कतीर (गोंद कतीर)


गर्मियों के प्रमुख देशी खाद्यों में से एक है कतीर या गोंद कतीर| इसके नाम में गोंद शब्द आने से हिंदी कम समझने वाले हिन्दीभाषी भी इसे चिपचिपी चीज समझ लेते हैं| ऐसा नहीं है| दरअसल गोंद शब्द किसी भी रेसिन (resin) के लिए प्रयोग होता है न कि किसी चिपकने वाले पदार्थ के लिए| यह पश्चिम भारत में पाए जाने वाले पेड़ कतीर (Moronobea coccinea) से प्राप्त होता है|

गाँव देहात और छोटे शहरों के पुराने घरों में इसका प्रयोग आज भी आम है| हमारे घर में यह हर गर्मी में होता रहा है| यह हलके पीले धूसर रंग के दानों/ टुकड़ों में बाजार में मिलता है| हमारे अलीगढ़ में यह सभी पुराने पंसारियों के यहाँ मिल जाता है| बल्कि कई बार तो पंसारी पुराने ग्राहकों को खुद ही बाँध देते थे| पता था कि सही चीज दी है तो पैसे तो आ ही जायेंगे| आजकल अपने अंग्रेजी नाम से यह ऑनलाइन शोपिंग में मिल जाता है|

एक चम्मच कतीर (एक मोटा दाना/टुकड़ा) को एक ग्लास पानी में डालने के बाद रात भर रख दिया जाता| अगले दिन सुबह तक यह फूल कर दानेदार जैली में बदल जाता| ज्यादा पानी में डालने पर यह लगभग घुल जाता है और केवल पीने के काम आ पाता है| इसलिए पानी तो ठीक रखा जाना चाहिए| इसकी दानेदार जैली में शरबत, मीठा, रबड़ी, आइसक्रीम, कुल्फ़ी, ठन्डे दूध, पतली ठंडी खीर आदि डालकर खा लिया जाता| घरों में हम बच्चे इसे बेहतर स्वाद और रंग पाने के लिए तरह तरह के शर्बतों के डाल कर रख देते थे| आजकल इसे बच्चों को जैली कहकर दे सकते हैं|

मैंने इसमें अधिकतर चीनी और शरबत के साथ ही मिलाया है| परन्तु वैद्य इसे मिश्री के साथ प्रयोग करने की सलाह देते हैं| इसे आइसक्रीम और रबड़ी के साथ भी खाया जा सकता है| यह प्रोटीन और फोलिक एसिड का प्रमुख स्रोत है|

इसकी तासीर ठंडी मानी जाती है| यह आपको गर्मी के प्रकोप से बचाता है| थकान, कमजोरी, गर्मी की वजह से चक्कर आना, उल्टी और माइग्रेन में कतीर काफी फायदेमंद होता है| ठन्डे मौसम में वैद्य इसके प्रयोग को उचित नहीं मानते| इसे मैंने ध्यान योग के दौरान होने वाली गर्मी और खुश्की के लिए भी प्रयोग करते हैं|

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गोंद कतीर

फ़ोटो क्रेडिट – किरण साव्हने

 

 

मैं और मिच्छामि दुक्कडम्


सभी के जीवन में कष्ट, कठिनाई, दुःख, क्रोध, घृणा, अवसाद आते हैं| उनके आवृत्ति और अन्तराल भिन्न हो सकते हैं| मेरे और आपके जीवन में भी आये हैं| सबको अपने दुःख प्यारे होते हैं| मैं और आप – हम सब उनके साथ जीते हैं| मैं क्या जानूं, दुःख क्यों आये| जब सोचता हूँ, तो हर दुःख के पीछे कोई न कोई मिल जाता है – पड़ौसी, मित्र-शत्रु, नाते-रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी, देश-विदेश, नेता-अभिनेता, अपराधी-आतंकवादी| कई बार किसी संत-महात्मा, धर्म-गुरु या प्रेरक वक्ता को पढ़ता-सुनता हूँ, लगता हैं – दुःख का कारण तो मैं ही हूँ| ध्यान के प्रारंभ में लगता हैं – मैं स्वयं दुःख हूँ| मैं दुःखी नहीं हूँ – स्वयं दुःख हूँ| मैं दुःख हूँ – अपने पर भी क्रोध आता हैं|

उन दुःखों को कितना याद करूं, जो भुलाये नहीं जाते| मैं दुःख नहीं भूलता| दुःख हमारी वास्तविकता होते हैं – भोगा हुआ यथार्थ|

प्रकृति और परिस्तिथि तो कठिन बनीं हीं रहतीं हैं| जीवन में कोई न कोई हमें कष्ट देता रहता है| कुछ मित्र-नातेदार तो बड़े ही प्रेम से कष्ट दे देते हैं| घृणा आती हैं उनसे और उनकी कष्टकारी प्रकृति से| ईश्वर भी कष्ट देता है| ईश्वर के पास तो कष्ट देने के अनोखे कारण है – भक्ति करवाना और परीक्षा लेना| मैं ईश्वर पर भी क्रोधित होता रहा हूँ| मैं किसी को अब मुझे दुःख देने का मौका नहीं देता| मैं अब क्रोध नहीं करता| पड़ौसी, मित्र-शत्रु, नाते-रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी, और ईश्वर को मेरे क्रोध से कोई फर्क नहीं पड़ता| तनाव और अवसाद तो मुझे होता है, मुझे हुआ था|

एक सज्जन मिले थे, उन्हें नहीं जानता| उन्होंने कहा था, क्रोध दान कर दे| मैंने कहा, क्रोध वस्तु है क्या? उन्होंने कहा, हाँ| किसे दूं दान? उन्होंने पास पड़े पत्थर की ओर इशारा किया| वो पत्थर अब कभी कभी तीव्र क्रोध करता होगा|

मगर फिर भी, अवसाद भी हुआ| अवसाद, समाज इसे पागलपन की तरह देखता है| मगर मुझे पता था, क्या करना है| मेडिकल कॉलेज में प्रोफ़ेसर ने कहा, यहाँ आये तो तो पागल कैसे हो सकते हो? दवा दे सकता हूँ| मगर दवा नहीं दूंगा, इलाज करूँगा| छोटी मोटी मगर गंभीर बातें हैं, यहाँ नहीं बताऊंगा| लोग गंभीर चीजों को घरेलू नुस्खा बना लेते हैं| बहरहाल मुझे लाभ हुआ|

अब मैं क्रोध नहीं करता| क्रोध दान कर दिया तो उसे कैसे प्रयोग करूं| कभी कभी खीज आती है और क्षोभ भी होता है| दो एक साल में क्रोध आता है, तो मैं उसे पल दो पल में वापिस कर देता हूँ| कई बार गलत लोगों को, गलत बात तो तीव्रता और गंभीरता से गलत कहता हूँ, तो क्रोध पास आ जाता हैं| मैं क्रोध का निरादर नहीं करता, क्षमा मांग लेता हूँ – मिच्छामि दुक्कडम्|

खामेमी सव्व जीवे, (khāmemi savva jīve)
सव्वे जीवा खमंतु मे, (savve jīvā khamaṃtu me)
मित्ती मे सव्व भुएसु, (mittī me savva-bhūesu)
वेंर मज्झं न केणई, (veraṃ majjha na keṇa:i)

मिच्छामी दुक्कडम (micchāmi dukkaḍaṃ)

सब जीवों को मै क्षमा करता हूं, सब जीव मुझे क्षमा करे सब जीवो से मेरा मैत्री भाव रहे, किसी से वैर-भाव नही रहे| मैं जीवों से ही नहीं निर्जीव, मृत, साकार, निराकार, सापेक्ष, निरपेक्ष, भावना और विकार सबसे क्षमा मांगता हूँ|

मैं दिन नहीं देखता, जब मन आता है, स्वयं से क्षमा मांग लेता हूँ, क्षमा कर देता हूँ, | अपने कष्ट, कठिनाई, दुःख, क्रोध, घृणा, अवसाद के लिए मैं स्वयं को क्षमा कर देता हूँ| अगर मैं इन्हें ग्रहण नहीं करता तो यह मुझ तक नहीं आते|

मैं पड़ौसी, मित्र-शत्रु, नाते-रिश्तेदार, सगे-सम्बन्धी, और ईश्वर को, दिन नहीं देखता, क्षमा कर देता हूँ सबसे मन ही मन क्षमा मांग लेता हूँ| जैन नहीं हूँ, धार्मिक, आस्तिक, आसक्त और शायद निरासक्त भी नहीं हूँ| मगर संवत्सरी अवश्य मना लेता हूँ| भाद्प्रद माह की शुक्ल पक्ष चतुर्थी से प्रारंभ पर्युषण पर्व का अंतिम दिन – संवत्सरी| दसलाक्षाना का अंतिम दिन संवत्सरी| यह ही है क्षमावाणी का दिन| क्षमावाणी का यह दिन भारतीयता का जीवंत प्रमाण है|

पर्युषण पर्व के दौरान शाकाहार और जबरन शाकाहार का आजकल अधिक जोर हैं| मैं जीव-हत्या करने वाले मांसाहारी और कड़की खीरा कच्चा चबा जाने वाले शाकाहारी सबसे क्षमा मांग लेता हूँ|

मुझे संवत्सरी/क्षमावाणी आकर्षित करता है| भारतीय जैन ग्रंथों में, दिवाली और महावीर जयंती से अधिक महत्वपूर्ण जैन त्यौहार| अधिकतर भारतियों की तरह मुझे भी खान-पान से ही त्यौहार समझ आते हैं| परन्तु, मुझे यह त्यौहार भोजन से नहीं वचन से शक्ति देता है| मुझे दुःख, क्रोध, घृणा, तनाव और अवसाद से मुक्ति देता है|

अक्रोध और क्षमा ही तो भारतीय संस्कृति का मूल है| जुगाड़ और चलता है जैसी भारतीय भावनाओं के पीछे भी कहीं न कहीं यह ही है| ऐसा नहीं, हम भारतीय गलत को गलत नहीं मानते समझते और कहते| मगर अक्रोध और क्षमा को अधिकतर अपने साथ रखते हैं| अक्रोध और क्षमा हमारी जड़ों में इतना गहरा है कि हम इसे कई बार स्वप्रद्दत (for granted) मान लेते हैं| गुण दोष होते रहते हैं| फिर भी, समग्र रूप में, मैं आज जितना भी सफल हूँ, उसमें अक्रोध और क्षमा का बड़ा योगदान है|

ऐसा नहीं है कि अक्रोध और क्षमा पर केवल भारतियों का अधिकार हैं| बहुत से अन्य लोग भारतियों सोच से अधिक भारतीय हो सकते हैं| हो सकता है, मानवता हमारी सोच से परे जाकर भारतीयता को अपना ले| भारतीय आदर-सत्कार, भोजन, योग, मनोरंजन, बोलीवुड, अक्रोध और क्षमा विश्व अपना रहा है|

मिच्छामी दुक्कडम|

पाठशाला पढाई के लिए नहीं है


“शिक्षे, तुम्हारा नाश हो, तुम नौकरी के हित बनी|”

अगर होते, मैथली शरण गुप्त अवश्य सोचते| क्या उन्होंने उनका श्राप सत्य हुआ? आज भारत के शिक्षित लोग रोजगारपरक नहीं माने जा रहे – अनियोज्य हैं, अप्रयोज्य हैं|

किन्हीं माता-पिता से पूछिए| पाठशाला का चयन कैसे करते हैं – निकटता, बेहतरीन भवन, वातानुकूलन, गैर-पाठ्य-गतिविधि, सुरक्षा, नगर-भ्रमण, परीक्षा-परिणाम, आवागमन, यातायात, सब कुछ गिना देंगे| शिक्षा और शिक्षक के अलावा|

हालत है कि निजी क्षेत्र के विद्यालयों में कम वेतन वाले निरुत्साही शिक्षक भरे पढ़े हैं और योग्य छात्र-छात्राएं भरे पड़े हैं| सरकारी विद्यालय अयोग्य छात्र-छात्राओं, निरुत्साही माता-पिता, और लोभी शिक्षकों की भेंट चढ़े हुए हैं| मैं बहुत से सरकारी शिक्षकों को जानता हूँ, जो पढ़ाने जाते हैं मगर जानते हैं उनके पढ़ाने-न-पढ़ाने से छात्र के माता-पिता को फर्क नहीं पढ़ता| उनका पैसा गैर-पाठशाला शिक्षक के पास जाने को व्याकुल है| यह अलग बात कि दोष सरकारी शिक्षक को जाता है|

इसके ऊपर से सरकार है, निरी-निकम्मी| अगर बच्चों को मतदान का अधिकार होता तो आदतन अनुपस्तिथ रहने वाले छात्रों के दबाब में ये शिक्षा को राष्ट्रद्रोही कृत्य घोषित कर देते|

अब तो पाठशाला पढाई के लिए नहीं है| पाठशाला में, मध्याह्न भोजन के अलावा सब कुछ पढाई से बच्चों को दूर रखने का पवित्र प्रयास है|

हर दिन हल्ला रहता है, बच्चों को पर्यावरण सिखाओ, देशप्रेम सिखाओ, भाईचारा सिखाओ, ईश-भक्ति सिखाओ, धर्म-कर्म, माता-पिता का सम्मान सिखाओ, संस्कार दो, ये सिखाओ वो सिखाओ| कुल मिलकर पढाई के अलावा सब कुछ सिखाओ| कुल मिलाकर बच्चों को संस्कार- संस्कृति देने सिखाने का काम परिवार से निकल कर पाठशाला के गले पड़ गया है| परिवार, मात-पित क्या करें – वेतन की गुलामी और टेलिविज़न का आराम?

अभी समाचार है, आंध्रप्रदेश में पाठशाला में “अम्माकू वन्दनं” होगा| भाई, बच्चों को पढ़ा-लिखा लो| उनमें अच्छा पढ़ने –लिखने की रूचि जगा लो| बाकि काम घर में होने दो| अगर कोई शंका है तो उनके माँ-बाप को साल में दो हफ्ते पढ़ा लो| इस प्रकार की संस्कृति – संस्कार बच्चे देखकर सीखते हैं, सीख भी लेंगे|