आरक्षण पर पारस्परिक कुतर्क


आरक्षण के समर्थन या विरोध में वाद –विवाद करते रहना धर्म, राजनीति, क्रिकेट और खाने-पीने के बाद भारतियों का प्रिय शगल है| मुझे आरक्षण की मांग मूर्खता और उसका विरोध महा-मूर्खता लगती है| सीधे शब्दों में कहूँ तो आरक्षण के पक्ष-विपक्ष में खड़े राजनीतिक दल या राजनेता भारत और किसी भी भारतवासी के हितेषी नहीं हो सकते| अगर आप चाहें, यह आगे न पढ़ें|

मेरे इस आलेख पर इस बात का कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आरक्षण का प्रस्ताव अपने आप में उचित था या नहीं| हालाँकि मुझे पारदर्शिता के हित में अपनी निजी राय रख देनी चाहिए| मुझे लगता है, जब तक समाज में असमानता है –आरक्षण की आवश्यकता है|

प्रख्यात कुतर्क है कि आरक्षण का देश के विकास पर कुप्रभाव पड़ता है| परन्तु सभी जानते हैं कि अपेक्षागत तौर पर कम आरक्षण वाले हिंदीभाषी राज्य अधिक आरक्षण वाले दक्षिणी राज्यों से बेहद कम विकास कर पाए हैं| एक कारण यह है कि दक्षिणी राज्यों में आरक्षण और उसका सही अनुपालन अधिक बड़े जन समुदाय को आगे बढ़ने की प्रेरणा देने में सफल रहा है| दक्षिणी राज्यों में विश्विद्यालयों और सरकारी नौकरियों में आरक्षित और अनारक्षित प्रतिभागियों के योग्यता सूची में अंतिम आने वाले प्रतिभागीयों के योग्यतांक का अंतर लगातार घट रहा है| दक्षिणी राज्यों में अधिकतर प्रतिभागियों को आरक्षण अथवा बिना आरक्षण लगभग बराबर का संघर्ष करना पड़ रहा है| जबकि उत्तरी और पश्चिमी राज्यों में योग्यता प्रदर्शन की खाई बरक़रार है|

आरक्षण के समर्थन (और नई मांग) या विरोध में खड़े होने वाली भीड़ को देखें| भीड़ के अधिकतर सदस्य वो निरीह प्राणी होते हैं जो शायद किसी प्रतियोगी परीक्षा में दस प्रतिशत अंक भी न ला पायें| जब इस प्रकार के उग्र प्रदर्शन होते हैं उस समय उनके सभी योग्य जातिभाई सरकारी या निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का लाभ उठाने का उचित प्रयास कर रहे होते हैं|

जातिगत भेदभाव के विपरीत, सभी वर्गों से नए नए उद्यमी आगे आ रहे हैं| व्यापार के साथ साथ बड़े उद्योगों में भले ही सवर्णों और अन्य धनपतियों ने आधिपत्य कायम किया है, छोटे और मझोले उद्योगों में हमेशा की तरह शूद्र कही गई जातियों का आधिपत्य है| ध्यान देने की बात है कि प्रायः सभी उत्पादक और सेवा प्रदाता जातियाँ प्राचीन काल से शूद्र के रूप में वर्गीकृत होती रहीं हैं| दुःखद यह है कि इनमें अपने पारंपरिक कार्यों के प्रति वही घृणा भर दी गई है, जो सवर्ण सदा से उन कार्यों से करते रहे थे|

अब, आइये मुख्य मुद्दे पर आते हैं|

रोजगार सुधार

आरक्षण समर्थक और विरोधी दोनों ही वर्ग सरकारी नौकरी के लालच में एक दूसरे से लड़ रहे हैं| कोई नहीं देखता कि सभी उत्पादक रोजगारों के मुकाबले सरकारी क्षेत्र में बहुत कम अवसर हैं| साथ में, बड़े और विदेशी उद्योगों और संस्थानों के दबाव में आवश्यक सरकारी पद भी नहीं भरे जा रहे| लागत कम करने के नाम पर सरकारी क्षेत्र को मानव संसाधन विहीन करने की परंपरा चल रही है|  इस नाते प्रथम दृष्टया आरक्षण अप्रभावी हो रहा है| वास्तव में मांग होनी चाहिए कि सरकारी गैर सरकारी क्षेत्रों में सभी खाली पद समय पर भरे जाएँ| अनावश्यक निजीकरण न हो| कोई भी व्यक्ति अपने कार्यालय में विवश होकर या लालच में भी आठ घंटे से अधिक समय न बिताये| ओवरटाइम की व्यवस्था समाप्त हो| पूरे साल में कोई भी व्यक्ति अगर दो हजार घंटे पूरे कर ले उसे साल भर के सभी लाभ एक घंटे भी बिना कार्यालय जाए बाकि बचे हुए समय में मिलें| आप देखेंगे कि देश में न सिर्फ रोजगार बढ़ जायेगा बल्कि कार्यालय में जीवन काटते लोग, वास्तविक जिन्दगी जी पाएंगे|

विकास

यदि देश में समुचित विकास हो तो कोई कारण नहीं कि सभी रोजगार योग्य युवाओं को रोजगार न मिले| सोचिये अगर किसी समय एक लाख पदों के लिए भर्ती होनी हो और रोजगार योग्य कुल युवा भी एक लाख के आसपास हों| ऐसे में किसे आरक्षण की जरूरत होगी? जब भी कोई राजनेतिक दल आरक्षण के समर्थन या विरोध में कोई बात कहता है, वास्तव में वह विकास के प्रति अपनी द्रष्टिहीनता की घोषणा करता है| यही कारण है कि विकास का नारा लगाने वाले बड़े बड़े तुम्मन खां नेता आरक्षण का तुरुप  नारा अपनी वाणी में बनाये रखते हैं| ध्यान रहे की विकास किसी सरकारी फीताकाट योजना से नहीं आएगा, वरन उच्च शिक्षित युवाओं द्वारा प्रतियोगी माहौल में आगे बढ़कर काम करने से आएगा|

आपको को आश्चर्य होगा, मगर मुझे बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के अलावा कोई भी राजनेता सच में आरक्षण विरोधी नहीं लगा|

कूँए से हरे समंदर तक


कूँए के मेंढ़क होना, हिंदी का वो मुहावरा है जिसे हम सब पर प्रयोग किया जा सकता है| हम सब किसी न किसी अर्थ में अपने अपने कूँए खोद लेते हैं| बचपन में हम अपने परिवार और घर के बाहर अक्सर देख नहीं पाते| फिर बड़े होते होते अपने रहने और पढ़ने के शहरों को जानने का मौका मिलता हैं| फिर भी हम अक्सर उन शहरों को पूरा जान समझ नहीं पाते| जितना भी आप घूमते फिरते हैं, लोगों से मिलते हैं तो लगता है कितनी विविधता है, एक ही शहर में सबके अपने अपने कितने ही जहाँ बसते हैं| जाति, धर्म और भाषा की बहुलता यूँ तो अक्सर शहरों को बाँटतीं हैं, मगर यह शहर में विविधता भी बनाये रखती हैं| अगर दुरूपयोग न किया जाए, यह विविधता शहर को सौन्दर्य देती हैं| मेरे शहर अलीगढ़ को देखें, ब्राह्मणों, वैश्यों, जैनों, कायस्थों, मुसलमानों और अन्य जातियों सबके अलग अलग मोहल्ले रहे हैं| आप हर मोहल्ले में, यहाँ तक कि अलग अलग गलियों में भी भाषा और संस्कृति की विविधता देख सकते हैं| अलीगढ़ के ही ऊपरकोट और लालडिग्गी इलाके में उर्दू का रंग जमीन- आसमान अलग है| आज पढ़ाई लिखाई के साथ गाढ़ी उर्दू का चलन जरूर है| जमीन की उर्दू में ब्रज की रंगत है तो पढ़ी लिखी उर्दू अरबी – संस्कृत का चोला पहनती है| यही हाल पुराने और नए शहर की हिंदी का है|

हमारे देश में घर घर में खाना-पीना बदल जाता है| हर कोस पर पानी और चार कोस पर बानी बदलना तो हमारी सांस्कृतिक विविधता और गतिशीलता का पर्याय है| यह सब जानने समझने की इच्छा होने लगती है – Travel inspiration|

World traveller, जब तक आप अपने कूएं से बाहर नहीं निकलते, आप घृणा करते हैं, आपको दूसरे के काम, संस्कृति, विचार गलत लगते हैं| आपका सांस्कृतिक आदान प्रदान नहीं होता| अपनी रोज-मर्रा की जिन्दगी में जितना जाना जाए, जान लेना चाहिए| क्या पता जो इस जन्म में जो हमारा अनजाना सा पड़ोसी है, उसे जन्नत में दोस्त बनाना पड़ जाए| जब मैंने अपने शहर को जानने का सिलसिला शुरू किया तो लगने लगा कि जब एक शहर में इतना सब जानने समझने और मिलने जुलने के लिए है तो दुनिया में कितना कुछ होगा – शायद इस जन्म से बहुत ज्यादा|

जिन भील – भिलाला आदिवासियों को महानगरीय लोग जंगलवासी सोचकर भाव नहीं देते उनके सांस्कृतिक रंग मुझे आश्चर्यचकित कर देते हैं| निर्गुण मूर्तियों के सामने सर झुकाते हैं तो मूर्ति-पूजक + रेतीले टीलों से लेकर बर्फीले पहाड़ तक दुनिया में प्रकृति अनूठे रंग भरती है| समंदर की लहरें और शीतल पवन के झोंके अलग अलग तरीके से आपपर अपना प्यार उड़ेलते हैं| हाड़-माँस के रंग-रूप बदलते हैं मगर मन अन्दर से मिलते जुलते हैं| जिन्हें आप निर्धन निरीह समझते हैं, उनकी संस्कृति अक्सर बहुत बड़ी और धनी होती है| so I love the world.

मुझे मिलना जुलना और उससे भी अधिक अलग अलग संस्कृति और उप-संस्कृति को समझना पसंद है| कई बार कई चीजें अपनी सीमित तर्क शक्ति के साथ समझ नहीं आती या गलत समझ आती हैं| अनेकों बार महीने लग जाते हैं समझते समझते| कभी मांसाहार समझ नहीं आता तो कहीं शाकाहार में रंग रूप, कंद- मूल, के झगड़े|  कभी ध्यान दिया है, हर शहर में गोलगप्पे का पानी अपने अलग स्वाद में होता है| पानी का स्वाद बदल जाता है तो मसालों का मिश्रण भी| हर स्वाद को समझना, हर रंग को जीना ही जिन्दगी है| घूमते फिरते ही मुझे आलू-गोभी और आलू-गोभी-मसाले की सब्जी अंतर समझ आया| जलेबी हमेशा लाल-गुलाबी नहीं होती|

इस यात्रा में मुझे तरह तरह के लोग मिल रहे हैं| बहुत अलग अलग आचार-विचार, रहन-सहन, भाषा-संस्कृति लतें-आदतें जानने समझने को मिलती हैं| कुछ पसंद आतीं हैं कुछ नहीं| सबको समझना जीना और जिन्दगी है| कुछ अच्छा बुरा नहीं| बस इतना है कि आप स्वीकार कर पाते हैं या नहीं| मगर आप समंदर में हैं, हजारों आती जाती लहरें है| आप गोते लगाते और हिचकोले खाते आगे बढ़ रहे हैं|

पहाड़ चारों ओर से आपको घेर कर गले मिलते हैं तो समंदर बाहें फैलाए| रेत आपको अपने रंग में रंग देता है तो झरने आपका अंतर्मन भिगो देते हैं| आपका परिदृश्य फैलता जाता है| जी हाँ, आप अपने घर को दुनिया समझने की जगह दुनिया को घर समझने लगते है|

पानी रखिये…


 

 

रहिमन पानी राखिये,

बिन पानी सब सून।

पानी गये न ऊबरे,

मोती, मानुष, चून॥

सोलहवीं सदी में महाकवि अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना ने जब यह दोहा कहा था, शायद सोचा भी न होगा कि इसके मायने विशेष होने की जगह साधारण हो जायेंगे और वह साधारण मायने अतिविशेष माने जायेंगे| इस दोहे में पानी शब्द का कोई भी अर्थ शाब्दिक नहीं है|[i] परन्तु तब से लगभग पांच सौ वर्ष के बाद पानी (water) का शाब्दिक अर्थ बहुत महत्वपूर्ण हो चुका है|

पानी अर्थात जल के बिना मोती, मनुष्य और आटा (यानि खाद्य पदार्थ) अपना अस्तित्व नहीं बचाए रख सकते| पानी को बचाए रखिये| बिना पानी दुनिया बंजर उजाड़ हो जाएगी| लगता है रहीमदास इक्कीसवीं सदी की इस आशंका की चेतावनी दे रहे हैं|

पानी कैसे बचे? इसके कई उपाय सुझाये जा रहे हैं| उनमें से बहुत से सुझाव अपनाये भी जा रहे हैं| दशक – दो दशक पहले तक पानी की साफ़ बनाये रखने पर जोर था| आजकल पानी बचाने पर सारा ध्यान है| अब पानी की कमी पहली दुश्वारी है, पानी को साफ़ रखना बाद की बात है|

किस काम में और किस उत्पाद में पानी कितना बर्बाद हो रहा है, यह आँका जा रहा है| औद्योगिक जगत इस समस्या पर कितना गंभीर है कोई नहीं जानता| शायद विकास और रोजगार की मांग देश और दुनिया की हर सरकार पर हावी है| ऐसे में पानी बचाने के ज़िम्मा साधारण घर-गृहस्थी पर ही है| पानी का पहला संकट घर में झेलना ही होगा –- वह भी अचानक दिन के पहले पल में|

पुराने समय में जब कूएं से पानी निकालना होता था तो सोच समझ कर खर्च होता था| पांच लीटर पानी की जरूरत हो तब दस लीटर पानी खर्च करने का अर्थ था दुगनी मेहनत, दुगना समय| मशीनी युग में पानी बर्बाद करने से पहले हम कम ही सोचते हैं| बटन दबाकर पानी पा जाने वाले हम लोग नहीं जानते पानी का वो महत्व; जो घर से दूर किसी ताल-पोखर से पानी वाली बूढ़ी माँ जानती है|

क्या यह जरूरी है कि एक बाल्टी पानी से नहाने की जगह दस बाल्टी पानी बाथटब में बर्बाद की जाएँ? यह नहीं कहता में कि आप कभी भी बाथटब का प्रयोग न करें, मगर उसे सीमित किया जा सकता है| ऐसे बहुत से उदहारण हो सकते हैं| नहाना, कपड़ा धोना, हाथ-मूँह धोना, खाना बनाना और खाना-पीना सब काम में पानी की जरूरत है|

जब भी मेहमान आते हैं, तो चाय-पानी पूछना हमारी पहली सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी होती है| शायद ही हम कभी आधे ग्लास पानी से उनका स्वागत करते हों| अगर मेहमान पानी को ग्रहण करने से मना कर दें, तो यह मेजबान के अपमान के तौर पर देखा जाता रहा है| इसीलिए आजकल मेहमान पानी की जरूरत न होने पर पहले ही बोल देते हैं| मगर शायद ही मेहमान के सामने लाये गए पानी का कुछ प्रयोग होता हो| यह पानी फैंक दिया जाता है|

आजकल दावतों, सभाओं, समाजों, जलसे, मजलिसों और शादी – ब्याह में पानी की बोतल देने का चलन बढ़ रहा है| अधिकतर मेहमान अपनी जरूरत जितना पानी पीकर बोतल या बचा पानी फैंक देते हैं| अगर यह झूठा पानी न भी फैंका जाए तब भी कोई और उसे नहीं पीयेगा| घरों में भी अक्सर हम पूरा ग्लास पानी लेते हैं| ग्लास में बचा हुआ पानी बर्बाद हो जाता है| पानी की यह सब बर्बादी भी रोकी जा सकती है – save water|

कटिंगपानी #CuttingPaani इसका उपाय हो सकता है| हम भारतीय लोग जरूरत न होने पर पूरी चाय नहीं लेते| कटिंगचाय से हमारा काम चल जाता है| यह उदहारण पानी के लिए भी अजमाया जा सकता है| जब जरूरत न हो तो ग्लास में पूरा पानी लिया ही क्यों जाए? अगर पूरा पानी लिया गया है, तो क्या जरूरत से ज्यादा होने पर उसे किसी और काम में प्रयोग नहीं कर सकते? बचे हुए पानी का प्रयोग बाद में पीने के अलावा भी पौधों को पानी देने, झाड़ू-पोंछा करने, और पालतू जानवरों को पिलाने के लिए किया जा सकता है| हमारे भारतीय परिवारों में झूठा पानी पौधों या पालतू जानवरों को नहीं दिया जाता| इसलिए कोशिश करें कि यह अतिरिक्त पानी झूठा होने से पहले ही अगल निकाल दिया जाए|

आइये पानी बचाने की शपथ लें| अगर आप अभी भी सोच रहे हैं तो यह तीन वीडियो भी देखते चलें|

[i] इस दोहे में पानी का पहला अर्थ सच्चे मोती की चमक, दूसरा मनुष्य की विनम्रता और तीसरा रोटी बनाने के लिए गूंथे गए आटे की लोच से है| उचित चमक, उचित विनम्रता और उचित लोच के बिना इमोटी, मनुष्य और आटे का कोई प्रयोग नहीं है|