हिटलर हिट – इस्रायल फिट


भारत में बहुमत का हिटलर प्रेम बहुत से लोगों को आश्चर्यचकित करता है| इस हिटलर प्रेम  के पीछे क्या मानसिकता काम करती है, यह अपने आप में शोध का विषय है|

लोकतान्त्रिक भारत में तानाशाह की तलाश भारतीय मतदाता, विशेषकर सवर्ण हिन्दू मतदाता का प्रिय शगल है| हर चुनाव में यह किसी तानाशाह की तलाश करते नज़र आते हैं और तानाशाह माने जाने वाले नेताओं को मतदान भी करते है| बहुत सी भारतीय लोकतान्त्रिक पार्टियों के कर्णाधार अपने तानाशाही रवैये के लिए प्रसिद्ध भी हैं| ऐसे में तानाशाह हिटलर अपने ऊँचे तानाशाही कद के लिए तानाशाहों में सर्वोपरि स्थान रखते हैं, और भारत में पूजनीय हैं|

कभी आर्य और कभी यहूदी पिता के संतान बताये जाने वाले हिटलर ने जिस प्रकार अपने को आर्य बताते हुए आर्य उच्चता की बात की, वह भारत में उन्हें लोकप्रिय बनाती है| सवर्ण भारतीय बिना किसी डीएनए टेस्ट के, अपने आप को आर्य बताते हैं और इसलिए बाकी सभी जन समूह उनके लिए तुच्छ हैं| आर्य उच्चता का हिटलरी सिद्धांत भारतीय आर्य विश्वासियों के लिए अपनी सदियों पुरानी दासता की यादों पर मरहम लगाने के काम करता है| उनके लिए हिटलर आर्यकुल शिरोमणि है|

हिटलर ने जिस प्रकार का बर्ताब यहूदियों के साथ जर्मनी में किया वही व्यव्हार भारतीय सवर्ण अपने शत्रुओं के साथ करना चाहते है| यद्यपि शत्रु की तलाश अभी जारी है और शत्रु मिलने तक अन्य भारतियों को शत्रु मानकर तैयारी जारी हैं|

कुछ लोगों का विचार में यहूदी हिटलर समर्थक भारतियों के स्वाभाविक शत्रु होने चाहिए परन्तु अपने आदर्शों के साथ खिलवाड़ करना एक शगल है| यहूदियों के भारत में उसी प्रकार मित्र माना जाता है जिस प्रकार से हिटलर को आदर्श| यहूदियों और भारतियों का यह स्नेह शायद एक तात्कालिक शत्रु के कारण है|

क्या इस्रायल भारत में हिटलर प्रेम को नज़रअन्दाज करते हुए भारत का मित्र है? क्या भारतीय हिटलर के प्रति घृणा करने वाले इस्रायल के मित्र हैं?

पर्युषण में फल, क्रिसमस में वाइन


सभी धर्मों का आदर किया जाना चाहिए| इसके लिए निजी विश्वास, मान्यता, शौक और लत से भी उठा जाना चाहिए|

शाकाहारी होने के नाते मुझे निजी रूप से इस बात से कोई कष्ट नहीं है कि मांसाहार को पर किसी त्यौहार के नाम पर प्रतिबन्ध लगाया गया है| मगर एक नागरिक होने के नाते मुझे हर किसी के धर्म, आचार, विचार, व्यक्तित्व, आदर, शौक, स्वाद, भोजन आदि की स्वंत्रतता के हित में बोलना चाहिए|

जब भी मेरे मांसाहारी रिश्तेदार मुझे मांसाहार के लिए दबाब डालते है, जब भी मेरे पियक्कड़ मित्र मदिरापान के लिए दबाब डालते है, जब भी मेरे सिनेमा प्रेमी मित्र मुझ पर सिनेमा देखने का दबाब डालते हैं – मुझे कष्ट होता है|

जब भी मेरे रिश्तेदार मुझे स्ट्रीट फ़ूड खाने से रोकते हैं, मेरे मित्र साहित्य पढने से रोकते हैं, मेरे सहयोगी हिंदी बोलने पर टोकते हैं, हितैषी साधारण कपड़े पहने से रोकते है – मुझे कष्ट होता है|

हमें कष्ट होता है जब हमें हमारे हिसाब से जीने के लिए नहीं मिलता| प्रकृति ने हर प्राणी, हर शरीर, हर आत्मा, हर मन, हर सोच को अलग बनाया है| तो हम प्रकृति में हस्तक्षेप नहीं कर सकते| कष्ट होता है|

  • यदि किसी जीव को कष्ट होता है, क्या यह उचित है?
  • यही मेरे कारण किसी और को कष्ट होता है तो यह मेरी हिंसा है|
  • यदि मुझे कष्ट होने से भी किसी को प्रसन्नता होती है तो यह मेरा परोपकार है|
  • यदि मुझे कष्ट न हो इसलिए मैं किसी को प्रसन्न नहीं होने देना चाहता तो यह भी हिंसा है|
  • क्या मांसाहार पर प्रतिबन्ध, मांसाहारी समुदाय के विरुद्ध हिंसा नहीं है?

सिंह और हिरण के जीवन संघर्ष में सिंह प्रकृति से हिंसक है| हिरण कष्ट के साथ मर जायेगा |

हम सिंह और हिरण के जीवन संघर्ष में जब भी हिरण को बचाने की बात करते हैं, तो हम अति हिंसक है, क्योकि उस सिंह के प्रति भी हिंसा कर लेते है जो प्रकृति से ही हिंसक है| हिरण के बचने से सिंह निश्चित ही कष्ट से मर जायेगा|

(कु)तर्क दिया जाता है कि सिंह प्रकृति से मांसाहारी है, मानव नहीं| परन्तु प्रकृति में हमें मांसाहारी मानव  बहुतायत में मिलते हैं और शाकाहारी अपवाद में {भारत जैसे कथित शाकाहारी देश में शाकाहारी मात्र 30% प्रतिशत हैं}| जो भी हो, हम किसी के मन को आहत क्यों करें, क्यों कष्ट दें, क्यों उसके प्रति हिंसा करें??

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अभी जो प्रतिबन्ध आदि भोजन पर लग रहें है; यह आगे प्रतिक्रिया नहीं देंगे क्या?

अगर पर्युषण पर सभी एक मत के अनुसार सभी भारतीय शाकाहारी रहेंगे तो क्रिसमस पर सभी भारतीय प्रसाद में वाइन क्यों न पीयें? क्यों न दुर्गा पूजा पर सभी बलि का प्रसाद लें? क्यों न ईद पर सभी क़ुरबानी का प्रसाद आदर पूर्वक लें|

भारत हैं, बहुत से धर्म ने ३६५ दिन के एक वर्ष में हम ५०० उत्सव मनाते हैं? क्यों न सभी के भावनाओं का आदर कर कर सभी भारतीय लोग अपनी निजी धर्म, आस्था, विश्वास, मान्यता, शौक और लत से ऊपर उठकर क़ानूनी बंधन के साथ सभी धर्मों का पालन करें? क्यों न हम शाकाहार के उत्सव पर  जबरन शाकाहार और मांसाहार के उत्सव पर जबरन मांसाहार करें?

जिनसे नहीं हो पाएगा वो, दूसरों पर जबरन अपनी खाद्य मान्यताएं न थोपें| शाकाहारी हिंसा न करें|

गदर्भ न्याय


भारतीय पुलिस को के बार आतंकवाद के आरोपी गीदड़  पकड़ने के आदेश मिले| पुलिस वाले बस इतना ही जानती थी कि गीदड़  कोई जानवर होता है| साल भर कुर्सी तोड़ने के बाद भी उन्हें गीदड़  नहीं मिला| एक दिन थाने के सामने घास चरता हुआ गधा मिल गया| तो उसे गीदड़  बना कर पकड़ लिया|

लात घूसे और लाठियां खाते खाते गधे को पता चला कि इन पुलिसियों को गीदड़  चाहिए| तो मार से बचने के लिए उसने खुद का गीदड़  होना कबूल कर लिया| अपराध में अपने शामिल होने के बारे में एक कहानी सुना दी|

सरकारी वकील ने अदालत को बताया हुजूर जानवरों के बारे में लिखी सबसे बड़ी किताब में लिखा है गीदड़  के सींग नहीं होते और पूँछ होती है| जो कि आरोपी के है| तो अदालत ने गधे को गीदड़  करार दे दिया|

इस बीच मंत्रीजी ने लालदीवार से गीदड़  पकड़ने वाले पुलिसियों को पुरुस्कार घोषित कर दिया| उधर अगले दिन वकील सफाई ने दलील दी कि आरोपी के खुर है, जो गीदड़  के नहीं होते| तो मंत्रीसेवकों ने उनको देशद्रोहियों का साथी बताना शुरू कर दिया| देश भर में अपराध पीड़ितों के लिए न्याय की मांग जोर पकड़ गई|

अदालत ने देश की भावना का सम्मान किया और गधे को गधा मानते हुए खुर न होने  की असमानता परन्तु अन्य समानता के आधार पर गीदड़  का भाई और उस के अपराध स्वीकार करने के आधार पर उसको अपराधी घोषित कर दिया|

मोमबत्तीवालों ने बड़ेदरवाजे जाकर मोमबत्ती जलाईं| मंत्रीजी ने पुलिसियों का मोरल डाउन करने के आरोप में मोमबत्ती वालो ने पीछे कुत्ते छोड़ दिए| और पटाखे वालों ने पटाखे फोड़े|

कहानी चलती रही| कहानी चलती रही| कहानी चलती रही| … कहानी यूँ ही चलती रही|

मंत्री जी की कुर्सी सालों साल बैठे रहने से चरमराने लगी| बढई ने बताया कुर्सी ठीक करने के लिए गीदड़  का खून लगेगा| पुलिस ने बताया, हमारे कब्जे में तो गीदड़  का भाई गधा है|

आनन फानन में मंत्री जी, अदालत, पुलिस, मोमबत्ती और पटाखे हरकत में आये|

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अख़बार ने लिखा “नरक में जा गधे|” गीदड़  ख़ुश हुआ| मोमबत्ती और पटाखे बिके| मंत्री जी ने बिरयानी खाई| पुलिस का मोरल आसमां से चिपक गया| कुछ गधों को कुछ यकीन आया|

बाद में एक किताब आई….