लिए कटोरा हाथ … स्कूल चले हम…|


स्कूल चले हम
लिए कटोरा हाथ
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
हाड़ तोड़ते बाप
कमर तोड़ती मैया 
स्कूल चले हम|
 
बाप के हाथ लकीरें 
माँ की आँख आंसू
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
लिए कटोरा हाथ.. स्कूल चले हम..

लिए कटोरा हाथ.. स्कूल चले हम..

पेट बाँध कर सोये 
पेट पकड़ कर जागे 
स्कूल चले हम|
 
दाल भात का सपना 
थाली में हो अपना 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
साहब जी का नोट 
नेता जी का वोट 
स्कूल चले हम|
 
भूख हमारी जात
नंग हमारी पात 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
कखगघ से क्या लेना 
जोड़ घटाव लेकर भागे 
स्कूल चले हम|
 
मास्टर पूछें जात 
बड़के मारें लात 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
देश दरिद्दर क्या जानें 
ईश्वर अल्लाह क्या मानें 
स्कूल चले हम|
 
पोखर पतली दाल 
कंकड़ चुभता भात
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
साहब बाबू डटकर खाते 
जिम जाकर कमर घटाते 
स्कूल चले हम|
 
माँ बोलीं डटकर खाना 
भूखे लौट न आना 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 

बेटा मिग उड़ाता था!


 

बेटा मिग उड़ाता था![i]

 

हँसती थी माँ,
गाती थी माँ,
बचपन में जब,
बेटा जहाज उड़ाता था|

 

गाती थी माँ,
गोदी में लेकर,
सपनों की लोरी,
बेटा सोने जाता था|

 

रचती थी माँ,
चौके में जाकर,
भोजन थाली,
बेटा पढ़ने जाता था|

 

डरती थी माँ,
अनहोनी बातों से,
नन्हे हाथों में जब,
बेटा बन्दूक उठता था|

 

उठाती थी माँ,
मिठाई के दौनों से,
आसमां सर पर,
बेटा अव्वल आता था|

 

रोती थी माँ,
भूली बिसरी यादों से,
अनहोनी आहों से,
बेटा चुप करता था|[ii]

 

सुख सांझे थे,
दुःख सांझे थे,
माँ के सपनों के गुल्ले,
बेटा बुनकर लाता था|

 

शिखर कुलश्रेष्ठ  चित्र आभार सहित http://indiatoday.intoday.in/story/iafs-mig-21-bison-crashes-in-uttarlai-in-rajasthan-pilot-killed/1/291418.html

शिखर कुलश्रेष्ठ
चित्र आभार सहित http://indiatoday.intoday.in/story/iafs-mig-21-bison-crashes-in-uttarlai-in-rajasthan-pilot-killed/1/291418.html

मुस्काती थी माँ,
संतोष में पल में,
दिनभर मेहनत की,
बेटा खबर सुनाता था|

 

उड़ती थी माँ,
गाती थी माँ,
बच्ची थी माँ,
बेटा मिग उड़ाता था|

 

क्या करती माँ?
क्या करती माँ!!
हाय रे हाय,
बेटा मिग उड़ाता था!!!

 

क्या करती माँ?
क्या करती माँ!!
हाय रे हाय,
बेटा मिग उड़ाता था!!!


[i] फ्लाइट लेफ्टिनेंट शिखर कुलश्रेष्ठ को समर्पित, जिन्हें सोमवार १५ जुलाई २०१३ को मिग दुर्घटना ने हमसे छीन लिया|

[ii] शिखर में काफी समय पहले अपने पिता को खो दिया था|

क्रिकेट: मनोरंजन में फिक्सिंग


 

 

इस देश में धर्म, भ्रष्टाचार और शराब की तरह ही लोंगो को क्रिकेट की लत हैं| बल्कि शायद क्रिकेट कहीं ज्यादा खतरनाक है| मुझे याद है कि बचपन में अगर कोई सहपाठी घर से पढाई पूरी करके नहीं जाता था और कहता था कि उसने कल फलां फलां क्रिकेट मैच की रिकॉर्डिंग देखी थी तो कई बार शिक्षक उस पर सख्ती नहीं दिखाते थे|

मैंने भी रेडिओ पर क्रिकेट कमेन्ट्री शायद अपने अक्षरज्ञान शुरू होने से पहले ही शुरू कर दी थी| जिस दिन क्रिकेट का मैच होता था तो मेरे पिता अपना ट्रांजिस्टर उस दिन अपने साथ चिपकाये रखते थे और वो उनके साथ कार्यालय भी जाता था| जब मैं थोडा बड़ा हुआ, तब मैंने मोहल्ले के लोगों से किस्से सुने कि किसी ज़माने में मोहल्ले का अकेला ट्रांजिस्टर मेरे पिता के पास ही था और बिजली गुल होने की दशा में हमारे घर में बैठक जमा करती थी| बाद में, जिन घरों में टीवी था वहां भी यही हाल था|

मुझे भी क्रिकेट की बीमारी बुरी तरह से थी और बाद में मुझे यह महसूस हुआ कि यह अफीम मेरे भविष्य को खराब कर देने के लिए काफी है| मेरे कई सहपाठी कहा करते थे बोर्ड परीक्षा तो हर साल आतीं है और क्रिकेट का विश्व कप  चार साल में एक बार| मेरा क्रिकेट से मोह भंग होने में सट्टेबाजी का कोई हाथ नहीं है वरन मेरे एक सहपाठी का हाथ है जो गणित और सांख्यकी की मदद और “सामान्य अनुभूति” से न सिर्फ मैच का सही भविष्य बताता था बल्कि एक मुख्य भारतीय बल्लेबाज का स्कोर में दहाई का अंक बिल्कुल सही बताता था| उसके साथ छः महीने रहकर मैंने क्रिकेट का नशा छोड़ दिया| दुर्भाग्य से मेरा वह मित्र क्रिकेट, गणित और अनुभूति की भेट चढ़ गया| पिछले पंद्रह वर्षों से मेरा उसके साथ संपर्क नहीं बल्कि मुझे उसका नाम भी नहीं याद|

जब क्रिकेट में सट्टेबाजी और फिक्सिंग के आरोप सामने आने लगे तब मुझे लगा की “क्रिकेट की सह्सेवाओं” ने मेरे मित्र के रूप में हीरा खो दिया|

मुझे या शायद किसी भी दर्शक को इस देश में क्रिकेट मैच की फिक्सिंग से कोई परेशानी नहीं है| जब तक आपको खुद मैच का परिणाम पहले से न पता हो तो क्रिकेट का हर मैच एक बढ़िया उपन्यास और फिल्म की तरह अंत तक मनोरंजन करता है| अगर फिल्म मनोरंजक हो तो किसे फर्क पड़ता है कि उसका प्लाट किसने कब कहाँ और क्यों लिखा था| हर गेंद का रोमांच बना रहना चाहिए| हर गेंद पर बल्ला वास्तविक तरीके से घूमना चाहिए|

अन्य खेलों के मुकाबले, क्रिकेट में हर खिलाडी के निजी विचारों और तकनीकि का अधिक स्थान है| क्रिकेट की एक टीम में कम से कम ११ सब – टीम खेल रही होतीं है| उनके अपने निजी लक्ष्य आसानी से निर्धारित किये जा सकते हैं| अगर मैच फिक्स न भी हो तो कोई  भी बढ़िया खिलाडी अपने दम पर अपनी निजी सब – टीम के लक्ष्य तक पहुँच सकता है| टीम में बने रहना और जनता की निगाह में चढ़े रहने से अधिक कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है| आपने देखा होगा कि अधिकतर बल्लेबाज एक मैच में अपने कार्य – प्रदर्शन पर निर्भर रहने की जगह अपना औसत बनाये रखने में अधिक ध्यान देते हैं|

भारत पाकिस्तान के मैच तो हमेशा ही फिक्सिंग के लिए अपना एक स्थान बनाये रहे हैं| दक्षिण भारत की सामरिक समझ रखने का दावा करने वाला हर व्यक्ति मैच शुरू होने के हफ्ते भर पहले से ही उसका परिणाम घोषित कर ने  लगता है| इस तरह के व्यक्ति मैच इसलिए नहीं देखते कि खेल में क्या हो रहा है बल्कि इसलिए देखते हैं कि उनकी सामरिक समझ कितनी सही थी और दोनों टीम उन्हें दी गयी स्क्रिप्ट पर किस प्रकार खरी उतरीं|

हाँ! सट्टेबाजी पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है और यह उस पर प्रतिबन्ध लगाने से नहीं बल्कि अवैध सट्टेबाजी का उचित वैध विकल्प देने पर ही किया जा सकता है| किसी भी कार्य को खुले रूप में अवैध बनाये रखने का अर्थ है कि हम उसे कानूनी नियंत्रण से बाहर रखकर खुली छुट दे रहे हैं| अवैध अवैध सट्टेबाजी से कई बार लोग जरूरत से अधिक निवेश कर देते है और घर बार लुटा बैठते हैं| सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार को राजस्व की बड़ी हनी होती है| जो पैसा कर के रूप में सरकारी खजाने में जाना चाहिए था वो नेता, पुलिस और माफिया के हाथ में बाँट जाता है|

मेरी इस साधारण सी बात को इस तरह से समझा जा सकता है कि जिन स्थानों पर शराब कानूनी  रूप से सहज उपलब्ध है वहां पर अवैध और/या नकली शराब का धंधा बेहद कम है, नशे की बुरे पहलू पर खुल कर बात होती है, नशा मुक्ति की तमाम व्यवस्था मौजूद है, सरकारी आय भी होती है|

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