भीषण लू-लपट और करोना


विश्व-बंदी २६ मई – भीषण लू-लपट और करोना

जब आप यह पढ़ रहे होंगे तब भारत में करोना के डेढ़ लाख मामलों की पुष्टि हो चुकी होगी| कोई बुरी खबर नहीं सुनना चाहता| मुझे कई बार लगता है कि लोग यह मान चुके हैं कि यह सिर्फ़ दूसरे धर्म, जाति, वर्ग, रंग, राज्य में होगा| सरकार के आँकड़े कोई नहीं देखता न किसी को उसके सच्चे या झूठे होने का कोई सरोकार है| आँकड़ों को कलाबाजी में हर राजनैतिक दल शामिल है हर किसी की किसी न किसी राज्य में सरकार है| कलाबाजी ने सरकार से अधिक समाचार विक्रेता शामिल हैं जो मांग के आधार पर ख़बर बना रहे हैं| जनता शामिल है जो विशेष प्रकार कि स्वसकरात्मक और परनकारात्मक समाचार चाहती है|

इधर गर्मी का दिल्ली में बुरा हाल है| हार मान कर कल घर का वातानुकूलन दुरुस्त कराया गया| चालीस के ऊपर का तापमान मकान की सबसे ऊपरी मंजिल में सहन करना कठिन होता है| खुली छत पर सोने का सुख उठाया जा सकता है परन्तु सबको इससे अलग अलग चिंताएं हैं|

मेरा मोबाइल पिछले एक महीने से ख़राब चल रहा है परन्तु काम चलाया जा रहा है – इसी मैं भलाई है| तीन दिन पहले एक लैपटॉप भी धोखा दे गया| आज मजबूरन उसे ठीक कराया गया| उस के ख़राब होने में गर्मी का भी दोष बताया गया|

इस सप्ताह घर में गृह सहायिका को भी आने के लिए कहा गया है| क्योंकि पत्नी को उनके कार्यालय ने सप्ताह में तीन दिन कार्यालय आने का आदेश जारी किया है|

यह एक ऐसा समय है कि धर्म और अर्थ में सामंजस्य बैठना कठिन है – धर्म है कि जीवन की रक्षा की जाए अर्थ विवश करता है कि जीवन को संकट मैं डाला जाए| मुझे सदा से घर में कार्यालय रखने का विचार रहा इसलिए मैं थोड़ा सुरक्षित महसूस करता हूँ| मैं चाहता हूँ कि जबतक बहुत आवश्यक न हो घर से बाहर न निकला जाए| मैं अति नहीं कर रहा चाहता हूँ कोई भी अति न करे| न असुरक्षित समझने की न सुरक्षित समझने की| गर्मी और करोना से बचें – भीषण लू-लपट और करोना का मिला जुला संकट बहुत गंभीर हो सकता है|

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विश्व-बंदी २५ मई – फ़ीकी ईद


ईद कैसी, ईद ईद न रही| उत्साह नहीं था| कम से कम मेरे लिए| देश क्या दुनिया में एक ही चर्चा| क्या सिवईयाँ क्या फेनी क्या कोई पकवान क्या नाश्ते क्या मुलाक़ातें क्या मिलनी? इस बार तो कुछ रस्म अदायगी के लिए भी नहीं किया| बस कुछ फ़ोन हुए कुछ आए कुछ गए|

न होली पर गले मिले थे न ईद पर| कोई संस्कृति की दुहाई देने वाला भी न रहा – जो रहे वो क्रोध का भाजन बन रहे हैं| कोई और समय होता तो गले मिलने से इंकार करने वाला पागल कहलाता| दूर का दुआ-सलाम प्रणाम-नमस्ते ही रह गया| चलिए गले मिलें न मिलें दिल तो मिलें| मगर हर मिलने वाला भी करोना विषाणु दिखाई देता है| बस इतना भर हुआ कि लोगों की छुट्टी रही| शायद सबने टीवी या मोबाइल पर आँख गड़ाई और काल का क़त्ल किया|

हिन्दू मुसलमान सब सहमत दिखे – जिन्दगी शुरू की जाए| कोई नहीं पूछना चाहता कितने जीते हैं कितने मरते हैं, कितने अस्पताल भरे कितने खाली| मुंबई में मरीज प्रतीक्षा सूची में स्थान बना रहे हैं – मरीज क्या चिकित्सक चिकित्सा करते करते प्रतीक्षा सूची में अपना नाम ऊपर बढ़ने की प्रतीक्षा कर रहे हैं| देश और दिल्ली की हालत क्या है किसी को नहीं समझ आता| बीमार हो चुके लोगों का आँकड़ा डेढ़ लाख के पार पहुँचने वाला है| मीडिया और सरकार गणित खेल रही है| मगर बहुत से लोग हैं जो इस आँकड़े से बाहर रहना चाहते हैं या छूट गए हैं| सरकारी तौर पर खासकर जिनमें कि बीमारी मिल रही है पर कोई लक्षण नहीं मिल रहा|

आज छुट्टी थी, मगर जो लोग सुबह ग़ाज़ियाबाद से दिल्ली आये या गए शायद शाम को न लौट पाएं – सीमा फिर नाकाबंद हो चुकी है| घर से निकलें तो लौटेंगे या नहीं कोई पक्का नहीं जानता| नौकरानी को बुलाया जाए या न बुलाया जाए नहीं पता| न बुलाएँ तो न उसका काम चले न हमारा|

पीछे मंदिर में लोग इस समय शाम की आरती कर रहे हैं| मुझे मंदिर के घंटे हों या मस्जिद की अज़ान मुझे इस से अधिक बेमानी कभी नहीं लगे थे| मगर उनके अस्तित्व और प्रयोजन से मेरा इंकार भी तो नहीं है|

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विश्व-बंदी २४ मई


उपशीर्षक –  पिनाराई विजयन

केरल – ईश्वर का अपना देश| पर साम्यवाद का बहुमत| वर्तमान में हिन्दू धर्मं के सर्वसुलभ रूप के संस्थापक आदि शंकराचार्य की भूमि – परन्तु शेष भारत और उत्तर भारतीय हिन्दुओं  में गोमांस भक्षण के कारण निन्दित| जब केरल जाएँ तो हर कण में संस्कृति के दर्शन – परन्तु कट्टरता और उदारवाद का सम्पूर्ण समिश्रण| केरल के आधा दर्जन यात्राओं में मुझे कभी केरल के सामान्य जीवन में कट्टरता नहीं मिली| केरल में मुझे हिन्दू, मुस्लिम और ईसाईयों के बीच आपसी समझ अधिक दिखाई देती हैं| सभी लोग अपनी साँझा संस्कृति के प्रति विशेष लगाव रखते हैं|

उत्तर और पश्चिम भारत में सांप्रदायिक तनाव के पीछे भारत विभाजन की याद जुड़ी हुई है| जिन मुस्लिमों ने पाकिस्तान की मांग की, उनमें से कई गए नहीं| कई मुस्लिम जिनके पुरखों को पाकिस्तान का पता नहीं मालूम वो सोचते हैं कि गलती हुई कि नहीं गए| हिन्दू खासकर शरणार्थी हिन्दू सोचते हैं कि यह लोग क्यों नहीं गए| मगर दक्षिण भारत खासकर केरल में यह सोच प्रायः नहीं है| केरल का हिन्दू- मुस्लिम कट्टरपंथ पाकिस्तान से अधिक अरब से प्रभावित है|

इस सब के बीच केरल भारत के आदर्श राज्यों में है| बंगाल और केरल भारतीय वामपंथ की प्रयोगशाला हैं – बंगाल असफल और केरल सफल| केरल में विकास और राष्ट्रीय जुड़ाव (राष्ट्रवाद नहीं) बंगाल ही नहीं किसी अन्य राज्य से बेहतर है| केरल में आप मलयालम हिंदी या अंग्रेजी का झगड़ा नहीं झेलते| यहाँ हिंदी प्रयोग बहुत सरल है|

केरल के सबसे बड़ी बात यह है कि यहाँ शिकायतें कम हैं| यह राज्य अपने बूते उठ खड़ा होने का माद्दा रखता है| २०१८ की बाढ़ की दुःखद याद को मैंने २०१९ की अपनी कई यात्राओं में देखा| सब जानते हैं कि केंद्र सरकार से केरल को वांछित मदद नहीं मिल पाई| परन्तु मुझे आम बातचीत में इसका मामूली उल्लेख मात्र ही मिला| इस से अधिक शिकायत तो उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग तब करते हैं जब केंद्र और राज्य दोनों में एक दल की सरकार हो और पर्याप्त मदद मिली हो|

हभी हाल में केरल ने बिना किसी परेशानी और मदद के कोविड-१९ से लड़ने की शुरुआत की थी| जिस समय उत्तर भारतीय करोना के लिए गौमांस और शूकरमांस भक्षण के लिए केरल को कोस रहे थे और बीमारी को पाप का फल बता रहे थे – केरल शांति से लड़ रहा था| यह लड़ाई पूरे भारत की सबसे सफल लड़ाई थी|

२०१८ की बाढ़ हो या २०२० का करोना, पिनाराई विजयन का नेतृत्व उल्लेखनीय है| आज उनका जन्मदिन है| भले ही यह असंभव हो, परन्तु मुझे लगता है कि उन्हें केरल के मुख्मंत्री पद से आगे बढ़कर भारत का प्रधानमंत्री बनना चाहिए| ऐसा न होगा, भारतीय लोकतंत्र का गणितीय दुर्भाग्य है|जन्मदिन की शुभकामनाएं|

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