बचिए कंपनी फिक्स्ड डिपाजिट से


जल्दी से दोगुना होने वाला पैसा हम सभी को जान से ज्यादा नहीं तो कम प्यारा भी नहीं है| पहले ज़माने में पैसा दोगुना करने का काम बाबाजी लोग करते थे| आज के ज़माने में पैसा दोगुना करने का ठेका कंपनियों के पास है|

कंपनी फिक्स्ड डिपाजिट में अच्छे ब्याज का वादा ललचाता है| बड़ी कंपनी का नाम आपको आश्वस्त करता है| मगर हाल में कंपनी डिपाजिट में लोग बुरी तरह फंसे हुए हैं और कंपनियां कैश क्रंच यानि नगदी की कमी की गहरी खाई में धंसी हुईं हैं| कई जानी मानी कंपनियां नगद पैसे की कमी के चलते ट्रिब्यूनल के पास जाकर पैसा वापसी का समय बढ़वाने में लगी हैं|

हाल में एक सज्जन मिले, जो तीन चार साल पहले किसी बड़ी कंपनी में “की मैनेजरियल पेरसोनेल” कहे जाने वाले एक ऊँचे पद से रिटायरमेंट लेकर आये थे| रिटायरमेंट फण्ड में से ढेर सारा पैसा किसी और कंपनी के फिक्स्ड डिपाजिट में फिक्स्ड कर दिया| जब वापसी का टाइम आया तो कंपनी ने बोला इन्तजार करो, हम ट्रिब्यूनल से टाइम मांग कर आते हैं| सरकार ने बोला कंपनी ट्रिब्यूनल कंपनी ट्रिब्यूनल से टाइम मांग कर आती है| भगवान ने बोला धीरज धरो| खैर बाद में पैसा मिल तो गया, मगर जरूरत के समय पर नहीं|

कंपनी फिक्स्ड डिपाजिट आज सबसे अधिक रिस्क का निवेश है| पिछले कुछ समय में सरकार ने कुछ कदम उठाये हैं निवेशकों के हित में|

पहला कदम है, फिक्स्ड डिपाजिट लेने वाली कंपनी को क्रेडिट रेटिंग लेनी होती है| यह रेटिंग मात्र एक आकलन है और यह रिस्क का मोटा अंदाजा भर है|

दूसरा कदम है, डिपाजिट का बीमा| फिक्स्ड डिपाजिट लेने वाली कंपनी को बाजार से डिपाजिट का बीमा करवाना होता है| मगर आज तक सरकार इस कदम को टालने पर मजबूर है| कारण – बीमा कंपनी कंपनी डिपाजिट का बीमा करने को अपने लिए खतरनाक मानती हैं – मतलब बेहद घाटे का सौदा| इतने बड़े भारत देश में कोई बीमा कंपनी, किसी भाई बन्धु कंपनी के डिपाजिट का भी बीमा करने को तैयार नहीं|

तीसरा कदम है, कंपनी की जायदाद की गिरवी| यह गिरवी, कंपनी के डिपाजिट ट्रस्टी के नाम पर रखी जानी है|

चौथा कदम है – निवेशक जागरूकता| सरकार ने कंपनियों को कहा है कि वह निवेशकों को भेजे जाने वाले कागजातों में एक दावात्याग यानि डिस्क्लेमर डालें| डिस्क्लेमर की भाषा पढ़िए और सुरक्षित रहिये –

“यह स्पष्ट रूप से समझा जाये कि रजिस्ट्रार के पास परिपत्र (फॉर्म) अथवा विज्ञापन के प्ररूप में परिपत्र फाइल करने को यह न माना जाये कि उसे रजिस्ट्रार अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा संस्वीकृत अथवा अनुमोदन दिया गया है| रजिस्ट्रार अथवा केन्द्रीय सरकार की किसी भी जमा स्कीम की वित्तीय सुदृढ़ता के लिए, जिसके लिया जमा स्वीकार या आमंत्रित की गई है अथवा विज्ञपन के प्ररूप में परिपत्र में दिए गए विवरणों या मतों की सत्यता के लिए कोई जबाबदेही नहीं है| जमाकर्ता जामा स्कीमों में निवेश करने से पूर्व पूरी सतर्कता बरतें|”

निदेशक पहचान संख्या (Director Identification Number)


हाल में सुब्रमणियास्वामी ने प्रियंका गाँधी वाड्रा के विरुद्ध एक से अधिक DIN रखने के आरोप में शिकायत दर्ज की है| इसके बाद उन्होंने कारती चिदंबरम के विरुद्ध भी शिकायत दर्ज कराई| पहले यह चुनावी मामले लगते थे, परन्तु चुनावों के बाद भी DIN को लेकर उठा विवाद थम नहीं रहा है| सभी दल रोज नए लोगों पर DIN सम्बन्धी आरोप लगा रहे हैं|

हाल में दो मंत्रियों नितिन गडकरी और पियूष गोयल के ऊपर भी यही आरोप लगाये गए|

अभी ३१ मार्च २०१४ तक, एक से अधिक DIN रखना या उनके लिए प्रार्थना करने के लिए पांच हजार रुपये तक के दंड का प्रावधान था और अगर यह गलती ठीक नहीं की जा सकी तो पांच सौ रूपए प्रतिदिन के हिसाब से अतिरिक्त दंड लगता था| इस सजा को अब बढ़ा कर छः महीने की कैद और पचास हजार रुपये तक के जुर्माने के रूप में बढ़ा दिया गया है| साथ में अतिरिक्त दण्ड भी लगता हैं|

जब मैंने स्वयं इन आरोपों को जांचा तो पाया कि इस प्रकार के सभी DIN में कुछ समानता थी| आइये समझें|

पहले आवेदक द्वारा DIN के लिए ऑनलाइन प्रार्थनापत्र भरना पड़ता है, जिस से एक प्रोविजनल DIN मिलता है| इस प्रोविजनल DIN के साथ ही प्रार्थना पत्र को छापकर, सभी जरूरी कागजात लगाकर, पैसा जमा करने के सबूत के साथ जमा कराया जाता है| कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय का DIN विभाग इस DIN को अंतिम अनुमति देता हैं|

अनुभव के आधार पर मैं जानता हूँ कि स्वीकार होने वाले प्रार्थना पत्रों से अधिक अस्वीकार होने वाले प्रार्थना पत्र हैं| संलग्न कागजन में पिता के नाम का अंतर, वर्तनी सम्बन्धी गलती, या और भी कई अन्य कारण है जिनके कारण प्रोविजनल DIN नामंजूर होता है| यह सभी DIN मंत्रालय के पोर्टल MCA21 पर आवेदक के नाम पर दिखाई देते हैं| मगर अभी और भी कुछ जानना शेष है|

यदि आवेदक से फॉर्म भरते समय कोई गलती सूचना भर गयी, अथवा लिखने में कुछ गलती हो गयीं, तो भी प्रोविजनल  DIN दे दिया जाता है| कई बार आवेदक फॉर्म भरने के बाद आगे कार्यवाहीं नहीं करता, तो भी प्रोविजनल DIN दे दिया जाता है| आवेदक का प्रोविजनल DIN हर हाल में मंत्रालय के पोर्टल पर दिखाई देता है, तब भी जब अंतिम और मान्य DIN मिल जाये|

इसके कई परिणाम होते हैं:

१.       मंत्रालय पोर्टल् पर आवेदक के नाम से कई DIN दिखाई देते हैं;

२.       जल्दी मंत्रालय के पास प्रयोग किये जाने लायक DIN समाप्त हो जायेंगे|

मंत्रालय के एक उच्च अधिकारी ने अभी हाल में बताया कि पोर्टल पर एक से अधिक DIN दिखाई देना, किसी आवेदक को गलत साबित नहीं करता है|

कई विचार – विमर्शों के बाद मैंने पाया कि हमें कुछ बातों का ध्यान रखना होगा:

१.       एक PAN पर एक ही DIN मिल सकता हैं|

२.       एक से अधिक DIN किसी गलत तरीके से ही मिल सकते हैं जैसे फर्जी या एक से अधिक PAN|

३.       अगर कोई व्यक्ति एक से अधिक DIN प्रयोग कर रहा है तो यह उसकी गलती का सबूत है|

अपनी स्तिथि को साफ रखने के लिए हम, सूचना का अधिकार प्रयोग कर कर अपने DIN के बारे में सही स्तिथि को पता कर सकते हैं|

डायरेक्टर साहब


निवेशक जागरूकता श्रंखला ४

 

अभी हाल में मेरे पास कुछ ऐसे मामले आये जिनमे साधारण लोग कंपनी का डायरेक्टर बनने के लालच में पैसा गवां बैठे| यहाँ चालक लोगों में जल्दी तरक्की का रास्ता देखने वाले, पढ़े लिखे, नौजवानों को अपने जाल में फंसाया था|

 

Mr Ratan Tata with Dr Greg Gibbons and Dr Ben ...

Mr Ratan Tata with Dr Greg Gibbons and Dr Ben Wood WMG (Photo credit: wmgwarwick)

 

एक मामले में कुछ नए लोगों ने एक परिश्रमी, महत्वाकांक्षी युवक से मित्रता की| बाद में अपनी एक पुरानी कंपनी का काम सँभालने का ऑफर दिया वह भी पार्टनर, डायरेक्टर, और मुनाफे में हिस्सेदारी के साथ| इस यूवक ने कंपनी के शेयर में पन्दरह लाख का पैसा नगद में लगाया| कुछ दिनों में उसे मैनेजिंग डायरेक्टर बना दिया गया| पर दो महीने में ही कंपनी के प्रोमोटर लोग गायब हो गए| रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज में शिकायत तो दर्ज कर दी गयी है| मगर कंपनी का ऑफिस तो इन मैनेजिंग डायरेक्टर साहब के घर पर ही था और प्रोमोटर के पते बदल गए हैं| जब तक सही पते नहीं मिल जाते, सरकारी कार्यवाही नहीं हो सकती| मगर मजे की बात यह है कि शिकायत का पता लगने के कई महीने बाद उन प्रोमोटर्स ने शिकायत करने वाले युवक से संपर्क कर कर  सौदेबाजी शुरू कर दी| इस सौदेबाजी में युवक को पंद्रह लाख में से केवल दस लाख का चेक दिया| मगर सुना है की वो चेक भी बाउंस हो गया है|

 

यह बहुत नुकसानदेय मामला है| अब दोबारा सौदे बजी हुई तो फिर इस युवक को कुछेक लाख का नुकसान हो जायेगा और अदालत के चक्कर में बहुत टाइम लगेगा|

 

एक दुसरे मामले में बेरोजगार युवक ने एक खोखा कंपनी में पैसे देकर जनरल मेनेजर की नौकरी कर ली| ये कंपनी कंसल्टेंसी का कम करने वाली थी| सारा दारोमदार इसी युवक पर था| कंपनी ने कुछ दिन तक उसी के पैसे में से उसे सैलरी दी मगर बाद ने वो लोग रफूचक्कर हो गए| अब इस युवक के पास लम्बी कानूनी कार्यवाही का न तो पैसा है न ही समय है| घर वालों ने भी उसको घर से लगभग बहार निकल रखा है|

 

दुर्भाग्य से दोनों ही मामलों में युवक पढ़े लिखे हैं| मेहनती और समझदार भी हैं| मगर थोड़ी और जागरूकता की जरुरत है|

 

हम सभी को लालच से बचना चाहिए| आप अपना पैसा लगा कर अपनी खुद की कंपनी में डायरेक्टर बनते है तो ठीक है| दुसरे की कंपनी में पैसा लगाकर उसमे डायरेक्टर बनना केवल मंझे हुए लोगों के लिए ही ठीक है| पूरी तरह से जांच पड़ताल कर लें|