तानाशाह का इन्तजार


उस वक्त में कानपूर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर बैठा हुआ था कि किसी ने ठेठ कनपुरिया लहजे में कहा, फिर इमरजेंसी लग गयी क्या देश में? दरअसल, एक एक बाद एक कई गाड़ियाँ अपने ठीक समय पर आकर चली गईं थी| देश आपातकाल को ट्रेन के समय पर चलने और अनुशासन के लिए याद करता है| मुझे लगता है कि आपातकाल के बाद जनता सरकार इसीलिए चली गयी कि उसके नेता देश में क्या अपने आप में भी अनुशासन नहीं ला पाए| यहाँ तक कि आपातकाल के अपराधियों को भी जनता परिवार आजतक दंड नहीं दिला पाया|

Captureआपातकाल अगर देश में अनुशासन पर्व रहा तो संजय गाँधी वो सुकुमार तानाशाह, जो देश को मिलते मिलते रह गया|

देश के सपनों का तानाशाह जो ईमानदार होता है, रोबिन हुड होता है, निर्णय लेता है, उसका व्यक्तित्व इतना तगड़ा होता है कि लोग उसके निर्णय को बिना सोचे समझे अमल में लाते हैं| भरोसा होता है, उसका निर्णय देश हित में ही होगा|

आखिर हमारा देश मंदिर – मस्जिद में “सच्चा” विश्वास, “सच्ची” आस्था और आदरणीयों से प्रश्न न करने के शिष्टाचार के साथ ही तो बड़ा होता है|

हम इस आस्था को इंदिरा गाँधी के रूप देख चुके है और नरेन्द्र मोदी के रूप में देख रहे है| भले ही यह नेता, प्रश्नों का उत्तर देने में संकोच न करें, मगर इनके आस्थावान आपको प्रश्न नहीं करने देंगे| जब राष्ट्र सत्ता को अवतार और नारायण के रूप में देखने लगें, तो प्रश्न की सम्भावना नहीं बचती|

क्या हमारा राष्ट्र वाकई चाबुक चाहता है? सर्वेक्षण कहते है कि पचास प्रतिशत पढ़े – लिखे होनहार युवा देश में तानाशाही या सेन्य शासन देखना चाहते है| यह पढ़ी – लिखी होनहार युवा पीढ़ी देश की सबसे अनुशासनहीन पीढ़ी बताई जाती है| वह पीढ़ी जो अपने माता – पिता की बात को आदेश क्या, सलाह भी न मानती हो उसे अगर अपने ऊपर एक बाहरी आदमी का सरकारी चाबुक चाहिए तो यह उसका अपने आप पर व्यंग है|

तानाशाह करेगा क्या? उत्तर घूमफिर कर समान ही होते है: देश का अंधाधुंध विकास, आरक्षण का खात्मा, पाकिस्तान को औकात बताना, आबादी (मुसलमानों और दलितों की) काबू करना| इसमें प्राचीन गौरव की पुनर्स्थापना और काले धन की वापसी भी कभी कभी जुड़ जाते है|

मजे की बात यह कि तानाशाही समर्थक लगभग सभी मानते हैं कि इस हिंदुस्तान का कुछ नहीं हो सकता, और इसलिए सबको अमेरिका और कनाडा का ग्रीनकार्ड सबसे पहले चाहिए|

इंस्टेंट कॉफ़ी, इंस्टेंट मेसेंजर, इंस्टेंट गूगल, इंस्टेंट आरती और इंस्टेंट सेक्स की पीढ़ी को समय कहाँ है? तानाशाही तो कडुवी अंग्रेजी दवा है जिससे भले ही कितना साइड इफ्फेक्ट हो या जड़ से बीमारी न जाये मगर ठीक होने का भ्रम तो पैदा हो ही जाता है| भ्रम बनाये रखना हमारी नियति नहीं इंस्टेंट मजबूरी है|

मैला आँचल


प्रकाशन के साठ वर्ष बाद पहली बार किसी क्षेत्रीय उपन्यास को पढ़कर आज की वास्तविकता से पूरी तरह जोड़ पाना पता नहीं मेरा सौभाग्य है या दुर्भाग्य| कुछेक मामूली अंतर हैं, “जमींदारी प्रथा” नहीं है मगर जमींदार और जमींदारी मौजूद है| कपड़े का राशन नहीं है मगर बहुसंख्य जनता के लिए क़िल्लत बनी हुई है| जिस काली टोपी और आधुनिक कांग्रेस के बीज इस उपन्यास में है वो आज अपने अपने चरम पर हैं, और सत्ता के गलियारे में बार बारी बारी से ऊल रहे हैं| साम्राज्यवादी, सामंतवादी और पूंजीवादी बाजार के निशाने पर ग्रामीण समाजवादी मूर्खता का परचम लहराते कम्युनिस्ट उसी तरह से हैं जिस तरह से आज हाशिये पर आज भी करांति कर रहे हैं| विशेष तत्व भगवा पहन कर आज भी मठों पर कब्ज़ा कर लेते हैं और सत्ता उनका चरणामृत पाती है| गाँधी महात्मा उसी तरह से आज भी मरते रहते हैं…. हाँ कुछ तो बदल गया है, अब लोगों को ‘उसके’ मरते रहने की आदत जो पड़ गयी है|

पता नहीं किसने मुझे बताया कि ये क्षेत्रीय या आंचलिक उपन्यास है, शायद कोई महानगरीय राष्ट्रव्यापी महामना होगा| मैला आँचल भारत के गिने चुने शहरी अंचलों को बाहर छोड़कर बाकी भारत की महाकथा है; और अगर महिला उत्पीड़न के नजरिये से देखा जाये तो आदिकालीन हरित जंगल से लेकर उत्तर – आधुनिक कंक्रीट जंगल तक की कथा भी है| पढ़ते समय सबकुछ जाना पहचाना सा लगता है|

पूर्णिया बिहार की भूमि कथा का माध्यम बनी है| दूर दराज का यह समाज एक अदद सड़क, ट्रेन और ट्रांसिस्टर के माध्यम से अपने को आपको राजधानियों की मुख्यधारा से जोड़े मात्र हुए है| समाचार यहाँ मिथक की तरह से आते हैं| हैजा और मलेरिया, उसी तरह लोगों के डराए हुए है जिस तरह साठ साल बाद नई दिल्ली और नवी मुंबई के लोग चिकिनगुनिया और डेंगू जैसी सहमे रहते हैं|

कथानायक मेडिकल कॉलेज के पढ़कर गाँव आ जाता है; धीरे धीरे गाँव में विश्वास, युवाओं में प्यार, देश में नाम और सरकार में सतर्कता कमा लेता है| नहीं, मैं डाक्टर विनायक सेन को याद नहीं कर रहा हूँ| गाँव जातियों में बंटकर भी एक होने का अभिनय बखूबी करता है| अधिकतर लोग अनपढ़ है और जो स्कूल गए है वो सामान्य तरीके से अधपढ़ हैं| जलेबी पूरी की दावत के लिए लोग उतना ही उतावले रहते है जिस तरह से आज बर्गर पीज़ा के लिए; मगर हकीकत यह है कि जिस तरह से देश की अधिसंख्य आबादी ने आज बर्गर पीज़ा नहीं खाया उस वक़्त पूरी जलेबी नहीं खायी थी|

बीमारी से लड़ाई, भारत की आजादी, वर्ग संघर्ष, जाति द्वेष, जागरूकता और स्वार्थ सबके बाच से होकर उपन्यास आगे बढ़ता है| यह उपन्यास एक बड़े कैनवास पर उकेरा गया रेखाचित्र है जिसमे तमाम बारीकियां अपने पूरे नंगेपन के साथ सर उठाये खड़ी हैं| ये सब अपने आप में लघुकथाएं हैं और आसपास अपनी अनुभूति दर्ज करातीं हैं|

पुनःश्च – मेरे हाथ में जो संस्करण है, उसमें विक्रम नायक के रेखाचित्र हैं| मैं विक्रम नायक को रेखाकथाकार के रूप में देखता हूँ| उनके रेखाचित्रों में गंभीर सरलता झलकती है| इस संस्करण में उनके कई चित्र सरल शब्दों में पूरी कथा कहते हैं| बहुत से चित्र मुझे बहुत अच्छे लगे|

राग दरबारी


हिंदी के कालजयी उपन्यास राग दरबारी के बारे में मैंने किसी भी साहित्यिक पत्रिका या चर्चा से अधिक गैर साहित्यिक लोगों से जाना| जब २८ अक्टूबर २०११ में उपन्यासकार श्रीलाल शुक्ल की मृत्यु हुई, तब राग दरबारी की चर्चा सोशल मीडिया में अफसरशाह, कूटनीतिज्ञ और पब्लिक पालिसी से सम्बद्ध लोग अधिक कर रहे थे| मजे की बात यह है कि वो सभी इसे निर्विवाद रूप से बेहद शानदार साहित्यिक कृति के रूप में याद कर रहे थे| राग दरबारी को “एनिमल फार्म” जैसी कृतियों जितना महत्वपूर्ण बताया जा रहा था| राग दरबारी पर हुई उस समय हुई साहित्यिक चर्चा मुझे आजकल की अधिकतर पंडिताऊ और दलिताऊ चर्चाओं की तरह ऊबाऊ लग रही थी|

इस वर्ष आखिरकार मैंने राग दरबारी खरीद ही लिया| यह एक शानदार निवेश साबित हो रहा है| राग दरबारी पढ़ते समय मुझे कई बार लगा की शायद यह आजकल में ही लिखा गया उपन्यास है| क्या पिछले पचास वर्ष में भारत में कुछ भी नहीं बदला है? यकीन नहीं हुआ कि राग दरबारी १९६८ में प्रकाशित हुआ था| अगर कंप्यूटर और मोबाइल का बेहद हल्का सा राग भी राग दरबारी के दरबार में रहता तो हम इसे २००८ में प्रकाशित हुआ मान सकते थे| यही तो कालजयी उपन्यास की जय है|

राग दरबारी पढ़ते समय मैं मोदी और केजरीवाल के किस्से भी परिभाषित होते हुए देख पाया, जो उपन्यास लिखे जाने के लगभग चालीस वर्ष बाद घट रहे हैं| इस उपन्यास में अनेक उपकथायें हैं आज कल घटित होती हैं, या कहें आजकल भी घटित होती हैं| कुछ घटनाएं नहीं तो उनके सन्दर्भ आजकल के समय में दिखाई दे जाते हैं|

“वास्तव में सच्चे हिन्दुस्तानी की यही परिभाषा है कि वह इंसान जो कहीं भी पान खाने का इंतजाम कर ले और कहीं भी पेशाब करने की जगह ढूंढ ले|”

इस एक वाक्य में मुझे मोदीजी के सफाई अभियान से लेकर गुटखा (तम्बाखू युक्त पान मसाला जो पान का आधुनिक समय बचाऊ विकल्प है) महसूस होता है| इस तरह से नगीने राग दरबारी में बिखरे पड़े हैं| राग दरबारी भारत की वर्तमान राजनीति, लोकतंत्र, अफसरशाही, भाई-भतीजावाद, जाति-प्रपंच, साम्प्रदायिकता, अध्-पढ़ता आदि अनेकानेक पहलूओं पर कालजयी व्यंग है|

राग दरबारी की रोचकता इसकी कहानी का सरल होना और रोजमर्रा की जिन्दगी के बेहद करीब होना है| बेहद साधारण कहानी को श्रीलाल शुक्ल जी ने बेहद रुचिकर तरीके से कहकर पाठक के सामने सजाया है जिसमें कथानक खुद अपने हर पहलू की विवेचना करता चलता है| कथानायक रंगनाथ वास्तव में सहनायक है| कहानी के कथ्य में उपन्यासकार लगातार अपनी सहज उपस्तिथि बनाये रखता है मगर कथानक में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करता| उपन्यासकार की टिप्पणियाँ कथानक को सजीव बनाते हुए उसे आगे बढ़ातीं है| यह टिप्पणियाँ ही हैं जो हमें कथानक को कालजयी रूप से पढ़ने में मदद करती हैं| राग दरबारी का हर पृष्ठ पढ़ते हुए आपको के सम्पूर्ण कहानी का अहसास होता है जो आपके करीब से ही उठाई गयी है| आपने राग दरबारी को कहीं न कहीं जीवन में महसूस किया है| इसके पात्र अपने साधारण परिवेश के बाद भी जाने पहचाने हुए हैं| सभी पात्र जीवन के सभी कार्य उसी साधारण तरीके से कर रहे हैं जिन्हें हम सभी अपने अपने साधारण तरीके से करते हैं|

पुस्तक केवल पढने लायक नहीं है वरन हमेशा अपने साथ रखने लायक है|