विश्व- बंदी ४ अप्रैल


उपशीर्षक – निशानदेही 

आज लोदी रोड पुलिस थाने से फ़ोन आया| पति-पत्नी से पिछले एक महीने आने जाने का पूरा हिसाब पूछा गया| पूछताछ का तरीका बहुत मुलायम होने के बाद भी तोड़ा पुलिसिया ही था| कुछ चीज़े शायद स्वाभाव से नहीं निकलतीं या शायद मेरे मन में पुलिस कॉल की बात रही हो तो ऐसा महसूस हुआ| मेरा अनुभव है कि दिल्ली पुलिस शेष उत्तर भारत की पुलिस से कहीं अधिक जन सहयोगी है| मेरे जबाब में बस्ती निज़ामुद्दीन का ज़िक्र तक नहीं था तो उसने सीधे ही मुझ से पूछ लिया| मैंने अपना आवागमन मार्ग समझा दिया तो उसे थोड़ी संतुष्टि हुई| मगर फिर भी शंका के साथ उसने हालचाल और अतापता पूछ लिया| फिर भी उसे चिंता थी कि मेरा मोबाइल उस टावर की जद में कैसे आया तो तकनीकि और भौगोलिक जानकारी के साथ संतुष्ट करना पड़ा|

वैसे परिवार में सब पंद्रह दिन से घर में ही बंद हैं| मेरे अलावा कोई भी दूध सब्जी लेने के लिए भी सीढ़ियाँ नहीं उतरा| मोहल्ले के बाहर मेरी अंतिम यात्रा भी २० मार्च को हुई थीं| वह तारीख भी पुलिस वाले के रिकॉर्ड में भी थी| ऐसा इसलिए हुआ कि मैं बस्ती निज़ामुद्दीन से मात्र कुछ सौ मीटर से ही तो गुजरा था| मोबाइल टावर आपकी मौजूदगी तो दर्ज करते ही हैं| घर भी तो बहुत दूर नहीं है निजामुद्दीन से|

मोबाइल फोटोग्राफी का एक वेबीनार देखा| जोश में दो तीन फ़ोटो खींचे गए और विडियो बनाए गए| तो

मकान मालिक रोज हालचाल के लिए फ़ोन करते हैं| आज बैंक तक गए थे| पूछा तो कहने लगे बहुत जरूरी काम था| क्या दिन आए हैं – बैंक जाने के लिए भी सफाई देनी पड़ती है| वो घर के प्रांगण में ही टहलने का उपक्रम करते हैं वर्ना रोज लोदी गार्डन जाते थे|

घर में लिट्टी-चोखा बनाया गया| यहीं समय है कि नए नए पकवान बनाए खाए जाएँ| परन्तु घुमने फिरने की कमी के कारण अतिरिक्त व्यायाम का भी ध्यान रखना पड़ रहा है|

इन दिनों आसमान का नीलापन दिल चुरा लेने वाला है| चाँद पूरे रंग ढंग में चमकता है| तारों ने भी अपनी महफ़िल मजबूती से जमा ली है| हल्की ठंडक में बाहर ही सो जाने का मन करता है| बचपन के वो दिन याद आते है जब हम छत पर सोते थे| अभी समझ नहीं आता कि छत पर सोना उचित हैं या नहीं| अजीब सी बेचैनी महसूस होती है|

विश्व- बंदी १ अप्रैल


उपशीर्षक – अप्रैलफूल 

आज अप्रैलफूल है| पिछले एक माह से मानवता इसे मना रही है| किसी ने चीन का शेष विश्व पर जैविक हमला बताया तो किसी ने अमेरिका के चीन पर जैविक हमले और उस के वापसी हमले की बात की| कोई इसे लाइलाज बता रहा है तो किसी को मात्र सर्दी जुकाम जैसे लक्षण हो रहे हैं| कोई गोबर – घंटे से ठीक कर रहा है तो कोई नमाज़ से| भारत सरकार कहती है इस बीमारी का भारत में कोई सामुदायिक फैलाव नहीं हैं मगर स्थानीय फैलाव की बात कर रही है जो सामुदायिक फैलाव का मामूली सा हल्का रूप है| भारत के सरकारी आंकड़े का अध्ययन करने पर लगता है उतना बुरा हाल नहीं, मगर सरकारी आँकड़े पर भरोसा कौन करता है?

अभी तक के आंकड़े के हिसाब से दस प्रतिशत से अधिक मृत्यु दर नहीं है| कुछ वर्ष पहले मलेरिया हेजा आदि शायद अधिक खतरनाक थे| देखा जाये तो साधारण सर्दी जुकाम की भी तो कोई पक्की दवा हमारे पास नहीं हैं| हमें चिंता करने और सावधानी बरतने की जरूरत है, घृणा और डर की नहीं|

पिछले दो दिन से अचानक एक धर्म विशेष की संस्था विशेष को खलनायक मान लिया गया है, जो शायद काफी हद तक सही लगता है, मगर केंद्रीय और स्थानीय सरकार इस सन्दर्भ में अपनी गलतियाँ छुपाकर बैठ गईं है| तबलीग वालों से सबसे अधिक ख़तरा मुस्लिम समाज को है, क्योंकि ये उनके बीच जाकर बैठेंगे|

बीमारी से अधिक घृणा फ़ैल चुकी है और उस से अधिक फैला है डर| हिन्दू इस मुद्दे पर मुस्लिमों से घृणा सिर्फ अपना खून जला रहे हैं| किसी को अगर यह बीमारी लगती हैं तो फिलहाल अपने किसी निकट वाले से होने की सम्भावना अधिक है| इसका ध्यान रखें|

हजरत निजामुद्दीन को दिल्ली का संरक्षण माना जाता रहा है| तबलीग वाली घटना के सामने आने के बाद से जंगपुरा की सड़के काफी सुनसान पड़ी थी| तीसरे पहर दवा का छिडकाव होने के बाद फिर से हल्की चहल पहल हो गई| जनता खुद चीजों को बहुत हल्के में लेती है| शाम टहलने वाले भी निकले|

तबलीग का एक असर यह मिला की आज पीछे पार्क में मंदिर का घंटा कम बजा| पुलिस वाले की दिन से कह रहे थे कि घंटे को कोई भी छूता है, केवल एक आदमी ही बजाए| आज कुछ असर हुआ|

दोस्तों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों से दूरी बनाकर रहें, बाकि लोग तो वैसे भी आपके पास नहीं आ पाएंगे| आज वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग पर रिश्तेदारों से बात हुई| बढ़िया रहा|

विश्व-बंदी ३१ मार्च


उपशीर्षक – वित्तवर्ष का अंत 

कुछ घंटों में यह वित्त वर्ष बुरी यादों के साथ समाप्त होने जा रहा है| मैं आशान्वित हूँ कि नया वर्ष फिर से बहारें लाएगा| इस साल पहले दस महीने शानदार बीते| बहुत कुछ नया सीखा, किया और कमाया| मगर बही खाते कर चटख लाल रंग उड़ा उड़ा उदास सा हो गया है|

लेनदारियां बहुत बढ़ चुकी हैं और इस माहौल में उनकी वसूली सरल तो नहीं दिखती| पिछले एक महीने से कोई खास बिल नहीं कटे| अप्रैल से जून से वैसे भी थोड़ा तंग रहता है| इस बार हालत शायद और तंग रहेंगे| उधर, मुवक्किल पैसा समय पर नहीं देते मगर सरकार को अपना वस्तु-सेवाकर तुरंत चाहिए होता है| सरकारी कर गांठ से देना बहुत भारी पड़ता है| जब सरकार खुद आपकी मुवक्किल हो तो स्तिथि नाजुक ही रहती है| केवल रकम वसूल हो जाने रेशमी भरोसा रहता है| हम सेवा प्रदाता तो सिर्फ कागज पर ही सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम हैं| जमीनी लाभ शायद कुछ नहीं|

इस समय बचत से लिए गए निवेश के हालात भी अच्छे नहीं| यह साँप छछुंदर की स्तिथि है| निवेश करें तो जवानी ख़राब, न करें तो बुढ़ापा| उसपर यह मंदी का समय किसी कंगाली से कम नहीं पड़ता| शेयर बाजार में मंदी के चलते निवेश बकत कुछ नहीं तो आज सरकार ने बचत वगैरा पर ब्याज घटा दी| कंगाली में आटा गीला हो चुका है| आटे से याद आया – पिछला गल्ला भी ख़त्म हो रहा हैं और इस महीने का गल्ला भरने के लिए आधे देश के पास पैसे नहीं बाकि बचे लोग के पास दूकान जाने की समस्या|

जिन लोगों के पास नौकरियां हैं उनकी भी समस्या है| लगभग सबको साल के आखिर और कार्यालय के बंद होने के कारण औना – पौना वेतन मिला है| मुनीम भी घर पर और याददाश्त से कितना हिसाब किताब लगायें|

ब्याज घटने से भविष्य निधि पर ७.१ फ़ीसदी, बचत पत्र पर ६.८ फ़ीसदी, किसान विकास पात्र पर ६.९ फ़ीसदी का ब्याज मिलेगा| बचत खाते पर सरकार ने ४ फीसदी पर ही ब्याज रखा हुआ है| इस सब से बुढ़ापे का गणित बिगड़ जाता है| मगर कुल मिलकर ब्याज की दर जीवनयापन की महंगाई की दर से कम होने का अंदेशा हो सकता है| यह बाद अलग है कि बाजार खुद मंदा हो रहे|

सरकार ने दिवालिया कानून को थोड़ा कमजोर थोड़ा सुस्त बनाया है तो काम धंधे में कमी रहेगी| इधर कुछ नया जानने सीखने की जरूरत रहेगी कि कुछ नया काम धंधा मिलता रहे|

प्रार्थना रहेगी बाज़ार में मंदी और देश में अकाल के हालात न बनें| यह नामुराद बीमारी और दुर्भिक्ष जल्दी दूर हो|

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