हिसाब – साल २०१७


गहराना – विचार वेदना की गहराई की मई २०११ में शुरुआत बहुत सादा और चुपचाप हुई थी| अक्टूबर २०११ आते आते एक पाठक रोजाना का औसत आया और पहली बार सौ पाठक जून २०१२ में मिले मगर जनवरी २०१२ के बाद ही माहवार सैकड़ा पक्का हो पाया| साल २०१५ इस माने में खास था कि ब्लॉग-अड्डा के मुताबिक यह हिंदी के पांच अच्छे ब्लॉग में था| मैं सहमत तो नहीं, मगर ख़ुश जरूर था| यूँ साल २०१६ में लगा कि कुछ ठीक ठाक हो रहा हैं और पहली बार पढ़े गए पृष्ठों की संख्या पांच हजार साल को पार कर पाई| मगर एक महीने में हजार के पार पहुँचने पहुँचते मार्च २०१७ आ लगा| जबकि पहली बार दो हजार पाठक नवम्बर २०१७ में मिले| साल २०१७ में साल भर में दस हजार पाठक पाने करीब पहुँचने में कामयाब से हुए और इस साल पढ़े पढ़ी गई पृष्ठ संख्या सत्रह हजार निकलती है| पढ़े गए पृष्ठों में दस हजार से अधिक भारत और लगभग छः हजार अमेरिका में पढ़े गए| अधिकतर पाठक गूगल आदि सर्च इंजन से आते हैं या उन्हें ख़ुद यूआरएल याद है| इस साल लगभग हजार बार इस ब्लॉग को मोबाइल पर पढ़ा गया है|

यूँ ही बात दूं कि साल २०१७ में लिखी गईं ५२ पोस्ट के साथ अब तक कुल ३२६ हो गईं| आप भी आयें कभी हमारे ब्लॉग पर| सनद रहे कि शुरुआत से अब तक कुल उन्तालीस हजार पाठक यह ब्लॉग पढ़ चुके हैं|

 

प्रदूषण का साल


दिल्ली में साल २०१७ प्रदूषण का साल रहा| हर साल बढ़ते प्रदूषण के लिए दिल्ली वाले नई नई दलीलें पेश करते हैं| इस दलीलों का कुल जमा मतलब यह होता है कि प्रदूषण का कारण दूसरे हैं, वो नहीं| इन दलीलों में दिल्ली वाले यह भूल जाते हैं कि प्रदूषण से बीमार पड़ना और मरना उनको है; दूसरों को नहीं|

मुझे साल २००५ में पहली बार बोला गया कि दिल्ली छोड़ कर किसी प्राकृतिक जगह में चले जाओ| मगर बहुत से कारण रहे, यह नहीं हो पाया| उस समय मुझे लाइलाज खाँसी का मरीज बताया गया| खैर, खाँसी का होमियोपैथी में इलाज हुआ और जो थोड़ा बहुत बचा था उसे देशी नुस्खे ने दूर कर दिया| दिल्ली में रहना आजकल एक अग्नि परीक्षा है| आज सुबह रोज इस उम्मीद में मोबाइल पर प्रदूषण का स्तर देखता हूँ कि शायद कम हो, मगर होता नहीं|

दशहरा के साथ जो ठंडक, उत्सव, मौज-मस्ती के जो दिन शुरू होते हैं वो मेरे लिए पस्ती के दिन बनने लगते हैं| नाक ढंकने के लिए कपड़े से लेकर मास्क तक का इंतजाम शुरू होने लगता है| फिर भी कुछ न कुछ चूक होती है| फ़िजाओं में फैला जहर कहीं न कहीं फेफड़ों तक पहुँचता ही है|

पिछले तीन हफ्ते से खाँसी से हाल बुरा रहा| बिना मास्क के घर से निकलने पर गले में खारिश और सीने में जलन होने लगती है| खाँसी से कमर टूट जाती है कई बार| इस दिसंबर में कमर में दर्द रहा| आज भी है| आँखों में जलन तो अब कहने की बात नहीं| यह सब शायद अकेले मुझे होता है| अगर बाकी लोगों को होता तो वो भी आवाज उठाते| अगर वो लोग गूंगे हैं, तो अपने बुढ़ापे तक बहरे और अंधे होने से कोई नहीं रोक सकता|

आप किसी भी राजनीतिक पार्टी से हों, पूछें तो सही पार्टी से क्या कर रहे हो उस देश या राज्य में जहाँ सत्ता में हो| अगर भाजपाई हो तो पूछो कि अगर सारा दोष राज्य का है तो उनकी दिल्ली सरकार बर्खास्त क्यों नहीं हो रही| अगर आप-पार्टी से हैं तो पूछे कि क्या कदम उठे| अगर राजनीति में गधे हो तो पूछो सब सरकारों से कि क्या कर रहे हो? कांग्रेस और कम्युनिस्ट से भी पूछो की सत्ता और विपक्ष में रहकर पर्यावरण पर तुम्हारे सरोकार क्या थे और हैं?

मगर मरने तक हम अपनी अपनी पार्टी को बचायेंगे, अपने अपने त्योहारों की कुरीतियों को बचायेंगे, अपने अपने धंधे के गंद छिपाएंगे| और किसी दिन खांसते खांसते एक गूंगी बहरी मौत मर जायेंगे|

जी तो पा नहीं रहे, आइये मिलकर मरें|

बदला लेने वाला न्याय


अजीब मनस्तिथि है| तलवार दम्पति की रिहाई से कोई खुश नहीं दिखाई देता| हर तरफ एक अजब सा मातम है| हर किसी को बिटिया को न्याय न मिलने का दुःख है|

लोग इस रिहाई से इसलिए दुःखी नहीं कि किसी के दोषी होने पर विश्वास है, बल्कि उन्हें आरुषि तलवार की हत्या का जल्द से जल्द बदला लेना हैं| बड़े मुश्किल से उन्हें कोई मिला था जिसे दोष दिया जा सकता था| शक के बिना पर किसी पर भी ऊँगली उठाई जा सकती है| अगर आपकी पुलिस व्यवस्था नाकारा हो, तब भी किसी न किसी तो तो न्याय के कठघरे में खड़ा करना ही होगा| अंधेर नगरी में क्या न्याय नहीं होता होगा|

न्याय; बदला लेने की आदिम जंगली गैर मानवीय प्रवृत्ति परिष्कृत प्रक्रिया का सभ्य – सुसंस्कृत नाम है और अब तो इसपर आधुनिकता का ठप्पा भी है| कर्मफल के आधार पर न्याय तो प्रकृति स्वयं करती है| या फिर क़यामत के दिन ईश्वर ख़ुद न्याय करता है| परन्तु किसने देखा कर्मफल? किसने देखी क़यामत?

न्याय इसी जन्म में इसी धरती पर जल्द से जल्द सब निपटा देने का नाम है| न्याय और बदला लेने की प्रक्रिया में मामूली सा अंतर है| न्याय प्रायः सबूत मांगता है और बदला शायद ही सबूत की कद्र करता हो| न्याय में न्यायाधीश को अपनी निजी भावना से ऊपर उठाना होता है और बदले में निजी भावना सर चढ़कर बोलती है| जरूरी नहीं बदला लेने के लिए आपके किसी प्रियजन या प्रियसम्पत्ति का कोई नुक्सान हुआ हो| आप अनजान मुल्क के अनजान पत्थर के टूटने पर भी अपने पुराने मित्र से बदला ले सकते हैं|

बदला लेने की भावना किसी अदालती कार्यवाही की मोहताज नहीं होती| बदला केवल शक की बिना पर या अपने पक्षपात लिया सा सकता है| कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह शक किसी षड्यंत्र ने पैदा किया है या अपने सर से काम के बोझ से परेशान पुलिस या न्याय व्यवस्था ने| बदले की भावना पुलिस और न्याय प्रशासन की उन्नति में बाधा होती है और उसपर जल्दी परिणाम लाने का दबाब डालती है| यह दबाब ही किसी न किसी निर्दोष को फंसा देने के लिए प्रशासन को मजबूर करती है| आप सही न्याय होते नहीं मात्र न्याय होते देखना चाहते हैं| आप टेलीविजन के किसी रियल्टी शो की तरह घटनाओं को देखते और प्रतिक्रिया देने लगते हैं| ऐसे में हर व्यक्ति दूसरों के लिए न्यायाधीश बन जाता है और बड़े बड़े फ़ैसले पान की दुकान, सोशल मीडिया और ख़बरिया चैनल पर होने लगते हैं| आपका सरोकार नहीं कि पुलिस को सबूत मिले या नहीं, दोष सिद्ध हुआ या आपके दबाब में आरोपों को जस का तस मान लिया गया|  आप अपने रियल्टी शो में बदला पूरा करना चाहते हैं, भले ही आरोपी दोषी हो या न हो|

जब आप ऐसे न्याय पर खुश होते हैं तब असल आरोपी आपके घर में बैठकर किसी न किसी दिन आपको निशाना बनाने की तैयारी कर रहा होता है|