गुनगुनी धूप गुनगुना पानी


<p class="has-drop-cap" value="<amp-fit-text layout="fixed-height" min-font-size="6" max-font-size="72" height="80">मंदिर के घंटे और अजान की आवाज से न जागने वाले क्या जानते होंगे, सुबह की पहली धूप पहले प्यार सुख होती है| कार्तिक से माघ तक तन की हड्डियों मन की लहरों में आलस्य जम जाता है, तो धूप की प्रथम रश्मि ही तो उसे पिघला देती है| जमा हुआ आलस्य मीठे दर्द की तरह रिसता है| पहले प्रेम की याद दिल में आते आते रूकती जाती है| उफ़, कुछ दर्द कितने अधिक अपने होते हैं| शीतदंश के महीने में अन्यथा शत्रु समझ आने वाली धूप हृदय में उतर आती है|मंदिर के घंटे और अजान की आवाज से न जागने वाले क्या जानते होंगे, सुबह की पहली धूप पहले प्यार सुख होती है| कार्तिक से माघ तक तन की हड्डियों मन की लहरों में आलस्य जम जाता है, तो धूप की प्रथम रश्मि ही तो उसे पिघला देती है| जमा हुआ आलस्य मीठे दर्द की तरह रिसता है| पहले प्रेम की याद दिल में आते आते रूकती जाती है| उफ़, कुछ दर्द कितने अधिक अपने होते हैं| शीतदंश के महीने में अन्यथा शत्रु समझ आने वाली धूप हृदय में उतर आती है|

जब आलस्य पिघलने लगता है औचक से उठकर हम न जाने कब पानी गुनगुना करने रख देते हैं| चाय का एक प्याला कड़क और कुछ तले हुए काजू हमारे एकांत में हमारा साथ देते हैं| यह एकांत भी तो नहीं होता| जाड़ों का एकांत प्रायः पारिवारिक या दोस्ताना होता है| सब मिलकर एक साथ चाय की चुस्कियों ने साथ अपना अपना मौन साँझा करते हैं| हमारे मौन सामूहिक विद्रोह के मुखर वक्तव्य होते हैं| हमारे वही विद्रोह, जिन्हें हम अपने भौतिक कर्मण्यता की जूतियों तले कुचलते चलते हैं| चाय की चुस्कियां हमें कभी याद नहीं दिलातीं, बर्फ़ की उन रंग बिरंगी चुस्कियों की जिन्हें हम गर्मियों में चूस कर फैंकते आए हैं| चुस्कियों की तपिश साँसों को गुनगुनाती हैं – किसी गुनगुने लोकगीत की तरह|

याद आता है गुसल में रखा गुनगुना पानी| सर्दियाँ हमें इसीलिए तो पसंद होती हैं|

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