि सर्दी जाने का गम किया जाए कि गर्मी आने कि तैयारी| फिर भी हौसला रखा ही जाता है| वातानुशीलन और वातानुकूलन के इंतजमात दुरुस्त करने की खानदानी हिदायतें दिमाग में कुलबुलाने लगती हैं| मगर सर्दियों वाला आलस सिर पर तारी रहता है| 

फिर अचानक जब कोई कहे, आज पुरानी दौलत का चाट नहीं दिखी, तो एक हाथ पंखा झलने पर लग जाता है| यह दिल्ली की नजाकत है कि इस बेवक्त के मौसम को ऋतुराज बसंत कहकर सिर माथे लगा लिया जाता है| कुछेक भटकी जवानियों और सांस्कृतिक बुढ़ापों के अलावा इस मौसम का कोई पूछने वला नहीं| यह लोग अपने वक्त और उम्र के तकाजे के साथ दिल्ली के भीड़भाड़ वाले वीरानों में बसंत मना लिया जाता है| बूढ़ों की रूमानी यादों के सहारे जवान अपनी रूमानियत की नींव रखते हुये, गर्मी का शुरुआती जश्न मना लेते हैं| 

इन्हीं दिनों, कुछ खास रूमानी इलाकों में पहले पलाश और फिर अमलताश रंग बिखेरते हैं और दिल्ली के गिने चुने रंगमिज़ाज इनके सुर्ख और जर्द रंगों में अपनी ज़िंदगी में कुछ रंग भरने की आह नुमा बातें करते हैं| 

मौसम का भी क्या है कुछ मनचलों की बातें है वरना तो घर से निकले गाड़ी में बैठे, गाड़ी से निकले दफ़्तर जा बैठे वाली बदरंग, बदनुमा, बदजात ज़िंदगी जीने वालों के लिए तो बस सोहर से शमशान एक ही मौसम रहता है| वैसे तो सोहर और त्रियोदसी जैसे शब्द भी दिल्ली में नहीं रहते| 

अगर होली की आमद न हो तो कोई इसे न पूछे| होली भी इनकी क्या कहिए, बहुत हुआ कि दो चार फिल्मी इल्मी होली गीत सुन लिए, कहीं किसी शास्त्रीय कड़ी टपक गई तो चैती, होली के साथ गाँजा और ठंडाई को बदनाम किया और विलायती के दो चार घूंट हलक से उतार लिए, कुछ बचा तो गुलाल का तिलक लगाकर दो चार छायाचित्र उतार लिए| 

उधर फिर अचानक एक दिन समाचार सुनाई देता है, आज का तापमान अड़तीस पार कर गया| दूसरी तरफ से हमारे गौरसिंह फरमाते हैं, अभी तो कई दिन तक बहुत काम है अगले हफ्ते आते हैं आपका पंखा, वातशीतक, वातानुकूलन सब दुरुस्त करते हैं| उन्हें जब आना होता है तब आते हैं और उलहना यह कि जब बुलाने का सही समय होता है हम बुलाते नहीं| खैर उसके बाद दिल्ली में किसे गर्मी याद आती है? किसी दिन पैदल बाहर निकालना पड़े तो जरूर उन लोगों का ख्याल आता है जो गर्मी में सड़क पर रोजी रोटी के लिए लगे होते हैं| 

कई बार लगता है कि दिल्ली में गर्मी का आना बड़े मान की बात है| जिसके घर में पंखा तक न हो, आपके घर के दरवाजे पर कहता है, आप ने वातानुकूलन चालू नहीं किया अभी, हम तो बिना वातानुकूलन के मरने भी न जाएँ|

जिन्हें खाने पीने को न निकलता हो वो भी एक बार पहाड़ का हवाई टिकट निकाल कर कम से कम रद्द तो करवा ही देते हैं, कम से कम अपनी नौकरनी को दिखा ही देंगे कि बस जा ही नहीं पाये वरना तो इस साल का पच्चीसवाँ रासरंग तो पहाड़ वाले बंगले पर ही करने वाले थे| जिन्हें कुछ छूट मिल जाती है वो किसी सप्ताहांत कुछ न हो तो कहीं आसपास तक चक्कर आते हैं| 

इस सब के बाबजूद गर्मी का रंग बना रहता है| तरह तरह से शर्बत दुकानों में सजते हैं, लस्सी की फरमाइश रहती है, फ़ालूदा कुल्फ़ी के साथ न भक्षणे पर इज्जत का फ़ालूदा होने का खतरा रहता है| 

गर्मियों में सबसे नापसंद बात होती है बच्चों की छुट्टियाँ| उन्हें हिल्ले से लगाए रखने के लिए विद्यालय गृहकार्य के नाम पर बालशोषण थमा देते हैं| होता तो दरअसल यूँ हैं कि माँ बाप ढूंढते हैं वह विद्यालय जहां इतना काम मिले कि औलाद कहीं घूमने जाने के लिए न कह दे| फिर भी न माँ बाप का दिल मानता हैं न विद्यालय वालों की तिजोरी, कि गर्मी के तम्बू (समर कैंप, ही पढ़ें) के नाम पर छुट्टियों को वो सरकारी काम बना दिया जाता है जिसे कोई हाकिम नहीं मिलता| आपको नोएडा वाले रोहिणी और रोहिणी वाले द्वारका में गर्मी की छुट्टियाँ बिताने की शाही रस्म करते नजर आ जाएँगे| 

अपना इतना अपमान होते देख गर्मियों का पारा क्रोध से चढ़ता चला जाता है| 

निगाह मेघदूत पर लगी रहती हैं, मौसम के तमाम भविष्यवक्ता, अपनी पत्रा और रडार लेकर बैठ जाएंगे| अखबार में मानसून के नक्शे छपेंगे| असम की बाढ़ और मुंबई की बारिश की रस्मी खबरे खाने के साथ सजाई जाएंगी|

इस वक्त दिल्ली में ढंग के आम आमद होती है और कुछ दिन आम के कसीदे पढ़े जाते हैं| जामुनों को परे सरकाया जाता है, फालसे को पहचानने से इंकार कर दिया जाता है|

तभी एक दिन कुछ बारिश होती है और दिल्ली वाले राहत कि सांस लेते हुए शिकायत करते हैं कितना कीचड़ हो गया सड़क पर, पानी इतना भर गया है और जाम तो बस पूछो मत|

गर्मी रह रह कर लौटती है, जब तक कि सर्दी न आने लगें|

आय, लाभ और नॉन-प्रॉफ़ि


नॉन-प्रॉफ़िट!!

सामाजिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर अक्सर वितृष्णा भरी चर्चा होती है| खासकर तब जब वह अपनी किसी सेवा के लिए किसी प्रकार का मूल्य चुकाने या खर्चा उठाने के लिए कहें या कुछ दान दक्षिणा माँग लें| यह चर्चा सबसे पहले वह लोग करते हैं जो मुफ़्तखोरी के खिलाफ है| यह भी देखा जाता है कि मुफ़्तखोर विरोधी यह लोग, नॉन-प्रॉफ़िट, सामाजिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को मुफ़्तखोर मान कर अपने विचार रखते हैं|

सदा सरहनीय है कि सामाजिक कार्यकर्ता निजी रूप से बेहतर कार्य करें| परंतु क्या वह समाजसेवा के लिए घर-फूँक तमाशा देखें? क्या उनके पास भरने के लिए एक पेट, ढंकने के लिए के तन और सुरक्षा के लिए एक सिर नहीं है?

यह समझने की बात है कि समाज सेवा क्षेत्र किस प्रकार काम करता है| 

आम तौर पर हम कल्पना करते हैं, सही प्रकार के समाज सेवक को झोलछाप, फटेहाल होना चाहिए| 

आम धारणा में अक्सर अपने पैसे से भंडारा करतें, प्याऊ लगवाते, लक्ष्मी-नारायण मंदिर बनवाते, धर्मशाला बनवाते, विद्यालय बनवाते धन-कुबेर सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता हैं| परंतु ऐसा नहीं है| यह सभी काम यश, कीर्ति, सामाजिक स्तरता और आजकल कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व कानून के कारण हो रहे हैं| 

वास्तव में मुझे वितृष्णा होती है जब किसी बड़ी कंपनी का विज्ञापन देखता हूँ, हमारा उत्पाद खरीदकर आप शिक्षा, स्वास्थ्य आदि आदि में योगदान देते है क्यों कि हमारे हर उत्पाद की बिक्री पर इतना इतना पैसा इन अच्छे कामों पर खर्च होता है| यह खर्च करना उनका कानूनन सामाजिक दायित्व है और ऐसा न करने पर कानून अपना काम करता है| मात्र इस दान दक्षिणा के लिए हमें उनका उत्पाद खरीदने की कोई आवश्यकता नहीं है| अपने कानूनी दायित्व का उत्पाद के प्रचार के लिए प्रयोग करना मुझे उचित प्रतीत नहीं होता|

राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रिय धन कुबेर इस प्रकार के प्रचार समाचार आदि के रूप में प्रचारित करने में सफल रहते हैं कि वह अपनी संपत्ति का बड़ा प्रतिशत सामाजिक कार्यों में लगा रहे हैं| अक्सर ही ऐसा उनके स्वयं के नियंत्रण वाले “सामाजिक संस्थान” के माध्यम से लिया जाता है| प्रायः यह “सामाजिक संस्थान” उनके नियंत्रण वाले व्यवसायों के कानूनी सामाजिक दायित्वों का निर्वाहन भी कर रहा होता है| दोनों प्रकार के स्रोतों से आया धन, कानूनी सामाजिक दायित्व, यश, कीर्ति, प्रचार, प्रसार, व्यक्तिव निर्माण, सामाजिक झुकाव, राजनैतिक लगाव, और कानूनी बदलाव आदि  काम आता है| 

सामाजिक संस्थान प्रायः सोसाइटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में काम करते हैं| आम धारणा के विपरीत, अधिकतर महत्वपूर्ण सामाजिक संस्थान कंपनी होते हैं और आम प्रचलित नॉन-प्रॉफ़िट शब्द नॉन-प्रॉफ़िट कंपनी के लिए प्रयुक्त होता है जिसे आम समझ के लिए नॉन-प्रॉफ़िट संस्थान कहा जाता है| 

मूल बात है कि यह संस्था आय उत्पन्न करते हैं परंतु लाभ नहीं| लाभ और आय का यह अंतर ही इस पूरे मुद्दे का मूल है| 

सोसाइटी, समाज, सभा आदि का गठन प्रायः सदस्यों के आपसी हितों के संदर्भों मे किया जाता है| इनमें दान लेकर सामाजिक काम करने से लेकर, किसी व्यवसाय से धनार्जन करकर उस धन से सामाजिक कार्य करना शामिल है| मोहल्ला सभा, जाति सभा, मंदिर सभा, धर्मशालाएँ, आदि इस प्रकार के सोसाइटी होते हैं| बहुत से लॉबी समूह सोसाइटी हैं, जो संबन्धित व्यवसाय के हित साधन में काम करते हैं| पर्यावरण सुरक्षा, मानवाधिकार, वनवासी कल्याण आदि महत्वपूर्ण काम भी सोसाइटी कर रही हैं| भारत का क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड भी एक सोसाइटी है और हम सबकी आँखों के सामने पूर्ण व्यावसायिक तरीके से काम करते हुये भी यह आयोन्मुखी संस्था लाभोंमुखी संस्था नहीं है|

जब उद्देश्य में शुद्ध रूप से आपसी लाभ की भावना हो तो सहकारी समिति आदि का गठन होता है जो एकदम अलग बात है| 

ट्रस्ट या न्यास का गठन किसी विशेष वर्ग के लाभ के लिए किया जाता है| इनमें से पब्लिक ट्रस्ट आम जनता या बड़े जन समूह के हिट और लाभ के लिए काम करते हैं| पब्लिक ट्रस्ट प्रसाद बेचने से लेकर अन्य प्रकार के लाभप्रद (आयप्रद पढ़ें) कार्य करते हैं और इस प्रकार होने वाली कमाई या आय को आम जनता के हित में निवेश या खर्च करते हैं| न्यासी अवैतनिक और वैतनिक हो सकते हैं, परंतु किसी न्यासी को लाभांश यानि लाभ में से हिस्सा नहीं मिलता|

सामाजिक क्षेत्र का सबसे बड़ा समुदाय वर्तमान कंपनी कानून की धारा 8 या पुराने कंपनी कानून की धारा 25, के तहत गठित कंपनी हैं| यह सामाजिक यानि नॉन-प्रॉफ़िट कंपनियाँ, वाणिज्य, व्यापार, कला, विज्ञान, खेल-कूद, शिक्षा, अनुसंधान, सामाजिक कार्यों, धर्म, दान-दक्षिणा, पर्यावरण, आदि आदि काम करतीं हैं| इनमें दिल्ली जिमख़ाना क्लब, रिलायंस रिसर्च इंस्टीट्यूट, इंडियन मोशन पिक्चर प्रोड्यूसर असोशिएशन, लघु उद्योग भारती, विश्व गुजराती परिषद, यूनाइटेड न्यूज़ इंडिया, ब क बिड़ला फ़ाउंडेशन, आदि बहुत से उदाहरण आप यहाँ (https://www.mca.gov.in/MCA21/dca/RegulatoryRep/pdf/Section25_Companies.pdf) ढूंढ सकते हैं| 1887 में गठित अलीगढ़ की भारतवर्षीय नेशनल असोशिएशन (U99999UP1887NPL000012) अब तक काम कर रही शायद देश में सबसे पुरानी नॉन-प्रॉफ़िट कंपनी है|

आम कंपनी से अलग इन्हें अपना लाभांश बांटने की अनुमति नहीं होती| यह अंतर ही इन्हें आम कंपनी से अलग करता है| शब्दों का हेर-फेर है| जब हम किसी भी वस्तु या सेवा को बेचकर या प्रदान कर कर उसके बदले कुछ धन जुटाते हैं तो इस से हमें कुछ आय होती है| नॉन-प्रॉफ़िट के मामलों में, खर्च से अधिक आय तो हो सकती है परंतु उसे कानूनन लाभ नहीं कहा जा सकता और इस लिए उस में से लाभांश नहीं दिया जा सकता| 

यदि हम खर्च से अधिक आय को लाभ कहते हैं तो इस लाभ पर मूलतः निवेशक का अधिकार बनता है| आम भाषा में यह निवेशक सोसाइटी के सदस्य, अधिकतर मामलों मे न्यास के न्यासी, और कंपनी के अंशधारक होते हैं| आम लाभकारी संस्थान या कंपनी के मामलों में इन्हें लाभांश मिलता है| 

अक्सर प्रश्न उठता है कि फिर कोई इन लाभांश रहित कंपनी में निवेश क्यों करेगा और निदेशक क्यों बनेगा? निवेश सामाजिक यश, कीर्ति, सदेच्छा, प्रतिष्ठा के लिए किया जाता है| बहुत से नॉन-प्रॉफ़िट में सदस्यता शुल्क आकर्षक रूप से अधिक होता है| निदेशक तथा अन्य कार्यकारी अधिकारियों व कर्मचारियों को बढ़िया वेतन भत्ते दिये जाते हैं| वरना कोई इतने महत्वपूर्ण, बुद्धि और श्रम युक्त कार्य क्यों करेगा| 

सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य वह नॉन-प्रॉफ़िट करते हैं जो शुद्ध सनकीपन के कारण अस्तित्व पाते है और बड़े उद्देश्य पूरे करते हैं| इनके संस्थापक या निदेशक प्रायः खाली कम वेतन पर पूर्णकालिक या अल्पकालिक रूप से इन संस्थानों को समय देकर महत्वपूर्ण काम अंजाम देते हैं|

यदि आप किसी भी संस्था के काम से प्रभावित और प्रसन्न है और वह संस्था दान स्वीकार करती है तो उसे दान अवश्य दें जिससे वह उसके अधिकारी व कर्मचारी बेहतर वेतन भत्तों के साथ प्रसन्नता पूर्वक बेहतर काम कर सकें|  इस बात से गच्चा न खाएं की यह बढ़िया काम करने वाला संस्थान अपनी किसी सेवा को महंगे दाम में बेचता है| उदाहरण के लिए, किसी विशेष कला का प्रचार करने वाला संस्थान उस कला को महंगे दाम में बेचकर कलाकार को बेहतर लाभ, सुविधा, प्रशिक्षण, व जीवनशैली दे रहा हो, या आपको मुफ्त ज्ञान बाँटने वाली संस्था कुछ ज्ञान किसी दूसरे को महंगे दाम पर दे रहा हो, या आप बढ़िया खादी महंगे दाम पर ले रहे हों| 

अच्छे कामों का हिस्सा बनते रहें|