बीच पिछाड़ी में


बाजारू रद्दी से

चीन्हते बीनते

ख़बरों का कलेवा

उबली मरीली फीकी चाय

फूकते सुङगते

अटक गयी है,

कसैले मूँह में;

चूतियापे के चड्डू

और बेस्वाद चिल्लपों|

 

मर गयी खेत मजदूर की औलाद

चाटकर सरकारी परोसे की थाली|

अलापकर सत्ता का रण्डी रोना

हैदराबाद हॉउस की बिरयानी

डकार गए हाकिम के बाप|

नये ब्रह्मास्त्र की खरीद के

डर के मारे मूत गयी

फौजी की माँ बहन|

देश के जवान सांडो ने

सड़क पर ठोंक दी

मस्त जवान छोरी|

चार साल की लड़की की

छोटी फलारिया देख कर

हो गया देश की इज्जत का

मासिक धर्म|

चिकने कागजों में हुई

दलालों की दावत

चर्चा में चमक गया

चड्डी पर लिया गया चुम्मा|

 

देश की तड़पती जवानी ने

खाए दुनियादार बाप के जूत

चुपचाप बैठ के लगाली 

बीच पिछाड़ी में सुन्न की सुई||

 

 

लिए कटोरा हाथ … स्कूल चले हम…|


स्कूल चले हम
लिए कटोरा हाथ
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
हाड़ तोड़ते बाप
कमर तोड़ती मैया 
स्कूल चले हम|
 
बाप के हाथ लकीरें 
माँ की आँख आंसू
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
लिए कटोरा हाथ.. स्कूल चले हम..

लिए कटोरा हाथ.. स्कूल चले हम..

पेट बाँध कर सोये 
पेट पकड़ कर जागे 
स्कूल चले हम|
 
दाल भात का सपना 
थाली में हो अपना 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
साहब जी का नोट 
नेता जी का वोट 
स्कूल चले हम|
 
भूख हमारी जात
नंग हमारी पात 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
कखगघ से क्या लेना 
जोड़ घटाव लेकर भागे 
स्कूल चले हम|
 
मास्टर पूछें जात 
बड़के मारें लात 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
देश दरिद्दर क्या जानें 
ईश्वर अल्लाह क्या मानें 
स्कूल चले हम|
 
पोखर पतली दाल 
कंकड़ चुभता भात
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
साहब बाबू डटकर खाते 
जिम जाकर कमर घटाते 
स्कूल चले हम|
 
माँ बोलीं डटकर खाना 
भूखे लौट न आना 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 

बेटा मिग उड़ाता था!


 

बेटा मिग उड़ाता था![i]

 

हँसती थी माँ,
गाती थी माँ,
बचपन में जब,
बेटा जहाज उड़ाता था|

 

गाती थी माँ,
गोदी में लेकर,
सपनों की लोरी,
बेटा सोने जाता था|

 

रचती थी माँ,
चौके में जाकर,
भोजन थाली,
बेटा पढ़ने जाता था|

 

डरती थी माँ,
अनहोनी बातों से,
नन्हे हाथों में जब,
बेटा बन्दूक उठता था|

 

उठाती थी माँ,
मिठाई के दौनों से,
आसमां सर पर,
बेटा अव्वल आता था|

 

रोती थी माँ,
भूली बिसरी यादों से,
अनहोनी आहों से,
बेटा चुप करता था|[ii]

 

सुख सांझे थे,
दुःख सांझे थे,
माँ के सपनों के गुल्ले,
बेटा बुनकर लाता था|

 

शिखर कुलश्रेष्ठ  चित्र आभार सहित http://indiatoday.intoday.in/story/iafs-mig-21-bison-crashes-in-uttarlai-in-rajasthan-pilot-killed/1/291418.html

शिखर कुलश्रेष्ठ
चित्र आभार सहित http://indiatoday.intoday.in/story/iafs-mig-21-bison-crashes-in-uttarlai-in-rajasthan-pilot-killed/1/291418.html

मुस्काती थी माँ,
संतोष में पल में,
दिनभर मेहनत की,
बेटा खबर सुनाता था|

 

उड़ती थी माँ,
गाती थी माँ,
बच्ची थी माँ,
बेटा मिग उड़ाता था|

 

क्या करती माँ?
क्या करती माँ!!
हाय रे हाय,
बेटा मिग उड़ाता था!!!

 

क्या करती माँ?
क्या करती माँ!!
हाय रे हाय,
बेटा मिग उड़ाता था!!!


[i] फ्लाइट लेफ्टिनेंट शिखर कुलश्रेष्ठ को समर्पित, जिन्हें सोमवार १५ जुलाई २०१३ को मिग दुर्घटना ने हमसे छीन लिया|

[ii] शिखर में काफी समय पहले अपने पिता को खो दिया था|