विचारों की भीड़–ताल और न्याय का समूह-साधन

बीतते हुए वर्ष के बारे में बात करते हुए हम उन घटनाओं का जिक्र करते हैं, जो हमारे मन में कहीं  न कहीं रीत जातीं हैं; एक कसक सी छोड़ जातीं हैं|

बीतता हुआ वर्ष अपने सन्दर्भों और प्रसंगों के साथ समय के एक वर्ष से अक्सर बड़ा होता है| इन अर्थों में इस वर्ष की शुरुआत कई महीनों पहले हुई थी| इस वर्ष में हमें एक शब्द बहुत सुना, क्राउड – सोर्सिंग (crowd – sourcing); जिसका अर्थ मैं समूह–साधन चाहूँगा|

इस वर्ष बहुत बातें समूह–साधन के माध्यम से इस वर्ष में विकसित हुईं; सामाजिक माध्यम (social media), समाचार, सरकार, शासन, लोकतंत्र, विचार, विमर्श, वेदना, वित्त, विधि और न्याय|

समूह–साधन का सर्वाधिक स्वीकृत प्रयोग वित्त यानि पैसे की व्यवस्था करने के लिए हो रहा है| साधारण रूप से इसके लिए हम सामाजिक माध्यम का प्रयोग कर कर परचित – अर्ध्परिचित – अपरचित लोगों से धन की मदद मांगते हैं| यह धन किसी अच्छे कार्य या विचार आदि के लिए हो सकता है| कुछ वेबसाइटों पर इसके लिए समुचित जानकारी, वयवस्था और विचार उपलब्ध हैं| मगर इस वर्ष वित्त से कहीं अधिक समूह–साधन का प्रयोग विचार के लिए हो रहा है|

विचार के सन्दर्भ में समूह–साधन हमेशा से समाज का हिस्सा रहा है| चौपालें, पान की दुकानें, दावतें, चंदा, और सत्संग समूह–साधन का सीमित मगर स्वीकृत माध्यम रहे हैं| मगर इस वर्ष में समूह–साधन को व्यापक तकनीकि विस्तार मिला| सूचना प्रद्योगिकी द्वारा प्रदत्त सामाजिक माध्यम निश्चित ही इस का सबसे बड़ा कारक रहे हैं|

पिछले कुछ समय से सामाजिक मध्यम जन चेतना का प्रसार प्रचार करने में अहम् भूमिका निभा रहे हैं| बहुत से विचार विमर्श सामाजिक माध्यमों के माध्यमों से सेमिनार हॉल, जनसभाओं, नुक्कड़ सभाओं, नुक्कड़ से आगे बढ़ कर तेजी से अधिक लोगों तक पहुँच पा रहे थे| इस से द्विपक्षीय संवाद की प्रबल संभावनाएं बनीं| विद्वानों को जनसाधारण तक सीधे विचार रखने का मौका मिला तो अल्पज्ञानियों को विद्वानों के समक्ष अपनी अज्ञानता का विष्फोट करने का समान अवसर दिया गया|

पिछले आम चुनावों में सामाजिक माध्यमों ने जन – समूह को एक साथ जोड़कर देश में एक राजनीतिक तौर पर वैचारिक माहौल पैदा करने में सफलता प्राप्त की थी| उसके बाद दिल्ली और बिहार चुनावों में सामाजिक माध्यमों का प्रयोग अन्य राजनीतिक दलों ने कुशलता पूर्वक किया और इसकी व्यापक चर्चा भी हुई| इस से देश में निश्चित ही सामाजिक माध्यम के प्रति जानकारी, जागरूकता, रूचि और प्रयोग में वृद्धि हुई| राजनीतिक रूप से माना जा सकता है कि अगले आम चुनाव तक सामाजिक माध्यमों में वही वैचारिक साम्य आ जायेगा जो धरातल (grass –root) पर पहले ही बन चुका था| प्रचार का बहुमुखी, बहिर्मुखी और आक्रमक होना सामाजिक मध्यम में सफलता की कुंजी के रूप में देखा जा सकता है|  चुनावों में जब विचार द्विपक्षीय सामाजिक संवाद के रूप में सामाजिक माध्यमों को प्रचारित और प्रसारित किया गया तो शायद यह सोचा भी नहीं गया था कि यह दिपक्षीय संवाद सामाजिक बेतालों (social media trolls) से आगे बढ़ कर एक भीड़–ताल (crowd – cry) बन जायेगा|

इस वर्ष, सामाजिक माध्यमों ने वैचारिक समूह-साधन के रूप में अपना विकास करने में व्यापक सफलता प्राप्त की है| हाल के भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना – आन्दोलन और दिल्ली बलात्कार काण्ड के समय टेलीविजन ने प्रचार प्रसार में व्यापक भूमिका निभाते हुए प्रिंट और रेडियो को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया था| इस वर्ष के अंतिम क्षणों में हम देख रहे हैं कि समूह-साधन देश में वैचारिक क्रांति या वैचारिक अव्यवस्था ला रहा है| हाल में हमने बहुत से मामलों में विचारों, कुविचारों, प्रचार, दुष्प्रचार, तर्कों और कुतर्कों को रणनीतिक रूप से समूह- साधित किया गया|

इस वर्ष के बिहार चुनावों में सामाजिक मीडिया में वह दल छाया रहा जिसका धरातल पर कोई आधार नहीं था| गाय हत्या के विरोध में तर्कों और कुतर्कों का ऐसा समां बंधा कि किसी को भी गाय का हत्यारा बना कर पेश करना और उसकी भीड़ द्वारा हत्या करा देना आसन हो गया| हम सब जानते हैं कि देश में बहुसंख्यजन शाकाहारी नहीं हैं और शाकाहार की सबकी अपनी परिभाषाएं है, परन्तु समूह – साधन के माध्यम से सामजिक माध्यमों में देश की छवि “शुद्ध सात्विक जैन शाकाहारी राष्ट्र” की बनाई गई|

देश की न्याय प्रणाली के ऊपर सामाजिक माध्यमों ने इस वर्ष मजबूत हमले किये| कई आरोपियों को सामूहिक पसन्द – नापसंद के आधार पर दोषी और निर्दोष साबित किया गया| संजय दत्त दोषी साबित होने के बाद भी पैरोल का आनंद आसानी से उठाते रहे| आमिर खान और शाहरुख़ खान अपने विचार रखने के लिए उस भीड़ द्वारा दोषी करार दिए गए, जिसे न विचार समझने की क्षमता थी, न विमर्श का माद्दा था, न न्याय प्रणाली में विश्वास था, सारा विचार – विमर्श – न्याय और दंड प्रक्रिया सामाजिक माध्यम के भीड़–ताल के हवाले कर दी गयी| पुलिस, अधिवक्ताओं और अभियोक्ताओं से प्रश्न पूछने के स्थान पर सलमान खान को दोषी घोषित न करने के लिए उच्च न्यायालय को भीड़- ताल के कठघरे में खड़ा कर दिया गया|

इस वर्ष में भीड़ ने यह तय किया कि कौन ज्ञानवान, बुद्धिमान, तार्किक, दार्शिनिक, विचारक, कलाकार, लेखक, कवि, संगीतकार, अभिनेता आदि कितना मूर्ख और मंदबुद्धि है| भीड़-तंत्र ने किसी पक्ष को सुने समझे जांचे-परखे बिना निर्णय दिए और न्याय को निर्दयता से समूह-साधन के हवाले कर दिया गया| अवार्ड वापसी के मसले पर देश में सर्वोत्तम विद्वानों को, मात्र मतभेद के आधार पर, शत्रु देश भेजने की व्यवस्था की गई|

वर्ष के अंत समय में हमने देश की सरकार, संसद, लोकतंत्र और राजनीति को भीड़ –ताल के समक्ष घुटने टेकते देखा| अपनी सजा काट चुके एक बाल अपराधी को सिर्फ़ भीड़ – ताल के दबाब में जबरन जेल में बंद रखने के प्रयासों से विश्व में भारत की उस छवि को हानि पहुंची| भीड़ – ताल से समक्ष आत्मसमर्पण करते हुए सरकार और संसद ने बाल न्याय संबंधी कानून में आनन् फानन में ऐसे बदलाव किये जिस से देश की न्याय प्रणाली और विश्व में भारत की न्यायप्रिय छवि को धक्का लगा|

दुर्भाग्य से यह वर्ष, सामाजिक माध्यमों के भीड़ – तंत्र द्वारा न्याय का समूह – साधन करने के लिए जाना जायेगा| इस वर्ष भारत, प्राचीन शास्त्रार्थ व्यवस्था और विचार – विमर्श के विपरीत कट्टरता और विचारशून्यता की ओर कदम बढ़ाता रहा| बीतता हुआ यह वर्ष सुकरात को भीड़ से सहमत न होने के कारण जहर दिए जाने की पुनरावृत्ति का वर्ष है|

I’m sharing my #TalesOf2015 with BlogAdda.

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