वो उधार वापिसी…


आज कल के हिसाब से तंगहाली का जमाना था, जिसे नए नए बुढ्डे सस्ते का जमाना भी कह सकते हैं| लोगों की इज्ज़त पैसे से नहीं उसके दुआ – सलाम करने के क़ायदे से होती थी| ये तो वही बातें हैं, जिन्हें हम हर गुजरे ज़माने के लिए लिखते कहते हैं|

हर बुधवार और शुक्रवार को मोहल्ले के बच्चे शाम को एक घर में इकठ्ठे होते थे और दूरदर्शन पर रामायण देख कर लोग रोया या हंसा करते थे| कच्ची धूप वाली लड़कियां हमें पसंद आया करतीं थीं| उस समय कंप्यूटर बड़ी बड़ी कंपनियों और विश्वविद्यालयों में पाया जाता था, सरकार देश भर में कंप्यूटर लगा कर हर गरीब को बेरोजगार कर देना चाहती थी| इसी सिलसिले में हमारे सरकारी स्कूल में भी “टाइपराइटर पर टीवी वीसीआर” लगाकर रखा गया था (हम सब कंप्यूटर को ऐसे ही समझ पाते थे)| हमारे सरकारी स्कूल में फर्नीचर टूट टूट कर गोदाम में जमा हो रहा था| मेरी कक्षा में हिन्दू और मुस्लिम, अगड़े तगड़े, पढ़ते थे| ग़रीब, गंवार, पिछड़े, और निठल्ले दूसरे सेक्शन में थे|  मैं अलीगढ़ का नौरंगीलाल राजकीय इन्टर कॉलेज में छठी या सातवीं कक्षा में पढ़ता था|

मैं उन गिने चुने बच्चों में से था जिन्हें हर रोज घर से चार या आठ आने मिला करते थे| बाकी सब पांच या दस नये पैसे वाले थे| हम जिन्हें चार आने मिलते थे वो हमेशा घर का खाना लाते थे और दूसरों के साथ शेयर भी करते थे| उस समय घर से पानी लेन का चलन नहीं था| अजीब बात यह थी कि जिन्हें पंजी या दस्सी मिलती थी वो हफ्ते में एक दो बार ठेल पर से चार आने के छोले या आठ आने का चीला खाया करते थे| फरबरी का महीना और बदलता मौसम था| मास्टर लोग पढ़ाने छोड़कर अपनी बोर्ड एग्जाम की ड्यूटी लगवाने में लगे थे|

उस ज़माने में हमारी फीस छः नए पैसे से बढ़ा कर दस पैसे होकर शायद आठ पैसे महीने पर टिक गयी थी| फीस विरोधी छात्र आन्दोलन ख़त्म हो चुका था| अगर बहुत से बच्चे या तो जब पैसे होते थे तो क्लास टीचर खां साहब के पास एडवांस फीस जमा कराते थे या कई बार फीस न दे पाने के कारण हर तीसरे महीने नाम कटवाते थे| खां साहब किसी की फीस अपने खाते से जमा नहीं करते थे| उनके पास एडवांस जमा का खाता था, मुसलमान थे इसलिए न उधार जमा करते थे, न लेते थे, न देते थे|

उधार पैसे देना मेरा काम था, हर महीने पच्चीस तारीख को मैं अपने पास के सारे सिक्के लाता था और उधार बांटता था| इसका हिसाब खां साहब ख़ुशी और नेक नीयत से खुद रखते थे|

वो एक मुस्लिम लड़का था, पिछड़ा था और गरीब भी| अगड़ों की तरह उसके पिता नहीं थे बाप था, जिसे वो प्यार से अब्बा और इज्ज़त से अब्बाजान कहा करता था| तीन नहीं से फीस नहीं दे पाया था और पूरे पूरे चौबीस पैसे फीस बकाया हो चुकी थी| अपना नाम पुकारे जाने पर उसने मेरी तरफ़ देखा और पाने चार आने बढ़ा दिए| फ़ीस जमा हो गई| उसका सर चकरा रहा था| हाथ फैलाना और इज्ज़त उतार कर सड़क पर रख देना एक बात थी| क्लास के सभी बच्चों के सामने खां साहब ने ताकीद की, ये उधारी किसी को बताना मत| वो दिन भर नहीं बोला, अगले दिन से स्कूल नहीं आया| हफ्ता बीत गया|

सुबह का वक्त था| स्कूल से 200 मीटर दूर घंटाघर पर साईकिल पकड़े तहमद कमीज़ पहने दढ़ियल शख्स ने आवाज़ दी, जनाब गहराना साहिब| मैंने पीछे मुड़ कर देखा| गहराना साहिब, यानि मेरे पिता तो जा चुके थे और कोई दूसरे गहराना साहिब भी वहां नहीं थे| मैं आवाज़ की तरफ़ देखने लगा| आजकल का ज़माना होता तो शायद मैं भाग खड़ा होता और हनुमान चालीसा पढ़ रहा होता|

“जनाब गहराना साहिब, आप से ही काम है” उन्होंने कहा| साइकिल के लट्ठे पर बैठे बच्चे ने भी ओढ़ी हुई लोई से बाहर झाँका| “ये लीजिये आपके पैसे, इसकी तरफ़ मत देखिये, इसको पीलिया बिगड़ गया है| मेडिकल ले जा रहा हूँ|” मैंने वो चवन्नी नहीं पकड़ी|

“ले लीजिये, ये मुसलमान है, इसे इसी जिन्दगी में चुकाना है| आगे मुलाकात हुई या नहीं| खुदा जाने|” (उन दिनों खुदा ही होता था, अल्लाह को मैं नहीं जानता था शायद|) वो शख्स आंसू पौछ रहा था| बाप था न|

मैंने पैसे ले लिए| उसने सर पर हाथ रख कर मेरी सलामती की दुआ की और चला गया| मैंने घंटाघर से बाबा बरछी बहादुर की मज़ार तक चार सौ मीटर की दौड़ लगाई| अन्दर जाती हुई एक औरत के हाथ ओर वही चवन्नी रखी, “आंटी इसे चढ़ा देना”|

डरपोक  सर्वशक्तिमान


पूजाघर में बंद डरपोक
सर्वशक्तिमान!!

कब कर मारते रहोगे,
जिन्हें यकीं नहीं तुम पर|

मुझसे मत कहो,
खुद पर यकीं करो|

बचा लो खुद को
अपने बचाव-दल से||

That poor unsecured God
always kills,
God! save yourself,
from your defenders.

 

जोहरीपुर का छूट जाना


“इश्क में शहर होना” कम से कम दिल्ली में हर हिंदी प्रेमी, साहित्यप्रेमी और पुस्तकप्रेमी की जुबान पर है| पुस्तक बिक रही है, लप्रेक धूम मचा रहा है| मगर पुस्तक पढ़ने के क्रम में मुझे दिल्ली का एक गांव याद आ रहा है| जी, यह भजनपुरा के पास का इलाका है जहाँ ब्रा बन रही है| मेरे अनुमान के मुताबिक वह इलाका जोहरीपुर है| जोहरीपुर इतना प्रतिबंधित सा है कि उसका नाम लेने में संकोच होता है| मैं भी तो नाम नहीं लेता| मैं सहमत हूँ, “ऐसा घबराया की नज़र बचाकर भागने जैसा लौटने लगा| कई दिनों बाद उन गलियों में दोबारा लौटकर गया| ब्रा भी बनता है पहली बार देखा|” [सन्दर्भ: – शहर का किताब बनना – इश्क में शहर होना – रवीश कुमार – सार्थक (राजकमल प्रकाशन)]

नहीं, मैं “इश्क में शहर होना” के लप्रेक को नहीं लपेट रहा हूँ| ब्रा का इश्क़ से सम्बन्ध भी तो नहीं है| ब्रा शरीर छुपाने की चीज है, और ब्रा खुद भी छिपा दिए जाने की| यहाँ पंकज दुबे को बीच में मत लाइए जो कहते हैं, “वहाँ उन्हें दुसरे कपड़ों के नीचे छुपाकर रखने का रिवाज है| पैंटी और ब्रा वहाँ कपड़ा नहीं बल्कि घर की इज्ज़त – आबरू से कम नहीं है|” [सन्दर्भ: – लूज़र कहीं का – पंकज दुबे – पेंगुइन प्रकाशन]

मैंने पूछा था कारीगर से जब दोनों चीजें बनाते हो तो ब्रा ही क्यूँ बोलते हो? बोला साहब, आपको तो पता है कि दूध की दुकान पर दही भी मिलता है, मगर आपने दही की दुकान कभी देखी है? दही से दाम आते हैं, मुनाफा दूध से आता है| दूसरी बात ये है साहब, जिस देश में औरत किनारे (हाशिया पढ़ सकते हैं|) पर हैं, वहाँ औरत के जरूरी कपड़े तो गटर में ही होंगे| कौन गटर का नाम लेगा? मैं उसे देखता रहा| मगर कुछ नहीं बोला| शायद वो नक़ल कर कर के बारहवीं पास हुआ था, मगर… चलिए छोड़ते हैं, अगर उसे बुद्धिजीवी कहूँगा तो… नजला हो जायेगा| [1]

जोहरीपुर – पूर्वी दिल्ली के पूर्व में एक छूट सा गया एक गाँव| लोनी से शायद सटा हुआ| मूल निवासी कम, भीड़ ज्यादा| बुलंदशहर और अलीगढ़ जिलों के गांवों से आने वाले ज्यादातर पिछड़े तबके के लोग| बहुत से लोग ब्रा के काम में लगे हैं| यहाँ कोई छिपाव नहीं है, कुछेक कारीगर, वापिस अपने गाँव में जाकर अपना छोटा सा काम डालते हैं और ट्रेन से तैयार माल दिल्ली के बड़े ब्रांड के पास आ जाता है|

मगर ज्यादातर कारीगर गांव – घर में नहीं बताते कि क्या काम कर रहे हैं| यह एक अछूत काम है| जोहरीपुर… नव – अछूतों की बस्ती है, जिसे पूर्वी दिल्ली ने भी गंदे नाले के पीछे छिपा दिया है|

[1] [जिन्हें दिलचस्पी हो तो उस समय ब्रा के मुकाबले दूसरे कपड़े का आल इण्डिया मार्किट अधिक से अधिक 22 – 25% करीब था, वो चार दिन पहनने वाला कपड़ा जो है| बाकी बातें इस ब्लॉग पोस्ट का हिस्सा नहीं हैं]