गरीबी रेखा की समाप्ति


प्रिय जनसेवक महोदय,

 

विभिन्न समाचार माध्यमों से समाचार माध्यमो से समाचार मिल रहा है कि आपको मष्तिष्क का कोई बेहद संक्रामक रोग हो गया है| अतः आपने इस देश से गरीबी जैसे कलंक का नाम निशान मिटा देने का संकल्प लिया है| अति प्रसन्नता हुई| इस देश में आजतक किसी भी स्वस्थ्य व्यक्ति ने यह साहस नहीं दिखाया है, यह सदा ही खेद का विषय रहा है|

 

अभी आपने गरीबी रेखा को दैनिक खर्च की नई “उचाईयों” से जोड़ दिया है| आपने अतुल्य साहस का परिचय देकर, नगर क्षेत्रों में गरीब कहलाने के लिए खर्च की समय सीमा कानूनन ३२ रूपए और गाँव देहात में २६ रुपये निर्धारित कर दी है| अभी तक विश्व बैंक वाली गन्दी मानसिकता वाले लोग इसे २ अमरीकी डालर बता रहे थे| इस तरह वो भारत को बदनाम करना चाहते थे| इस नई व्यवस्था से आपने एक कलम हिलाकर करोड़ो घटिया लोगों की गरीबी खत्म कर दी| सही है, कलम में तलवार से भी बड़ी ताकत है|

मैं जानता हूँ कि यह छोटे मुँह बड़ी बात होगी, परन्तु मेरा आपसे विनम्र निवेदन है कि इस गरीबी रेखा जैसी निहायत ही गन्दी चीज को खत्म कर दीजिए और देश को गरीबी से मुक्ति दिला दीजिए|

 

एक और विनम्र निवेदन है, थोड़ा सा कष्ट जरूर होगा परन्तु आप या आपका कोई सम्मानित प्रतिनिधि किसी सार्वजनिक स्थान पर आकर हमें यह प्रस्तुतिकरण दे कि किस प्रकार देश की अबोध जनता इस जादुई धनराशि में अपना पेट भर सकती है| मेरा प्रस्ताव यह कि आप दिल्ली के रामलीला मैदान या मुंबई के आजाद मैदान में आयें, महीने भर सबके सामने रहें, जनता आपको ३१०० रूपये (१०० रूपये प्रतिदिन) चन्दा कर कर दे, उस जमा धन से आप महीने भर पेट भर मौज करें| इस पुनीत प्रदर्शन से जनता का अवश्य मार्गदर्शन होगा|

 

आशा है कि देश की तुच्छ जनता शीघ्र ही ३२ रूपये में पेट भरना सीख जायेगी|

धन्यवाद सहित,

ऐश्वर्य मोहन गहराना

दंगानामा


भैया रे, अब तो सुना है कि विलायत के लन्दन शहर में भी दंगा हो गया| चलो जी अब हमारा अलीगढ और लन्दन भाई भाई हो गए इस नाते| चलो पहले अपने दर्द दिखा कर मन हल्का कर ले फिर लन्दन देखेंगे|

बचपन में अगर कोई पूछता कि तुम्हारे अलीगढ में दंगा क्यों होता है, तो मन करता कि पूंछू कि तुम्हारे पेट में मरोड़ क्यों होता है| अगर हम किसी नाते रिश्तेदारी में जाते और बच्चों का हुडदंग होता तो नाक चढ़ा कर कोई न कोई जनानी बोलती, अलीगढ वाले आये है; सबको पता चल रहा है| एटा वाली मौसी के पडोसी बोलते भाई, हमारे यहाँ भी तो मुसलमां उतने ही है जितने अलीगढ़ में; मगर हमारे यहाँ तो दंगा नहीं होता| अब भाई दंगा करने के लिए भी ज़िगर चाहिए होता है, कारण ढूँढना पड़ता है, तमाम बातें होती है| फिर चुनाव वगैरह के समीकरण भी देखने होते है| ऐसा थोड़े है कि मन आया और; अइयो रे और दइयो रे; शुरू धूम-धडाका, फटे पटाखा|

बारह तेरह साल पहले के दंगे को लें, क्या बात थी क्या नजारा था| मैं धर्मसमाज कालिज में पढ़ता था, सकूं भर बसंत बहारी दिन थे| सुबह पढ़ने निकले और अचलताल होकर क्लास रूम पहुँच गए| अभी दस मिनट हुए थे कि बूढ़ा चपरासी भागता आया, प्रिंसिपल साब ने बोला है दंगा हो गया है, पढ़ाई बंद करो, बच्चन को घर भेज दो| अब हमारा सनकी प्रोफेसर, बोला कब हुआ दंगा, अभी दस मिनिट पहले तो घर से आ रहा हूँ, कहीं कोई चर्चा तक नहीं थी| ये साला बूढ़ा सनक गया है| चपरासी अपना सा मुहँ और फटा कलेजा लेकर चला गया| पीछे पीछे लिखित फरमान आ पहुँचा| पता लगा कि आधा घंटा पहले बाहर अचल पर दंगा हुआ है, सराय सुल्तानी पर आगजनी भी हो गयी है| अब मैं सोचूँ, भाई आधा घंटा पहले दंगा हुआ, पन्द्रह मिनिट पहले मैं ठीक अचल पर था, दस मिनिट पहले आगजनी भी हो गयी| चलो खैर, कुछ सोचते विचारते घर को निकल गया| रस्ते में हर किसी को घर लोटने की जल्दी थी, एक दुसरे कि चिंता थी| हिन्दू इलाके के लोग मुसलमान को देख कर जल्दी घर जाने कि सलाह दे रहे थे तो एक नातेरिश्ते ले दुश्मनों से बचकर चलने की सलाह भी मुफ्त दे रहे थे| इन मौको पर रंजिश निकालने का खूब मौक़ा रहता है| घर मेरा लाइन पार दस मिनिट दूर था| बे मौक़ा घर पर देखकर माँ को गुस्सा आया जब बताया कि दंगा है तो उनकी चिंता बढ़ गयी| बोली दौड़ कर बहन को देख ला वो तो कलिज से नहीं लोटी, तब तक मैं सामान कि लिस्ट बना देती हूँ, बाजार से ले आना| मैं उलटे पाँव लौट लिया वापस कॉलिज पहुँचा| वहाँ पर चपरासी ने बोला सब लड़कियों को पिछले दरवाजे से लाइन पार करा दिया है अब तक तो लली घर पहुँच गयी होगीं| लौटे तो रास्ते में फ्लैग मार्च शुरू हो चुका था| आगे आगे एक जीप में कर्फू का एलान हो रहा था और जनता से जल्द घर पहुँच जाने की अपील थी| जनता सुन नहीं रही थी, सबको गल्ला राशन जो खरीदना था| पीछे पुलिस की खाली गाड़ियां थीं और उनके पीछे डरे सिमटे पैदल सिपाही| अलीगढ  पुलिस के इस साहसिक शक्ति प्रदर्शन पर मुझे अंदर ही अंदर हँसी आ रही थी| आखिर ये पुलिस वाले भी तो इंसान ही तो  है| जब घर पंहुचा तब तक बहन घर पर पहुँच गया| तभी माँ ने आकार सामान की लिस्ट पकड़ा दी| अनुभव बताता है कि अगर घर में सामान नहीं रहा तो दंगे बहुत भारी पड़ सकते है| अगर आपके घर में पूरी रसद है तो आप सुरक्षित है|

मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि अलीगढ़ में दंगा हुआ है, मुझे लगता था कि कोई सरकारी मजाक है| मगर शाम को आकाशवाणी, दूरदर्शन और बीबीसी ने भी दंगो की पुष्टी कर दी थी| विदेश के किसी अखबार में लिखा गया कि भारत की राजधानी की नाक के ठीक नीचे गृहयुद्ध की स्थिति बन रही है| खैर, अब यह टीवी पर सिनेमा देखने, सड़क पर क्रिकेट खेलने और मन करने पर पढाई करने का दिन था| इस समय दुनिया की कोई भी ताकत अलीगढ़ में बिजली काटने का आदेश नहीं दे सकती थी| पानी नल से खत्म नहीं होता था| जिन इलाको में पूरा कर्फू था वहाँ पर जरूर बच्चे चोर सिपाही या आई स्पाई का खेल रहे थे जिसमे गलियों में उंघते पुलिसिये वास्तविक सिपाही थे|

 

एक और दंगे की याद है| मैं एक चार्टर्ड अकाउन्टेंट फर्म के साथ काम कर रहा था| हम अपने जिस क्लाइंट के दफ्तर में थे वो मुस्लिम थे और एक को छोड़ कर उनके सारे मुलाजिम भी| दंगे की खबर आते ही उनका हुक्म आया की पास की दूकान से समौसे मांगा कर हम लोग खा पी लें| जैसे पुलिस की गाड़ी आती है वह हमें खुद हमारे मुहल्लों तक छोड़ देंगे| हमारा एक ट्रेनी अलीगढ़ के बाहर का था, बोला कहीं मुसल्ला मार तो नहीं देगा| मैंने कहा, घर बुलाएं मेहमान को कौन मारता है| खैर, जब पुलिस की गाड़ी आयी हम क्लाइंट की गाडी में थे और पुलिस की गाड़ी हमारे आगे आगे| आखिर वो हमें पुलिस के भरोसे नहीं छोड़ सकते थे, क्या पता नेताओं के क्या आदेश हों|

इस तरह अलीगढ़ के दंगे कुछेक मौतों के अलावा आराम से बीत जाते है| मगर देश भर नफरत का गंदा जलील खेल और बढ़ जाता है| लोग अपनी आपसी रंजिश निपटा लेते है, और मरने वाले के घरवाले मुआवजे के लालच में चुप भी रहते है और अगले दंगे का इन्तजार करते है|

अलीगढ़ का आखिरी बुरा दंगा १९९२ वाला था|

(सभी विचार मेरी निजी समझ पर आधारित है, राजनितिक, सरकारी और अन्य निजी विचारों से कतई मेल नहीं खाते|)

साईकिल बे-कार नहीं है!!


बचपन में पंडित सुदर्शन की कहानी पढ़ी थी, साईकिल की सवारी| तभी से मन में यह भाव घर कर गया कि आपका स्वास्थ्य, समय और संसार सब कुछ एक अदद साइकिल के बिना सफल नहीं को सकता| उस समय मुझे स्कूटर चलाना तो आता था पर साइकिल नहीं| हेंडल सम्हालने से साथ पैर चलाना एक मुश्किल काम था| आज भी मुझे लगता है कि साइकिल चलाना निपुण प्रवीण लोगो का काम है और आरामपसंद लोग इसे नहीं कर सकते| अब दिल्ली शहर को देखिये सब लोग दिन भर कार में चलते है, और अपनी ख़ूबसूरत शामें किसी महफ़िल कि जगह जिम में बर्बाद करते है| मजे कि बात ये कि यही लोग हर रोज पर्यावरण प्रदूषण पर बतकही करते है| दूसरी और यूरोप में बड़े बड़े लोग साईकिल पर घूमते है| सब मर्म समझने की बात है, साईकिल चलना और उसे बढ़ावा देना आज की जरूरत है| यह बढ़ती महंगाई में घर के बज़ट को ठीक रखती है, आपके एक अच्छी कसरत देती है और पर्यावरण की साफ़ सुथरा बनाने में इसका बढ़ा योगदान है|

यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि यहाँ लोग साईकिल को गाँव गँवार, नौकर मजदूर की सवारी समझते है| अरे भाई! दिखावे से न आप का घर चलता है न ही देश| सस्ती सुन्दर साईकिल दुनिया भर में शान की बात है, अपने यहाँ क्या बात हो गई| साइकिल को नीचा करके रखना तो बढ़ी बढ़ी मोटर कंपनी वालो की साजिश है, अपना माल बेचने की| मोटर कार महंगी आती है, रखरखाव पर अधिक खर्च होता है, जगह भी अधिक लेती है, ईधन भी मांगती है, बदले में आपको बिमारी ही देती है| मैं किसी भी तरह कार के खिलाफ नहीं हूँ, परन्तु दोनों की उपयोगिता भिन्न है| हमें एक दो किलोमीटर की दूरी के लिए कार के प्रयोग से बचना चाहिये|

दुनिया भर में सडको पर अलग से साईकिल लेन हैं, हमारे यहाँ उस पर सफेदपोश लोग बेकार मैं कार खड़ी कर देते है| कोई उन्हें कुछ नहीं कहता कि बाबूजी, पार्किंग में कार खड़ी करने के पैसे नहीं थे तो क्यों ये हाथी पाल लिया| खाई, छोड़िये उन बेचारों को| यहाँ तो साईकिल कि बात करनी है|

पुद्दुचेरे सहित देश के कई शहर में आज भी घूमने के लिये साइकिल किराए पर मिल जाती है| दिल्ली मेट्रो आजकल उधार पर साइकिल देती है, पार्किंग कि सुविधा भी| यह उसका अपने सामाजिक जिम्मेदारी निभाने का तरीका है|साईकिल के प्रयोग को इसी तरह के प्रोत्साहन की जरूरत है|