बालूशाही


बालूशाही बहुत लंबे समय तक मेरे लिए नापसंदीदा मिठाई रही है| इसके बारे में लिखा पढ़ा भी कम मिलता है| कम से कम इसके इस शाही नाम का कोई रोमांचक किस्सा नहीं है| यह बालू शाह या भालू शाह शायद कोई तुर्रम खाँ नहीं रहे होंगे वरना उनके मिठाई-पसंदी के किस्से हिंदुस्तान पाकिस्तान के बच्चों के जुबान पर चढ़ जाते| भले ही यह हिंदुस्तानी मिठाई हो, मगर इसके नाम और स्वाद में तुर्किस्तानी (तुर्की न समझें) रंगत नज़र से नहीं छिपती| मैं ऐसा कुछ नहीं बोलना चाहता कि इस ना-मामूल मिठाई को देश-निकाला दे दिया जाये| समझदार भक्त जो त्योहारों के नामुनासिब मौसम में दूध कि मिठाइयों पर शक करते हैं उन्हें लड्डू से गणेश जी और लड्डू गोपाल का और बालूशाही से लक्ष्मी जी का भोग लगाते अक्सर देखा जाता हैं| 

महसूस होता है कि किसी खालिश हिंदुस्तानी हलवाई ने तुर्किस्तानी बकलावा का मुक़ाबला करने और हिंदुस्तान की खुशबू बहाल रखने के लिए बालूशाही का ईजाद किया होगा| बकलावा खाते समय बालूशाही और बालूशाही खाते समय इमरती की बड़ी याद आती है| 

इस गंगाजमुनी मिठाई को बनाने के लिए मैदा, गुड़- चीनी, घी का इस्तेमाल इराफ़ात से होता है| आप मर्जी मुताबिक मेवे इस मिठाई में डाल सकते हैं या फिर कंजूसी कर सकते हैं| लड्डू और बालूशाही कभी कोई शिकायत नहीं करते| आम हलवाइयों की बालूशाही अक्सर कड़ी रहती है और जल्दी खराब न होने के कारण हफ़्तों हलवाई की परातों और घर के दस्तरखान पर मौजूद रह सकती हैं| इसको हल्का, खस्ता और रसदार बनाना ही किसी हलवाई की परीक्षा होती है| इसे आकार प्रकार का ध्यान रखे हुये इस बिना जलाए अंदर तक सेंकना अपने आप में कला है| इसका खस्ता और मुलायम दोनों गुण एकसाथ बरकरार रखना भी महत्वपूर्ण है| बालूशाही का स्वाद गरम गरम खाने में है| मगर गरमागरम बालूशाही अगर ठीक से न सिंकी हो तो अंदर से अधिक कच्ची महसूस होगी| बालूशाही का स्वाद इसके सिंकने के बाद समय के साथ घटता है| मगर तेजी से ठंडी की गई बालूशाहियों का भी अलग स्वाद लिया जाता है| 

रसायन शास्त्र में अर्ध आयु का सिद्धान्त किसी बालूशाही के स्वाद के हर घंटे आधा होते चले जाने की प्रवृति देखकर ही सामने आया होगा| जितना बढ़िया हलवाई उसकी बालूशाही के स्वाद की अर्धआयु उतनी लंबी| आप बालूशाही को सुखाकर महीनों खा सकते हैं| अगर इस पर की परजीवी न आए तो यह बेस्वाद नहीं होगी| 

मुझे लगता है, जिन हलवाइयों को ताजा ताजा मिठाइयाँ रोज बनाने और बेच देने की खानदानी बीमारी रही है, उन्हें कभी बढ़िया बालूशाही बनाने का विचार नहीं आया| कुछ बढ़िया बालूशाहियाँ देहाती हलवाइयों के मर्तबानों में महीनों गुजारती हैं और दूध, छाछ या फिर चाय के साथ निपटाई जातीं हैं| 

दिल्ली के हीरा हलवाई अपनी बालूशाही की बदौलत अपनी मजबूत जगह बना पाए हैं| उनकी बालूशाही का दिल्ली में शायद कोई मुक़ाबला नहीं| बिना शक यह बढ़िया बालूशाही है और आप हफ्ते भर इसका बेहतरीन स्वाद ले सकते हैं| मगर मैं इस बालूशाही का दीवाना नहीं हो पाया|
राजधानी से कुछ दूर बागपत के भगत जी स्वीट्स की बालूशाही किसी भी बालूशाही को मात दे सकती हैं| एक लंबे समय तक महीने में एक बार चार-पाँच किलो बालूशाही बागपत से मंगाता रहा| सीधे उनके कारखाने पर अपना निशाना लगता और बालूशाही ठीक कढ़ाई से ही खरीदी जाती| गरम गरम बालूशाही का जलबा निराला होता हैं| ऐसा नहीं है कि इसके मुक़ाबले कोई और बालूशाही नहीं होगी पर मेरे ज्ञान में यह बेहतरीन बालूशाही है| बढ़िया आकार के साथ खस्ता, कुरकुरी, मुलायम, रसीली और अंदर तक बढ़िया सिकी हुई बालूशाही -कोई सरल बात नहीं| 

समय के साथ बालूशाही की लोकप्रियता बढ़ रही है| इसके लिए दूध की मिलावट, दूध की मिठाइयों की बेहद कम उम्र और स्वास्थ्य समस्याएँ की एक कारण है| बेहतरीन कारण है, बालूशाही बनाने की तकनीक में सुधार| 

हलवा परांठा


हलवा परांठा एक ऐसा पकवान है जिसे ठीक से बनाया या खाया न जाए तो बेहद खराब लगता है| जिन लोगों ने इसे नहीं खाया है तो घर पर लूचई या लूची (मैदा की पूड़ी) को देशी घी में थोड़ा करारा सेक कर सूजी के हलवे के साथ खाकर अनुभव कर सकते हैं| बढ़िया हलवा परांठा देशी घी में ही बनता है| 

देशी घी के सूजी या रवा  हलवे के बारे में हम सब जानते हैं| परंतु, हलवा परांठा का परांठा घर पर बनना मुश्किल है| ऐसा इसलिए कि पहले तो इसका आकार बहुत बड़ा होता है और दूसरा यह तवे पर घी चुपड़ कर सिका हुआ परांठा नहीं है, बल्कि तला हुआ परांठा है| 

यहाँ यह बात समझने की है कि परांठा परतों से तय होता है न कि सिकने और तलने के ढंग से| यह बात कहते सुनते समय आप आलू कचौड़ी और आलू पराँठे का ध्यान कर सकते हैं| कायदे से आलू पराँठे में में पिट्ठी की परत है आलू कचौड़ी में पर्त नहीं| परतों वाली यही बात तवा परांठा, तंदूरी परांठा और कड़ाई वाले तले हुए पराँठे को परांठा बनाती है| 

वैसे हलवे पराँठे का परांठा दिल्ली की परांठा वाली गली के पराँठे के मुक़ाबले पूरी तरह से परांठा है| 

इसमें मैदा की बहुत सारी परतें होती हैं जैसे किसी भी सादे पराँठे में हो सकती हैं| मैदा के परते बार बार बनाना थोड़ा कठिन हो जाता है, इसलिए बड़े आकार का परांठा बनाया जाता है| आम तौर पर इस बार में आधा किलो तक मैदा ली जा सकती है| दुकानदार इसे काटकर हलवे के साथ तौल कर बेचते हैं| 

मुझे अलीगढ़ शहर का देशी घी वाला हलवा परांठा पसंद है| इसका पहला कारण है इसका लगभग कुरकुरा सिंका होना, ठीक ठाक संख्या में परतें रहता और देशी घी का प्रयोग| यह बात हलवे को लेकर भी है| हर दाना पूरी तरह घुला हुआ होता है| 

सभी जगह हलवा परांठा तौल कर बेचा जाता है| अगर आप पाव भर (250 ग्राम) हलवा परांठा लेते हैं तो लगभग एक बड़ा दौना भरकर हलवा और शेष परांठा मिलता है| परंतु हलवा परांठा को लेकर मेरी एक शिकायत हमेशा बनी रही| बड़ी बड़ी दुकानों में भी हलवा परांठा अखबार पर रख कर देते का चलन आज भी बना हुआ है| पहले यह पत्तल और दौने पर दिया जाता था| आज भी कोई हलवाई इसे थाली में देना पसंद नहीं करता| मुझे लगता है कि अगर थाली का प्रयोग नहीं करना है तो पत्तल का प्रयोग किया जाना चाहिए|

देशी घी वाला हलवा परांठा, हलवाई खाना, अलीगढ़ 5 फरवरी 2022
देशी घी वाला हलवा परांठा, हलवाई खाना, अलीगढ़ 5 फरवरी 2022

‘पुष्पा’ और ‘जय भीम’


पिछले महीनों में दक्षिण भारतीय फ़िल्मों “जय भीम” और “पुष्पा” की बड़ी धूम रही| यह तक कहा गया कि यह बॉलीवुड नामक हिन्दी फ़िल्म फॉर्मूला का अंत है| सोचा, अगर इतनी बड़ी क्रांति होने जा रही तो साक्षी बन लेना ही बेहतर है|
समय निकाल कर मैंने भी दोनों फिल्में देख ही लीं| जब से ओटीटी सेवाएँ शुरू हुई है, यह सुविधा तो हो ही गई है कि फ़िल्म के गंभीर पक्ष को समझने के लिए आप मनचाहे अल्पविराम ले सकते हैं| फ़िल्में बहुत गतिशील माध्यम है उनकी गति से सभी बातें समझ पाना मेरे लिए कठिन ही रहा है|
दोनों फिल्मों में सर्वप्रथम जो बात आकर्षित करती है वह है जमीन| दोनों फ़िल्में उस जमीन और जंगल के धरातल पर बनीं हैं, जहाँ वर्तमान समय का वास्तविक आम आदमी खड़ा है| यह वह वर्ग है जो पिछले बीस वर्षों से अचानक समाज और फिल्मों से काट कर रखा गया था| बड़ी चमक दमक वाले बहु-पटल सिनेमाघर इन की आर्थिक और सामाजिक हिम्मत से बाहर होने लगे थे| जिन बड़े परिसरों में यह सिनेमाघर खड़े हैं वहाँ जमीन से जुड़े किसी भी व्यक्ति हो जाने से संकोच होता है, कहीं दरबान महोदय लताड़ न दें|
यह बहु-पटल सिनेमाघर उच्च-मध्यवर्ग की पहुँच में ही रहे हैं|
पिछले बीस पच्चीस वर्षों में बॉलीवुड फ़िल्में भी उसी उच्चमध्य वर्ग को आम आदमी और दर्शक मानकर बनती रहीं| बॉलीवुड की बेहतरीन फ़िल्म संसाधन नव-धनाढ्य उच्च-मध्यवर्ग के जीवन और सपनों पर टिक गई| अनिवासीय भारतीय के भारत प्रेम, भारतियों के विदेश संबंधी सपने और जीवन, भारत के वैश्विक कारनामे, मुख्यधारा में प्रमुखता पा गए| कौन सा समाज सपने नहीं देखता| यह सपने मध्य और निम्नमध्य वर्ग ने भी बखूबी अपनाए| पिछले बीस वर्षों में भारतियों की यह विश्व विजय इतना आम हो चुकी है कि विश्व की हर बड़ी कंपनी का सबसे बड़ा नौकर एक भारतीय है| 

Business Standard Hindi
7 February 2022

इसके साथ आता है एक सामाजिक और आर्थिक किन्तु-परंतु| भारत सन 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी से भले ही बचा हो पर आर्थिक विकास उच्चमध्य वर्ग से नीचे नहीं उतर रहा है| सनद रहे, कायदे से भारत का उच्च और उच्च-मध्यवर्ग जनसंख्या का ऊपरी दस प्रतिशत ही है| बढ़ती हुई आर्थिक खाई और बढ़ता हुआ निम्न मध्यवर्ग (और हाल में अचानक पुनः बढ़ा निम्न वर्ग) भारत का सामाजिक और आर्थिक ताना बना समाज के निचले तबके के पाले में झुका रहा है|
साथ ही प्रचार माध्यमों की बढ़ती पहुँच, उपभोक्तावाद, बदलते सरकारी सरोकार इस बढ़ते हुए निम्न मध्यवर्ग को हाशिये पर रख देते हैं| यह माहौल भी बन गया है कि गरीबी, नकारात्मक पहलू, काले पक्ष आदि न दिखाएँ जाएँ| यह भी कहा गया कि सिनेमा मनोरंजन के लिए है, क्रांति के लिए नहीं| सामाजिक माध्यमों में प्रतिदिन होने वाली सूचना क्रांति, जनभावनाओं को पहुँचती ठेसें और बात बात की पुलिस कार्यवाहियाँ भी सिनेमा जैसे महंगे माध्यम के लिए बहुत छोटा मैदान शेष रहने देतीं हैं|

इसी सूचनाक्रांति का शानदार कलात्मक पहलू है – ओटीटी| आप कम खर्च, मनचाहे समय, मनचाहे एकांत और मनचाहे अल्पविरामों के साथ मनचाही फ़िल्म देख पाते हैं| यह माध्यम सीमित संसाधनों वाले निम्नवर्ग तक को बिना हीनभावना फ़िल्म देखने दे पा रहा है| फ़िल्मकारों के लिए सिनेमाघरों के बड़े नाज नखरों के बिना फिल्में जनता तक पहुँचा पाना भी संभव हुआ है| 

साथ ही यह कहना भी सतही होगा कि मात्र इसी वर्ग ने ही यह फ़िल्में देखी हैं| सात रोमांचक वर्षों में जाने अनजाने धरातल के विषय हमारे अचेतन को प्रभावित करते रहे हैं| आधार, मनरेगा, नोटबंदी, अप्रत्यक्ष कर, नागरिकता, कृषि कानून, शिक्षा शुल्क, रोजगार आदि छोटे बड़े घटनाक्रम सभी वर्गों को सपनों से इतर का धरातल देखने समझने की इच्छा प्रदान करते हैं| साहित्य का सत्य सदा ही पत्रकारिता के सत्य से बड़ा, प्रिय और आकर्षक होता है|
यह दोनों फिल्में हमारा सत्य के इसी साहित्यिक पहलू से सामना करातीं हैं| “जय भीम” के लक्ष्य और उद्देश्य स्पष्टतः सामने रहे हैं| यह उसके शीर्षक से स्पष्ट है| फ़िल्म की कथा समुचित गति से आगे बढ़ती है और रुचि पैदा करती है| अगर आजकल की भाषा में कहें तो फ़िल्म किसी भी आंदोलनजीविता में बहे अपने उद्देश्य तक पहुँचती है| किसी भावनात्मक अतिरेक और सामाजिक क्रांति की उद्घोषणा से इतना बची है कि अगर फ़िल्म का नाम “जय भीम’ न रखा होता तो फ़िल्म को किसी वाद से जोड़ना आम जनता के लिए कठिन होता|
कथानक का सामाजिक माध्यमों में हुआ सीमित विरोध और उसके समक्ष सत्य घटनाक्रम का अस्त्र फ़िल्म के पक्ष में खड़े होते हैं| यहाँ तक कि “कभी जातिगत भेदभाव नहीं रहा”, “पुरखों का दण्ड हमें क्यों”, “हम दलित के घर भोजन करते हैं” वाले सभी धड़े चुपचाप इस फ़िल्म के समक्ष आत्मसमर्पित हुए हैं| फ़िल्म बेहतरीन कथानक, सीमित नाटकीयता, सरल अभिनय के साथ अपने उद्देश्य तक पहुँच जाती है| यह न तो समानान्तर सिनेमा का उबाई परिदृश्य खड़ा करती है न व्यवसायिक सिनेमा की अतिनाटकीय नोस्टाल्ज़िया| 

दूसरी ओर ” पुष्पा” मूलतः व्यावसायिक फ़िल्म है जिसका कथानक जमीन और जंगल से जुड़ता है| कथानक गरीबी, रोज़गार संबंधी पलायन, महाजनी, माफ़िया, तस्करी, और भ्रष्टाचार संबंधी विषय मूल भारतीय परिवेश और में दिखती है| इसमें नाटकीयता की भरमार है, परंतु मुद्दा नहीं छूटता| अपराधिक परिवेश में रह रहे नायक के प्रति सहानुभूति आम जनता में अक्सर पाई जाती है| फ़िल्म इस ओर सीधा संकेत भी करती है, जब हम देखते हैं कि यह अपराधी बड़े मगरमच्छों के मुक़ाबले आमजन के साथ खड़ा है| यह फ़िल्म पुनः विशुद्ध व्यवसायिक अपराधियों के सामने जनता का अपराधी खड़ा करती है| यह घटना हिन्दी सिनेमा जगत के सामने वर्षों बाद गंभीर और विश्वनीय रूप से हो रही है| जनता इस बात से चमत्कृत होती है कि किस तरह जननायक की अपनी कमियाँ भी सामने आती हैं| फ़िल्म की छोटी छोटी उपकथाएँ मुझे बहुत आकर्षित करती हैं| फ़िलहाल इसकी दूसरी कड़ी का इंतज़ार रहेगा|

दोनों फ़िल्में आम जनता को अपने निकट मालूम होती है| यही इन फ़िल्मों की मूल सफलता है|
चलते चलते यह भी याद दिला दें कि हाल में बॉलीवुड हिन्दी फ़िल्म “शेरनी” को भी सफलता मिली थी और यह भी जंगल और जमीन से जुड़ी हुई फ़िल्म थी|