बचकाना बिचौलिया

पिछली पोस्ट बंद होते बैंक में मैंने लिखा था:  बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|

बैंक उद्योगीकरण के समय की पूंजीवादी जरूरत थी जो जल्द ही एक धुर-पूंजीवादी विचार में बदल गया| बैंकों ने आमजन का पैसा लेकर उद्योगपति को देना शुरू किया| लुटे पिटे आमजन के लिए धन कमाने और खुद को साहूकार समझने का यह सुहाना मौका था| परन्तु जल्द ही बैंक पूंजीपति के हाथ के खिलौने बन गए| पूंजीपति से मिले ब्याज और बैंक के खर्च से बचा ख़ुचा धन ब्याज के नाम पर जमाकर्ता को मिलने लगा| आज भी वास्तव में पूंजीपति ही ब्याज के दर तय करता है – भले ही अब यह लोबिंग के माध्यम से किया जाता है| बैंक के पास तो उधार देने के भी भारी लक्ष्य हैं कि योग्य को भी वह उधार दे देते हैं| बैंक का लिखित उद्देश्य उस समय खंडित हो जाता है जब जरूरतमंद किसान नीलाम हो जाता है और पूंजीपति ८५ प्रतिशत का माफ़ीनामा ले लेता है|

इस्लाम स्पष्टतः और हिन्दू आदि धर्म किसी न किसी रूप में ब्याज आधारित तंत्र के विरोधी रहे हैं| क्योंकि ब्याज लेना देना वास्तव में धन का कोई उत्पादक प्रयोग नहीं करता| धन का वास्तविक प्रयोग उसके उत्पादक प्रयोग में है| बैंक खुद भले ही उत्पादक कार्यों के लिए धन देते हैं परन्तु उनका उत्पादन से कोई सम्बन्ध नहीं होता| ब्याज न निवेशक को पूरा परिणाम देता हैं न उसकी बौद्धिक क्षमता का पूरा प्रयोग करता है| धार्मिक नियमों के ऊपर उठकर देखें तो बैंकों में एक सीमा से अधिक निवेशक और अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक हैं| बैंक पूँजी की समुच्चय और समन्वय करने में भी विफल रहे हैं| वास्तव बैंक के पास अपने धन का समुचित निवेश करने की कोई उचित कुशलता भी नहीं होती| यही कारण है कि बैंक असफल होते रहते हैं|

बंद होते बैंक

मैं आजतक नहीं जानता कि वास्तव में बैंक होते क्यों हैं?

पहले भारत या पूरे एशिया में बैंक नहीं थे तब आम जनता की आवागमन और व्यापारिक जरूरत के लिए हवाला तंत्र था| यह वास्तव में पेमेंट बैंक सिस्टम है जिसे पश्चिमी बैंक प्रणाली के हित के लिए अवैध, गैरकानूनी और आपराधिक बनाकर पेश किया गया| जबकि इसे उसी प्रकार विनियमित किया जा सकता था, जैसे आज पेमेंट बैंक को किया जाता है| हर शहर और गाँव में कर्जदाता साहूकार भी थे जिनके ब्याज के कड़वे किस्से महशूर किये गए थे| सहूकारियां और हवाला आज भी है और कानूनन मना भी है|

बैंकतंत्र का मूल उद्देश्य बड़े समूह से धन बटोर कर उद्योग आदि में प्रयोग करने के लिए देना था|  यह एक उलट-साहूकारी है| आलोचक इसे समाजवाद से धन जुटाकर पूंजीवाद को देना भी कहते हैं| आज इसमें साहूकार की सूदखोरी, हवाला की हौल और पूंजीवाद की लम्पटता है| बाद में जब पूंजीपति असफल होता तो बैंक का बाजा बज जाता और पूंजीपति सो जाता| बहुत बार यह धोखाधड़ी का मामला भी होता|

आखिर बैंक क्यों असफल होते हैं?

भारत में बैंक बंद होना कोई नया घटनाक्रम नहीं हैं| आरम्भ में अधिकतर बैंक पूंजीपतियों ने समाज में मौजूद धन को ब्याज के बदले इकठ्ठा करकर अपने व्यवसाय के लिए प्रयोग करने के लिए खोले थे| इस तंत्र में कमी थी कि आमजन के लिए पैसा लगाना सरल था निकलना कठिन| इसके बाद बैंक का राष्ट्रियकरण हुआ| हालत बदले और लगा कि धोखेबाज रोक लिए जायेंगे| परन्तु छोटे बैंक, साहूकार आदि बने रहे| बड़े बैंक भी कोई नया व्यासायिक नमूना नहीं बना पाए| पूंजीपति बैंक का लाभ लेते लूटते रहे| हाल का दिवाला शोधन कानून भी कोई बहुत सफल नहीं दिखाई देता| हाल का पंजाब महाराष्ट्र सहकारी बैंक भी सामाजिक पूँजी पर पूंजीवादी कुदृष्टि की पुरानी कथा है|

फिलहाल इस सब का कोई इलाज नहीं दिखाई देता| सरकारी नीतियाँ जब तक पेमेंट बैंक, बचत बैंक और साहूकारी और निवेश व्यवस्था को अलग नहीं करेंगी यह सब चलेगा| परन्तु यह सब करना कोई सस्ता सौदा भी तो नहीं है|

आम जन को अपना ध्यान खुद रखना होगा| बैंक का बिचौलियापन पूँजी बाजार से ख़त्म होना चाहिए| इसके लिए निवेशक के रूप में आमजन को जागरूक होना होगा|

लम्बा चौड़ा कराधान दायरा

संभावित अमीर और नए अमीर अक्सर यह मांग करते हैं कि सरकार करों के नाम पर उन्हें न लूटे और कराधान का दायरा बड़ा कर कर अधिक लोगों से करवसूल करे| मुझे अक्सर उनकी मांग के भोलेपन पर दया नहीं, तरस आता है| अक्सर यह लोग इस प्रकार का बर्ताव करते हैं कि मानो देश में कोई साम्यवादी या समाजवादी व्यवस्था उन्हें उनकी मेहनत और अमीरी के लिए परेशान कर रही है| दुनिया के हर पूंजीवादी देश में पूंजीपतियों पर अधिक कर हैं| अमेरिकी कांग्रेस तो और बढ़ाने पर विचार भी कर रही है| आखिर कराधान का दायरा बढ़ाने से इन लोगों की मुराद क्या है? क्या सरकार गरीबों से कर लेना शुरू करे? क्या गरीब कर नहीं देते?

वास्तविकता यह है कि गरीब कुल प्रतिशत में अमीरों के मुकाबले अधिक कर देते हैं| यह बाद नए वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम के बाद बहुत अधिक विश्वास के साथ कही जा सकती है| भारत में दो प्रकार के कर लगते हैं:

  • प्रत्यक्ष कर यानि आयकर और
  • अप्रत्यक्ष कर यानि वस्तु एवं सेवा कर|

फिलहाल आयकर का दायरा बढ़ाने के दो तरीके हैं:

  • गरीबों से आयकर लेना;
  • अधिक लोगों को रोजगार देकर वर्तमान कर सीमा में लेकर आना;
  • वर्तमान कर सीमा के अन्दर के लोगों की कर चोरी पकड़ना|

गरीबों से कर लेना सरल तो हैं परन्तु एक गरीब की आयकर विवरणी को भरवाने और देखने मात्र में आयकर विभाग के कम से कम हजार रुपए खर्च होंगे| इतना ही पैसा कोई भी उनकी आयकर विवरणी भरने का भी लेगा| क्या आपको लगता हैं कि जिसका कर पांच हजार से कम हो उस की आयकर विवरणी भरवाने का कोई फायदा है| यही कारण है कि सरकार पांच लाख तक की आय वालों को आयकर विवरणी भरने से छूट देनी चाहिए| जिससे सरकार को फालतू खर्च न उठाना पड़े| परन्तु सरकार ऐसा नहीं कर पाती| बल्कि फालतू कर विवरणी को पढ़ने के लिए अब महंगी तकनीक का सहारा लिया जा रहा है|

सोचें क्यों? साथ ही यह भी सोचें कि इस प्रकार सरकार से आप कितना पैसा कर प्रशासन के मद में फालतू खर्च करवा रहे हैं|

पिछले बीस साल में सरकार और निजी क्षेत्र सबको खर्च कम करने की लत पड़ चुकी है| इसलिए नौकरियां नहीं दी जा रहीं| मगर क्या सोचा है कि हर नया नौकर अपनी नई आय खर्च करेगा तो हर साल में अपनी आय का लगभग २८% प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर से रूप में मिलाकर सरकार को सीधे और लगभग ५०% दूसरों के माध्यम से लौटा देगा| मैं उन नौकरियों की बात कर रहा हूँ जिन्हें पैदा नहीं करना वरन भरना मात्र है| नई नौकरियों में जरूर कुछ अधिक खर्च होगा|

कर चोरी पर मुझे कुछ नहीं कहना| मुझे लगता है कि यही लोग हैं जो कराधान के दायरा लेकर रोते रहते हैं और अक्सर खुद तस्करों की श्रेणी में आते हैं|

(विशेष टिपण्णी: तस्कर अप्रत्यक्ष कर के चोर को कहते हैं, प्रत्यक्ष कर के चोर के लिए करचोर जैसे सम्मानित शब्द का विधान किया गया है|)

अगर अप्रत्यक्ष कर की बात की जाए तो हाल में देश के सबसे सुलभ और सबसे सस्ते बिस्कुट की बिक्री में कमी की बात सामने आई| कहा गया नोटबंदी और अप्रत्यक्ष कर के कारण लोग इसे नहीं खरीद पा रहे| जबाब में कहा जाता है कि उस बिस्कुट पर कर नया तो नहीं है| चीनी या मसाले सब पर कर लगता है| इतना ही है कि अब नमक सत्याग्रह नहीं हो सकता क्योंकि उसकर घरेलू नमक पर इस समय शून्य की दर से लगता है|

जब भी आप कराधान के दायरे की बात करें सोचें कि कौन है जो कर के दायरे में नहीं है?

चलते चलते इतना जरूर कहूँगा, किसी भी समझदार अमीर की कार पर कोई कर नहीं लगता| क्या वास्तव में उसपर कर लगता है?

#गहरानाज्ञान #तीसराशनिचर

तीन घंटा बनाम मेरी मर्जी

फिल्म और टेलिविज़न कम या कहें कि नहीं देखने की आदत का मेरे जीवन में बड़ा योगदान रहा है| मगर ऐसा भी तो नहीं है कि मुझे दृश्य साहित्य पसंद नहीं है| टेलिविज़न का नारदीय रूप यानि देशी समाचार चैनल कभी पसंद नहीं आये| परन्तु शुद्ध दूरदर्शन के शुद्ध ज़माने में वृत्तचित्र देख लेता था| वर्ना रेडियो कहीं बेहतर उपाय है| कहीं भी बैठ उठ कर सुन लिया| बीबीसी, दुयुचे वैले, वॉयस ऑव अमेरिका से लेकर रेडियो पाकिस्तान तक दुनिया भर के दोनों तीनों पक्ष से समाचार सुन लिए जाते थे| टेलीविज़न समाचार में नाटकीयता अधिक और गंभीरता कम है|

दृश्य साहित्य के तौर पर मैं कभी कुछेक टेलिविज़न नाटकों और गिने चुने सीरियल से आगे नहीं बढ़ पाया| फिल्मों का हाल यह कि तीन घंटे बैठना हमेशा भारी पड़ता था| मैं टिक कर नहीं बैठ सकता| हर आधा घंटे के भीतर अन्दर का ऊदबिलाब ऊलने लगता है| कोई फिल्म टीवी पर दो-तीन बार आ गई या किसी वजह से लेटे पड़े हैं तो साल दो साल में फिल्म पूरी हो गई| हॉल में फिल्म देखने का यह हाल रहा कि सिनेमा हॉल में देखी गई फिल्मों की संख्या अभी तक दर्जन नहीं पकड़ती| लगता है घुट कर मर जाऊँगा इस कैद में|

फिर सूचना क्रांति हुई| आपको कभी भी फ़िल्म रोकने चलाने की सुविधा हो गई| जब जिनता मन आये देख लो| मगर उसमें भी कई हाल में आपका मोबाइल आपके समय और आपकी जगह पर फ़िल्म सीरियल और समूचा दृश्य साहित्य उपलब्ध कराने लगा है| कई बार एक दृश्य देख कर रुके और ढेर सारा मनन चिन्तन और विश्लेषण कर लिया| मन हुआ तो प्यारी सी दोस्ताना किताब की तरह लगे रहे|

जिस प्रकार अच्छी किताब यह करती है कि वह कब तक आपको पढ़वाती जाएगी, ये फ़िल्में और सीरियल भी खुद तय करते हैं| मगर आपको कैद में नहीं बंधना पड़ता|

फिर भी मैं किताबों को पसंद करता हूँ, भले ही वह किन्दल, मोबाइल या लेपटॉप पर क्यों न हो| किताबें आपसे अधिक बात करती हैं और आपकी समझ को खुला वितान देतीं हैं| दृश्य माध्यम में आप शांत निर्लिप्त प्रेक्षक होते हैं जिन्हें निर्देशक और अभिनेता की निगाह से दुनिया देखनी होती है|

सुना है, कुछ इंटरैक्टिव कहानियों पर काम हो रहा हैं| परन्तु… शरद पूणिमा की पीली गुलाबी सी बेलाई ठंडक को निर्देशक की निगाह से समझने की जो मजबूरी इन माध्यम में है वह किताब में नहीं है|

फिर भी जो है, स्वागत योग्य है|

अच्छी फिल्मों और सीरियल के बाद उनकी मूल कहानी पढ़ी जाए तो नए सोपान अब भी खुलते हैं और शायद आगे भी खुलते रहेंगे|

भेदभाव उत्पादक यंत्र

मोटर वाहन एक ऐसा यंत्र है जो अपने मालिक और चालक को मनुष्य के स्तर के उठा कर सांड के स्तर पर लाकर रख देता है| जिस की जितनी बड़ी गाड़ी, उतना बड़ा सांड| मोटरवाहन की कुर्सियाँ उस सिंहासन की तरह है जहाँ से दूसरों ख़ासकर पैदल चलने वालों और कीड़े मकौड़े में कोई फर्क नहीं दिखाई देता|

एक हिन्दुस्तानी सड़क दुनिया का सबसे ख़तरनाक इलाका है जहाँ किसी को भी गाली गलौज कर सकते हो, पुलिस को अपने बाप का नाम बता सकते हो, दरोगा से उसकी औकात पूछ सकते हो, छोटी गाड़ी में बैठे बूढ़े पर हाथ उठा सकते हो, और सबसे बड़ी बात बिना गलती माफ़ी मांग लेने वाले को खानदानी पापी मान सकते हो| अगर आपको वर्णभेद और जातिभेद हमारी पुश्तैनी भेदभावी आदतें समझनी हैं तो हिन्दुस्तानी सड़क बढ़िया ठिकाना है| यहाँ आपके रंग, आपके कपड़े, आपकी गाड़ी और आप की सहनशील स्वभाव आपको वर्णभेद का शिकार बना सकता है| यह ऐसा भेदभाव है जिसमें आपके कर्म, जन्म, रंग आपके बारे में कुछ तय नहीं करते| आपको पददलित बनाने का काम इस बात से भी तय हो सकता है कि आप अपनी दसकरोड़ी गाड़ी को मरम्मत के लिए दे आये हैं और पिताजी की दो लाखी गाड़ी लेकर सड़क पर उतरे हैं| यह भेदभाव ही है जिसके कारण एक सस्ती मगर बढ़िया गाड़ी हिन्दुस्तानी बाजार में बिक भी नहीं सकी|

जो आदमी सड़क पर गलत हाथ पर चलता हुआ बिना किसी लाल हरी रौशनी का ध्यान दिए अपने वाहन में आकर बैठता है वह भी चाहता है कि हर सूअर या कीड़ा मकौड़ा सारे नियम का पालन करे| वास्तव में उसे अपने लिए सब सुविधाएँ चाहिए मसलन – रास्ता साफ़ हो, चमकदार सड़क हो, कोई रास्ता जाम न मिले, पुलिस वाला बिकाऊ हो और हर अँधा-बहरा भी उस का वाहन देखे और फालतू बजता उसका भोंपू सुने और आपातचिकित्सा वाहन भी उसके लिए रास्ता छोड़ दें|

मोटर वाहन भेदभाव के सबसे बुरे शिकार मजदूर, रिक्शाचालक, ऑटोचालक, रेहड़ीवाले, टैक्सीवाले हैं| उनका कोई दिन मोटर वाहन वाले किसी न किसी दैत्य से बिना गाली सुने नहीं बीतता|

खस्ता कचौड़ी की अर्थव्यवस्था

प्रधान जी ने पहले ही पहचान लिया था कि मजेदार खस्ता बनेगा| बोले, खूब तलो, सब मिलकर तलो| नादान समझ न पाए| जब अर्थव्यवस्था के हालत खस्ता हों (या होने वाली हो) तो खस्ता तलने में ही भलाई है| मैं मजाक नहीं कर रहा  हूँ| अभी हाल में अलीगढ़ में कचौड़ी तलने पर सरकारी छापा पड़ा और सालाना बिक्री का आंकड़ा गरमागरम खस्ता निकला – पूरे साठ लाख सालाना|

मुझे अलीगढ़ी कचौड़ियों से प्रेम है| एक समय था, जब मेरी, मेरी पढाई की और देश की हालत ख़राब थे और देश का मण्डल कमण्डल हो रहा था| तब मैंने बहुत सारी चीज़े बनाना सीखा था| उस समय मेरी समझ यह विकसित हुई थी कि कपड़ा और खाना दो धंधे धड़ाकू आदमी के लिए और वकालत और वैद्यकी पढ़ाकू आदमी के लिए बहुत बढ़िया है| यह बात अलग है कि मुझे अब लगता है पहले दो धंधों में पढ़ाकू और दूसरे दो धंधों में धड़ाकू अधिक सफल हैं|

चाट पकौड़ी वाले भोजन में लागत के मुकाबले बाजार मूल्य अधिक होता है| देखा जाए तो जब तक आपको ग्राहक को बिठाने पर खर्च न करना हो तो लाभ पक्का और पका पकाया है| किसी भी ठीक ठाक चलती दूकान पर पहुँचें तो पाएंगे कि हर पांच मिनिट में उसके पास एक ग्राहक होता है और अगर हर ग्राहक औसतन पचास रुपये का माल उठाता है तो साल भर में इक्कीस लाख रुपये का धंधा हो जाता है| दाम अगर आधे हों तो ग्राहकी चार गुना बढ़ जाती है परन्तु बढ़ी हुई ग्राहकी को सँभालने में दिक्कत रहती है| अगर आपका माल सामान्य से अच्छा है तो आप की बिक्री को कुछ ही दिनों में दोगुना होने से कोई नहीं रोक सकता| इस प्रकार चाट पकौड़ी के बाजार में पचास साठ का धंधा होना एक सामान्य बात है|

आप दिल्ली या किसी भी शहर के किसी भी मोहल्ले के किसी भी चाट पकौड़ी वाले को लें तो पाएंगे कि जिस “भैया” से आप तू तड़ाक करते रहे हैं वह शायद आपके बॉस से अधिक कमाता है| यहाँ तक कि आपके ऑफिस के बाहर बैठा चाय वाला भी आपकी कंपनी खरीद सकता है| शायद आपको मेड इन हेवन –  सीजन वन का प्लम्बर याद हो जिसने वेडिंग प्लानिंग कंपनी में मोटा निवेश किया हुआ था| प्लम्बर का पता नहीं मगर दिल्ली शहर के कई बड़े चाट पकौड़ी वाले देश के महत्वपूर्ण निवेशक हैं| यह सब जीवन की मध्यवर्गीय खस्ता सच्चाई है|

कुछ नया खस्ता बनाइये, पकाइए, खिलाइए|

कलाचित्र की खरीद

कला प्रदर्शनियों में मेरा जाना ऐसा ही रहा है जैसे कोई भूखा बेरोजगार मर्द बनारसी रेशम साड़ी भण्डार पहुँच जाए| इन प्रदर्शनियों में जाकर मेरे पास अपने आप को भरमाये रखने का एक ही तरीका है: अपनी काँख दबाकर और आँख गढ़ाकर कलाचित्रों को चिंदी चिंदी देखने लगना| कभी किसी चित्रकार ने कुछ पूछ लिया तो ब्रश स्ट्रोक से लेकर रंग बिरंग तक कुछ भी भारीभरकम ऊलजुलूल कह दिया| कुछ बेचारे चित्रकार बाकायदा अपनी प्रदर्शनी का निमंत्रण भेजने लगे| हकीकत यह है कि मैं कला के बारे में आजतक कुछ भी नहीं जानता, मगर प्रदर्शनी में चला जाता हूँ| फिर भी चित्रकार से कुछ भी पूछने से बचता हूँ, क्योंकि उनका नजरिया अक्सर कलाचित्र के बनने के साथ ही पुराना हो चुका होता है| मगर इस सब में थोडा बहुत लगाव पैदा हुआ| विधिक और साहित्यिक सभाओं से इतर कला प्रदर्शनियों में आपको विषयवस्तु से सीधी बातचीत का अवसर मिलता है|

अभी हाल में साहित्य पत्रिका सदानीरा के ग्रीष्म २०१९ अंक के मुखपृष्ठ पर छपने जा रहा कलाचित्र मुझे पसंद आया| इसमें एक अभिव्यक्ति की सरलता और विचार की तरलता का अनुभव होता था| जब चित्रकार ने अपने इन्स्टाग्राम पर इसे डाला तो इसने मुझे आकर्षित किया| मैं सिर्फ पत्रिका से ही संतोष कर लेना चाहता था| फिर भी टिपण्णी छोड़ दी कि यह चित्र कुछ दिन में मेरे घर आने वाला है – इशारा पत्रिका की तरफ था| पूछा गया कलाचित्र भी ले आया जाए आपके लिए? मुझे लगा मैंने अपनी फटी जेब भरे चौराहे पर पतलून से बाहर निकाल दी है| फिर भी पूछा, कीमत| मुझे दाम लगाने के लिए कहा गया| कला का क्या दाम (price), उसकी अहमियत (value) होती है| दाम तो खरीददार की जरूरत में होता है| अहमियत और दाम का रिश्ता तो अर्थशास्त्र भी नहीं निकाल पाया| मैंने मात्र अपना बजट बताया| उफ़; बात पक्की, मैंने सोचा| अब कठिनाई यह है कि छोटे से घर में आप इसे सजायेंगे कहाँ? उधर चित्रकार की समस्या थी, अमेरिका से दिल्ली तक का सफ़र और दिल्ली लाकर उसे फ्रेम कराकर मुझ तक सकुशल पहुँचाना|

समय बीता और एक दिन अचानक कलाचित्र मेरे घर में था| तेज बारिश का दिन था| कामकाजी दिन की शाम, बारिश और अरविंदो मार्ग|

अब चित्रकार की बारी थी – अपने ही चित्र को चिंदी चिंदी देखने की| मैं शांत था, मैं एक माँ से उसका बच्चा गोद ले रहा था| मेरे अन्दर का कानूनची अचानक बहुत से क़ानूनी पहलूओं पर खुदबुदा रहा था| मुझे एक कलाचित्र को पालना है, शायद कुछ और कलाचित्रों को भी|

इस कलाचित्र की खरीद के सम्बन्ध में बहुत कुछ सोशल मीडिया पर है| बहुत से लोग जो मौलिक कला खरीदना चाहते हैं उनके लिए मैं पूरी परिघटना यहाँ नीचे लगा रहा हूँ|