प्रदूषित दिल्ली!!


देश की राजधानी दिल्ली को देश की जनता राजनीति के पवित्र धर्मस्थल की तरह सम्मान देती है| उसे दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर का दर्जा दिया जा रहा है| दिल्ली में सारे ऑटो टैक्सी सबको तो गैस पर चलवा रहे है| प्रदूषण फ़ैलाने वाले हर मिल और कारखाने को दिल्ली के बाहर निकलवा दिया गया है| बाहर से आने वाले हर ट्रक, टैक्सी पर टोल लगा दिया गया है|

मगर कहते हैं न, जब दुनिया में सब गन्दा दिखाई देने लगे तो अपने अन्दर झाँक लेना चाहिए| दिल्ली का भी यही हाल है| दिल्ली से दुनिया गन्दी, पिछड़ी, गरीब, नजर आती हैं| अगर दिल्ली अपने अन्दर झांके तो दिल्ली की हवा इतनी गन्दी कि साँस न ले पायें, दिल्ली इतनी पिछड़ी कि खुद को साफ़ न कर पाए और इतनी गरीब की साफ़ हवा भी न खरीद पाए|

दिल्ली में आदमी के पास घर हो या न हो गाड़ी होनी चाहिए| एक गाड़ी भले ही वो रोज मेट्रो पर पार्क हो जाए मगर दिखावे का गुरूर हो पूरा हो| दिल्ली के लोग टहलने भी गाड़ी से जाते है| हर घर में दो चार गाड़ियाँ मिल जाएँगी| अगर शादी ब्याह दावत या कोई भी सामाजिक काम हो तो घर का हर सदस्य जाये या न जाये गाड़ी जरूर भेजी जाती है|

अगर दिल्ली के प्रदूषण की बात की जाये तो अगर फालतू कारें हटा ली जाएँ तो ट्रैफिक भी कम हो और प्रदूषण भी| सबसे पहली बात दिल्ली में हर जगह पार्किंग का दाम बेहद कम हैं या अवैध पार्किंग के ऊपर कोई कार्यवाही नहीं होती| दिल्ली के हर कॉलोनी में सड़कें शाम ढलते ही पार्किंग में तब्दील हो जातीं हैं| इस जबरन और अवैध पार्किंग व्यस्था पर उसी प्रकार नाक मूंह सकोड़ने की जरूरत है जिस प्रकार अवैध बस्तियों और झुग्गी – बस्तियों के बारे में किया जाता है|

जब तक कोई खरीददार अपने घर में में निजी क्षेत्र में पार्किंग की व्यस्था न दिखा दे तब तक उसे कर खरीदने की अनुमति नहीं होनी चाहिए और हर कार के लिए अलग अलग पार्किंग की व्यवस्था न होने पर भी कार लेने की अनुमति नहीं होनी चाहिए| कंपनी आदि के नाम पर खरीदीं गयीं कारों के लिए भी सामान व्यवस्था होनी चाहिए| पार्किंग क्षेत्र का वेरिफिकेशन करने के लिए उसी प्रकार से कंपनी सेक्रेटरी या अन्य प्रोफेशनल्स को जिम्मेदारी दी जा सकती है जिस प्रकार से कंपनी के रजिस्टर्ड ऑफिस के वेरिफिकेशन के लिए दी गयी है| सड़क पर पार्क की जाने वाली गैर व्यवसायिक गाड़ियों से बाजार दर पर कम से कम महीने भर का किराया वसूला जाना चाहिए|

व्यावसायिक वाहनों और पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्हीकल को कुछ छूट दे जा सकती है क्योकि वो न सिर्फ देश के सकल उत्पाद में योगदान देते है बल्कि यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाते हैं|

पुनःश्च –भारत में अधिकतर कार या तो दहेज़ में आती है या कर्जे में| अतः निजी कारों को हेयदृष्टि से देखे जाने की महती आवश्यकता है|

सहजीवन आनंद


वास्तविक दुनिया में लोग मोबाइल एप्लीकेशन के जरिये संकेत भाषा में बात नहीं करते; उनकी एक विकसित भाषा होती है| वास्तविक लोग हँसते, गाते, मुस्कराते, रोते और लड़ते – झगड़ते हैं| मगर यह बातें आज हमें अपने को याद दिलानी पड़तीं हैं|

राष्ट्रीय राजधानी से कुछ दूर एक सुप्त सा गांव है, जिसका कुछ भी नाम रख लीजिये – किसानपुर!! कहने के लिए तो मात्र दो सौ किलोमीटर दूर है, मगर पहुँचने के लिए आज भी दिल्ली से दो बस और एक तांगा या ऑटो पकड़कर जा सकते हैं| विकास के नाम पर एक मोबाइल टावर हैं, गाँव के हर घर में बिजली के लट्टू हैं, हर हाथ में स्मार्ट फ़ोन हैं और उन्हें चलाने के लिए हर घर में जनरेटर का कनेक्शन है जो मौसम के हिसाब से दिन में दो बार बिजली देता है| सरकारी बिजली भी कभी कभी आ जाती है, जिसका बिल खेती में नाम और उसका न आना सब्सिडी के नाम पर माफ़ है|

निकट के कस्बे से फट फट फट फट की आवाज करते ऑटों में लड़कर पहुंचे थे वहां| मगर मुख्य सड़क से गाँव अभी भी एक किलोमीटर दूर था| साथ में गए बच्चों को गड्ढों के बीच कहीं कहीं किसी ऐतिहासिक सड़क के अवशेष प्राप्त हो रहे थे| सड़क के किनारे तरह तरह के पेड़ और उनके पीछे लहराते खेत मानों लोदी गार्डन का अव्यवस्थित रूप हो| बच्चे किताबों और टेलीविजन से ली गई जानकारी का उत्साह पूर्वक प्रयोग कर रहे थे| कुछ देर पहले तक की परेशानी अब उनके लिए बीती बात थी|

गाँव में पहुँचते ही जब मेजबान का पता पूछा गया, तो बच्चों के लिए हैरत की बात थी| स्मार्ट फोन के मैप पर रास्ता देखने के जगह अब हम बताये गए पहचान चिन्हों के सहारे अपने मेजबान के घर तक पहुँच गए| बच्चे उस बात को खेल की तरह ले रहे थे जो आज भी एक सामान्य बात है|

शाम को घुमने निकले तो बाग़ में कई तरह के फल के पेड़ और खेतों में अलग अलग तरकारी के पौधे और बेलें थीं| ताजा सब्जी का अपना आनंद था| मेजबान के घर के बाहरी हिस्से में मिर्च, टमाटर, हरा धनिया, और कुछ एक और सब्जियों का तरोताजा इंतजाम है| बच्चों के लिए ताजा सलाद और सब्जियां तोडना, काटना और पकाना आज खेल थे| प्रकृति आपके पास थी और उसका आनंद ले सकते थे| दिन में जब भी चाय बनानी हो तो बकरी ताजा दूध दे देती थी| फ्रिज का प्रयोग नगण्य था|

रात को ढेर सारे तारे आसमान में दिखाई दे रहे थे| और शीतल हवा में बच्चे अपनी मर्जी के खेल खेल रहे थे| दिल्ली में जितना बड़ा कालोनी का पार्क था उस से कहीं लम्बी चौड़ी छत यहाँ उनका मैदान थी| समय का कोई बंधन नहीं था|

जिन बच्चों को मैं सुविधाओं की कमी के बारे में बता कर और कोई शिकायत न करने के लिए मना कर ले कर गया था वो पूरी तरह मस्त थे|

शिकायतें कम थी, आनंद बहुत| परिवार और पास पड़ोस के बच्चे कई दिन तक प्रसन्न रहे| मैं सोचता रहा, शहरी विकास का मतलब क्या प्रकृति से दूर चले जाना है?

आनंद को खोजते हुए मानव में विज्ञान और विकास के नए पायदान छू लिए हैं| मगर आज भी जरूरतें वह ही हैं जो आदम काल में थीं – भोजन, सहजीवन, और आश्रय| तकनीकि आपको भटकाती है और प्रकृति आपको वो सब देती है जो हजारों सालों से हम सब की जरूरत है|

प्रेम में गाय


भारतीय सामाजिक संचार माध्यमों गाय एक चर्चित मुद्दा है| लोग जान देने और लेने की धमकी दे रहे है| कुछेक हत्याएं और दंगे हो चुकीं हैं| मगर ज्यादातर भारतियों ने बहुत मुश्किल से ही किसी गाय को सींग मारते हुए नहीं देखा होगा| उन्होंने भी नहीं, जिन्होंने खुद गाय पाली है| गाय लात भी यदा कदा ही मारती है|

भारतीय मानस में ही नहीं वास्तविकता में भी गाय एक जैसा जानवर हैं जो सीधी है और जिस खूंटे से बाँधी जाये वहीँ बंधी  रहती है| अगर दुधारू गाय को दिन भर के लिए घर से निकाल दिया जाये तो भी वो शाम को खुद दूध काढने के समय पर गौशाला पहुँच जाती है|

कम दूध देने वाली गाय को दूध के लिए प्रतिबंधित दवा के इंजेक्शन लगाये जाते है, पिटाई की जाती है, पैर बांध दिए जाते है; मगर विरोध का कोई शब्द नहीं आता|

गाय मानव से प्रेम करती है| मगर उसकी स्थिति उस माँ की तरह है, जिसके पैर छू कर सब स्वर्ग जाना चाहते हैं मगर सेवा कुछेक है करते हैं; और बुढ़ापे में वो कुछेक भी साथ छोड़ने लगते हैं| मगर गाय का मानव प्रेम कम नहीं होता| आप शायद ही कभी देखेंगे कि कभी चिढ़चिढ़ी होकर गाय ने किसी को मारा हो| क्षमा उसके जीवन का मर्म है|

दुर्भाग्य से प्रेममय होकर भी भगवान और गाय, घृणा और हिंसा का सबसे बड़ा कारण बन गए हैं| आयें प्रेम फैलाएं|

जिस प्रकार पीटे जाने पर भी गाय प्रेम कम नहीं करती है, हम सब भी अनुशरण करें|

Villager and calf share milk from cow in Rajasthan, India

For Indian social media, cow is a cause of big debate. Peoples threat each other to kill and be killed. Few murdered and riots already reported in media. This is happening when most Indians have rarely seen a cow attacking anyone.

Not only in Indian Psyche but in reality, Indian cow is a very generous  and never protest on restrictions.

Cow usually faces assault for milk. Many cow given injection which is prohibited medically and legally.

Cow loves humans. It is like a mother, who is respected in expectation of heaven but very few pay any service.

Unfortunately, loving god and cow are becoming biggest reason for hate and violence. Spread love.

A cow still loves humans even after they assault her, we have to follow the love.