सतीत्व और आदर

 

 

पुरुष सत्ता ने स्त्री को अपनी दासता में रखने के लिए कई प्रकार के मुहावरे गढ़े हैं| जिनमें से सतीत्व और समर्पण प्रमुख हैं| भले ही हम सतीत्व की अवधारणा को तो भारतीय पुरुष सत्ता निम्नता के जिस स्तर पर ले गई उसका शायद ही कोई और उदाहरण कहीं और मिल सकता हो| सती की अवधारणा, पति – पत्नी के आपसी समझ – बूझ – विश्वास और सहयोग से परिवर्तित होकर न केवल यौन शुचिता में तब्दील हो गई, अपितु पति की मृत्यु के साथ उसकी सामाजिक रूप से खुले आम हत्या तक चली गई| विधवा स्त्री को नकारने और उसका “बोझ उठाने” से कतराने वाले समाज ने स्त्री को आत्म हत्या के लिए उसके जन्म से ही तैयार करना शुरू कर दिया| मैं सती के इस पहलू पर पहले भी बात कर चुका हूँ; आज मुझे दुसरे कम चर्चित परन्तु सर्वव्यापी पहलू पर बात करनी है|

सती का यह पहलू यौन शुचिता के साथ ही यौन दासता से भी जुड़ा हुआ है| स्त्री के सतीत्व और यौन शुचिता को उसके अपने वजूद से इतना बढ़कर बना दिया गया कि उसके घर परिवार और गाँव मोहल्ले का आदर सत्कार भी घर की बेटियों के कौमार्य और बहुओं की योनि की कसौटी पर कसे जाने लगे| शायद अपने घर परिवार की इज्जत बनाने का कोई और रास्ता शायद पुरुष सत्ता के पास बचा ही नहीं रह गया था| अच्छे धर्म कर्म, आचार व्यव्हार सब इसी अंग के आगे पीछे आकर टिक गए हैं|

इस मुर्खता पूर्ण अवधारणा का सीधा प्रभाव यह है कि पुरुष सत्ता हर बात में अपने शत्रु अथवा विरोधिओं की बेटी- बहुओं की योनि पर कब्जे को ही युद्ध और झगड़े का निर्णायक दाँव मानने लगी| इसका उदहारण न सिर्फ युद्धों में बलात्कार और जबरन विवाह आदि के रूप में दीखता है वरन समाज के हस परिहास में भी दिखाई देता है| माँ बहनों की योनि को इंगित किये बिना आज हमारे समाज का कोई हास – परिहास भी पूरा नहीं होता| पुरुष सत्ता का क्रोध जाहिर करने का सारा वाक्य – विन्यास तो पूरी तरह से योनि – मग्न ही है|

समूचे दक्षिण एशिया में प्रचलित “ऑनर किलिंग” हमारी पुरुषसत्ता की इसी मानसिकता का निर्लज्ज उदहारण है|

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