तिरंगा, पतंगे, और आजादी का जिन्न|


 

इस समय जब मैं यह आलेख लिख रहा हूँ, हम सभी स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं|

कल शाम नई दिल्ली के खन्ना मार्किट में टहलते हुए और उसके बाद मुझे कई बार सोचना पड़ा कि हम अपना स्वतंत्रता दिवस किस तरह से मानते हैं?

पहले थोडा परिचय दे दिया जाये| ७० – ८० दुकानों वाले खन्ना मार्किट; लोदी कॉलोनी, जोरबाग और बटुकेश्वर दत्त कॉलोनी का मोहल्ला बाजार ही है| यहाँ पर किसी भी समय आपको चार पांच सौ से अधिक लोग कभी नहीं दिखाई देते हैं| शाम होने से पहले घर गृहस्थी का सामान अधिक बिकता है और शाम होने के बाद अधिकतर भीड़, खाने पीने के लिए ही होती है| मेरे विचार से दसेक तो रेस्तरां और हलवाई ही होंगे और ठेले तो सभी खाने पीने के है ही| अधिकतर रिवाज फोन पर आर्डर लिखवा कर घर पर ही खाना मंगवाने का है|

कल नजारा अलग ही था| जब भी हम कोई त्यौहार मानते है, बाजार में वो हमेशा ही एक दिन पहले हंसी ख़ुशी और पसीने के साथ मनाया जाता है| कल दोपहर से ही स्वतंत्रता दिवस शुरू हो गया| तिरंगे, पतंगों और खाने पीने की धूम थी| छोटे बच्चे तिरंगे के हर रूप पर फ़िदा थे.. झंडे, पर्चे, कागज, विज्ञापन, केक, फीते, कुछ भी| शायद कल उन्हें देश के अलावा कुछ नहीं सूझ रहा था| तिरंगी पतंगे तो गजब ढाती हैं, हमेशा| हर रंग रूप की पतंगें थी| पतंग की हर दुकान पर हर रंग की पतंगें और हर रंग – रंगत के लोग थे| पतंग खरीदते, मांझा खरीदते, चरखी सँभालते, कन्ने बांधते; सब तरह के लोग| पतंग न उड़ा पाने के कारण मुझे हमेशा शर्मिंदगी महसूस होती है| कल तो लगा कि शायद जो लोग पतंग नहीं उड़ा पाते होंगे उनके भारतीय होने पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है| “वो काटा” तो हमारा राष्ट्रीय मूल मंत्र है| “वो काटा गाँधी को.. वो काटा नेहरू को..; है न मजेदार|

फिर खाने पीने की बारी आ गयी| ठेले पर चाट पकोड़ी जल्दी ख़त्म हो गयी| गोलगप्पे जरूर देर तक टिके, मगर उनकी आपूर्ति आसान थी और बार बार हो रही थी| मगर, असल जश्न तो दो खास दुकानों पर चल रहा था| केवल दो खास दुकानें.. दोनों पर पचास पचास लोग.. दो पुलिस बाइक.. चार पुलिस वाले..| थके मारे लोग, जश्न से खुश होते लोग, यार-बास लोग, मस्त लोग, मस्ती से पस्त लोग| विद्यार्थी भी है… और कब्र का इन्तजार करने वाले बुढ्ढे भी| न भीड़ ख़त्म होती है न जोश| एक जाता चार आते| चखना भी लेना था, और बर्फ के टुकड़े भी| कोई अनुशासन नहीं.. कोई धक्कम धक्का भी नहीं.. सब्र ऐसा जो शायद कभी रेलवे स्टेशन पर देखने को न मिले| पैसा बह रहा है, उड़ रहा है, कूद रहा है.. गरीबी की ऐसी तैसी..| क्या रखा है ३२ रुपल्ली की गरीबी में| बोतल और कैन.., यस, वी कैन…|

रात ढलते ढलते जब बाकि का सारा बाजार बंद होने लगा, मगर यहाँ तो जश्न की रात थी| लोग आजादी के नशे में चूर थे, उनकी हर बोतल में आजादी बंद थी, उनकी हर कैन में आजादी के बुलबुले उठ रहे थे|

मैं थक गया था; घर चला आया| घडी ने साढ़े दस बजा दिए थे|

सुबह आसमां में बादल थे, चीलें थी और हमारी रंग बिरंगी पतंगें थीं| सड़क पर तिरंगे लहराते बच्चे थे| जन सुविधाएँ के बोर्ड के ठीक नीचे, आजाद देश का आजाद सपूत नशे में चूर चित्त पड़ा था| एक साथी ने कहा, आज ड्राई-डे है न, कल डबल पीना पड़ा होगा न||

कामवाली बाई ने कहा, आज ड्राई डे है तो क्या कल फ्लड डे था न भैया|

तिरंगा, पतंगे, और बोतल से निकला आजादी का जिन्न| 

प्रथम विजय का उत्साह


अभी हाल में मेरे बेटे प्रत्युष ने अपने जीवन के पहले चिट्ठाकार सम्मेलन (जी हाँ, ब्लोगर्स मीट) में हिस्सा लिया| भले ही अभी उसे कुछ लिखना या बोलना नहीं आता मगर शायद वह सम्मेलन का सबसे अधिक ध्यान खींचने वाला प्रतिभागी बन गया|

स्थान:       फार्च्यून सलेक्ट ग्लोबल, ग्लोबल आर्केड, महरोली गुडगाँव मार्ग, गुडगाँव

समय:        शनिवार, जून 8, 2013, दिन का तीसरा प्रहर (1.00PM  – 5.30 PM)

उस दिन पत्नी जी को अपने किसी कार्य से व्यस्त रहना था| मुझे जब इस निमंत्रण के बारे में पता चला तो बेहद प्रसन्नता हुई| कामकाजी माता पिता की संतान होने के कारण मेरे बेटे के पास घुमने फिरने के कम ही मौके होते हैं| इस कार्यक्रम के निमंत्रण में कहा गया था कि छोटे बच्चों को भी ला सकते हैं तो मुझे प्रसन्नता हुई| बिना किसी पुर्विचार के निमंत्रण को स्वीकार किया और उसके बाद मैंने आयोजकों से स्पष्टीकरण माँगा कि क्या मैं १८ महीन के बालक को ला सकता हूँ| उनकी ओर से हाँ में उत्तर आने के बाद किसी भी प्रकार का संशय मन में नहीं था| अब मैं अपने बेटे को अपने साथ घुमाने भी ले जा सकता था और अपने नये मित्रों के साथ अपने क़ानून सम्बन्धी ब्लॉग के बारे में भी चर्चा कर सकता था|

उस दिन जब मेट्रो में सहयात्रियों के साथ खेलते हुए वह गंतव्य तक पहुँचते पहुँचते थक गया| मुझे लगा कि आज का बाकी का दिन यह सो कर बितायेगा और मैं इसे गोद में लिए बैठा रहूँगा| मगर जब मैं आगंतुक सूची में अपना नाम दर्ज करने उसने जग कर चारों ओर देखना शुरू कर दिया|

 

प्रत्युष, समारोह में पहुंचे समय

प्रत्युष, समारोह में पहुंचे समय

 

जल्दी ही उसने चारों और घूम घूम कर चीजों के समझने की कोशिश शुरू की| सभी लोगों के मित्रवत व्यवहार से उसे पता चाल गया था कि वह यहाँ पर अपने लोगों के बीच है और उसे घुमने फिरने की आजादी भी है|

कार्यक्रम प्रारंभ होते ही मौजूद बच्चों में से सबसे छोटे बच्चे के लिए कुछ उपहार दिए जाने की घोषणा की गयी| मात्र 18 महीने की उम्र के साथ प्रत्युष ने यह पुरुस्कार प्राप्त कर लिया|

 

प्रत्युष, उपहार लेते हुए

प्रत्युष, उपहार लेते हुए

 

इस के बाद तो उसने जो धमा – चौकड़ी शुरू की, तो रुकने का सिलसिला थमा ही नहीं| उसके कूछ चित्र इस पोस्ट के अंत में मौजूद  हैं|

इसके बाद “ओल्ड मेक्डोनाल्ड हेड अ फार्म” गाने के ऊपर खेली गयी छोटी सी प्रतियोगिता की बारी आई| उसे इस गाने में बहुत आनंद आया| घर आकर भी उसने “ईईई ऊऊओ” कई बार गाया|

अब सभी लोगों को अपना परिचय देना था| वो हर व्यक्ति को परिचय देते हुए ध्यान से देख रहा था| उसने यह खेल लग रहा था, उसके हिसाब से शायद उस खेल में यह पहचानना था कि आवाज किधर से आ रही है|

इसके बाद उसने एच पी द्वारा दिए गए प्रस्तुतिकरण को न केवल ध्यान से सुना बल्कि वह उस मेज तक पहुँच गया जहां पर करुणा चौहान कुछ ब्लोगर्स को एच पी प्रिंट आर्ट के बारे में सिखा रहीं थीं| मेरे पास उस समय का कोई चित्र नहीं है|

इसके बाद सभी प्रतिभागियों को कुछ समूहों में बाँट दिया गया| हर समूह को दिए गए साज – सामान से अपनी मेज को एक जन्मदिन समारोह के लिए सजाना था| अब तो बालक की मौज आ गयी| हमारे पास स्पेस ट्रैवलर का थीम था| और हमारी टीम में से उसके सहित चार लोग सिर्फ उस पर ही ध्यान दे रहे थे|  मगर बाकी ग्यारह लोगों में खूब मेहनत की| मगर बालक खुश था| इतने सारे लोग उसका जन्म दिन जो मना रहे थे| हमारी टीम ने काम भले ही कितना भी बुरा किया हो, मगर मेहनत खूब की और उसका आनंद भी पूरा लिया| आखिर हम मिलने जुलने और आनंद लेने भी गए थे|

 

प्रत्युष, बिना जन्म दिन मनाया जन्मदिन

प्रत्युष, बिना जन्म दिन मनाया जन्मदिन

 

इन तैयारियों के बीच उसने वहां मौजूद वेटरों से अच्छी दोस्ती कर ली थी और अपने लिए असीमित फिंगर चिप्स का इंतजाम कर लिया था| मुझे कई साथी ब्लोगर्स में बताया कि उन्होंने इसके कई कई फोटो लिए है| अब मुझे उन फोटो का इन्तजार है|

 

प्रत्युष, सेलेब्रिटी पोज

प्रत्युष, सेलेब्रिटी पोज

प्रत्युष, समारोह का आनंद उठाते हुए

प्रत्युष, समारोह का आनंद उठाते हुए

चोकलेट नहीं, वो वाला टेबल

चोकलेट नहीं, वो वाला टेबल

 

हमने उसके स्पीकर्स संभल कर रख दिए हैं जिस सेबड़ा होकर वह उन पर अपनी मर्जी के गाने सुन सके| यह भी हो सकता है कि वह उन का प्रयोग इन्टरनेट पर अपनी पढाई करने के लिए करे|

 

लोक संगीत – रसिया


संगीत किसी भी तरह का हो अगर आप उसका आनंद नहीं ले पा रहे हैं, तो आप सच में संगीत को प्यार नहीं करते| संगीत ही विविधता ही उसका सबसे बड़ा सौंदर्य है| हम आज भारतीय और पाश्चात्य संगीत और उसके फ्यूज़न की बात करते हैं| हमारे यहाँ खुद हिन्दुस्तानी और कर्णाटक दो अलग अलग शाश्त्रीय संगीत हैं और तमाम तरह के लोक संगीत मौजूद हैं| अलग अलग समय पर अलग अलग संगीत सुनना प्रिय लगता है और उनकी अपनी विशेषता हैं| आज वैश्वीकरण और तकनीकि के दौर में जहाँ विश्व, पास आते आते सिकुड़ कर हमारे लैपटॉप में आ गया है, वहीँ लोक संगीत का गला इस इस सिकुड़ गए विश्व में घुट रहा है| लोक संगीत दम घुटने से मरने से बचने की जुगत कर रहा है|

मुझे संगीत की सभी विधाएं सुनने समझने में अच्छी है और मैं उनका माहिर न होकर भी उनका आनंद ले सकता हूँ| लोक संगीत से मेरा एक विशेष लगाव है और उसके बचाव और बढ़ाव में मैं अपना योगदान अगर दे सकूँ तो मेरा सौभाग्य होगा|

यह हमारे भारत वर्ष में बसंत की ऋतू अभी अभी समाप्त हुई है| यह ऋतू बसंतोत्सव का समय है और विश्व भर में प्रेम का संचार करती है| मानवीय प्रेम के प्रतीक, बसंत – पंचमी, वैलेंटाइन दिवस, होली आदि सभी उत्सव इसी ऋतू में मनाये जाते हैं| स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण की विभिन्न प्रेम लीलाओं का संगीतमय वर्णन इस समय किये जाने की परम्परा रही है|

इसी परंपरा का एक प्राचीन प्रतीक है हमारा लोक संगीत, रसिया गायन| रसिया मुख्य रूप से व्रजभाषा में गाया जाता है| व्रज भाषा हिंदी के जन्म से पहले, पांच सौ वर्षों तक उत्तर भारत की प्रमुख भाषा रही है| रसिया गायन में राधा और कृष्ण को नायक – नायिका के रूप में चित्रित करते हुए, मानवीय संबंधों, मानवीय प्रेम, और ईश्वरीय भक्ति – प्रेम का गायन है|

मेरे जैसे जिन लोगों ने आकाशवाणी (आल इंडिया रेडियो) पर रसिया सुने हैं उन्होंने अवश्य इसका रसास्वादन किया होगा| अच्छे रसिया गीत में श्रंगार और भक्ति रस का गजब का सम्मिश्रण होता है जो प्रेम को ईश्वर तक ले जाता है| रसिया गायन आपको सरल सहज शब्दों में प्रेम का सन्देश देता है| एक समय में व्रज क्षेत्र में रात रात भर रसिया दंगल हुआ करते थे| जिनमे एक से एक बढ़िया काव्य और संगीत की प्रस्तुतियां की जातीं थीं| आज तो होली के दिनों में रेडियो टेलिविज़न पर वही दो चार पुराने रसिया गीतों की रिकार्डिंग बजा कर केवल परम्परा का नाम भर ले लिया जाता है|

आज इस दम तोडती परम्परा को निर्वाह करने वाले बाजार में निम्न स्तरीय संगीत बेच रहे हैं| ऐसा शायद सुनने वालों का आसानी से उपलब्ध अन्य विधाओं के संगीत की तरफ जाने के कारण हो सकता है| कुछ लोक संगीत, विशेषकर रसिया, के कलाकारों के पास संसाधनों और विज्ञापन क्षमता की कमी हो सकती हैं| लोक संगीत से फिल्मो और अन्य संगीत की ओर प्रतिभा पलायन भी एक समस्या है| मुझे लगता है कि शायद नयी तकनीकि लोक संगीत को संरक्षित कर सकने और बढ़ावा देने में अपना योगदान दे सकती है| मुझे आशा है कि HP Connected Music India भी इस प्रकार का एक अच्छा प्रयास कर सकता हैं|