अहोई कथा – दिवाली व्यथा

दिवाली का त्यौहार कहने को पांच दिन चलता है, मगर इसकी धूमधाम तैयारी पितृपक्ष के साथ ही प्रारंभ हो जाती है| पितृपक्ष के शांत दिनों में बनाई गई योजनाओं की फुलझड़ियाँ नवरात्र आते आते अपने फूल बिखेरने लगतीं हैं| सबसे पहला काम होता है – साफ़ सफाई, रंगाई – पुताई, नया सामान आदि| हर कोई अपनी सामाजिक स्तिथि के अनुसार अपनी आर्थिक मर्यादा को लांघना चाहता है|

दिवाली पर सबसे अधिक भागदौड़ मेरे जैसे लोगों के लिए रहती है| हम अपनी जड़ों से कट नहीं पाए है, इसलिए हर साल अपने घर पहुँचते हैं, दिवाली मनाने| मैं होली – दिवाली तो घर पहुँचता ही हूँ, हफ्ता – दस-दिन पहले भी घर जाना होता है| दो दिन पूरी लगन से घर साफ़| कभी दीमक का प्रकोप होता तो कभी चूहों का| इस बार मेरे सफाई अभियान के दिन इत्तिफ़ाकन अहोई अष्टमी पड़ी| सोचा न था, कि यह संयोग मुझे तो रात सोने नहीं देगा|

अलीगढ़, घर का भंडारघर, अन्दर कौने की दीवार और उसके आगे कई संदूक, चूहों को बदबू, ताजी हवा कई दूर ठहर गई थी| सामने की दीवार पर टिमटिमाता बल्ब संदूक और दीवार के बीच पर्याप्त रोशनी देने में असमर्थ था| संदूक और दीवार के बीच चूहों का घौंसला| कागज के टुकड़े, कपड़े की कतरनें| बदबू यहीं से आ रही थी शायद| मैंने डस्टकार्ड के सहारे उस सब को फैंकने का निर्णय लिया| कूड़े के ढेर पर देखा, चूहे के छोटे छोटे बच्चे बिखरे पड़े थे| अचानक उदास सी ठंडक मेरे चारो ओर फ़ैल गई| छोटे छोटे बच्चे| दोपहर की गर्म धूप उनके लिए तेज थी, रौशनी असह्य| मुझे दो एक बच्चे मरे हुए मालूम होते थे तो अन्य अब मेरे कारण मरने वाले थे| अवांछित हत्याओं का कारण था मैं|

अहोई की कथा, मेरे कानों में पड़ रही थी| मैं जानता था, यह भ्रम है| एक सेही का बच्चा गलती से मर जाता है| प्रकृति गलती की सजा देती है| मानव को क्षमा माँगनी होती है| अहोई – अनहोनी शब्द का रूप है| अनहोनी एक माता के रूप में, देवी रूप में पूजी जाती है| मैं रात भर जगा हुआ हूँ| पूजा – पाठ न करने के बाद भी उनके पीछे के सही गलत विचार समझना मेरी प्रकृति है| आज प्रकृति ने विचार दिया है|

दिवाली के सफाई के हम जीवों की हत्या तो नहीं कर देते| क्या हम खुद जैव संतुलन को नहीं बिगाड़ रहे| हम कीड़े – मकौड़े ख़त्म करना चाहते है| डरते हैं, वो बहुत न हो जाएँ| प्रकृति संतुलन बनाना जानती है| करोड़ों साल राज करने वाले डायनासोर एक झटके में हवा हो गए| कुछ लाख साल का मानव, पृथ्वी का मालिक| प्रकृति का हास्य मुझे सुनाई देता है| मैं दिन भर में मारे गए मकौड़े गिन रहा हूँ| मच्छरों की गिनती ही नहीं| दिवाली से पहले अहोई का पर्व क्यों आता है? सेही, जिसे शायद कोई मानव प्रेम नहीं करता, कोई नहीं पालना चाहता| प्रकृति के प्रतिनिधि के रूप में सेही सामने है|

अहोई कथा शायद यही कहती है| हमसे कोई अनहोनी न हो, हमारे साथ कोई अनहोनी न हो|

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