विश्व-बंदी २२ अप्रैल


उपशीर्षक – न्यायलोप और भीड़हिंसा

अगर समाचार सही हैं तो एक ऐसे गाँव ने जिसमें गैर हिन्दू आबादी नहीं है क्रोधित हिन्दूयों की बड़ी भीड़ ने दो साधू वेशभूषाधारियों की बच्चाचोर मानकर हत्या कर दी| मृतकों की वास्तविक साधुओं के रूप में पुष्टि हुई| कई दिनों तक भारत के दुष्प्रचारतंत्र (आप समाचार तंत्र कहने के लिए स्वतंत्र हैं) ने इसे मुस्लिम आतताई भीड़ द्वारा साधुओं की हत्या के रूप में प्रचारित कर दंगे या गृहयुद्ध के हालात पैदा करने का प्रयास किया| दुर्भाग्य से भारत में भीड़हिंसा परंपरा की तरह स्थापित हो रही है| दुष्प्रचारतंत्र ने वर्तमान घटना का दुष्प्रयोग भीड़हिंसा की बनती जा रही विशिष्ट सामुदायिक पहचान को पलटने के लिए किया था| परन्तु, भीड़हिंसा आखिर क्यों?

इतिहास में राजा-महाराजाओं में भी हमने न्यायप्रियता को सामान्य गुण के रूप में न लेकर विशिष्ट गुण के रूप में दर्ज किया है| मानवता में शासक से लेकर शासित तक का हिंसा ही न्याय का प्रमुख साधन रहा है| न्याय प्रणाली का ह्रास, सत्ता की निस्कृष्टता का पहला प्रमाण पस्तुत करते रहे हैं| पिछले कई दशकों से दुनिया भर के सभी इंगितों (इंडेक्स) में भारत सबसे पीछे न्याय सम्बन्धी इंगितों में ही है और स्तर लगातार गिर रहा है|

अगर न्याय का महंगा या विलंबित हो या न्याय प्रणाली भ्रष्ट तो क्या होगा? समाज वैकल्पिक न्याय व्यवस्था के बारे में विचार करेगा| सरकारी अवैचारिकता के चलते भारत में स्थानीय वैकल्पिक न्याय प्रणालियों का विकास नहीं हो सका है जैसे न्याय-पंचायत, मध्यस्थता और सुलह के औपचारिक ढ़ांचे खड़े नहीं हो सके| यहाँ तक कि बड़े बड़े न्यायाधिकरण निंदनीय रूप से न्यायाधीशों, न्यायविदों, अधिवक्ताओं और सरकारी अधिकारीयों के सेवानिवृत्ति केंद्र बनकर रह गए हैं|

विलंवित न्याय के चलते भारतीय राजनैतिक प्रणाली ने पहले तो पुलिस द्वारा की जाने वाली गिफ्तारियों को न्याय का समकक्ष बना दिया| झूठी या गलत गिरफ्तारियों के मामलों से भारत के तमाम न्यायिक निर्णय भरे पड़े हैं, सबूत के अभाव में आरोपी के छूटने की लम्बी चर्चा होती है परन्तु कोई सरकार या पुलिस से नहीं पूछता कि असली अपराधी कहाँ है या पूरे सबूत क्यों नहीं जुट सके| धीरे धीरे आरोपियों के अन्यायपूर्ण सरकारी हत्याओं को न्याय की संज्ञा दी जाने लगी| तुरंत न्याय का दावा| जिसे मारा गया वो असली गुनाहगार था या नहीं किसे पता? जब भी आनन फ़ानन न्याय की ख़बरें आतीं है, असली अपराधी दावत उड़ाते हैं|

जब जनता ने पाया कि न्याय तंत्र या क़ानून व्यवस्था तंत्र नाकारा है, तो उन्हें अपने हाथ में न्याय को ले लेने का विकल्प दिखाई दिया| जनता का क्रोध उस समय बढ़ जाता है जब अपराधी दूसरे गाँव, समाज, शहर, धर्म, जाति, जिले, प्रदेश, रंग, लिंग, भाषा आदि किसी का हो – कुल मिलाकर बाहरी| फिर जनता सिर्फ बच्चाचोर होने के हल्के से से शक में दो साधुओं के मार देती है| साधुओं द्वारा लॉक डाउन का समुचित पालन न करना उनके प्रति शक को कई गुना बढ़ा देता है| यह बहुत बड़ी कीमत है|

मैं गिरफ्तार हुए सभी आरोपियों को दोयम दर्जे का आरोपी मानता हूँ, भीड़हिंसा के सभी मामले ऐसे ही हैं| मैं पुलिस विभाग को तीसरे दर्जे का दोषी समझता हूँ| दुष्प्रचार तंत्र के बारे में क्या कहा जाए? वो तो नबाब साहबों की पालतू मुर्गा-बटेर हैं| पहले दर्जे के मेरे आरोपी पिछले पचास वर्ष में रहे सभी सांसद, विधायक, न्यायाधिकारी, और न्यायविद हैं| यह न्याय प्रणाली और उसको सहजने वालों का अपराध है|

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विश्व-बंदी २० अप्रैल


उपशीर्षक: भयातुर चिंताएं

कहना चाहता हूँ दिल्ली में डर लगता है| पर देश में डरना मना ही नहीं अक्षम्य पाप है|

वैसे भी इंसान भले ही बिना सोचे बड़े कौर खा ले मगर उसे बिना सोचे बड़ी बात नहीं कहनी चाहिए| करोना शायद इंसानियत को बदलने जा रहा है या शायद नहीं| हम १९१८ से तुलना शायद नहीं कर सकते क्योंकि मानवता और अर्थ व्यवस्था उस समय से बहुत बड़े हैं| जितनी तबाही करोना ने इस साल की है उसे करने में इसे १९१८ में शायद कई गुना समय लगता और आज के सन्दर्भ से देखें तो तबाही का कारण करोना से अधिक हमारी कमजोर चिकित्सा पद्यति होती| कितना दूरगामी प्रभाव वर्तमान बीमारी छोड़ती है, यह इतिहास जानेगा| यदि यह बीमारी लम्बे समय रहती है तो निश्चित ही इसके दूरगामी प्रभाव होंगे| अन्तराष्ट्रीय राजनीति जरूर गरमाई है परन्तु मुझे यह तात्कालिक गुस्से से अधिक फ़िलहाल इसका कोई सार नहीं दिखता| अगले महीने समीकरण किसी भी करवट बदल सकते हैं|

बहुत से गरीब जिन्हें खाने के लिए भीख, कूड़े और झूठन का सहारा था उनके लिए यह दिन कुछ राहत लायें हैं| जिन्हें खैरात लेना नहीं सुहाता उनके आत्मसम्मान पर बन आई है| बढ़ती ग़रीबी और घटता आत्मसम्मान उन्हें नकारा बना सकता है| निम्न मध्यवर्ग के लिए अलग कठिनाई हो सकतीं हैं|

उलट विस्थापन की प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद मुझे है| इसका कारण करोना नहीं बल्कि यह सीख है कि विकास का विकेन्द्रीयकरण होता तो हम बहुत से अपनी लगभग तिहाई अर्थव्यवस्था को चला सकते थे| देश के तिहाई ज़िलों में करोना का असर नहीं है| अगर गांव और तहसील/तालुकों की बात करें तो शायद दो तिहाई गाँव और तालुके एकदम अछूते हैं| इस तरह की स्तिथि में विकेन्द्रीय विकास निश्चित ही अर्थव्यवस्था की हानि को कम कर सकता है| हाँ, अगर विकास विकेन्द्रीय होता तो भौगोलिक रूप से अधिक क्षेत्र प्रभावित होता पर प्रभावित आबादी इतनी ही होती|

परन्तु यह सब अटकलें हैं| वास्तव में मेरा दिमाग यह सोच रहा है कि क्या दिल्ली जैसे महानगर सुरक्षित है? देखा जाये तो अलीगढ़ कहीं अधिक सुरक्षित लगता है| पर कब तक, कितना?

पर दुविधा यह है कि अगर केंद्रीयकृत विकास फैला तो जल्दी ही दिल्ली का प्रभामंडल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दस बीस वर्ष में अलीगढ़ पहुँच जाएगा| अलीगढ़ की दिशा में गाज़ियाबाद, मेरठ, गौतम बुध नगर, और बुलंदशहर प्रभावित है साथ में निकटवर्ती आगरा भी|

ईश्वर नींद आप भेजते रहना|

विश्व-बंदी १९ अप्रैल


उपशीर्षक – राहत में कमी 

बाजार में बढ़ी हुई सख्ती देख कर लगता है कि सरकार का रुख़ और कड़ा हो रहा है और बहुत सी ढिलाई आसानी से अमल में नहीं आ पाएगी| दांया बांया कर कर लोगों द्वारा अपने कार्यालय खोलने की पूरी तैयारियाँ है| बहुत से कार्यालय कल खुलेंगे| घर में चिंता का माहौल है|

दिल्ली, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु और कर्णाटक की सरकारें बिना किसी राहत के लॉक डाउन को चलने के आदेश दे चुकी हैं| राज्य सरकारों का यह आदेश केंद्र सरकार के आदेश में दिए गए अधिकारों के तहत है और इसमें कोई विभेद नहीं है| यहाँ तक की केंद्र सरकार ने भी कुछ छूटों में वापिस कमी की है| देखना यह है कि राज्य सरकार के आदेश को कड़ाई से लागू किया जाता है या कठिनाई बढ़ने का खतरा उठाया जाता है| उम्मीद है दिल्ली राजनीति के दलदल में नहीं फंसेगा|

मरने वालों की संख्या देश में पांच सौ और पीड़ितों की सोलह हजार के पार निकल चुकी है| अन्य देशों के मुकाबले यह संख्या कम है, परन्तु ग्राफ़ के नीचे आने तक ख़ुशफ़हमी पाल लेना गलत होगा – हम बीमारी के प्रसार को टालने में कामयाब जरूर हुए हैं| परन्तु बीमारी की समाप्ति की घोषणा तब तक नहीं की जा सकती जब तक बीमारों की संख्या बढ़ने की ख़बरे आती रहेंगी| १९ अप्रेल की शाम पांच बजे, मन्त्रालय की वेबसाइट १३,२९५ लोगों के इलाज जारी होने के बारे में बता रही है|

मैं बहुत से कार्य समय पर नहीं कर पा रहा हूँ| घर से काम करने की पुरानी आदत के बाद भी कई रुकावटें हैं| घरेलू काम जो नौकर चाकर कर लेते हैं, उन्हें करना एक पहलू मात्र हैं| साथ ही इन कामों के साथ में ऑडियो पुस्तकें सुन रहा हूँ| सामाजिक चिंताएं मुझे व्यथित तो करती हैं पर इतना नहीं कि संतुलन खो बैठा जाए| भविष्य, जिसकी चिंता अनावश्यक है, उचित योजना का विषय है| योजना है, लागू करना सरल नहीं हो पाता| बहुत कुछ समझ से परे है| प्रश्न मानसिक रूप से अपने को दुरुस्त रखने का ही नहीं अपना ध्यान आवश्यक कार्यों में बनाए रखने का भी है|

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