नया स्मार्टफ़ोन


आज के समय में अगर आप स्मार्ट हो या न हों मगर आपका फ़ोन हर हाल में स्मार्ट होना चाहिए| आज जीवन की हर सुविधा स्मार्ट फ़ोन के जरिये लोगों तक पहुँच रहीं है| मोबाइल बैंकिंग और मोबाइल टिकटिंग आदि ऐसे कुछ उदहारण है जिनका प्रयोग आपको ज्यादातर करना होता है| उधर सरकार भी अब ई- गवर्नेंस के साथ साथ मोबाइल – गवर्नेंस की बात करने लगी है| मुझे लगता है की स्मार्ट फ़ोन को इसलिए लिया जाना चाहिए कि वो आपके जीवन में कुछ और स्मार्टनेस लाये और आपको ई- गवर्नेंस, मोबाइल गवर्नेंस, मोबाइल बैंकिंग, मोबाइल टिकटिंग आदि अनेक सुविधाओं से समय पर जोड़ पाए|

किसी भी मोबाइल या स्मार्ट फ़ोन में भारतीय परिस्तिथि के अनुसार लम्बी लाइफ वाली ऐसी बैटरी होनी चाहिए जो जल्दी चार्ज हो जाये| हो सके तो आपको मोबाइल के साथ पॉवर बैंक साथ में चिपका कर न घूमना पड़े|

स्मार्ट फ़ोन की अपनी खुद की कार्यक्षमता बहुत अच्छी होनी चाहिए| किसी भी स्मार्ट फ़ोन की कार्यक्षमता उसके प्रोसेसर और रैम पर निर्भर करती है| इन दोनों का अच्छा होना बहुत जरूरी है|

किसी भी स्मार्ट फ़ोन का ऑपरेटिंग सिस्टम बेहद सरल सहज और तीव्र कार्यक्षमता वाला होना जरूरी है| यदि ऑपरेटिंग सिस्टम को समझना आसान होता है तो ज्यदातर लोग उसे समझ पाते हैं और आसानी से प्रयोग कर पाते हैं| किसी भी स्मार्ट फ़ोन की सफलता उसके अच्छे ऑपरेटिंग सिस्टम पर भी टिकी होती है|

जब से हम लोगों ने मोबाइल या स्मार्ट फ़ोन का प्रयोग प्रारंभ किया है हमें फ़ोटो और सेल्फी का रोग भी लग गया है| अब इसके लिए स्मार्ट फ़ोन में अगर अच्छा कैमरा नहीं है तो इसका मकसद किसी भी तरह पूरा नहीं होता है| कैमरा कहीं भी किसी भी परिस्तिथि में अच्छा चित्र निकल सके तभी स्मार्ट फ़ोन का कैमरा कहला सकता है|

स्मार्ट फ़ोन को एक फ़ोन ही होना चाहिये उसे न तो टैब की तरह बड़ा होना चाहिए न ही साधारण मोबाइल फ़ोन की तरह छोटा| आपकी उंगलियां उस पर आसानी से अपना काम कर सकें| उसका कुंजीपटल (keyboard), दृश्यपटल (display), और गति स्मार्ट होनी चाहिए| आप स्मार्टफ़ोन पर अपने सन्देश तेजी से लिख सकें| आने वाले सन्देश आँखों पर बिना जोर डाले पढ़ सकें, यह बहुत जरूरी है| कुल मिला किसी भी स्मार्ट फ़ोन का यूजर इंटरफ़ेस बहुत ही शानदार होना चाहिए|

भारत में खासकर दिल्ली जैसे राज्यों में जहाँ लोग रोमिंग में जाते रहते हैं दो सिम रखने का चलन है| इसलिए स्मार्ट फ़ोन को डूएल सिम होना ही चाहिए|

स्मार्ट फ़ोन तकनीकी इतनी तेजी से बदल रही है कि आज कोई भी अपने स्मार्ट फ़ोन को दो या तीन साल से ज्यादा चलाने के बारे में नहीं सोचता है| स्मार्ट फ़ोन का महंगा होना ऐसे में लोगों के लिए चिंता का विषय होता है| कोई भी स्मार्ट फ़ोन खरीदते समय जादातर लोग उसके लिए अपने एक महीने के वेतन से अधिक पैसा नहीं देना चाहते| भले ही इस बारे में कोई सोच समझ कर निर्णय न लिया जाये मगर ओसतन बज़ट एक माह के वेतन के बराबर ही होता है|

जल्दी ही एक ऐसा डूएल सिम स्मार्ट फ़ोन लांच होने जा रहा है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि उसमें 2.3GHz 64-बिट इंटेल एटम Z3580 प्रोसेसर और चार जीबी का रैम है| इसका डिस्प्ले साढ़े पांच इंच का है| उसका कैमरा २ मेगापिक्साल मास्टर कैमरा है जो कम रौशनी में भी सरलता से तस्वीर निकाल सकता हैं| उसकी बैटरी ३९ मिनिट में ६०% चार्ज हो जाती है| मुझे यह जानने में दिलचस्पी बनी हुई है कि इसकी बैटरी कितनी देर में पूरी तरह चार्ज हो जाती है, क्योकि बैटरी का चार्ज होना गणित का नहीं वरन भौतिकशास्त्र का प्रश्न है| मुझे लगता है जिस प्रकार की सूचना आ रही है ASUS Zenfone 2 खरीद लिए जाने लायक स्मार्ट फ़ोन होना चाहिए|

पंचकन्या


पंचकन्या पढ़ते समय एक ताजगी का अहसास होता है|

भारतीय समाज में स्त्री, स्वतंत्र विचार, स्त्री पुरुष सम्बन्ध, सामाजिक संवेदनाएं आदि यदि किसी और समकालीन उपन्यास में आती है तो लगता है कि शब्दों के हेर – फेर के साथ वही पुराना घिसा – पिटा लिख कर परोस दिया गया है| कथाकार ऐसे में अक्सर कथानक पर हावी हो जाते हैं पात्र घुटकर मरने लगते है|

पंचकन्या, सामयिक प्रकाशन, जटवाडा दरियागंज नई दिल्ली -110002 कीमत 395 रुपए

सामयिक प्रकाशन, जटवाडा दरियागंज नई दिल्ली -110002 कीमत 395 रुपए

यहाँ पर मनीषा कुलश्रेष्ठ ने किसी भी मापदंड के लिए एक अलग पैमाना रख लिया है; प्रदीप भट्टाचार्य का लेख पंचकन्या: स्त्री सारगर्भिता केवल इस उपन्यास का सन्दर्भ आलेख नहीं है वरन एक प्रकार से पात्रों के लिए स्वतंत्रता का वितान है, जहाँ पात्र पाने अस्तित्व में सांस ले पा रहे हैं| मैंने इस सन्दर्भ आलेख को पहले पढ़ लिया था इसलिए जहाँ भी सन्दर्भ आया है मुझे ऊबाऊ लगा, मगर यदि आप सन्दर्भ आलेख पहले नहीं पढ़ते तो आपके लिए सरलता और सहजता वैसे ही बनी रहती है जैसे पात्रों के जीवन में है| उपन्यास की विशेष बात है, पात्रों के जीवन में जहाँ कहीं भी असहजता, कठिनाऊ, उबाऊपन, घुटन या दुःख है तो वो बस है| पात्र अपने आप को उसमें नहीं मार रहे बल्कि सहजता है कि परिस्तिथि को सामान्यतः जीते हुए उस से उबर रहे है| कोई भी पात्र “लार्जर दैन लाइफ” भी नहीं है| उपन्यास भारत की प्राचीनता, अर्वाचीनता, आधुनिकता, योग, तंत्र, मन्त्र, धर्म, जाति, स्थान, शास्त्रीय नृत्य, लोक नृत्य, सबको जीते हुए समरसता से आगे बढ़ता है|

उपन्यास स्त्रियों को केंद्र में रख कर लिखा गया है मगर उस पर फेमिनिज्म हावी नहीं है| उपन्यास की भूमिका में मनीषा कुलश्रेष्ठ ने लिखा है कि वह फेमिनिज़्म की जगह एलिस वॉकर का दिया शब्द ‘वुमेनिज़्म’ अपने मन के ज्यादा करीब पाती हैं| इसमें स्त्रियोचित मुलायमियत है| यह सोच मूल पंचकन्याओं के अस्तित्व की भी सही व्याख्या है और यह भावना अपने नारी होने का उत्सव मनाती है| स्त्री होने के उत्सव में पुरुष सहभागी है और अपने पुरुष होने के उत्सव के लिए स्त्री की सहभागिता के साथ स्वतंत्र है| यहाँ फेमिनिज्म की तरह प्रतिक्रियावादी पुरुष – विरोध नहीं है| स्त्री – पुरुष को दो ध्रुव मानने का दबाब पाठक पर नहीं डाला गया है| इस कारण उपन्यास स्त्री  – पुरुष दोनों के लिए समझने में सरल और सहज है|

उपन्यास अलग अलग स्त्रियों की नितांत ही अलग गाथा है जिसमें देश काल लगभग समान हैं, परन्तु मानव देशकाल में नहीं बंधता, भावनाओं में बंधता है जो स्त्री – पुरुष के सामान्य अंतर में ही भिन्न होती है| उपन्यास की स्त्रियाँ प्रेम और संबंधों को महत्व देते हुए उनकी तलाश कर रहीं हैं और उस तलाश को सरलता से जी रहीं हैं| पुरुष उनको सरलता से बिना पूर्वाग्रह के समझ रहे है जैसा सामान्य जीवन में सामान्य पुरुष करते हैं|

“कन्या का अर्थ पारंपरिक ‘वर्जिनिटी’ से कतई नहीं है, अकेले होने और उसकी चुनौतियों का सामना करने से है|”

उपन्यास कन्या के इसी शास्वत जीवन को उकेरता है जिसे यदा कदा आधुनिकता का भूत, स्वच्छंदता, परंपरा विरोधी, आदि कहकर नकारा जा रहा है|

अहिल्या द्रौपदी कुन्ती तारा मन्दोदरी तथा

पंचकन्या स्वरानित्यम महापातका नाशका

वह भी कोई देस है महराज


जब मैंने इस पुस्तक के बारे में पहली सुना था तो शीर्षक से लगा था कि हिंदी पट्टी का कोई आंचलिक यात्रा – वृतांत है| यह भारत के छोटे से अंचल मुख्यभूमि की निगाह से उस उत्तर पूर्व का शोध – विवेचन है, जिसे भारतीय देशप्रेम चीन समझने की हठ करता रहता है| पुस्तक खुद को बिना विराम और लघु विराम के पढ़ाती है| आपको “चिकेन नेक कॉरिडोर” (जलपाईगुड़ी) से आगे ले जाने के बाद सरल बारीक़ विस्तृत रोचक विवरण के साथ यह पुस्तक आपकी गर्दन पकड़ कर रखती है और बार बार पढ़े जाने के आग्रह रखती है| यह मेरे जैसे अधजल गगरी मुख्यभूमि वालों के लिए सन्दर्भ ग्रन्थ का काम कर सकती है मगर लेखक कहीं भी इस प्रकार का कोई आग्रह करता हुआ प्रतीत नहीं होता| पुस्तक के पीछे छपे ज्ञानरंजन के शब्द मुझसे यह आग्रह जरूर करते प्रतीत होते हैं मगर दुर्भाग्य से आधुनिक भारत तो ज्ञानरंजन को भी नहीं जानता|

आप कब दिल्ली से चलते चलते उत्तरपूर्व के दूरदराज में पहुँचते जाते है पता ही नहीं लगता| पुस्तक का प्रताप है कि जब अभी नागालैंड में एक आरोपी को जेल से बाहर कर क़त्ल कर दिया गया तो मैं मीडिया में दिए गए सारे दृष्टिकोण आसानी से समझ पाया|

“लघु राज्यों के राजा अपने लोगों को समझा रहे थे की १५ जनवरी १९४७ को असं के राज्यपाल अकबर हैदरी और खासी राज्यों के बीच जो समझौता हुआ था उसके मुताबिक रक्षा, मुद्रा और विदेश मसलों को छोड़कर बाकी सारे मामले उनके अधीन होने चाहिए| बाद में धोखे से इन राज्यों को संविधान की छठी अनुसूची में डालकर पारंपरिक ढंग से प्रशासन चलाने के लिए खासी, गारो और जयंतिया जिलों में स्वायत्तशासी परिषदों की स्थापना की गई| इस कारण सीयेम नाम के राजा रह गए हैं| अब परिषदें उन्हें मोहरों की तरह हटाती और बिठाती रहती हैं|”

यह सुचना पुस्तक में बहुत साधारण तरीके से दी गई है| परन्तु जब मैं इसे जोधपुर समेत कई रियासतों के विरोध के भारत में विलय के सेकड़ों समझौतों, और बाद में इंदिरा गाँधी द्वारा संविधान संशोधन के साथ भूतपूर्व रजवाड़ों के प्रिवीपर्स ख़त्म करने के लोकप्रिय और अदूरदर्शी निर्णय के साथ पढ़ता हूँ तो चिंता होने लगती है| शुक्र है कि वह मामला अभी क़ानूनी विश्लेषणों में ही फंसा हुआ है|

“ज्यादातर असमिया हिन्दू गाँव किसी न किसी मठ से सम्बद्ध हैं और वहाँ के सामाजिक जीवन में नामघर की केन्द्रीय भूमिका होती है|… … इधर हिन्दू कट्टरपंथ के प्रभाव में कुछ इलाकों में महिलाओं के महीने में पाँच दिन नामघर आने पर रोक लगा दी गई है, जिसका विरोध शहरों के नारीवादी संगठन कर रहे है|”

“ये फुल बिरले ही खिलते हैं लेकिन जब आते हैं तो प्रकृति नया असंतुलन पैदा करती है|… … इन्हीं फूलों ने मिजोरम में उग्रवाद की नींव रखी थी और पूर्वोत्तर का इतिहास, भूगोल दोनों बदल दिया था| तब मिजोरम असम का एक जिला हुआ करता था जिसे लुसाई हिल्स कहा जाता था|”

“सब्जी मंडी का हर्बल देखकर समझ आ गया कि दीमापुर से यहाँ के रास्ते में इतना सन्नाटा क्यों था| जानवर और पक्षी पीढ़ियों के अनुभव से जानते हैं, वन्यजीवप्रेमियों और पर्यावरणविदों के चिकने काग़ज वाले दस्तावेज़ों से पुकार कितनी ही काव्यात्मक क्यों न हो, इक बार छेमोकेडिमा का इनरलाइन बैरियर पार करने के बाद वे जिन्दा वापस नहीं लौट पाएँगे|”

इसी तरह की कुछ साधारण सी सूचनाएं इस पुस्तक में लगभग हर पृष्ठ पर अंकित है जिन्हें समझने के लिए समय, सुविधा, संस्कार और समृद्धि की आवश्यकता नहीं है| बहुत कुछ है जिसे पढ़ा जाना चाहिए| सब कुछ यहाँ बता देना पुस्तक की रोचकता को समाप्त कर देगा| पुस्तक किसी पुस्तकालय में बैठ कर नहीं लिखी गई है, सामान्य जन जीवन की वह कहानी है जिसे हम अक्सर नहीं देख पाते| हर दिन को आँख कान नाक खोल कर जिया गया है, बंदूकों और मौत के साये में| जहाँ सेना और ढेर सारे उग्रवादी दिन के हिसाब से लड़ रहे है, आकड़ों के हिसाब से मर रहे है, बयानों के हिसाब से नकारे जा रहे है, राजनीति के हिसाब से प्रयोग हो रहे है और वक्त के हिसाब से काटे जा रहे है| इस किताब को पढ़ने से पहले और बाद, मैं अक्सर पूछता रहा हूँ, चम्बल के डकैत और भारत भर के उग्रवादियों में कितना अंतर हैं, जबाब आसन तो नहीं है, मगर मैंने उसे इस पुस्तक में भी ढूंडा है|

जीवन और भारतीयता के बहुत सारे जबाब प्रश्न बनकर यहाँ खड़े हुए हैं| अनिल यादव पढ़े जाने योग्य नहीं लिखकर लाये हैं वरन वो खुद को पढ़ा लिए जाने का माद्दा रखते हैं| अमृतलाल बेगड़ जिस श्रृद्धा से नर्मदा यात्रा करते हैं शायद अनिल यादव ने उस तरह का ही कोई विचार रख कर उस देस की यात्रा की है|

पुस्तक: वह भी कोई देस है महराज

लेखक: अनिल यादव

प्रकाशन: अंतिका प्रकाशन

वर्ष: २०१२

श्रेणी: यात्रा – वृतांत,

मूल्य: रुपये १५०