पिंजड़ा


मेरे चारों तरफ एक पिंजड़ा रहता है| तुम पिंजड़े को गलत क्यों समझते हो? पिंजड़ा तुम्हे कैद नहीं करता| तुम्हें आजादी देता है – चैन से सोने की|

पिंजड़ा लोहे का नहीं होता|

सोने का पिंजड़ा देखा है तुमने? बड़ा सा सोने के पिंजड़ा, जिसमें भगवान रहता है| पिंजड़े के ऊपर भगवान की ध्वजा रहती है| भगवान उस पिंजड़े में आजाद रहता है| छप्पन भोग अपनी मर्जी से खाने को मिल जाए तो कौन भगवान प्रसन्न न हो? पुराने समय की बात है| भगवान अपने पिंजड़े से बाहर निकला और निर्गुण हो गया| अब वो पिंजड़े से बाहर नहीं निकलता|

चाँदी के पिंजड़ो में हमने बहुत लोगों को देखा है| किस किस के नाम लें? उनकी आजादी और नींद में ख़लल क्यों डालना? चाँदी के पिंजड़ो में हमारी सरकार सोती है और उसके हाकिम सोते हैं| उसे अपना भला करने की आजादी है| उसे कानून बनाने की आजादी है| उसे गोलियाँ चलाने की आजादी है| उसे अपने मन पसंद नारे सुनने की आजादी है|

हमने दिल्ली मुंबई में शीशे के पिंजड़े देखे हैं| उन पिजड़ों में रहने वाले गुलामी पर अपने हस्ताक्षर करते हैं| पिंजड़े से बाहर जाने का जुर्माना खुद अपने कलम से तय करते हैं| वहाँ चौबीस घंटे काम करने की आजादी है| शीशे के एग्जीक्यूटिव केबिन में शांत बीमारियों से शांतिपूर्वक मरने की आजादी है| लोग दिन भर कंप्यूटर पर टकटक करते रहते हैं जिससे शाम को नर्म बिस्तर पर बैठ कर नींद की गोली खा सकें| उन्हें नींद की गोली खाने की आजादी है|

आजकल बड़े बड़े मुहल्लों के बाहर लोहे के बड़े बड़े गेट देखते हो? नहीं, मैं कुछ नहीं बताऊंगा| ये मेरा पिंजड़ा है|

तुम पिंजड़े से बाहर जाना चाहते हो? पंख कट चुके हैं तुम्हारे| तुम एक उड़ान नहीं भर सकते| बेपर लोगों का जीवन आवारगी में बीत जाता है| तुम्हारा भोजन अपवित्र और तुम्हारा भोग अश्लील है| तुम्हारी सोच नक्कल है|

अपने पर उगाने की भूल न करना दोस्त| तुम्हारा आसमान अराजक है| तुम्हारी आजादी नारा है| तुम्हारी साँस गिरवी होने की मोहताज है|

लाओ अपने कटे हुए पंख दो, तुम्हारे लिए मुकुट बनायें| तुम वापिस आना पिंजड़े के राजा बनना|

मैं भी


मैं भी, साल २०१८ के दो ख़तरनाक शब्द| पुरुषों में डर है कि इन दो शब्दों के साथ उनका नाम न लिखा हो| प्रवृत्ति विशेष के पुरुष बुरी तरह घबराये हुए हैं तो अन्य पुरुष अकारण परेशान किये जाने की आशंका से ग्रसित हैं| इन दोनों प्रकार के पुरुषों में एक बात का संतोष भी है – उनकी बेटी, बहन या पत्नी अपने की अकेला और असहाय महसूस नहीं कर रहें होगीं| तो एक मूर्खतापूर्ण चिंता भी है कि कहीं उनकी बेटी, बहन या पत्नी अपने प्रति अन्याय की बात बात उठाकर परिवार की योनि अर्थात इज्जत दाँव पर न लगा दें और शोषित होने के जन्मजात अभिशाप के मुक्त न हो जाएँ|  

मुद्दे की राजनीति, मुद्दे की राजनीति, मुद्दे से जुड़े क़ानून और उनके संभावित दुरूपयोग चर्चा में हैं| किस कानून या आन्दोलन का दुरूपयोग नहीं होता? हमारा ध्यान सकारात्मक पहलू पर होना चहिये| युवा लड़कियों के परिवार सुरक्षित वातावरण महसूस कर रहे हैं| जिन कंपनी या संस्थानों में यौन शोषण सम्बन्धी समिति का गठन नहीं था या ठीक से नहीं था, वो सलाह के लिए संपर्क कर रहे है|

जिस प्रकार के आवाजें उठ रहीं हैं, आन्दोलन में गंभीरता आएगी और यौन शोषण सम्बन्धी कानून के लैंगिकसंतुलन की ओर बढ़ने में भी मदद मिलेगी| उम्मीद है कि शोषण का शिकार रहे पुरुष भी शोषक पुरुषों और महिलाओं के प्रति आवाज उठाने की हिम्मत करेंगे|

इस समय कई प्रकार की भ्रान्ति जनता में फैली हुई है| बहुत से लोग यह मान कर चल रहे हैं कि आपकी हँसी मजाक भी इस प्रकार के आरोपों का आधार बन सकते हैं| वास्तव में ऐसा नहीं है| इस प्रकार के दुर्भाग्यपूर्ण आरोप दुर्भावनावश लगाये तो जा सकते हैं परन्तु यह कानून की लड़ाई में नहीं टिक पाएंगे| परन्तु आपसी हँसी मजाक की परिभाषा सत्ता और समाज के अलग अलग पायदान खड़े हर व्यक्ति के लिए अलग हो जाती है| भाभी और साली के साथ भारत में मजाक का रिश्ता माना जाता है| मगर आप अपनी साली से जो मजाक करते है वो भाभी से नहीं करते, यह एक सत्य है| मजाक आप अपनी बहन से भी कर लेते हैं मगर यह वह मजाक नहीं होते जो आप भाभी या साली से कर लेते हैं| यही बात महिला मित्र के साथ लागू होती है| प्रायः पुरुष महिला सहकर्मियों के साथ शुरुआत से ही भाभी या साली वाले रिश्ते तक पहुँचने की कोशिश करते हैं| देखने की बात है कि सम्बंधित महिला इस हँसी मजाक को किस तरह ले रहीं हैं| यदि आप ही मुख्यतः मजाक प्रारम्भ करते रहे हैं तो आप फँस सकते हैं क्योंकि महिला आपके साथ अपनी ओर से मजाक नहीं कर रही| सहकर्मी के कपड़ो, श्रृंगार, अंगों आदि पर बात करना गलत है, कम से कम जब यह सब पिछली बार की बात में पसंद न किया गया हो|

एक बात और कहनी पड़ती है| भारत को कामसूत्र का देश माना जाता है| देश में कामसूत्र छिप कर पढ़ने की पुस्तक रही है| सब पाठक जानते हैं कि इस पुस्तक के कौन कौन से अध्याय उन्होंने पढ़े हैं| मगर कामसूत्र का सबसे महत्वपूर्ण भाग है, किस स्त्री से सम्बन्ध रखने चाहिए, किस से नहीं| कामसूत्र पुराना ग्रन्थ है| समय के साथ इस सूची में कुछ परिवर्तन की आवश्यकता अवश्य बनी होगी, मगर प्रासंगिकता बरक़रार है| हर स्त्री आपके लिए नहीं है| स्त्री की सहमति के लिए कामसूत्र में जोर दिया गया है| सहमति के प्रयासों पर और उनकी हद समझने की भारतीय पुरुषों की जरूरत है| भारतीय समाज को यौन शिक्षा की आवश्यकता है| यौन शिक्षा के पाठ्यक्रम को समझने की उस से भी बड़ी आवश्यकता है|

जिन दिनों हम यह सब बातें कर रहे हैं, भारतवासी नारीशक्ति के सबसे बड़े उत्सव नवरात्र के उत्साह में डूबे हुए हैं| हर वर्ष प्रश्न उठते हैं कि स्त्रीशोषक पुरुष किस मूँह किस  शृद्धा से नवरात्रि मना पाते हैं| कन्याभ्रुण हत्या करने वाले अपनी पाप मुक्ति के लिए जोर शोर से कंचक जिमाने और नवरात्रि के भण्डारे करते पाए जाते हैं| नवरात्रि का यह त्यौहार एक बात की भी याद दिलाता है कि पुरुषसत्ता सर्वोपरि नहीं हैं और पुरुषसत्ता को मानवता का अस्तित्व बचाने के लिए नारीशक्ति की शरण लेनी पड़ी है और उसे अपनी समस्त शक्तियों से भी नवाजना पड़ा है|

आइये बेहतर समाज की ओर कदम बढ़ाएं|

https://gahrana.com/2013/11/29/sexual-abuse-in-the-corporate-world-hindi/

https://aishmghrana.me/2013/03/06/ring-the-bell-stop-violence-against-women/

https://gahrana.com/2015/12/21/do-not-sit-quiet-hindi/

https://gahrana.com/2013/08/02/%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%85%E0%A4%AC%E0%A4%B2%E0%A4%BE-%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80/

तिवारी जी की सरकारी हत्या


तिवारी जी की सरकारी हत्या “उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग” के लिए कानफोड़ू धमाका साबित हुए।

सवाल को कई थे मगर पूछे न गए, न जाएंगे। वो तो तिवारी की की सहकर्मी मुस्लिम हुईं, वरना “मुहब्बती जिहाद” का मीडियाई मामला बन जाता। ख़ैर ये तो बाद में किस्से गढ़ने की बात हुई कि मुस्लिम लड़कियां जिहादी क्यों नहीं होती और मुहब्बत वाला जिहाद क्यों नहीं करतीं। प्याज, सरकारी फ़ाइल और मीडियाई मामलों की परतें तो खुलती उतरती रहतीं हैं, सो अभी के लिए मामले का यह पहलू मुल्तवी। मुद्दा खास पर चलते हैं।

उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग को तिवारी जी की सरकारी हत्या के कानफाड़ू धमाके से झटका ऐसा लगा है कि हलाल हुए जाते हैं।

उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग इंसानी बिरादरी का वो हिस्सा है जो स्वयंपोषी बने रहने के लिए कुत्ते की दुम की तरह डोलने और कबूतर की तरह मिचमिचाने का आदि है।

यह हिंदुस्तानी समाज का जो नासूर है जिसे हर तरह के भेदभाव ढूंढ लेने में महारत है। बस इनकी चाकरी बनी रहे और इनके मालिकान की काली सफेद आमदनी।

सरकारी गोली से आदिवासी मरें तो यह पुलिसियों से पहले उन्हें नक्सल का दर्जा दे दें। दलित, पिछड़ा, मुसलमान, पूर्वोत्तरी, कश्मीरी, झोपड़पट्टी, किसान, मज़दूर, दाढ़ीवाला, सांवला, काला, औरतजात, औरतबाज, कुछ भी इनके निशाने पर आ सकता है। वो तो गनीमत हैं आजकल राष्ट्रवाद के जोर के चलते सैनिकों की इज्ज़त है वरना रेलवे की दूसरा दर्जा बोगी तबादले पर जा रहे दस सैनिक बैठा कर के देखिए।

अन्नदाता किसान भले ही उच्च कुलीन ब्राह्मण या सूर्यवंशी क्षत्रिय क्यों न हो, उसकी रैली में सरकारी लाठी तो चलवा दीजिये। उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग ऐसे खुश हो जाते हैं जैसे सब्सिडी वाला तिलचट्टा जूते से कुचल कर मारा जा रहा हो। सब्जी किसान को सब्सिडी न दो, और उस से प्याज़ दो रुपये किलो खरीद कर दिल्ली मुम्बई में पच्चीस रुपये किलो बेच दो। इनके पास दारू, दावत, टीवी, कार, मोबाइल सब के लिए बड़ा बटुआ है, बस किसान मज़दूर और रिक्शेवाले ही लुटेरे हैं। उन पर गोली चलाते रहो।

मुझे तिवारी जी से बैर नहीं है वरन उस मानसिकता पर है तो तिवारी ही की अपना मानकर हो – हल्ला कर रही है|मगर उस वक़्त सब को साँप सूंघ जाता है जब “कोई और मरता” है| दर्द केवल अपनों के मरने पर होता है| 

आख़िर क़ानून के राज्य में पुलिस द्वारा किसी की भी हत्या क्यों हो? सब गिरफ्तारियाँ हों, मुकदमा चले और सजाएँ मिलें या बरी हो जाएँ| मगर इस के लिए पूरा तंत्र चाहिये| सबूत जुटाने के लिए पूरा विभाग खड़ा करना होगा| गवाहों की सुरक्षा का मसला है| उस से ऊपर फ़र्जी मुकदमों और झूठे आरोपों के के मामलों में भी उचित कानून होने चाहिए|

ये मीडिया ट्रायल बंद होने चाहिए| पुलिस को शिकारी कुत्ता समझने की प्रकम वृत्ति ख़तरनाक है कि पट्टा खोला और शिकार हाज़िर| पुलिस को तहकीकात का समय मिलना चाहिए और अपनी तहकीकात पर अच्छे से सोच विचार का भी| यहाँ तक की नामजद मामलों में भी कम से कम हफ्ते भर का समय पुलिस के पास होना चाहिए| पुलिस को तत्काल जनता, नेता, पत्रकार, मंत्री, मुख्यमंत्री आदि दबावों से मुक्ति मिलनी चाहिए| हो सके तो दैनिक कानून व्यवस्था और आपराधिक मामलों की तहकीकात दोनों के लिए तुरंत अलग अलग व्यवस्था होनी चाहिए|

वरना सौ पचास “और लोगों” के बाद फिर कोई तिवारी जी या गुप्ता जी मारे जायेंगे और आप को दुःख झेलना होगा|