भूला गया वानप्रस्थ 


सरस्वती पूजन के समय भारतीय बच्चे पूछ लेते हैं, माँ के हाथ में अजीब सा गिटार क्या है? संस्कृति के जयघोष लगाने वाले भी जीवन में शायद कभी भारतीय शास्त्रीय संगीत सुन लेते हैं। यह लंबे समय तक मुग़लों, सुल्तानों और तवायफ़ों का मोहताज रहा और आज देश छोड़ कर विदेश में अपने को रोपने का प्रयास कर रहा है। जब कोई ईनाम मेहरबान हो जाए तो जयघोष की रस्म भी अदा हो जाती है। 

वानप्रस्थ भारतीय संस्कृति का वह पहलू है जिसे विस्मृत कर देना संस्कृति में आवश्यक माना जा रहा है। छात्र जीवन के बाद विरले ही कोई इस आश्रम का नाम लेता हो और चालीस पार करने के बाद तो इसका नाम लेना पाप माना जाता है। आजकल हम सयुंक्त परिवार, माता पिता की सेवा और श्रवण कुमार की गाथा गाते हैं। ध्यान नहीं देना श्रवण ने माता पिता की क्या इच्छा पूरी की? तीर्थ यात्रा!! आपने कब सोचा तीर्थ जाने के लिए? उन्हें तो अंधेपन ने बेटे का सहारा लेने के लिए बाध्य किया वरना वह खुद वानप्रस्थ लेते और चल देते। बस अपने मतलब की प्रेरणा लीजिएगा?

आजकल चलन हुआ है, शायद पुरुषों में अधिक है, बुढ़ापे में की साथ नहीं बैठता जैसी कहानियाँ किस्से और फ़ेसबुकिया पोस्ट लिखने का। बहुत कमा लिया आपने और अब सेवा चाहिए – उलहना यह – पत्नी भी ध्यान नहीं देती – रसोई में और बच्चों में लगी रहती है। सोचता हूँ, इनकी पत्नियाँ इनके बुढ़ापे के साथ बूढ़ी क्यों नहीं होतीं। 

आपने भी रसोई जैसे किसी रचनात्मक काम में ध्यान लगाया होता तो शायद कुछ दिन और जवान रहते। 

वैसे भी यह बुढ़ापा और नीरसता मध्य वर्ग का रोग है। सेवानिवृत्त जज साहब बाबू साहब प्रोफ़ेसर साहब किसी न्यायाधिकरण, प्राधिकरण, आयोग या समिति में बैठकर राष्ट्र करते हैं तो बड़े उद्योगपति किसी फाउंडेशन, समिति, संस्था, ट्रस्ट आदि में जा समाज की सेवा करते हैं। वकील साहब, डाक्टर साहब सब अपने धंधे नाम प्रकार आकार बदल कर मरने तक खोले रहते हैं। इनमें से तो कोई नहीं कहता, बहुत सेवा कर ली, अब बच्चे सेवा करें। निम्न वर्ग तो चर्चा से बाहर ही है, मरने तक कमाते रहिए। 

मध्यवर्ग को मात्र रोना आता है – मात्र हम कर देते हैं जैसे निम्न वर्ग जीएसटी न देता हो, सरकार हमें कुछ नहीं देती – जैसे यह बहुत मतदान करते हों, उद्योग किसान को सबसिडी मिलती है – जैसे उसका सस्ता उत्पाद यह न खाते हों, स्पेक्ट्रम घोटाला हो जाता है – जैसे सस्ती दर पर बात यह न करते हों। यह आदत ही इनका बुढ़ापा हो जाती है। ऊपर से यह लोग बिना बुलाए भगवान के घर न जाएँ और जब घूमने का मन हो तो चलो बुलावा आया है माता ने बुलाया है। वर्षों देशाटन के विचार बनेंगे पर यात्रा का कष्ट होगा। अपनी हारी-बीमारी सब आएं पर जाने के नाम पर यह याद है कि कौन कब नहीं आया था। मनपसंद का खाना न मिले तो कोई सुनता नहीं, मनपसंद का खाना मिले तो हम सुनते नहीं, अगले दिन बुढ़ापे में पेट खराब ही रहता है। 

जिस ने भी अपनी जवानी में अपने बूढ़े माँ बाप को गाँव में छोड़ दिया और अपनी पत्नी को दोष पड़ते रहने दिया, अब “बच्चे नालायक है” का गाना गाते हैं। ऊपर से तुर्रा यह कि उनका बुढ़ापा नहीं पचास साला सनक थी और हमारा साठ साला बुढ़ापा। मजे हैं, रहिए जिंदा लंबा – मत सुनिए – रहिमन विपदा हू भली, जो थोड़े दिन होय – आप महामारी बन कर अपने जीवन पर पड़े हैं। सोचिए न कभी जिस उम्र में आपके माँ बाप बूढ़े होने लगे आज आपके उस उम्र के बच्चे आपकी सेवा कर रहे हैं – पचास साल की उम्र। आपकी चारों उँगलियाँ घी में। बात हल्के ढंग से कही जा रही है पर हल्की नहीं है।

इंसान की लंबी उम्र बच्चों के जीवन पर सिरदर्द न हो, इसलिए ही तो वानप्रस्थ है। आप समाज के लिए और समाज आपके लिए। आपको पश्चिमी देशों के वृद्धाश्रम में दोष निकालने से फुर्सत हो तब न वानप्रस्थ समझिएगा। अब औलाद औरंगजेब न बने तो क्या करे, समय पर हज के लिए निकल लें तो पत्नी की कब्र पकड़ कर न रोना पड़े। जिन्हें इस बात से आपत्ति हो तो सोचें, इस्लाम ने वानप्रस्थ का नाश कर दिया वरना आप कान पकड़ कर जंगल भेज दिए जाते। फिर यह सोचें कि हर धर्म कहता है जीवन की जिम्मेदारियाँ पूरी होते ही हज या तीर्थ यात्रा आदि हो, निकल लें, समाज में समाज के लिए जीवन अर्पित करें। बच्चों को बांधने और उनके आपके बंद कमरे में आने का इंतजार करने के बेहतर है खुद को अपने आप से अपने कमरे से और अपनी सनक से आजाद करें। बूढ़ों के नाम पर लिखी हिन्दी कहानियाँ न पढ़ें, भले ही वनमाली-कथा में छपी हों।

दिल्ली


भारत के केंद्र में
दिल्ली
देश की देहली है
जिसे बिना लाँघे
आप देख सकतीं हैं
हमारे बिम्ब हजार|

ख़ान बाज़ार में खनकती खुशहाली
हमारी हफ़्ताई हाटों में
जेब कतरों से बचाकर
अपनी जरूरतों से आँख बचाकर
घर की खुशियाँ बटोरते हम|

सातों मृत मृत्युंजय दिल्लियाँ
उनके बिखरे वैभव
उनके धड़कते खुले दिल
नए रंग हमारे
हमारी जिजीविषा|

दरिया सी बहती दिल्ली,
रायसीना सी अकड़ती दिल्ली,
चाँदनी चौक चमकती दिल्ली,
दीवाली सी जगमग दिल्ली,
होली सी दिलरंगी दिल्ली|

मरियल दिल्ली,
करियल दिल्ली,
हरियल दिल्ली,
अड़ियल दिल्ली,
कड़ियल दिल्ली|


सुनो जोशीमठ


सुनो जोशीमठ ,

अकेले नहीं हो तुम| तुम ही अकेले नहीं हो| अकेले नहीं ढह रहे हो तुम| तुम्हारे साथ मैं भी हूँ| तुम्हारे साथ हम भी हैं|

तुम्हारी ऊँचाइयों पर जब तब पैरों के नीचे से दरकने लगती है जमीन| इसमें नया तो कुछ नहीं| कुछ भी तो नया नहीं है| ऊँचाइयाँ कितनी आकर्षक होतीं हैं, उफ़, उतनी अच्छी भी तो नहीं होती| ऊँचाइयाँ दरकती ही रहती हैं| कौन है जो ऊंचाइयों की माया में नहीं फँसता? कौन है तो ऊंचाइयों से नहीं फिसलता – लुढ़कना? 

उफ़! यह भी तो सच नहीं हैं| फिसलना लुढ़कना तो चलता ही रहता है भले ही आप जमीन पर हों, जमीन के नीचे गढ़े हों, अनंत गहराइयों में आपकी नींव गड़ी हो| सोचो तो कभी पृथ्वी भी तो लुढ़कती है हर पल लट्टू की तरह, फिरकनी की तरह|

नहीं मैं कुछ नहीं कहना चाहती| मेरा तुम्हारा दुःख सांझा है| कभी मेरी भी सुनो| 

हमें दूसरों के कष्ट के सब कारण पता होते हैं और अपनी सफलताओं के भी| हम जानते है दूसरों के सुख और अपने कष्ट| चलो मिलकर चलते हैं, मैं अपने कष्ट और तुम्हारे कष्टों का कारण तुम्हें सुनाऊँ और तुम मुझे| चलो मेरे साथ, तुम्हें कुरेदने की चाहत कुछ मुझे भी तो कुरेदेगी| चलो हम एक दूसरे को कुरेदें|

सड़क बिजली और पानी तुम्हारे लिए तबाही लाते हैं, मेरे लिए भी| मानव को विकास क्रम में सरल और स्वतंत्र हो जाना चाहिए था| पर आदर्श स्वप्नलोक में विचरते हैं, अस्तित्व में नहीं उतरते|

आज विकास की बेड़ी में जकड़ा मानव उन्नति की वेदी में अपनी बलि दे रहा है और उस विकास यज्ञ में स्वाहा हो रहा है उसका तन, मन, चित्त, चरित्र, श्रम, परिश्रम, विश्राम, समय, भूत, भविष्य, सौन्दर्य, प्रकृति, पृथ्वी, हम सब और तुम सब|

जब तुम्हारे नीचे से धरती दरक रही है, मेरे पैरों के नीचे से दरक रहा है पानी चुपचाप, बिना चेतावनी, बिना ध्यानाकर्षण, बिना चर्चा| मैं भी दरक रही हूँ तुम्हारी तरह| नहीं, शायद तुम्हारी तरह नहीं, बहुत धीरे धीरे| मेरे नीचे की धरती धंस रही है धरती में बरस दर बरस| 

मेरे पाँव तले पानी नहीं हैं, मैं शुष्क हो चली हूँ| ठीक उस तरह जिस तरह आधुनिक मानव की आँख शुष्क होती है| अब शर्म से मेरी आँखों में पानी नहीं आता,भले ही कोई प्यासा रह जाए| बचा खुचा पानी आँखों तक चढ़ आता है, जब संतानों द्वारा दी गई अनंत पीड़ा मुझे फिर फिर घेरती है|

हर बारिश तुम फिसलते हो रपटते हो, हम देखते है वर्षा के वशीभूत तुम्हारा स्खलन| कितना रूमानी लगता होगा तुम्हें सुंदर मौसम तुम्हारा स्खलन? तुम्हें याद होगा ऐसे ही एक रोज मौज चढ़ी तो केदार तक, स्खलित हो गए थे एक के बाद एक पहाड़| नहीं, मुझे मत कहो तुम संवेदनहीन| नहीं, मेरा तुम्हारा दुःख तो सांझा है| यह मेरा क्रदन है|

जब तब सोचती रही हूँ, कम से कम तुम्हारे पास सुंदर साँसें हैं| स्वच्छ वायु है- प्राणवायु है| मेरे पास क्या है? फिर ध्यान आता है यदि जीवन ही न हो तब इस स्वच्छ प्राणवायु का क्या करोगे तुम? फिर हर पल अपनी घुटती रूंधतीं साँसे ध्यान आतीं हैं, आँखों की जलन याद आती है, सीने की जकड़न याद आती है, हर सप्ताह की खाँसी याद आती है| पैसे से खरीदे जा रहे सुख याद आते है: वायु शोधक, रोग-प्रतिरोधक, स्वास्थ्यवर्धक, जीवन संरक्षक| किस से मैं अपना बचाव करूँ? अपनी साँसों से – अपने फैलाये प्रदूषण से| 

दुःखता है दिल, जब सुनती हूँ – दिल्ली ऊँचा सुनती है| कितना शोर है मेरे पास – सिर्फ़ सत्ता ही शोर नहीं मचाती, सत्ता के पास होने का थोथपन उस से अधिक शोर मचाता है| सोचो तो तुम, नई दिल्ली के बाहर का हर शख़्स अपने पते में पूरे शान-ओ-ईमान से लिखता है- नई दिल्ली| क्या कहूँ तुमसे| झूठी शान जीते जीते सात जिंदगियाँ जी चुकी – कितना कष्ट भोगना होगा|

मुक्ति जितना जल्द हो, सुखद है – हर दिन न कहना पड़े – ईश्वर उठा ले मुझे|

कम लिखा अधिक समझना| इस सब को गुनने के लिए तो फ़िलवक्त कितना बचोगे तुम, नहीं जानती|
तुम्हारी बेहद बड़ी बहन|

दिल्ली