विश्व-बंदी २९ अप्रैल


उपशीर्षक – देर आयद हमेशा दुरुस्त आयद नहीं

बात शुरू करने से पहले: वास्तविक तौर पर महान अभिनेता माने जा सकने वाले इरफ़ान खान को कैंसर ने मानवता से छीन लिया| उन्होंने कम फ़िल्में कीं, मगर अच्छा प्रभाव छोड़ा|


शाम होते होते केंद्रीय गृह मंत्रालय का यह निर्णय सामने आया कि लॉक डाउन में फँसे हुए प्रवासी मजदूरों, छात्रों, पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों को उनके घर जाने के लिए अंतराज्यीय यातायात शुरू करने की अनुमति दे दी गई है| यह अनुमति वास्तव में लॉक डाउन के पहले दिन होनी चाहिए थी, बल्कि ट्रेन सेवायें इन लोगों को यथास्थान पहुँचाने के बाद बंद होनी चाहिए थीं| इसकी कीमत इन लोगों ने भारी अवसाद, तनाव, आर्थिक तंगी, अनुत्पादक कार्य और समय की बर्बादी के बीच असुरक्षित आवास में असुरक्षित भोजन करते हुए करोना संक्रमण के ख़तरे के बीच रहकर चुकाई है| सरकार इन सभी लोगों को अनावश्यक रूप से दुर्भाग्य के सहारे छोड़े हुई थी| अब जब यह लोग भर लौटेंगे तो इसमें लम्बी कानूनी और स्वास्थ्य प्रक्रिया का होना आवश्यक होगा ही, साथ ही इन सभी को मानसिक और शारीरिक रूप से ठीक होने में महीनों का समय लगेगा| इन सभी लोगों को घर पहुँचने से ठीक पहले या ठीक बाद चौदह दिन तक के एकांतवास (क्वॉरंटीन) में रहना होगा| यह तथ्य और भी कठिनाई व्यक्त करता है कि हाल में काशी से तमिलनाडू और नांदेड़ साहब से पंजाब लौटा आकर लाये गए तीर्थ यात्रियों में यह यमदूत करोना संक्रमित बनाने में कामयाब रहा है| ध्यान रहे, सूरत में मजदूरों ने दंगा किया था और दिल्ली और मुम्बई में मजदूरों की हजारों मजदूरों की भीड़ अलग अलग समय में घर जाने की आशा में घर से निकल चुकी थी| दुनिया भर में भारतीय मजदूरों और छात्रों की हालत को देखते हुए इस अन्यथा प्रशंसित लॉक डाउन की कड़ी आलोचना होने लगी थी|

सरकार की दिशाहीन नीतियों की बेहद कड़ी आलोचना करने के साथ ही हमें इस बाद के लिए सरकार को धन्यवाद देना चाहिए की कम से कम उसने अपनी इस बुरी गलती को सुधारा और स्तिथियों को और अधिक ख़राब होने से शायद बचा लिया है|

यह निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि लॉक डाउन बढ़ाया जा रहा है, वर्ना लॉक डाउन की प्रस्तावित समाप्ति से चार दिन पहले इस निर्णय का कोई औचित्य नहीं है|

अब यदि सरकार सूक्ष्म, लघु, और मध्यम उद्यमों और उनके करोड़ों कर्मचारियों के लिए एक दो दिन में उचित निर्णय और कर ले तो मुझे लगता है, देश एक और माह का लॉक डाउन सँभालने का प्रयास कर सकता है| यह अलग बात है कि लम्बा लॉक डाउन उचित रहेगा या नहीं यह दस बीस साल बाद इतिहास की पुस्तकों से पता चलेगा|

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विश्व-बंदी २८ अप्रैल


उपशीर्षक – करोना काल का भोजन उत्सव

ग़लतफ़हमी है कि धर्म भारतियों को जोड़ता और लड़ाता है| हमारी पहली शिकायत दूसरों से भोजन को लेकर होती है| इसी तरह भोजन हमें जोड़ता भी है| करोना काल में भारतीयों को भोजन सर्वाधिक जोड़ रहा है| यहाँ तक कि रोज़ेदार भी भोजन और पाक-विधियों पर चर्चा में मशगूल हैं| पारिवारिक समूहों से लेकर मित्रों के समूह तक पाक विधियों की चर्चा है|

मैं परिवार में भोजन रसिक के रूप में जाना जाता हूँ, परन्तु इस समय देखता हूँ कि जिन्हें बैंगन पुलाव और बैगन बिरियानी का अंतर नहीं पता वह भी उबला-बैंगन बिरियानी और भुना-बैंगन बिरियानी के अंतर पर चिंतन कर रहे हैं| जिसे देखिये नई विधियाँ खोज रहा है और पारिवारिक और निजी स्वाद के अनुसार|

अभी पिछले सप्ताह परवल की चटनी बनाई थी तो मित्रों, सम्बन्धियों और रिश्तेदारों ने उसके तीन अलग अलग परिवर्धित संस्करण बनाकर उनके चित्र प्रस्तुत कर दिए| मैं गलत हो सकता हूँ, मगर स्वाद के हिसाब से लॉक डाउन के पहले ७-१० दिन साधारण घरेलू खाने के रहे, उसके बाद नए नाश्तों ने ७-१० दिन रसोई सजाई| उसके बाद भारतीय रसोइयों में दोपहर और शाम के पकवानों की धूम मची – मुगलई, पंजाबी, कायस्थ, लखनवी, बंगाली, उड़िया, गुजरती, मराठी, बिहारी, आन्ध्र, उडुपी, चेत्तिनाड, केरल, आदि अलग अलग पाक परम्पराओं को खोजा और समझा गया है| मगर गूगल बाबा जरूर सही जानकारी दे पाएंगे| अगर कोई सही दिशा निर्देशक जनता को सर्व-भारतीय पाक विधियों के बारे में बताने लगे तो राष्ट्रीय एकता को मजबूत होने में एक अधिक समय नहीं लगे| अब हम मिठाइयों की और बढ़ रहे हैं| मैं अगले महीने इटालियन, मेक्सिकन, थाई, जापानी आदि पाक-विधियों के भारत में प्रयोग की सम्भावना से इंकार नहीं कर सकता|

भोजन प्रेमी भारतीयों के लिए सबसे बड़ी कठिनाई पाक सामिग्री की कम उपलब्धता है तो सबसे बड़ा प्रेरक भी यही है – उपलब्ध सामिग्री के नए नवेले प्रयोग, नए स्वाद, नया आपसी रिश्ता|

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विश्व-बंदी २७ अप्रैल


उपशीर्षक – प्रकृति का पुनर्निर्माण

करोना के फैलाव के साथ साथ प्रकृति का विजयघोष स्पष्ट रूप से सुना गया है| दुनिया में हर व्यक्ति इसे अनुभव कर रहा है| सबसे बड़ी घोषणा प्रकृति ने ओज़ोनसुरक्षाकवच का पुनर्निर्माण के साथ की है| दुर्भाग्य से मानवता अभी भी प्रकृति के विजयघोष पर गंभीर नहीं है| अगर वर्ष २०२० में मानवता डायनासोर की तरह प्रकृति विलुप्ति का आदेश दे दे तो शायद पृथ्वी के नए सम्राट शायद १० लाख साल बाद मूर्ख मानवों की आत्मविलुप्ति को सहज ही पढ़ा रहे होंगे| यह ठीक वैसा ही है जैसे हम डायनासोर की विलुप्ति पढ़ते हैं| आज हम प्रकृति की यह चेतावनी स्पष्ट सुन सकते हैं: अगर मानव नहीं सुधरे तो पृथ्वी पर सबसे कब समय तक विचरण करने वाली प्राणी प्रजाति में मानव की गिनती की जाएगी|

ओज़ोन सुरक्षा कवच में अभी और भी छेद हैं और यह वाला सुराख़ इसी साल देखा गया था और इसे भरने में प्रकृति को मात्र दो या तीन महीने लगे| यह कार्य शायद करोना जन्य लॉक डाउन के कारण जल्दी संपन्न हो गया| इसके बनने और बिगड़ने का कारण जो भी रहा हो, दोनों घटना प्रकृति का स्पष्ट शक्ति प्रदर्शन हैं| यदि मानव अपनी बिगड़ीं हरकतें करने से कुछ और दिन रोका जा सका तो प्रकृति चाहे तो शेष ओज़ोन सुरक्षा कवच की मरम्मत भी कर सकती है|

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की बैठक के बाद यह स्पष्ट लगता है कि लॉकडाउन प्रतीकात्मक ढील के साथ बढ़ने जा रहा है| शहरी मध्यवर्ग आर्थिक दबाब के बाद भी डरा हुआ है और मुझे नहीं लगता कि स्तिथि जल्दी सामान्य होगी| गाँव और वन क्षेत्र को कदाचित इतनी चिंता न हो या फिर उनपर दबाब बहुत अधिक होगा| किसी मामूली इलाज के लिए भी अस्पताल जाने से लोग बचना पसंद करेंगे| इसका कारण मात्र भय नहीं बल्कि अस्पतालों को करोना के प्रति ध्यान केन्द्रित करने की भावना है| आश्चर्यजनक रूप से लोग अस्पतालों की कम जरूरत महसूस कर रहे हैं| स्वस्थ पर्यावरण, समुचित शारीरिक व मानसिक आराम और घर का ताजा खाना अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी बनकर उभरे हैं|

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