चुनाव २०१८

उत्सवधर्मी भारतीय हर अवसर पर उत्सव का आनंद उठा ही लेते हैं| भारतीय त्योहारों में अलग अलग तरह के खेलों का आयोजन होता है| कभी पतंग के पेंच लड़ते हैं तो कभी तीतर बटेर और मुर्गे| चुनाव भी भारतीय लोकतंत्र का ऐसा ही त्यौहार है| इसके खेल में नेता लड़ाए जाते हैं| मजा ये कि लड़ने वाले खुद आगे आते हैं|

चुनाव के खेल में चौसर की बिसात है, क्रिकेट का पिच है, टेनिस का नेट है, हॉकी की छड़ी है, फ़ुटबाल का लक्ष्य है, शतरंज के वजीर हैं, साँप सीढ़ी के साँप हैं, कबड्डी का साँसे है, मुक्केबाजी का मुक्का है और कुश्ती की पटकनी है| किसी भी पल ठोंक पीट कर बाहर कर दिया जाना है| जो टिका उसके गले सोने का तमगा और सिर काँटों का ताज है| हर किसी की उँगलियाँ शुध्द देशी घी और सिर सरसों के खौलते तेल में है| हर किसी खेल में गणित का विज्ञान और जन संपर्क की कला है|

235x96_featured-indivine-post

हाल में चुनाव को आंकड़ों का गणित और गणित का खेल बताने के प्रयास चलते रहे हैं| प्रशांत किशोर में आंकड़ों के बूते जनता को अपने आंकड़े में जकड़ने का जंजाल बुना था| यह जाल जंजाल अगले चार साल में ही खुद प्रशांत किशोर के गले में पड़ता हुआ, मोदी शाह के गले से उतर छुआ लगता है| जिस गणित के दम पर शाह शहंशाह ज्ञात होते थे उसका शाह-मात उनके सामने है| पन्ना प्रमुखों के पञ्च-प्रमुख कुछ बोल नहीं पा रहे| ऐसा पहली बार नहीं हुआ है| चुनावों में सितारों का टूटना चलता रहा है| टूटे सितारों के नाम इतिहास में अंकित होते रहे हैं|

पहले दूसरी जाति या धर्म देश के दुश्मन नहीं मान लिए जाते थे, आज ऐसा हो रहा है| तकनीकि सामाजिक माध्यमों को असामाजिक स्तर पर गिराने के साथ राजनीति ने अपने आप को एक अंधकूप में धकेल दिया है| हाल फिलहाल राजनीति ने सामाजिक संबधों को धर्म और जाति की तरह ही विभाजनकारी रूप में विच्छेदित किया है| इस देश में सांड छुट्टे घूम रहे हैं और बैल बाप हो चुके है| यह देश गाय और सूअर का देश बनकर रह गया है|

मगर क्या स्थिति इतनी निराशाजनक है| नहीं, बिक्लुल नहीं| कम से कम पांच राज्यों के हालिया चुनाव आश्वस्त करते हैं| हिंदुत्व का नारा कमजोर हुआ कि न पुराने सिपहसालारों का राम मंदिर जनचर्चा में आया न नए सिपाही का मंदिर मंदिर भटकना| अंध विकास का मजबूत नारा छत्तीसगढ़ में खेत रहा तो अन्य जगह विकास के नारे का खोखलापन खुलकर सामने आया| मध्यप्रदेश में जनता ने चहुमुखी विकास का प्रश्न सामने रखा है जहाँ विकास के बाद भी जनता को अधूरी योजना कार्य और नेताओं के अहंकार का सामना करना पड़ा| यह परिघटना यह बताने के लिए पर्याप्त है कि जनता में सोचने समझने का काम हो रहा है| सामाजिक संचार माध्यम अपने हो हल्ले के बाद भी आम जनता को अपनी समस्याओं और उनके समाधानों के प्रति सोचने से विरत नहीं कर पा रहे|

सामाजिक संचार माध्यम अपनी प्रासंगिकता के बारे में सोचें, यह समय की आवश्यकता है|

कृपया, अपने बहुमूल्य विचार यहाँ अवश्य लिखें...

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.