मैं भी


मैं भी, साल २०१८ के दो ख़तरनाक शब्द| पुरुषों में डर है कि इन दो शब्दों के साथ उनका नाम न लिखा हो| प्रवृत्ति विशेष के पुरुष बुरी तरह घबराये हुए हैं तो अन्य पुरुष अकारण परेशान किये जाने की आशंका से ग्रसित हैं| इन दोनों प्रकार के पुरुषों में एक बात का संतोष भी है – उनकी बेटी, बहन या पत्नी अपने की अकेला और असहाय महसूस नहीं कर रहें होगीं| तो एक मूर्खतापूर्ण चिंता भी है कि कहीं उनकी बेटी, बहन या पत्नी अपने प्रति अन्याय की बात बात उठाकर परिवार की योनि अर्थात इज्जत दाँव पर न लगा दें और शोषित होने के जन्मजात अभिशाप के मुक्त न हो जाएँ|  

मुद्दे की राजनीति, मुद्दे की राजनीति, मुद्दे से जुड़े क़ानून और उनके संभावित दुरूपयोग चर्चा में हैं| किस कानून या आन्दोलन का दुरूपयोग नहीं होता? हमारा ध्यान सकारात्मक पहलू पर होना चहिये| युवा लड़कियों के परिवार सुरक्षित वातावरण महसूस कर रहे हैं| जिन कंपनी या संस्थानों में यौन शोषण सम्बन्धी समिति का गठन नहीं था या ठीक से नहीं था, वो सलाह के लिए संपर्क कर रहे है|

जिस प्रकार के आवाजें उठ रहीं हैं, आन्दोलन में गंभीरता आएगी और यौन शोषण सम्बन्धी कानून के लैंगिकसंतुलन की ओर बढ़ने में भी मदद मिलेगी| उम्मीद है कि शोषण का शिकार रहे पुरुष भी शोषक पुरुषों और महिलाओं के प्रति आवाज उठाने की हिम्मत करेंगे|

इस समय कई प्रकार की भ्रान्ति जनता में फैली हुई है| बहुत से लोग यह मान कर चल रहे हैं कि आपकी हँसी मजाक भी इस प्रकार के आरोपों का आधार बन सकते हैं| वास्तव में ऐसा नहीं है| इस प्रकार के दुर्भाग्यपूर्ण आरोप दुर्भावनावश लगाये तो जा सकते हैं परन्तु यह कानून की लड़ाई में नहीं टिक पाएंगे| परन्तु आपसी हँसी मजाक की परिभाषा सत्ता और समाज के अलग अलग पायदान खड़े हर व्यक्ति के लिए अलग हो जाती है| भाभी और साली के साथ भारत में मजाक का रिश्ता माना जाता है| मगर आप अपनी साली से जो मजाक करते है वो भाभी से नहीं करते, यह एक सत्य है| मजाक आप अपनी बहन से भी कर लेते हैं मगर यह वह मजाक नहीं होते जो आप भाभी या साली से कर लेते हैं| यही बात महिला मित्र के साथ लागू होती है| प्रायः पुरुष महिला सहकर्मियों के साथ शुरुआत से ही भाभी या साली वाले रिश्ते तक पहुँचने की कोशिश करते हैं| देखने की बात है कि सम्बंधित महिला इस हँसी मजाक को किस तरह ले रहीं हैं| यदि आप ही मुख्यतः मजाक प्रारम्भ करते रहे हैं तो आप फँस सकते हैं क्योंकि महिला आपके साथ अपनी ओर से मजाक नहीं कर रही| सहकर्मी के कपड़ो, श्रृंगार, अंगों आदि पर बात करना गलत है, कम से कम जब यह सब पिछली बार की बात में पसंद न किया गया हो|

एक बात और कहनी पड़ती है| भारत को कामसूत्र का देश माना जाता है| देश में कामसूत्र छिप कर पढ़ने की पुस्तक रही है| सब पाठक जानते हैं कि इस पुस्तक के कौन कौन से अध्याय उन्होंने पढ़े हैं| मगर कामसूत्र का सबसे महत्वपूर्ण भाग है, किस स्त्री से सम्बन्ध रखने चाहिए, किस से नहीं| कामसूत्र पुराना ग्रन्थ है| समय के साथ इस सूची में कुछ परिवर्तन की आवश्यकता अवश्य बनी होगी, मगर प्रासंगिकता बरक़रार है| हर स्त्री आपके लिए नहीं है| स्त्री की सहमति के लिए कामसूत्र में जोर दिया गया है| सहमति के प्रयासों पर और उनकी हद समझने की भारतीय पुरुषों की जरूरत है| भारतीय समाज को यौन शिक्षा की आवश्यकता है| यौन शिक्षा के पाठ्यक्रम को समझने की उस से भी बड़ी आवश्यकता है|

जिन दिनों हम यह सब बातें कर रहे हैं, भारतवासी नारीशक्ति के सबसे बड़े उत्सव नवरात्र के उत्साह में डूबे हुए हैं| हर वर्ष प्रश्न उठते हैं कि स्त्रीशोषक पुरुष किस मूँह किस  शृद्धा से नवरात्रि मना पाते हैं| कन्याभ्रुण हत्या करने वाले अपनी पाप मुक्ति के लिए जोर शोर से कंचक जिमाने और नवरात्रि के भण्डारे करते पाए जाते हैं| नवरात्रि का यह त्यौहार एक बात की भी याद दिलाता है कि पुरुषसत्ता सर्वोपरि नहीं हैं और पुरुषसत्ता को मानवता का अस्तित्व बचाने के लिए नारीशक्ति की शरण लेनी पड़ी है और उसे अपनी समस्त शक्तियों से भी नवाजना पड़ा है|

आइये बेहतर समाज की ओर कदम बढ़ाएं|

https://gahrana.com/2013/11/29/sexual-abuse-in-the-corporate-world-hindi/

https://aishmghrana.me/2013/03/06/ring-the-bell-stop-violence-against-women/

https://gahrana.com/2015/12/21/do-not-sit-quiet-hindi/

https://gahrana.com/2013/08/02/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%85%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80/

रणछोड़


रण छोड़ दिया और भाग निकले, कायर!!
किसी ने तो कहा ही होगा उन्हें; “रण छोड़ दिया और भाग निकले कायर!!” धिक्कारा गया होगा। क्षत्रिय होने का धर्म, जीवन का मर्म बताया गया होगा। सोचा भी न गया होगा कि रणछोड़ 64 कलाओं के ज्ञाता हैं। जीवन में बहुत से रगड़े झगड़े होते हैं। हमें अपने मतलब के रगड़े झगड़े चुनने होते हैं। मतलब नहीं कि रगड़े में हम अपना दिमाग़ रगड़ने लगें। मतलब नहीं कि बेकार के झगड़े में जीवन की लंबी लड़ाई गवां दी जाए। अर्थ यह नहीं कि सिद्धान्त से समझौता करना है। नहीं। सिद्धान्त पर कायम रहें। अपना विचार दृढ़ता से रखें। अगर यह छोटी लड़ाई है तो इस से हट जाएं। शांति रहेगी। बड़ी लड़ाई की ताकत और समझ बनी रहेगी। मगर ये छोटे मोटे झगड़े और रोज रोज के रगड़े छोड़ देना सरल काम नहीं है। आदत नहीं लत हो जाती हैं इनकी। रोज रोज के रगड़े में किसी को रगड़ देना संतोष देता है। इस संतोष का अपना सुख और नशा है। यह संतोष है कि कुछ तो किया प्रतिपक्ष का हमने, रगड़ दिया उसे। छोटी मोटी जीत भी यही आनंद प्रदान करती है। मगर इन छोटे मोटे रगड़ो झगड़ों में हम खोते भी बहुत कुछ हैं। यह उन झगड़ों में हार जाने और रगड़ों में रगड़ जाने के कहीं ज्यादा है। आप दिमाग़ का बेकार प्रयोग करते हैं जो कई बार नकारात्मक भी हो सकता है। आप को मन की शांति खो देनी होती है। आप का अहम आप पर राज करने लगता है कि आप को पता नहीं चलता। हाल में मैंने ऐसा ही एक और झगड़ा छोड़ दिया। इस तरह जब आप झगड़ा छोड़ कर चल देते हैं तो आपका प्रतिपक्ष हार जाता है। उन्हें जीत का नहीं उन के झगड़े को महत्व न दिए जाने का दुःख होता है। वो अक्सर हार महसूस करते हैं। आप का झगड़े से हट जाने शायद ही कभी उनकी जीत होती है। सावधान रहें, यह झगड़ा दोबारा आप के सामने नहीं आएगा, अगर खुद न चाहें।

आरक्षित अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय


अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण न दिए जाने का मुद्दा जोरों पर है| यह नया मुद्दा नहीं है| पिछले साठ सत्तर सालों से यह मुद्दा उठता रहा है| सरकारी पत्राचार होता रहा है| स्थानीय सवर्ण हिन्दू हमेशा इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण के विरोध में रहे हैं| वास्तव में मुस्लिम समुदाय को इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण से कोई फ़र्क नहीं पड़ता|

जातिगत आरक्षण के मुद्दे का सरकारी पत्राचार से बाहर आना कई परिकल्पनाओं पर आधारित है:

  1. इस विश्वविद्यालय में मुस्लिम तबके के लिए आरक्षण है|
  2. जातिगत आरक्षण से विश्वविद्यालय में लगभग आधे लोग उस आरक्षित तबके होंगे जो हिन्दू है या कम से कम सरकारी कागजों में हिन्दू माना जाता है|
  3. मुद्दा उठाने वालों को तात्कालिक राजनीतिक लाभ मिलेगा|

यह विश्वविद्यालय वास्तव में कोई धार्मिक या जातिगत आरक्षण नहीं देता| पचास प्रतिशत का आंतरिक छात्रों के लिए दिया जाने वाला आरक्षण और गैर मुस्लिम समुदाय का यहाँ पढने की इच्छा न रखना इस को मुस्लिम बहुल विश्वविद्यालय बनाने का काम बखूबी करता है|

यहाँ पढाई वास्तव में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर शुरू होती है और यह छात्र आगे चलकर पचास प्रतिशत आरक्षण का लाभ पाते कहते हैं| ज़ाहिर हैं, प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर अधिकतर छात्र मुस्लिम परिवारों से होते हैं| इनमें भी अधिकतर छात्रों के परिवार के परिवार खानदानी तौर पर यहाँ के छात्र हैं| इसके बाद बची हुई सीटों के लिए खुला मैदान है| देश विदेश का हर सुखी संभ्रांत मुस्लिम परिवार अपने बच्चों को यहाँ पढ़ाने ले लिए दस दस साल से मेहनत का रहा होता है| उनके जेहन और यह गिने चुने विकल्प में होता हैं, जहाँ उनके बच्चे सुरक्षित होंगे| इस सोच में उनका दोष नहीं है न ही वो डरपोक हैं, यह असुरक्षा की भावना उनपर लादी गई है|

अभी तक इस विश्वविद्यालय में पढने वाले हिन्दू भी मुस्लिमों की तरह परिवार के परिवार पढ़ते रहे हैं| इसका कारण यह है कि सांप्रदायिक ताकतों के द्वारा खड़े किये गए पारस्परिक अविश्वास के चलते अन्य हिन्दू परिवार यहाँ अपने बच्चों को पढ़ने नहीं भेजते| साथ ही अलीगढ़ में दंगों की संख्या भले ही बहुत कम हो अलीगढ़ के बाहर लोग इसे इसी तरह देखते हैं कि यहाँ मानो बहुत लम्बा गृहयुद्ध चल रहा हो|

इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण मांगने वालों का एक भ्रम (बल्कि गणित) यह भी है कि जातिगत आरक्षण की लाभार्थी जातियां हिन्दू हैं| ध्यान देने की बात यह है कि बड़ी संख्या में मुस्लिम जातियाँ भी आरक्षण का पात्र हैं और उनकी जनसंख्या भी कम नहीं है| यदि इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण आता भी है तो आरक्षण का पात्र मुस्लिम तबका बड़ी संख्या में अपना हक ज़माने में कामयाब रहेगा| अगर आप विश्विद्यालय के मुस्लिम बहुमत को तोड़ना चाहते हैं तो ऐसा नहीं होगा| वास्तव में अगड़े और पिछड़े मुस्लिमों में आपस में मेलजोल का नेक काम होगा| अगर इस गणित को ध्यान से समझें तो धरातल पर राजनैतिक झुकाव में कोई परिवर्तन यह मुद्दा नहीं ला सकता|

हाँ, नुक्सान में कौन रहेगा? कुछ सवर्ण हिन्दू परिवार|