तीसरी जात

भारत में आप जातिवादी (या कहें, भेद्भावी) न होकर भी जाति के होने से इंकार नहीं कर सकते| जाति व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था से जन्म आधारित में परिवर्तित हुआ माना जाता है, और आज यह भेदभाव के आधार के अलावा आदतों, परम्पराओं, भोजन, रिहायश और वंशानुगत बीमारियों का प्रतीक है| इनमें जाति विशेषों से सम्बंधित कई बातें दुर्भावना से भी प्रेरित मानी जाती हैं|

परन्तु, किसी भी व्यवस्था के प्रारंभ होने के समय उसके कुछ न कुछ कारण रहे होते हैं, भले ही बाद में वह सही साबित हो या गलत| मेरे मन में एक प्रश्न हमेशा रहा कि कर्म आधारित जाति व्यवस्था में जातियों के श्रेणीक्रम का क्या मापदंड था और क्यों था|

किसी भी सामाजिक व्यवस्था में ज्ञान को सुरक्षा और अर्थ से पहले रखा गया है| ब्राहमण यानि ज्ञान का पहले स्थान पर रखने पर कोई प्रश्न नहीं हैं| आज हम सुरक्षा को हमेशा धन के बाद रखते हैं और मानते हैं की धन ही धर्म और सुरक्षा का संवाहक है| मानवता और देश का विकास धन और धनपतियों की धरोहर मन जाता है| मजे की बात यह है कि अधिकांश भारत में ब्राहमण और वैश्य खान – पान की शाकाहारी आदतों की बहुलता के चलते स्वाभाविक रूप से निकट जाति समूह लगते हैं| साथ ही दानजीवी ब्राह्मणों के लिए भी यह सरल था कि वो राजाओं का मूँह देखने की जगह धन स्रोत वैश्यों को सम्मान देकर जातिक्रम में दूसरे स्थान पर आसन्न करते|

आज जब पूँजीवाद का समय है और पूंजीपति के आते ही धर्म के तमाम देवता, पंडित, फ़कीर, सन्यासी आदि विशिष्ट क्रम (VIP Line) में लग कर उन्हें दर्शन देते हैं| सत्ता ज्ञानवान के स्थान पर धनवान से पूछकर नीति – निर्धारण करती हैं| कहा जाता है कि विश्व का एक बड़ा देश अपने हथियार निर्माता धनपतियों को ख़ुश करने के लिए अपनी सेना को नरक में भी भेजने के लिए तैयार रहता है| ऐसे समय में मुझे लगता है कि जातिक्रम निर्धारित करते समय वैश्यों को अगर पहले नहीं तो दुसरे स्थान पर अवश्य होना चाहिए था|

परन्तु ऐसा नहीं हुआ| क्यों?

पिछले सप्ताह जब भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की संभावित विदाई और इस सप्ताह उनके पद पर न रहने के निर्णय के सन्दर्भ में क्रोनी – कैपिटलिज्म के सहारे भारतीय जाति व्यवस्था में वैश्यों यानि पूँजी को तीसरे सामाजिक पायदान पर रखने का निहित कारण समझ आया|

पूँजीपति पूँजीवाद के छद्म रूप बाजार और अर्थव्यवस्था के नाम पर अपने लोभ – लालच की व्यवस्था चलता हैं| इस लोभवाद में पूँजीवाद कहीं नहीं रहता केवल पूंजीपति रहता है जो अपने लोभ के लिए पूंजीवादी सिद्धांतों का दुरूपयोग करता है| उसके लोभ के लाभ पर आश्रित लोग उसके लिए विकास और खुशहाली के गीत लिखते है और कुतर्क रचते हैं| जिस प्रकार मदमस्त हाथी अपने सामने आने वाली हर अच्छी बुरी चीज को कुचल देता है, उसी प्रकार यह लोभवाद धर्म, कर्म, सुरक्षा आदि को अपने कुहित में कुचलता चलता है| रघुराम राजन इसके पहले शिकार नहीं हैं| इस्रायल में बैंक ऑफ़ इस्रायल के गवर्नर प्रोफ़ेसर स्टैनले फिशर लगभग सात साल पहले इसके और कहीं अधिक सीधे शिकार बने थे|[i]

हमारे प्राचीन विद्वानों को उस समय में लगा होगा कि पूँजी, पूंजीपति और पूँजीवाद का साथ आसानी से लोभवाद को जन्म देता है| अगर अगर पूँजीसत्ता को धर्मसत्ता और राजसत्ता से पहले या किसी एक के साथ दे दिया जाता जाता तो यह लोभवाद भारत को बहुत पहले विकास के नाम पर बर्बाद कर चुका होता|

 

[i] https://promarket.org/raghuram-rajan-stanley-fischer/

Advertisements

कृपया, अपने बहुमूल्य विचार यहाँ अवश्य लिखें...

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s