दिवाली, चीन, और वो!!


[२८ सितम्बर २०१६ को ही यह पोस्ट लिखना चाह रहा था मगर अभी रवीश कुमार जी की पोस्ट “इस दिवाली चीन का माल ज़रूर ख़रीदें” पढ़कर तुरंत लिख डाला]

हर बार होता है, हर दिवाली पर| गरीब कुम्हार का घर, बिजली के चीनी लट्टू, पटाखों और सामान का फ़ोटो, और बहिष्कार की मांग| फेसबुक पर लाइक और व्हात्सप्प पर शेयर होता रहता है| इस बहाने प्रचार हो जाता है – सस्ता चीनी सामान उपलब्ध है, पोस्ट को लाइक करने के बाद अपनी जेब टटोलिये और देशभक्ति और हमदर्दी घर छोड़ दीजिये|

भरे बाजार के फूटपाथ पर, दस रुपये का पटाखा ले लो बाबा जैसी मुद्रा में बहुत लोग बैठे होते हैं उसी चीनी सामान को बेचते| न वो इस चीनी सामान के निर्माता हैं, न आयातक, न वितरक, न कालाबाजारिये| इन चीनी सामान के आयातक, वितरक, कालाबाजारिये कोई देशभक्त जी होते हैं, जो नाम, धाम, जाति, धर्म, कर्म, राजनीति, मन, कर्म, वचन से देशभक्त होते हैं|

मैं जो लिखने जा रहा हूँ, उसका कारण मूल कारण एक प्रेस विज्ञप्ति है जो २८ सितम्बर २०१६ को जारी हुई और मैंने उसे शेयर भी किया था|

यह मूल प्रेस विज्ञप्ति प्रेस सूचना ब्यूरो की साईट पर उपलब्ध है| यह उस तथ्य के बारे में है जिसे हम सब जानते और उसका फेसबुकिया विरोध भी करते हैं| दिवाली के समय विदेशी विशेषकर चीन के पटाखों की बिक्री धूम धड़ाके से होती है| सब लोग आसानी से खरीदते भीं हैं| मगर चिंताजनक रूप से यह विज्ञप्ति कहती है – सरकार को विदेशी मूल के पटाखों की बड़ी मात्रा में आयात की सूचना/शिकायत मिलती हैं| शायद यह सूचना और शिकायत प्राप्त करना सरकार के लिए रोजमर्रा का काम है|

आगे यह विज्ञप्ति कहती है – इन पटाखों का आयात रिस्ट्रिक्टेड है और भारत सरकार ने आज तक पटाखों के आयात का कोई लाइसेंस किसी को भी नहीं दिया है| कम से कम २००८ में नियम बनने के बाद से तो किसी को यह लाइसेंस नहीं मिला है|

आश्चर्यजनक रूप से यह विज्ञप्ति विदेशी मूल के पटाखों की बिक्री की सूचना निकट के पुलिस थाने को देने की कहकर समाप्त हो जाती है|

अगर किसी को पटाखा आयात की अनुमति नहीं तो उनका आयात कैसे होता है? इसके उत्तर में विज्ञप्ति कहती है कि झूठे डिक्लेरेशन देकर आयात किया जाता है| किस तरह के यह झूठ होते होंगे? क्या उन झूठों को पकड़ने की कोई कार्यवाही हुई होगी? क्या उन झूठों पर विश्वास करने के लिए सीमा शुल्क अधिकारीयों को साम – दाम से राजी किया जाता है या वो भी देश के जनता की तरह भोले भाले हैं?

जब झूठे डिक्लेरेशन देकर पटाखे आयात हो जाते हैं तो राम जाने क्या क्या आयात हो जाता होगा|

आगे बहुत से प्रश्न है मगर मेरी अपनी सीमायें है… कम लिखा ज्यादा समझना की तर्ज पर लिखना बंद करना चाहता हूँ|

काले काले भूत, काला धन लेकर


काली रात होती है… अमावस की रात…
बहुत काली रात है… पितर अमावस की रात…
इस साल 30 सितम्बर की रात एक बार फिर वही पितर अमावस की काली रात होगी…
 
इस साल की इस काली रात में काले- काले भूत निकलेंगे… काले काले भूत…
काला धन लेकर…. अपना काला काला कालाधन….
 
उनका इन्तजार करेंगे…. सदियों के भूखे बेताल… नहीं भाई…
उनका इन्तजार करेंगे… आयकर विभाग वाले…
उनका स्वागत होगा… उनका काला काला कालाधन सफ़ेद हो जायेगा…
उसके बाद, भूत और बेताल…
नहीं नहीं…
भूत और आयकर वाले सो जायेंगे…
अगली अखिल भारतीय काला-सफ़ेद- योजना आने तक…
 
अगर आपके पास भी कालाधन तो आप भी आइये…
इस बहुत काली अमावस की रात में
किसी को नहीं बताया जाएगा कि आप काले काले भूत हैं
 
– ऐश्वर्य मोहन गहराना
 
नोट– आयकर विभाग के काउंटर बीच काली रात यानि रात के बारह बजे तक खुले रहेंगे, जिस से काले भूतों के बारह न बजें|

गूगल के बहाने कंपनियों के जन्मदिन पर


आज २७ सितम्बर २०१६ को गूगल अपना अठारहवां (18 वां) जन्मदिन मना रहा है| मगर लगता है की कुछ लोचा है|

यूनाइटेड किंगडम के प्रख्यात अखबार द टेलीग्राफ की इस ख़बर के मुताबिक सन २००५ में गूगल ने अपना सातवाँ जन्मदिन सत्ताईस सितम्बर को नहीं वरन छब्बीस सितम्बर दो हजार पाँच (२६ सितम्बर २००५) को मनाया था| जबकि गूगल का छठां जन्मदिन सात सितम्बर दो हजार चार (७ सितम्बर २००४) को था| लेकिन गूगल का पांचवां जन्मदिन आठ सितम्बर दो हजार तीन (०८ सितम्बर २००३) को हुआ| खुद गूगल के मुताबिक गूगल ने अपना इनकारपोरेशन एप्लीकेशन चार सितम्बर उन्नीस सौ अठान्वै (०४ सितम्बर १९९८ को सरकार के पास दाखिल की थी| उधर गूगल डॉट कॉम पंद्रह सितम्बर उन्नीस सौ सतानवे (१५ सितम्बर १९९७) को पंजीकृत हुई|

बहरहाल, अब गूगल हर साल २७ सितम्बर को ही अपना जन्मदिन मनाने का सोच रही है|

ऐसा नहीं है कि कंपनी के जन्म दिन का मसला अकेला गूगल का मसला है|

सिद्धांततः कम्पनी दो या अधिक लोगों के मन में कंपनी बनाने की इच्छा के जन्म लेने के साथ उन सबके मस्तिष्कीय गर्भ में उत्पन्न होना शुरू होती है| इस प्रक्रिया में उसका रंग रूप आकार प्रकार कद काठी आदि तय की जाती है| सिद्धान्तः कंपनी उस दिन बन जाती है जिस दिन यह सब तय हो जाता है| इसके बाद कंपनी के नाम पर सरकार सरकारी मुहर लगवाई जाती है जो तकनीकि रूप से उस नाम से कंपनी बनाने की अनुमति होती है| अगले चरण में कंपनी के जन्मदाता – प्रमोटर उस नाम से कंपनी के इनकारपोरेशन के लिए अर्जी दाखिल करते हैं| यह सभी चरण देश और काल के हिसाब से आजकल के दो घंटे से लेकर पुराने ज़माने के दो एक साल तक हो सकते हैं|

परन्तु कानूनन कंपनी का जन्म उस दिन माना जाता है जिस दिन सरकार से इनकारपोरेशन सर्टिफिकेट मिलता है| परन्तु, कंपनी के प्रमोटर इस आधिकारिक जन्मदिन का प्रायः इन्तजार नहीं करते और नाम तय होते ही कंपनी का कुछ न कुछ काम धाम शुरू भी कर देते है|

उदहारण के लिए अभी हाल में एक कंपनी खोलने के लिए प्रक्रिया शुरू की गई| कंपनी के प्रमोटर अपने इस बच्चे के लिए पिछले तीन साल से योजना बना रहे थे| इस साल फरवरी में उन्होंने कंपनी की पूँजी, कार्यकलाप, नागरिकता, निवास स्थान (कार्यालय), लोगो, पञ्चलाइन आदि मसलों पर अपना विमर्श पूरा किया| तमाम कानूनी औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए उन युवा प्रमोटरों पर संसाधन (कागजात – जैसे पहचान पत्र) नहीं थे तो उन्हें बनाने की कार्यवाही हुई| इसके बाद एक दिन उन्होंने कंपनी बनाने संबंधी औपचारिक अनुरोध किया गया | तीन चार दिन में कंपनी के लिए नाम विशेष की सरकारी अनुमति मिली| अब प्रमोटर अपनी कंपनी के नाम और लोगो को लेकर इतने उत्साहित थे कि कहा गया कि जब तक बढ़िया सा लोगो न बन जाए तब तक कंपनी इनकारपोरेशन की औपचारिक एप्लीकेशन न लगाईं जाए| वो कंपनी के जन्म के दिन शानदार कार्यक्रम करना चाहते थे| इसके बाद एक दिन शाम को एप्लीकेशन इस हिसाब से लगाईं गई कि अगले दिन कंपनी को इनकारपोरेशन सर्टिफिकेट मिले| मगर सरकारी कार्यालय उस दिन अच्छे मूड में था और कंपनी उसी दिन यानि योजना से एक दिन पहले बन गई| पुराने समय में एक और दिक्कत थी| कंपनी बनने के लगभग दस दिन बाद प्रमोटर को अधिकृत रूप से पता लगता था कि कंपनी बन चुकी है|

अब आप कंपनी का वास्तविक जन्म दिन तय करते रहिये| कानून वही मानेगा जो वो मानता है – सनद की तारीख़|