बहू बेटी, दामाद बेटा


भारत में स्तिथि कुछ इस तरह से मानी जाती है कि अगर आप किसी घर की बहू हैं तो आप इज्ज़त के पायदान में सबसे नीचे हैं और अगर आप किसी घर के दामाद हैं तो आप इज्ज़त में हर पायदान से ऊपर हैं|

मगर नई हवा शायद कुछ बदल रही है| क्या वाकई??

हमारे वृज क्षेत्र में बहू हर किसी के पैर छूती है तो दामाद हर किसी से पैर छुलवाता है| ध्यान रहे हमारे यहाँ बेटा सभी बड़ों के पैर छूता है, मगर बेटी किसी के पैर नहीं छूती|

अब से कुछ वर्ष पहले जब एक नए नवेले दुल्हे ने अपने ससुर के पैर छुए तो हम सबके दिल में इज्ज़त बढ़ गई| और अगले ही पल उसी परिवार के बहुत से लोगों ने उस थोड़ी सी पुरानी बहू को याद किया जिसने बड़ों के पैर नहीं छुए थे| कुल जमा निष्कर्ष था कि दामाद का पैर छूना अच्छी बात है मगर बहू का पैर न छूना बुरी बात है| सभी लोगों को पैर छूने वाले दामाद में बेटे के दर्शन हुए| मगर पैर न छूने वाली बहू में किसी को बेटी न दिखाई दी|

उसके बाद एक समारोह में मैंने पहली बार एक घर के दामाद को बेटे की तरह खाना परोसते देखा| मगर आधुनिकता को छटका तब लगा जब बेटा उस पूरे समय दोस्तों और रिश्तेदारों से गप्प मारता रहा| मुझे शक हुआ कि क्या दामाद को बेटा बनाने की कवायद में बेटे को दामाद बना दिया गया है| मगर ससुर साहब ने दामाद को समारोह के बाद गले लगाया, “आप तो हमारे बेटे ही हो, हमने तो बेटी देकर बेटा लिया है|” मेरा दिल थोड़ा खुश हुआ| मैंने पूछ लिया फिर तो दामाद को बेटों की तरह दौलत में हिस्सा मिलेगा| ससुर साहब ने जबाब न दिया| बस अगले दिन कोठी के आगे एक नामपट्ट और लग गया, सुपुत्र के नाम का|

एक बार एक सज्जन के मुलाकात हुई| उनकी कन्या के लिए वर की आवश्यकता थी| उनके शब्दों में बेटी देकर बेटा लेना था| दान – दहेज़ से परहेज था| मगर अगले वर्ष उनके सुपुत्र के लग्न- सगाई कार्यक्रम में जाने को मिला तो बोले, “गरीब घर की लड़की है, वर्ना बहुत से लोग थे जो सेडान कार दे रहे थे| हमने घर में क्या कमी है?” मन में आया बोलूं, “सदेच्छा की”| इन सज्जन ने अपनी बेटी की शादी में सिर्फ चालीस लोगों की बारात की अनुमति दी थी| मगर सुपुत्र के विवाह में चालीस का वादा करने के बाद भी बिना किसी पूर्व सुचना के पूरे डेढ़ सौ लोग लेकर पहुँच गए| बाद में फिर एक और बेटी के विवाह में रोने लगे, “सालों ने पहले पच्चीस लोग बोले थे और अब पिचहत्तर ले कर आ रहे हैं|

एक और सज्जन मिले| बहू की तारीफ करते थक न रहे थे| उसके काम, नौकरी, नाम, आचार – विचार सब सुनकर अच्छे लग रहे थे| यहाँ तक बोले, अब बेटी तो पराई लगती है| बहू ही जीवन है| उनके विदा लेकर बाहर निकला ही था कि साथ आये सज्जन ने उनको बेटी सम्बन्धी अपशब्द से सम्मानित किया बोले, जब बीमार हुए थे तो बेटी की ससुराल वालों ने इलाज में खूब खर्चा किया था, बेटी सेवा के लिए पड़ी रही| यहाँ तक कि बेटी का घर टूटने लगा| रिश्तेदारों ने समझा बुझा कर बेटी को उसके घर भेजा| आज जब बेटी घर से निकाली जाती है, तो पराई हो गई|

ई ससुरी NET NEUTRALITY है क्या बे ?


अनुभव सिन्हा जाने-माने फिल्म निर्माता-निर्देशक हैं. उनके ब्लॉग का पता है- http://benarasi-babu.blogspot.in/ नेट नयूत्रलिटी पर अच्छा लिखा है| पढ़ने योग्य| यह आलेख bargad.org से रिब्लोग किया जा रहा है|

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Anubhav Sinha अनुभव सिन्हा

अनुभव सिन्हा जाने-माने फिल्म निर्माता-निर्देशक हैं. उनके ब्लॉग का पता है-http://benarasi-babu.blogspot.in/

मैंने मेरे एक डायरेक्टर फ्रेंड से पूछा कि net neutrality के लिए कर क्या रहे हो.  वो थोड़ा शर्मिंदा हो गया और बोला सुन तो रहा हूँ कि कुछ चल रहा है, पर सच कहूँ, तो समझ नहीं आ रहा कि है क्या ये. मैं थोड़ा चिंता में पड़ गया. अगर पढ़े लिखे लोग अनभिज्ञ हैं, तो किसी और को क्या समझ आएगा.  सोचा, चार लाइनें लिख देता हूँ, चार लोगों को भी समझा पाया तो काफी होगा.  अंग्रेजी में काफी बातें उपलब्ध हैं नेट पर, हिंदी में कम हैं. मैं इंजीनियर भी हूँ और ‘भैय्या’ भी, सो सोचा, हिंदी वाली ज़िम्मेदारी मैं निभा देता हूँ.

पहली बात, इंटरनेट है क्या?  दुनिया भर में हज़ारों लाखों करोड़ों कंप्यूटर हैं, जो आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. किसी कंप्यूटर पर संगीत है, तो किसी पर…

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राग दरबारी


हिंदी के कालजयी उपन्यास राग दरबारी के बारे में मैंने किसी भी साहित्यिक पत्रिका या चर्चा से अधिक गैर साहित्यिक लोगों से जाना| जब २८ अक्टूबर २०११ में उपन्यासकार श्रीलाल शुक्ल की मृत्यु हुई, तब राग दरबारी की चर्चा सोशल मीडिया में अफसरशाह, कूटनीतिज्ञ और पब्लिक पालिसी से सम्बद्ध लोग अधिक कर रहे थे| मजे की बात यह है कि वो सभी इसे निर्विवाद रूप से बेहद शानदार साहित्यिक कृति के रूप में याद कर रहे थे| राग दरबारी को “एनिमल फार्म” जैसी कृतियों जितना महत्वपूर्ण बताया जा रहा था| राग दरबारी पर हुई उस समय हुई साहित्यिक चर्चा मुझे आजकल की अधिकतर पंडिताऊ और दलिताऊ चर्चाओं की तरह ऊबाऊ लग रही थी|

इस वर्ष आखिरकार मैंने राग दरबारी खरीद ही लिया| यह एक शानदार निवेश साबित हो रहा है| राग दरबारी पढ़ते समय मुझे कई बार लगा की शायद यह आजकल में ही लिखा गया उपन्यास है| क्या पिछले पचास वर्ष में भारत में कुछ भी नहीं बदला है? यकीन नहीं हुआ कि राग दरबारी १९६८ में प्रकाशित हुआ था| अगर कंप्यूटर और मोबाइल का बेहद हल्का सा राग भी राग दरबारी के दरबार में रहता तो हम इसे २००८ में प्रकाशित हुआ मान सकते थे| यही तो कालजयी उपन्यास की जय है|

राग दरबारी पढ़ते समय मैं मोदी और केजरीवाल के किस्से भी परिभाषित होते हुए देख पाया, जो उपन्यास लिखे जाने के लगभग चालीस वर्ष बाद घट रहे हैं| इस उपन्यास में अनेक उपकथायें हैं आज कल घटित होती हैं, या कहें आजकल भी घटित होती हैं| कुछ घटनाएं नहीं तो उनके सन्दर्भ आजकल के समय में दिखाई दे जाते हैं|

“वास्तव में सच्चे हिन्दुस्तानी की यही परिभाषा है कि वह इंसान जो कहीं भी पान खाने का इंतजाम कर ले और कहीं भी पेशाब करने की जगह ढूंढ ले|”

इस एक वाक्य में मुझे मोदीजी के सफाई अभियान से लेकर गुटखा (तम्बाखू युक्त पान मसाला जो पान का आधुनिक समय बचाऊ विकल्प है) महसूस होता है| इस तरह से नगीने राग दरबारी में बिखरे पड़े हैं| राग दरबारी भारत की वर्तमान राजनीति, लोकतंत्र, अफसरशाही, भाई-भतीजावाद, जाति-प्रपंच, साम्प्रदायिकता, अध्-पढ़ता आदि अनेकानेक पहलूओं पर कालजयी व्यंग है|

राग दरबारी की रोचकता इसकी कहानी का सरल होना और रोजमर्रा की जिन्दगी के बेहद करीब होना है| बेहद साधारण कहानी को श्रीलाल शुक्ल जी ने बेहद रुचिकर तरीके से कहकर पाठक के सामने सजाया है जिसमें कथानक खुद अपने हर पहलू की विवेचना करता चलता है| कथानायक रंगनाथ वास्तव में सहनायक है| कहानी के कथ्य में उपन्यासकार लगातार अपनी सहज उपस्तिथि बनाये रखता है मगर कथानक में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करता| उपन्यासकार की टिप्पणियाँ कथानक को सजीव बनाते हुए उसे आगे बढ़ातीं है| यह टिप्पणियाँ ही हैं जो हमें कथानक को कालजयी रूप से पढ़ने में मदद करती हैं| राग दरबारी का हर पृष्ठ पढ़ते हुए आपको के सम्पूर्ण कहानी का अहसास होता है जो आपके करीब से ही उठाई गयी है| आपने राग दरबारी को कहीं न कहीं जीवन में महसूस किया है| इसके पात्र अपने साधारण परिवेश के बाद भी जाने पहचाने हुए हैं| सभी पात्र जीवन के सभी कार्य उसी साधारण तरीके से कर रहे हैं जिन्हें हम सभी अपने अपने साधारण तरीके से करते हैं|

पुस्तक केवल पढने लायक नहीं है वरन हमेशा अपने साथ रखने लायक है|