तिजोरी में स्त्री


जब तब सामाजिक माध्यमों पर विद्वतजन एक क़िस्सा रुपी आलेख प्रस्तुत करते हैं| किस्सा कुछ यूँ है, किसी “आधुनिका” विद्वान संत द्वारा आधुनिक स्त्रियों के बारे में, खासकर उनके कपड़ों के बारे में टिपण्णी करने पर कड़ी आपत्ति दर्ज की| ज्ञान पराक्रमी संत ने “आधुनिका” से प्रश्न किया, पुत्री, आप लोहे को तिजोरी में रखेंगी या हीरे को| “आधुनिका” ने उत्तर दिया, हीरे को ही तिजोरी में रखेंगे| तब विद्वत संत ने समझाया कि बेटियां अनमोल होती हैं, इसलिए उन्हें संभाल कर रखा जाता है, यह बार स्त्रियों को भी समझनी चाहिए| इस के बाद कुछ आलेख सा आता है| कुल जमा यह, आधुनिका जी समझ जाती हैं और किस्सा ख़त्म सा हो जाता है|
किस्से के बाद एक होड़ जाती हैं, इस किस्से और उसके निष्कर्ष का समर्थन करने वालों की होड़ सी लग जाती हैं| संत महोदय के कोई नहीं पूछता, स्त्रियों को कितनी हिफाजत में रखना है| कोई यह भी नहीं पूछता कि क्या स्त्रियों वस्तु हैं कि तिजोरी में रखा जाए| अब, स्त्री को लोहे की तिजोरी में तो बंद नहीं नहीं कर सकते| आखिर तमाम काम भी तो करने करवाने भी तो हैं|  यहाँ दिखाई देता है, क्षमता, समझ और सामाजिक स्तर का खेल|

दूसरा किस्सा रुपी आलेख और भी है| एक देवी जी एक दिन विलायती घाघरे में कहीं जातीं हैं तो ऑटो वाला उन्हें मेडम कहकर बुलाता है| दूसरे दिन पंजाबी कपड़ों में तो उन्हें बहन जी कहता है| तीसरे दिन जब वह देवी जी साड़ी पहन कर जातीं हैं तो वह ऑटो वाला उन्हें माताजी कहता है| 

यह किस्सा खास हमारे दिल को छू गया कि जिस दिन बाल रंग नहीं होते तो लोग अंकल कहते हैं, जिस दिन दाढ़ी भी बढ़ी हो बाबा, जिस दिन सफ़ाचट दाढ़ी और कालिख़ पुते बाल हो तो भैया| पर यहाँ तो कपड़ों की महिमा थी| 

इस किस्से के एक प्रेषक एक दिन नई धज का सजधज कुर्ता पायजामा पहने हुए सूती साड़ी में लिपटी अपनी पत्नी के साथ नजर आए| हमने उन्हें भाईसाहब और उनकी पत्नी को माताजी कहकर सम्मान पूर्वक अभिवादन किया| माताजी चिढ़ कर बोली, अब यह क्या तरीका है? हमने कहा हमने एक संदेशा पढ़ा है कि साड़ी वाली कन्याएं माताजी नजर आती हैं, आप तो भरी-पूरी औरत है| इन किस्सेनुमा आलेखों के अग्रसारकों का पूरा दलबल मौजूद है| 

भारत के सामाजिक संचार माध्यमों में एक मौन आम सहमति दिखाई देती है| स्त्री की सुरक्षा ढके शरीर और “पूरे” कपड़ों में है| ऐसा नहीं कि कोई लड़कों को नहीं समझाना चाहता, परन्तु हमारे पास वह भाषा और व्याकरण नहीं है जिस से लड़कों को समझाया जाए| हम स्त्री के सम्मान की बात करते है तो परन्तु सम्मान के इस व्याकरण में माता या बहन रूप में सम्मान है, स्त्री रूप में उसका कोई सम्मान नहीं| हमारा कोई व्याकरण नहीं जो कहे कि पत्नी, प्रेमिका, परस्त्री आदि का भी कोई सम्मान है| इस देश में स्त्रियाँ अपने पति की प्रसंशा में कहती है;” मेरे ‘ये’ तो मुझे पूरा सम्मान देते हैं, मेरी इच्छा-अनिच्छा का ख्याल रखते हैं”| जिस दिन यह सम्मान और इच्छा अनिच्छा के प्रश्न प्रसंशा के विषय नहीं रहेंगे तब पत्नी को सामाजिक स्तर पर सम्मान की बात कहिएगा|

हम चाहते हैं, स्त्रियां मोटे कपड़ों में सिर से पैर तक ढकी रहें| अगर ऐसा न हो पाए तो उनके सास ससुर माँ बाप कहें, हमारी बहु-बेटियाँ नौकरी करती है तो फलाना कपड़ा मजबूरन पहनती हैं, वर्ना तो सिर से पल्लू नीचे नहीं गिरातीं| सिर पर पल्लू रखने की तारीफ़ में लम्बे घूँघट की दिली इच्छा जोर मारती रहती है|  अगर धर्म की घृणाएँ बाधाएं न बनतीं तो भारतीय औरतों को पर्दा, घूँघट, हिज़ाब और बुर्क़ा पहनाना ही सर्वधर्म समभाव कहलाता|

नवउत्सव


ये त्योहारों और दावतों का मुल्क है| जश्न हमारी आदत या शौक नहीं, लत है| त्योहारों की कमी नहीं हमारे पास – जब तक पैसा सिर पर चढ़ कर हमें गुलाम की तरह काम पर नहीं लगा देता, हम जश्न मनाते हैं, त्योहार मानते हैं| छुट्टी हो न हो, कुछ न भी कर पाएँ, शगुन ही हो जाए, कुछ मन रह जाए बच्चों का, कुछ ठाकुरजी (कृष्ण का बालरूप) का, कुछ हँस-बोल ले, वक़्त हो तो हंसी ठट्ठा हो ले| हिंदुस्तान और इसकी ज़िंदगी ऐसे ही चलती है| हाट-मेले तो हम मोहर्रम पर भी कर लेते हैं तो दशहरा, दाऊजी, चौथ-चौमासे पर भी| रावण जले जलेबी खाएं, पाप धोवे गंगा नहाएँ| क्या नहाने धोने, क्या बासी खाने, सब पर हमारा त्योहार हो जाए| 

भगदड़ में कुछ मेले ठेले, तीज त्योहार छूटे तो कोई नहीं विलायत से दो चार मना लिए| बसंत पंचमी पर कामदेव छोड़े, तो वैलेंटाइन पकड़ लिए| रुक्मणी छूटे तो राधा प्यारी, सबसे न्यारी जनक कुमारी| परशुराम ने माँ का गला काटा तो त्योहार, विलायत वालों ने माँ को गले लगाया तो त्योहार| कुछ न हो तो हमारे दो मुल्क जब अपना अपना झण्डा उतारते हैं शाम को तो आपसी घृणा का भी त्योहार कर लेते हैं हम| दुनिया भर का कुनबा जुटता है एक दूसरे ओर नारे लगाने फिर उसके बाद दोनों अपनी अपनी तरफ चल देते हैं चूर चूर नान खाने| हर शाम जब दुनिया डरती है कि अब लड़े तब लड़े, हमारे बाप अपनी अपनी औलादों से बोलते हैं, राजनीति मत झाड़, ये नेताओं के झगड़े है तू बिना चू चप्पड़ खाना खा| दुनिया भर के मुल्क हमारी खातिर हथियार बना बना कर पागल है और हम है कि ढूंढ रहे हैं कि यख़नी पुलाव, यख़नी बिरयानी और यख़नी ताहिरी के बनाने में क्या अंतर है?

घृणा के त्योहारों का भी तो इतिहास है: होलिका जलाते हुए, होलिका माई का जयकारा लगते हुए, किस ने सोचा कि हम किसी विरोध या घृणा को अंजाम दे रहे है| रावण जलता है तो उसका पांडित्य हमारे सिर चढ़ता है, हम तांडव स्त्रोत गाते हैं| ओणम के बारे में कोई पक्का तो बताए आज महाबलि की स्मृति है या वामन की या कोई घृणा है इसके पीछे| उत्सव तो महाभारत की जीत का भी रहा होगा, स्मृति तो जन्मेजय के नागयज्ञ की भी है| परमप्रतापी सम्राट अशोक कलिंग जीता, अहम् हारा, फिर एक दिन उसका आत्मसमर्पण दुनिया जीता, आज दुनिया में हमारा परचम कलिंग जीत का नहीं, अशोक के आत्मसमर्पण की विजय गाथा है| 

जो बीत गया, हमने मिट्टी डाल दी| हम तीज त्यौहार मेला जश्न करेंगें| कुछ नया और अच्छा खाएंगे| 

तो एक त्योहार और सही, एक आग और सही, एक ज़हर और सही, कुछ नीलकंठ और सही| कुछ तेरी करनी कुछ मेरी करनी, बातें करनी बातें भरनी| कितना लड़ेंगे? कहीं तो तू दर्द इतना दे कि दर्द दवा हो जाए, चल मिल बैठ कर थोड़ी सी पी जाए| छोड़ यार बहुत हुआ – कुछ चाय वाय सी पी जाए| 

श्वेतकेश


श्वेतकेश अनुभव की कोई उद्घोषणा नहीं है, परन्तु अनुभव का प्रतीक अवश्य माना जाता है| ईश्वर की कृपा से मुझे मात्र चौदह वर्ष की अवस्था में यह अनुभव प्रतीक प्राप्त हुआ| दो चार लट इस तरह सफ़ेद हुई कि उसका श्रेय हमारे छोटे से शहर के बड़े नामी से केश-विन्यासक को मिला| चरण पादुका से मेरी और शब्द श्लोकों से निरपराध केश-विन्यासक की सेवा हुई| केश-विन्यासक महोदय कुपित होकर मुझे अपनी गली में देखकर भी लाल पीले होने लगे| जब केश दीर्घकाल तक भी काले न हुए तब परिवार में चिंता हुई| 

बीस की वय तक इतने बाद सफ़ेद हुए कि केश काले करने प्रारम्भ हुए| जब जीवन की पच्चीसी संभालने का समय था, तब मैं चिकित्सालय के चक्कर लगा रहा था| अलीगढ़ विश्वविद्यालय के तिब्बिया कॉलेज चिकित्सालय के इलाज से प्रारम्भ हुआ| जीवन के किन्तु परन्तु के चलते एक दिन मेरी समस्या का उपचार करने वाले एसोशिएट प्रोफ़ेसर साहब दो तीन महीने के लिए अमेरिका के किसी विश्वविद्यालय चले गए| पीछे रह गए असिस्टेंट प्रोफ़ेसर साहब ने पर्चा देखा तो बोले इस युवावस्था में गठिया का इलाज क्यों करा रहे हो? गठिया? मुझे लगा कि दोनों में से कम से कम सठिया गया है| लाभ हानि के फेर में दोबारा न गया|  मेरे श्वेत केशों को मेरी यह लापरवाही बहुत रास आई| जब तक कुछ समझ आता, इलाज छूट चुका था| 

वर्ष बीतते रहे, हम केश काले करते रहे, सफ़ेदी झाँकती रही| दाढ़ी मूंछे जरूर विशुद्ध कृष्णवर्णी रहीं| बालों के रंग का जीवन पर इतना प्रभाव रहा कि रंग करने के तुरंत बाद में अपनी आयु से पाँच वर्ष छोटा लगता तो हफ्ते भर बाद वास्तविक आयु से पाँच वर्ष बड़ा| कई बार यह भी रहा कि जो कन्या सप्ताह भर पहले मुस्कुरा कर प्रेम से मिलती वही अगले सप्ताह पूरे आदर से पेश आती| 

जब आप दस बीस साल बाल रंगने के बाद धीरे धीरे झुंझलाहट पैदा होने लगी| एक दिन तय किया, अब बस| नकली रंग का नकली जीवन कब तक जिया जाए| वास्तविकता को वास्तविक जीवन मे सरलता से स्थान नहीं मिलता| समाज और सभ्यता कि चिंता में हो हल्ला करते लोग, वास्तविकता का मज़ाक उड़ाने में कुशलता का परिचय देते हैं| कई बार ऐसा होता है कि मुझे बूढ़ा बाबा कहने वाले लोग रंग रोगन के बाद भैया पर उतर आते| हाल फ़िलहाल बगैर लीपापोती और लीपापोती के बाद कि मेरी उम्र मे अंतर बीस तीस का महसूस होता है| मैंने अपनी इस खूबी का प्रयोग बखूबी किया भी है| मैंने सफेदी को अपने अतिशय अनुभवों कि गवाही देने मे कई बार प्रयोग किया| बिना किसी झूठे प्रदर्शन के कई बार मुझे अनुभवी और समझदार माना गया| 

पिछले दो वर्षों में करोना के चलते रंगने सजने का बहुत दबाब नहीं रहा| कई तरह के प्रयोग करने के लिए लोग स्वतंत्र रहे| पूरे डेढ़ वर्ष के बाद मैंने पास के एक केश- विन्यासक से सेवाएं प्राप्त कीं| केश कतरने के बाद उन्होने बोला वाह, क्या शानदार रंग निकल कर आया है आपके बालों का| पूछिए मत, मेरे सरल हृदय पर क्या बीती| जब  केश- विन्यासक महोदय को लगा, ग्राहक को बात अच्छी नहीं लगी तो वह अपनी सेवा पुस्तिका लेकर आया और बोला, आपके जैसे रंग के बाल करने के लिए हमारी संस्था दो हजार रुपये लेती है| 

बलुए रंग के खिचड़ी बाल के लिए भी कोई इतना खर्च करता है क्या?