वेश्या की असहमति


माननीय अदालतें जब बलात्कार आरोपी को यह कहकर दोषमुक्त कर देतीं है कि उनकी शिकार महिला एक वेश्या थी, मुझे निराशाजनक आश्चर्य होता है| असहमति के साथ हुआ कोई भी यौन सम्बन्ध बलात्कार है| शायद वेश्या एक ऐसी स्त्री है, जिसकी सहमति लेना सबसे सरल है| अगर, कोई व्यक्ति/आरोपी एक वेश्या की भी सहमति नहीं ले सकता तो यह बेहद निम्न दर्जे की बात है| अगर वेश्या असहमति व्यक्त  करती है तो उसकी असहमति का भी माननीय अदालतों द्वारा सम्मान किया जाना चाहिए|

कुछ तर्क दिए जाते हैं, अधिक धन की लालसा से वेश्या ने यह आरोप लगाया है| इस तर्क पर न जाने कैसे माननीय अदालतें भरोसा कर लेतीं हैं| तथ्यों की गूढ़ता एक मुद्दा हो सकती है, मगर न्याय के हिट में समस्या नहीं| बेहतर हो, माननीय अदालतें इस मामले में कोटेशन (Quotation) और इनवॉइस (Invoice) की व्यवस्था कर दें|

मैं कौन???


मैं कौन हूँ?

कोई दार्शनिक प्रश्न नहीं| जी नहीं| इस प्रश्न की दार्शनिकता समय के इतिहास में अंकित हो चुकी है|

मैं कौन हूँ? लोकतान्त्रिक प्रश्न है| नहीं, नहीं| जी नहीं| मैं इसे राजनीतिक प्रश्न नहीं कहूँगा| मुझे राजनीति से भय होता है|

जिन युगों में…. जी हाँ इस प्रश्नों के उत्तर खोजने वाले पल, युगों जितने लम्बे होते है| जिन युगों में मैं इस प्रश्न का उत्तर खोजता हूँ, मेरे मुख में हलाहल विष जैसे उत्तर उड़ेल दिए जाते है| मेरी जीभ इन उड़ेले गए उत्तरों के विष से जल रही है|

उन्हें नहीं जानना, मैं कौन हूँ|

आचार्य शंकर चले गए – अहम् ब्रह्मस्मि| यह उनका समय नहीं, आचार्य शंकर को बताना होगा, ब्रहमुद्दीन या ब्रहमाशंकर या कि ब्रहमविलिंग्टन|

मैं आज ब्रह्म नहीं हूँ| मैं आज ईश्वर का भुला – भटका अंश भी नहीं हूँ| मैं आज आत्मा भी नहीं हूँ|

क्या मैं एक जीव हूँ? कदाचित्, कदाचित् परन्तु; परन्तु मेरी श्वास स्वतंत्र नहीं है, मेरा भोजन स्वतंत्र नहीं है, मेरा सहवास स्वतंत्र नहीं है| मेरी परतंत्रता ईश्वर के हाथ नहीं, ईश्वर मुझे कुछ नहीं कहता| ईश्वर ने मुझे दुर्गन्ध न सूंघने की समझ दी है, विष न खाने की समझ दी है, मुझे सहवास की समझ दी है| परन्तु समयखंड में में जीव नहीं हूँ| यदि जीव हूँ भी, तब भी मैं जीव नहीं बचा रहता, मैं नए कलेवर में ढाल दिया गया हूँ|

यदि मैं थोड़ा भी जीव हूँ, तो मुझे अणुमात्र तो मानव होना ही चाहिए| कदाचित्, मैं मानव नहीं हूँ| मानव मेरी पहचान नहीं है| मैं मात्र उतना ही मानव हूँ, जितना गाय को सम्मान देता हूँ और वाराह से घृणा करता हूँ|

जब मुझसे पूछा जाता हूँ, मैं कौन हूँ| मैं अपने प्रतिबिम्ब के पीछे छिप जाता हूँ| मैं अपना छद्म प्रतिबिम्ब ओढ़ लेता हूँ|

मैं भारतीय, अमरीकी, ब्रितानी, जर्मन, होने से पहले मानव होना चाहता हूँ| मैं हिन्दू मुस्लिम ईसाई होने से पहले मानव होना चाहता हूँ| मैं ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य होने से पहले मानव होना चाहता हूँ| मैं गोरा काला भूरा होने से पहले मानव होना चाहता हूँ|

मैं सबसे पहले मानव हूँ| मैं भारतीय –पाकिस्तानी, हिन्दू-मुस्लिम, ब्राह्मण – बनिया, बिहारी-मराठा, हिंदी-उर्दू, व्रज-अवध, आगरा – अलीगढ़, से पहले मानव हूँ|

गूगल के बहाने कंपनियों के जन्मदिन पर


आज २७ सितम्बर २०१६ को गूगल अपना अठारहवां (18 वां) जन्मदिन मना रहा है| मगर लगता है की कुछ लोचा है|

यूनाइटेड किंगडम के प्रख्यात अखबार द टेलीग्राफ की इस ख़बर के मुताबिक सन २००५ में गूगल ने अपना सातवाँ जन्मदिन सत्ताईस सितम्बर को नहीं वरन छब्बीस सितम्बर दो हजार पाँच (२६ सितम्बर २००५) को मनाया था| जबकि गूगल का छठां जन्मदिन सात सितम्बर दो हजार चार (७ सितम्बर २००४) को था| लेकिन गूगल का पांचवां जन्मदिन आठ सितम्बर दो हजार तीन (०८ सितम्बर २००३) को हुआ| खुद गूगल के मुताबिक गूगल ने अपना इनकारपोरेशन एप्लीकेशन चार सितम्बर उन्नीस सौ अठान्वै (०४ सितम्बर १९९८ को सरकार के पास दाखिल की थी| उधर गूगल डॉट कॉम पंद्रह सितम्बर उन्नीस सौ सतानवे (१५ सितम्बर १९९७) को पंजीकृत हुई|

बहरहाल, अब गूगल हर साल २७ सितम्बर को ही अपना जन्मदिन मनाने का सोच रही है|

ऐसा नहीं है कि कंपनी के जन्म दिन का मसला अकेला गूगल का मसला है|

सिद्धांततः कम्पनी दो या अधिक लोगों के मन में कंपनी बनाने की इच्छा के जन्म लेने के साथ उन सबके मस्तिष्कीय गर्भ में उत्पन्न होना शुरू होती है| इस प्रक्रिया में उसका रंग रूप आकार प्रकार कद काठी आदि तय की जाती है| सिद्धान्तः कंपनी उस दिन बन जाती है जिस दिन यह सब तय हो जाता है| इसके बाद कंपनी के नाम पर सरकार सरकारी मुहर लगवाई जाती है जो तकनीकि रूप से उस नाम से कंपनी बनाने की अनुमति होती है| अगले चरण में कंपनी के जन्मदाता – प्रमोटर उस नाम से कंपनी के इनकारपोरेशन के लिए अर्जी दाखिल करते हैं| यह सभी चरण देश और काल के हिसाब से आजकल के दो घंटे से लेकर पुराने ज़माने के दो एक साल तक हो सकते हैं|

परन्तु कानूनन कंपनी का जन्म उस दिन माना जाता है जिस दिन सरकार से इनकारपोरेशन सर्टिफिकेट मिलता है| परन्तु, कंपनी के प्रमोटर इस आधिकारिक जन्मदिन का प्रायः इन्तजार नहीं करते और नाम तय होते ही कंपनी का कुछ न कुछ काम धाम शुरू भी कर देते है|

उदहारण के लिए अभी हाल में एक कंपनी खोलने के लिए प्रक्रिया शुरू की गई| कंपनी के प्रमोटर अपने इस बच्चे के लिए पिछले तीन साल से योजना बना रहे थे| इस साल फरवरी में उन्होंने कंपनी की पूँजी, कार्यकलाप, नागरिकता, निवास स्थान (कार्यालय), लोगो, पञ्चलाइन आदि मसलों पर अपना विमर्श पूरा किया| तमाम कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए उन युवा प्रमोटरों पर संसाधन (कागजात – जैसे पहचान पत्र) नहीं थे तो उन्हें बनाने की कार्यवाही हुई| इसके बाद एक दिन उन्होंने कंपनी बनाने संबंधी औपचारिक अनुरोध किया गया | तीन चार दिन में कंपनी के लिए नाम विशेष की सरकारी अनुमति मिली| अब प्रमोटर अपनी कंपनी के नाम और लोगो को लेकर इतने उत्साहित थे कि कहा गया कि जब तक बढ़िया सा लोगो न बन जाए तब तक कंपनी इनकारपोरेशन की औपचारिक एप्लीकेशन न लगाईं जाए| वो कंपनी के जन्म के दिन शानदार कार्यक्रम करना चाहते थे| इसके बाद एक दिन शाम को एप्लीकेशन इस हिसाब से लगाईं गई कि अगले दिन कंपनी को इनकारपोरेशन सर्टिफिकेट मिले| मगर सरकारी कार्यालय उस दिन अच्छे मूड में था और कंपनी उसी दिन यानि योजना से एक दिन पहले बन गई| पुराने समय में एक और दिक्कत थी| कंपनी बनने के लगभग दस दिन बाद प्रमोटर को अधिकृत रूप से पता लगता था कि कंपनी बन चुकी है|

अब आप कंपनी का वास्तविक जन्म दिन तय करते रहिये| कानून वही मानेगा जो वो मानता है – सनद की तारीख़|