किसान आन्दोलन – मध्यवर्गीय दृष्टिकोण


वर्तमान किसान आन्दोलन के समय सामाजिक माध्यमों में कम्युनिस्ट विरोधी विचारों की बाढ़ आई हुई है| किसानों को कम्युनिस्ट दुष्प्रभावों के प्रति सचेत किया जा रहा है| अधिकांश बातें घूम फिर कर यह हैं कि किस तरह से हड़तालों, बंद और जलूसों के चलते उद्योग धंधे बंद हुए| चेतावनी यह दी जा रही है कि कम्युनिस्ट किसानों की कृषि भी नष्ट करवा देंगे|

हमारे सामाजिक माध्यमों में अजीब सा असमञ्जस है| सामाजिक माध्यम सामान्यीकरण के रोग से त्रस्त हैं| स्वर्गीय प्रधानमंत्री नेहरू और उनकी नीतियों के बाद वर्तमान राजनैतिक प्रभाव में कम्युनिस्ट आंदोलनों को आर्थिक दुर्दशा का दोष दिया जाता है|

पिछली शताब्दी के साठ से नब्बे के दशक तक धरने, प्रदर्शन, बंद, और हड़ताल की लम्बी परंपरा रही है| भारत के उद्योगपति प्रायः इन हड़तालों को कम्युनिस्ट राजनीति का कुप्रभाव कहते रहे हैं| श्रम क़ानून के सुधारों के नाम पर धरने, प्रदर्शन, बंद, और हड़ताल क्या श्रमिकों और कर्मचारियों के किसी भी प्रकार के सामूहिक बातचीत और मोलभाव की क्षमताओं को नष्ट करने के प्रयास रहे हैं| पिछले बीस वर्ष में अपने आप को भारत का मध्यवर्ग मानने वाले श्रमिकों और कर्मचारियों ने इस प्रकार के प्रत्येक अधिकार को नौकरियों के अनुबंधों के साथ अपने मालिकों को समर्पित किया है| धरने, प्रदर्शन, बंद और हड़ताल ही नहीं सामूहिक मोलभाव और मालिक-मजदूर वार्तालाप को भी असामाजिक मान लिया गया है|

परन्तु क्या उद्योग बंद होना बंद हुए? जो आरोप पहले मजदूर संघ लगाते थे आज निवेशक और वित्तीय संस्थान लगाते हैं:

  • कंपनी के धन को उद्योगपतियों द्वारा अवशोषित कर लिया जाना;
  • गलत और मनमाने तरीके से आय-व्यव विवरण बनाना;
  • कंपनी या उद्योग के हितों से ऊपर अपने और सम्बंधित लोगों के हित रखना और उन्हें साधना; और
  • इसी प्रकार के अन्य कारक|

पिछले बीस वर्षों में भारतीय वित्तीय संस्थानों की गैर- निष्पादित संपत्तियों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है| उनके कारण प्रायः वहीँ हैं, जो पहले मजदूर असंतोष के कारण थे| आखिर क्यों? वह कारण क्यों नहीं बदले? उन कारणों के प्रति असंतोष क्यों नहीं है?

क्योंकि भारतीय मध्य वर्ग; धर्मसत्ता, धनसत्ता, कामसत्ता और राजसत्ता के प्रति अंधभक्ति रखता है| भारतीय मध्यवर्ग पुरातन काल से शोषक रहा है| अपने नितांत और निरंतर शोषण के बाद भी मध्यवर्ग अपने आप को शोषकों के अधिक निकट पाता है| और क्यों न पाए, भारतीय मध्यवर्ग देश के लगभग ७०-८० प्रतिशत जन का शोषण करने की गहन लत रखता है| उसके पास अपने आधार हैं – धर्म, जाति, वर्ग, भाषा, बोली, क्षेत्र, प्रदेश, आय, सम्पति, रंग, शिक्षा, अंकतालिका और कुछ भी| हम किसी भी आधार पर भेदभाव और उस से जुड़े शोषण करने का माद्दा रखते हैं| शोषक मानसिकता की यह लत हमें मजदूरों आदि का विरोधी बनाती है| यही मानसिकता मध्यवर्ग को एक साथ यहूदियों के शोषक हिटलर, फिलिस्तीनियों के शोषक इस्रायालियों, मजदूरों के शोषक चीनी कम्युनिस्टों, मजदूरों के शोषक भारतीय पूँजीपशुओं (पूंजीवाद अलग होता है और भारत में अभी तक गायब है) आदि का एक साथ समर्थन करने की अद्भुत क्षमता प्रदान करती है|

वर्तमान किसान आन्दोलन में मध्यवर्ग का कम्युनिस्ट विरोध वास्तव में पूँजीपशुओं के समर्थन का उद्घाटन है| हमारे सामाजिक माध्यमों को वर्तमान किसान आन्दोलन में शामिल किसी कम्युनिस्ट का नाम नहीं पता| जबकि विश्व भर की पूंजीवादियों के वर्तमान किसान आन्दोलन को दिए जा रहे समर्थन के समाचार सुस्पष्ट हैं| इस समय कम्युनिस्ट विरोध मात्र इसलिए है कि वर्तमान मध्यवर्गीय मानस के पूँजीपशु मालिकान कम्युनिस्टों और समाजवादियों को अपने लिए ख़तरा समझते हैं|

ध्यान रहे वास्तव में हमारा मध्यवर्ग कम्युनिस्ट आन्दोलन के विरुद्ध नहीं है| कम्युनिस्ट सोवियत को मित्र मानता रहा है और कम्युनिस्ट चीन को अपना विकास आदर्श मानता है|

मध्यवर्ग और नीतिनिर्माताओं को वास्तविक खतरों को पहचानना चाहिए| वह है हमारे पूँजीपशुओं का पून्जीपतिवाद|

गुनगुनी धूप गुनगुना पानी


<p class="has-drop-cap" value="<amp-fit-text layout="fixed-height" min-font-size="6" max-font-size="72" height="80">मंदिर के घंटे और अजान की आवाज से न जागने वाले क्या जानते होंगे, सुबह की पहली धूप पहले प्यार सुख होती है| कार्तिक से माघ तक तन की हड्डियों मन की लहरों में आलस्य जम जाता है, तो धूप की प्रथम रश्मि ही तो उसे पिघला देती है| जमा हुआ आलस्य मीठे दर्द की तरह रिसता है| पहले प्रेम की याद दिल में आते आते रूकती जाती है| उफ़, कुछ दर्द कितने अधिक अपने होते हैं| शीतदंश के महीने में अन्यथा शत्रु समझ आने वाली धूप हृदय में उतर आती है|मंदिर के घंटे और अजान की आवाज से न जागने वाले क्या जानते होंगे, सुबह की पहली धूप पहले प्यार सुख होती है| कार्तिक से माघ तक तन की हड्डियों मन की लहरों में आलस्य जम जाता है, तो धूप की प्रथम रश्मि ही तो उसे पिघला देती है| जमा हुआ आलस्य मीठे दर्द की तरह रिसता है| पहले प्रेम की याद दिल में आते आते रूकती जाती है| उफ़, कुछ दर्द कितने अधिक अपने होते हैं| शीतदंश के महीने में अन्यथा शत्रु समझ आने वाली धूप हृदय में उतर आती है|

जब आलस्य पिघलने लगता है औचक से उठकर हम न जाने कब पानी गुनगुना करने रख देते हैं| चाय का एक प्याला कड़क और कुछ तले हुए काजू हमारे एकांत में हमारा साथ देते हैं| यह एकांत भी तो नहीं होता| जाड़ों का एकांत प्रायः पारिवारिक या दोस्ताना होता है| सब मिलकर एक साथ चाय की चुस्कियों ने साथ अपना अपना मौन साँझा करते हैं| हमारे मौन सामूहिक विद्रोह के मुखर वक्तव्य होते हैं| हमारे वही विद्रोह, जिन्हें हम अपने भौतिक कर्मण्यता की जूतियों तले कुचलते चलते हैं| चाय की चुस्कियां हमें कभी याद नहीं दिलातीं, बर्फ़ की उन रंग बिरंगी चुस्कियों की जिन्हें हम गर्मियों में चूस कर फैंकते आए हैं| चुस्कियों की तपिश साँसों को गुनगुनाती हैं – किसी गुनगुने लोकगीत की तरह|

याद आता है गुसल में रखा गुनगुना पानी| सर्दियाँ हमें इसीलिए तो पसंद होती हैं|

आमजन से दूर होती रेल


वर्षों पहले जब पहली बार रेलवे के निजीकरण की बात उठी थी, तभी मुझे लगा था कि सरकार निजीकरण को गलत दिशा में लेकर जाने वाली है| यह होने लगा है| आशंका है, रेलवे आम जनता से दूर होने जा रही है|

फिलहाल रेल किराये बढ़ने की खबर है| यह विमान उड्डयन उद्योग के लिए बढ़िया खबर है और रेलवे खरीदने के इच्छुक किसी भी गंभीर व्यवसायी बुरी खबर है| विमान उद्योग में बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा उसके किरायों को कम स्तर पर बनाये रखती है| विमान किराये यह तय करते हैं कि लोग रेलवे की महँगी सेवाओं में कितनी रूचि लेंगे| वास्तव में प्रथम श्रेणी या उससे ऊपर की किसी भी सेवा को लाभ में नहीं चलाया जा सकता| पिछले कई वर्षो में राजधानी और प्रथम श्रेणी डिब्बों की यात्री संख्या में प्रायः गिरावट आई है| यह सेवायें उन्हीं शहरों के बीच सफल है जहाँ अभी विमान सेवाओं का विकल्प नहीं है|

यदि भारतीय रेल प्रथम या विलासिता श्रेणी की सेवाओं में निवेश करती है तो उसका हाल जल्दी ही उच्च और उच्च मध्यवर्ग के लिए मकान बनाए चले जाने वाले अचल सम्पति निर्माताओं की तरह होगा और रेलवे दिवालियापन की ओर बढ़ेगी|

रेलवे के लिए लाभ देने के लिए मध्यम स्तर की सेवाएं जैसे तीनस्तरीय वातानुकूलित शयनयान का प्रयोग किया जा सकता है| परन्तु इनका बढ़ता हुआ बाजार भी सीमित है| इसके किराये को भी विमान किरायों से स्पर्धा में देखा जाना चाहिए| पिछले दिनों में देखा गया कि इस स्तर की तत्काल टिकट सेवाएं विमान किराये के काफी निकट पहुंची और यात्रियों ने इनका उपयोग कम कर दिया| सरकार को वातानुकूलित कक्ष में बैठकर योजना बनाने की पिछले पचास वर्षों की परम्परा को तोड़कर सोचना होगा|

भारत में रेल के लिए मुख्य बाजार अनारक्षित या सामान्य श्रेणी के कुर्सीयान और शयनयान हैं| परन्तु जमीन से दूर रहने वाले अधिकारीयों और सलाहकारों के समुदाय ने यह मान लिया गया है यह लोग लाभ नहीं दे सकते| ध्यान दें तो मुख्यतः यही वर्ग मोबाइल और खाद्य उद्योगों को लाभ देता है| परन्तु इस वर्ग के उत्पाद में आपका लाभांश प्रतिशत निश्चित ही कम होता है| आप दो से पांच प्रतिशत से अधिक लाभ नहीं कमा सकते| परन्तु आप “न्यूनतम आवश्यक सेवाओं” के साथ खर्च में कटौती कर सकते हैं| हम सामान्य कुर्सीयान बढ़ा सकते हैं|

यह ध्यान रखना चाहिए कि सामान्य रेलयात्री भले ही सीधे ही रेलवे को लाभ न दें परन्तु उनका गतिशील बने रहना देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत आवश्यक है|

ऐश्वर्य मोहन गहराना 

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