कड़ाहे वाली होली


सिकंदराराऊ में होली के कड़ाहों के अलग अंदाज थे| हुलियारों की अलग अलग टोलियाँ शहर में गाती – बजाती गुलाल उड़ाती और रंग खेलती घूमतीं| मगर सबसे बड़ा आकर्षण रंग के बड़े बड़े कडाहों का था, जो शहर के अलग अलग इलाकों में रखे जाते थे|

इन कड़ाहों का होली पर इस्तेमाल के अलावा कोई और काम न था| ये हर बरस होली से पहले निकलते, साफ़ होते, मौज – मस्ती करते और फिर तहखाने में जाकर सोये रहते| ये कड़ाहे कुंभकर्ण के पुराने चेले चपाटे लगते| इन कड़ाहों को ज़रा सा हिलाने में भी दो चार लोग लगते और साफ़ करने का काम भी किसी त्यौहार से कम न होता| लोग इन की सफाई के लिए भी दिन तिथि तय करते, मोहल्ले में  बुलावा लगाते|

कड़ाहे की गहराई – चौड़ाई इसके मालिक के बड़प्पन और इसमें घोले गए रंग का गाढ़ापन उसके दिल में समाज के प्रति लगाव का गाढ़ापन बताना| बढ़िया गाढ़ा पक्का रंग हफ़्तों तक लोगों के दिल दिमाग और   शरीर पर चढ़ा रहता| टेसू का तैयार रंग गुनगुना ही कड़ाह में डाला जाता| बाद में लाल हरे रंग भी न जाने कब घोल दिए जाते| हुलियारे अभी इन कड़ाहों में खुद उतर जाते तो कभी थोड़ी ताकत और प्रेम से उतार दिए जाते| अगर जोर जबरदस्ती के बीच किसी का शरीर कड़ाहे के किनारों से टकरा जाता तो मन लिया जाता कि मर्जी का मामला नहीं है और वहां मौजूद बड़े तुरंत बीच में आ जाते| शायद ही कभी किसी के चोट लगी हो|

घूमना –फिरना, रंगना – रंगाना, खाना – पीना चलता रहता| गुजिये, अंदरसे नमकीन आदि चर्चा में रहते| छोटे शहर में सब लोग जानते कि किस घर में क्या बनता है और किस घर में पकवान का स्वाद उम्दा है| मगर होली खाने के साथ पीने का त्यौहार भी है| आज लोग शराब या भंग से काम चला लेते हैं मगर तब तक ठंडाई और कांजी का जबर दौर था| ठंडाई मंहगा और शाही शौक है| दूध, बादाम, केसर, सौंफ़, गुलाबजल की उम्दा ठंडाई पीने और पिलाने के लिए जिगर चाहिए| मगर शौक़ीन घरों में हमने बेहद बड़े बड़े भगौनों में ठंडाई का गंगा की तरह बहते देखा है| दरवाजे पर आये दुश्मन को भी मांग कर ठंडाई पीते और मेजबान द्वारा हाथ जोड़कर पिलाये जाते देखा है| भांग वाली ठंडाई की के चर्चे भी जोरदार रहते| कांजी भी कम नहीं हैं|

गाजर कांजी का चर्चा अपना जोर रखता| इसमें मौसम की तरावट और उर्जा का अपना योगदान होता है| बड़े बड़े मटकों में कांजी का आचार तैयार होता| जब तक प्रेम से कांजी न बने, इसका स्वाद नहीं आता| हमारे घरों मटकों में कांजी पड़ता| अगर कोई एक बार पीकर दोबारा न मांगे तो घर की औरतें थोड़ा सा खुद चखकर देखतीं कोई कमी तो नहीं आ गई|

होली; मिलने, खेलने, खाने और पीने का त्यौहार है| रंगना और भंगना इसका सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा है| इस साल बहुत दिन बाद होली के बाद लम्बा सप्ताहांत है.. आइये.. रंगे, भंगे… गुलाल उड़ायें|

“I’m pledging to #KhulKeKheloHoli this year by sharing my Holi memories atBlogAdda in association with Parachute Advansed.

भगौरिया-भ्रमण


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उमराली में भगौरिया

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उमराली में भगौरिया

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उमराली में भगौरिया

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बालपुर में भगौरिया

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बालपुर में भगौरिया

सभी चित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

हँसते इश्कियाते मुस्कुराते


मुद्दा तो यही है न, इश्क़ और हँसी पर लिखना है| वो भी अपने “बैटर हाफ” वाला इश्क़; यानि, वो इश्क़ जो होता है तो कोई बताता नहीं, नहीं होता तो सब बताते हैं| तो भाई, बैटर हाफ के साथ, इश्क़ की ईमानदार बात उन्हीं दिनों सो सकती है जब वो वास्तव में बैटर हाफ न हों|

दरअसल, बात उन दिनों की है जब न इश्क़ था, न इश्क़ की बातें, न शादी थी, न बेग़म| घर वाले जान के पीछे पड़े थे| और सारे नाते रिश्तेदार सब साजिश में शमिल थे| कहा गया, मिल लो, बाद में चाहो तो मना कर देना|

लाला की नौकरी में छुट्टी मिलना भी बोनस मिलने की तरह होता है| दोनों तरफ से कहा गया, हम आते हैं किसी इतवार| जिस शहर में मैं नौकरी करता था वहाँ, रहने का ठिकाना सब गड़बड़ था| तो मुलाकत के लिए कॉफ़ी हाउस तय हुआ| साथ में बता दिया गया कि लड़की हमारी चाय कॉफ़ी तक नहीं पीती, तो उसके लिए पानी, दूध या जूस का इंतज़ाम किया जाये| पहली बार कोई आ रहा था मुझे से मिलने और वो भी शिकार फांसने; उस पर खातिरदारी के भी नखरे उठाने थे|

दुआ – सलाम हाय – हेलो के बाद आप बैठिये आप बैठिये हुआ| मेजबानी करने की जिम्मेदारी मेरी थी| सेल्फ सर्विस कॉफ़ी हाउस में मैं सबके लिए पानी और कॉफ़ी लाकर रखने लगा| मेरी होने वाली सासू माँ अपनी बिटिया जी के चाय-कॉफ़ी तक को हाथ न लगाने के किस्से बता बता कर माहौल बनाने की कोशिश कर रहीं थी| मेरे पिताजी डर कर बैठे थे कि कहीं ये लड़की शादी के बाद घर में चाय – कॉफ़ी  पीना भी न बंद करा दे| सबके लिए कॉफ़ी लाते लाते मुझे डर लगा कि कहीं घर में नुक्सानदेय काली – पीली बोतलें न आने लगें| सर्विस काउंटर पर सेल्स गर्ल ने चुहल की, सर, शादी के बाद तो आपको बराबर के ठेके वाला ड्रिंक ही पीना पड़ा करेगा|

जब में होने वाली पत्नी जी के लिए मौसमी का ताजा जूस लेकर सर्विस काउंटर से वापिस मुड़ा, तो मेरे पिताजी मुस्करा रहे थे, ससुर साहब कॉफ़ी हाउस का मीनू उल्टा ही पढ़ रहे थे, उनका भाई मोबाइल में स्नेक खेल रहा था, मेरी बहन अपनी होने वाली भाभीजी को अजीब से देख रही थी| सासू माँ, अपनी साड़ी के पल्लू से वो कॉफ़ी साफ कर रहीं थी जो अभी तक नहीं गिरी थी|

मेरी सीट हाथ से जा चुकी थी, मेरी पसंदीदा कॉफ़ी हाथ से जा चुकी थी| उस दिन इश्क़ तो हुआ, समय की नज़ाकत देखकर हँसी बाद के लिए टाल दी गई|

मेरी सासू माँ आज भी कायम है कि उनकी बेटी चाय – कॉफ़ी नहीं पीती| ससुर साहब को लगता है शादी के बाद लड़कियों में कुछ परिवर्तन हो जाता है| पत्नी के ससुराल वाले जब तब इस किस्से को लेकर हम दौनों पर हँसते हैं|

मैं रोज पत्नी के लिए भी कभी कभी चाय – कॉफ़ी बनाता हूँ और मुस्कराहट के साथ सर्वे करता हूँ| पत्नी जी आज भी मेरे साथ हँस हँस कर दावा रखतीं हैं कि वो चाय कॉफ़ी नहीं पीतीं|

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