आपातकाल का बोझ

आपातकाल भारत में आज चालीस साल बाद भी मुद्दा बन कर खड़ा है| एक पक्ष इन दिनों किसी अघोषित आपातकाल से कष्ट महसूस करता है| दूसरा पक्ष किसी परोक्ष आपातकाल को बिना सकारे और नकारे आपातकाल के दुःख आज भी याद करता हैं| कुल मिलाकर दोनों पक्ष मानते हैं कि आपातकाल दुःख भरा समय था और इसे दोहराया नहीं जाना चाहिए| विवाद केवल इस बात में हो सकता है कि आज आपातकाल जैसा माहौल है या नहीं| मुझे इस विवाद में दिलचस्पी नहीं है| भारत में हर सरकार किसी न किसी रूप में और किसी न किसी रूप में मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों के विरुद्ध काम करती रही हैं|

आज का समय मह्त्वपूर्ण इसलिए है कि दोनों विरोधी धड़े किसी न किसी रूप में आपातकाल और उस के समर्थन से जुड़े रहे हैं|

आपातकाल की जिम्मेदारी का उत्तराधिकारी कौन हैं? इंदिरागांधी का कौन सा पुत्र अथवा पौत्र?

इंदिरा गाँधी के बड़े पुत्र राजीव गाँधी की आपातकाल में किसी भूमिका का कोई उल्लेख नहीं रहा है| यह अलग बात हैं कि परोक्ष रूप से उन्होंने अपने छोटे भाई और माँ का समर्थन किया हो|

उस समय के युवराज माने जाने वाले इंदिरा गाँधी की छोटे पुत्र संजय गाँधी की आपातकाल में भूमिका जग जाहिर है| बल्कि आपातकाल को कई विश्लेषक उनके दिमाग की उपज मानते रहे हैं| परन्तु आपातकाल हटने संजय गाँधी के अपनी माँ से शायद अच्छे सम्बन्ध नहीं रहे| उनकी मृत्यु के बाद उनका परिवार इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी परिवार के दूर हो गया| मेनका संजय गाँधी और वरुण संजय गाँधी, संजय गाँधी की उस विरासत को काफी हद तक कांग्रेस और राजीव गाँधी परिवार को सोंपने में कामयाब रहे हैं|

आपातकाल के संभावित लाभार्थी आज अपने राजनैतिक दल के साथ आपातकाल के विरोधियों के साथ गुपचुप खड़े दिखाई देते हैं| परन्तु, आपातकाल का यही विरोधी धड़ा उस समय की कई तथाकथित अच्छाइयों को मानक की तरह प्रयोग भी करता है| मुस्लिम विरोध, नागरिकों के सीमित अधिकार, कड़ा नागरिक अनुशासन उनके प्रिय गौरव हैं|

अभी हाल में मैंने फेसबुक पर एक मतदान करवाया था:

आज जनता को यह स्पष्ट नहीं है कि संजय गाँधी को वह किस राजनैतिक दल के साथ खड़ा कर आकर देखें| संजय गाँधी अपने पूरे जीवन में कांग्रेस में रहे| संजय गाँधी की पूरी राजनैतिक विरासत अपनी पूरी जिम्मेदारी और नकारात्मकता के साथ कांग्रेस के साथ हैं|

आश्चर्यजनक रूप से संजय गाँधी के सभी निजी विचार और कट्टरता उनके परिवार के साथ में भारतीय जनता पार्टी में मौजूत हैं| वास्तव में आज के दोनों बड़ी राजनैतिक दल संजय गाँधी की विरासत, आभा और प्रभा मंडल की प्रतिछाया हैं| दोनों दल इंदिरा गाँधी परिवार के एक एक धड़े के साथ खड़े हैं|

जनता के पास इस सब को देखने समझने और इस में उलझने के लिए अपने अपने चश्मे हैं|

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बेवफ़ा

मेरी बेवफ़ा ने मुझे छोड़ा न था, दिल तोड़ा न था|

मेरी जिन्दगी से रूह निकाली न थी|

मेरी जिन्दगी में न जलजले आये, न सूखी आँखों में सैलाब, न बिवाई फटे पाँवों तले धरती फटी|

जिन्दगी यूँ ही सी घिसटती सी थी, नीरस, बंजर, लम्बी ख़ुश्क सड़क बिना मंज़िल चलती चली जाती हो|

उस के बिना कल दो हजार एक सौ सतासीवीं यूं ही सी उदास शाम थी|

कहवाखाने के उस दूर धुंधले कोने में उसका शौहर कड़वे घूँट पीता था|

काँगड़ा की उस कड़क चाय की चुस्की के आख़िरी घूँट पर ख़याल आया|

इश्क़ मेरे दिल से रिस रिस के तेरे हुज़ूर में सज़दे करता है, मिरे महबूब!

मेरे माशूक किस कहर से बचाया था तूने मुझे|

एक थैले वाला मुकदमा

विज्ञापन का सबसे बेहतर तरीका है – समाचार में छा जाना| अभी हाल में जूता कंपनी बाटा पर एक थैले के लिए हुआ मुकदमा बाटा के लिए इसी प्रकार का समाचार साबित हो रहा है| सामान के साथ थैला देने के लिए दाम वसूलने का काम पहली बार नहीं हुआ| दिल्ली में मदर डेरी भी बिना पैसे वसूले आपको थैला नहीं देती| इसी प्रकार के अन्य और भी संस्थान हैं| मगर इन सभी मामलों में ग्राहक के पास यह थैला खरीदने या न खरीदने का विकल्प रहता है| अगर वह अपने हाथ में अपना खरीदा हुआ सामान ले जाना चाहे तो उसकी मर्जी पर निर्भर करता है| दुर्भाग्य से आजकल ग्राहक मुफ्त के थैले को अपना अधिकार समझते हैं| कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ ग्राहक थैला न देने पर भद्दी भाषा का प्रयोग करते हैं| मुफ्त के यह थैले प्रायः घर और बाहर कूड़े का एक प्रमुख कारण बन रहे हैं| इन दिनों कूड़ादान और कूड़ाघरों में सबसे अधिक कूड़ा थैलों और अन्य बारदाने (पैकिंग मटेरियल) का ही है|

दिनेश प्रसाद रतूरी बनाम बाटा इंडिया लिमिटेड मजेदार मुकदमा है| जहाँ तक मुझे लगता है, इस फैसले पर जल्दी ही अपील होनी चाहिए| इस प्रकार यह लम्बे समय तक बाटा को खबर में रख सकता है|

ग्राहक ने शिकायत की है कि बिना बताए या पूछे थैला उन्हें बेचा गया| मामला साधारण था| ग्राहक थैले की यह बिक्री स्वीकार करने से मना कर सकता था और जूता या जूते का डिब्बा साथ ले जा सकता था| उस पर थैला ले जाने की कोई जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए थी| क्योंकि थैला बेचने का कोई करार नहीं हुआ, कोई बात नहीं हुई तो यह बिक्री तुरंत निरस्त करने योग्य थी| निर्णय में लिखे गए तथ्य यह नहीं बताते कि ग्राहक ने थैले की यह बिक्री रद्द करने का प्रयास किया या नहीं किया| क्या ग्राहक मात्र मुफ्त थैले की मांग करता रहा और बाद में बिक्री स्वीकार कर कर वहां से चल दिया? जी, उसने थैले को स्वीकार किया मगर उसका मानना था कि मुफ्त थैला उसका अधिकार था, खासकर जब कि उस थैले पर कंपनी का लोगो ब्रांड आदि लगे हुए थे|

इस मुक़दमे में यह दावा किया गया है कि दुकानदार मुफ्त में ग्राहकों को थैला देने के लिए बाध्य है| मुझे यह दावा बिल्कुल गलत लगता है| इस समय बाटा को छोड़कर किसी भी अन्य दुकानदार के लिए मेरी तत्काल सलाह है कि तुरंत अपनी दूकान में सूचना लिखवा दें – थैला घर से लायें या खरीदें, मुफ्त नहीं मिलेगा|

दूसरी बात ग्राहक का कहना है कि इस थैले पर विज्ञापन लिखा हुआ है और उस थैले को दे कर बाटा कंपनी उनसे बिना पारिश्रमिक दिए विज्ञापन करवा रही थी| अब आपकी कार, फ्रिज, टेलिविज़न, चश्मे, कमीज कुरता सब पर कोई न कोई ब्रांड या लोगो लगा हुआ है| क्या यह विज्ञापन है, या आपके घर की ब्रांड वैल्यू? आप सब अब स्वीकार कर लें कि आप बेगारी की माडलिंग और विज्ञापन सेवा कर रहे हैं| वास्तव में होता उल्टा है, हम उस ब्रांड को घर लाने और दुनिया को दिखाने में गर्व कर रहे होते हैं| विक्रेता हमें यहीं गर्व बेचता है और उसके दाम वसूलता है|

बाटा का दावा है कि उसने पर्यावरण हित का ध्यान रखकर यह थैला बेचा| यह अपने आप में बचकाना बचाव था|

अगर पर्यावरण हित का ध्यान था तो ग्राहक को बार बार प्रयोग करने वाला थैला बेचना चाहिए था या उपहार में देना चाहिए था| सबसे बेहतर था कि कंपनी अपने ग्राहकों पर अपने घर से मजबूत कपड़े का बार बार प्रयोग हो सकने वाला थैला लाने के लिए दबाव बनाती|

वास्तव में यह गलत बचाव बाटा के विरुद्ध जाता है| ऐसा लगता है कि वह गलत और जबरन बिक्री को जायज ठहराने का कमजोर प्रयास कर रही है| इस गलत बचाव से यह महसूस होता है कि यह थैले की गलत तरीके से की गई बिक्री का मामला बनता है| इस प्रकार के बचाव से उसने इस थैले की जबरन बिक्री स्वीकार कर ली| अगर आप गलत तरीक से बिक्री करते हैं तो यह कानूनन गलत है|

होना यह चाहिए था कि कंपनी कहती कि वह पर्यावरण हित में ग्राहकों को अपने घर से बार बार प्रयोग हो सकते वाला थैला लाने के लिए प्रोत्साहित करती है और विशेष मामलों में ग्राहक की मांग पर उन्हें थैला बेचती है| क्योंकि यह ग्राहक अपने साथ अपना थैला नहीं लाया था, इसलिए यह थैला उसने खुद खरीदा| थैले पर कंपनी का कोई भी विज्ञापन इस थैले को सस्ता रखने का प्रयास है और कागज का अधिक बेहतर उपयोग भी है|

दुर्भाग्य से इस मुक़दमे के फ़ैसले में विक्रेता को अपने सभी ग्राहकों को आगे से मुफ्त में थैले देने का आदेश दिया गया है| वास्तव में यह अपने आप में गलत होगा| कम्पनी यह थैले अपने लाभ में से नहीं देगी वरन अपनी लागत में वह इसे जोड़ेंगे और जूतों के दाम बढ़ जायंगे| हो सकता है, ३९९ रूपए का जूता आधिकारिक रूप से ४०२ रुपए का हो जाए| एक साथ दो जोड़ी जूते खरीदने ओर ग्राहक को ८०१ रूपए की जगह ८०४ रुपए खर्च करने पड़े|

साथ ही इस निर्णय से हमेशा अपना थैला लेकर चलने वले जागरूक पर्यावरण प्रेमी ग्राहकों को हताशा होगी|

तुरंत आवश्यकता है कि जागरूक कंपनियां अपने ग्राहकों की कपड़े के मजबूत थैले साथ लाने के लिए प्रेरित करें| पोलीथिन, प्लास्टिक, कागज़ और महीन कपड़े के कमज़ोर एकल प्रयोग थैलों को देना तुरन और पूरी कड़ाई से बंद करें| अपने साथ थैला न लाने वाले ग्राहकों को पच्चीस पचास रुपये का मजबूत खादी का थैला खरीदने का विकल्प दें|

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जलियांवाला वाला बाग़

कौन याद करेगा तुम्हे, ऐ मरने वालो| कोई दस पांच बरस तुम्हारा नाम जिएगा| कुछ बीस चालीस बरस तुम्हारी याद आएगी| क्या कोई मंजर होगा कि तुम याद आओगे? याद आओगे किसी तारीख़ की तरह और उस दिन के ढलते सूरज के साथ बीत जाओगे| कोई, शायद कोई, तुम्हारी क़ब्र पर चिराग़ रोशन करेगा, मगर तुम्हे याद कौन करेगा? चिराग़ रोशन करने वाले दुआ से वास्ता रखते हैं, उन्हें तुम्हारे सलाम का क्या काम? तुम्हें भी क्या पता था कि उस शाम तुम ढल जाओगे? वो गुनगुनी शाम तुम्हारी आखिरी शाम होगी|

सौ बरस बीत गए| तुम्हारा कौन नाम लेवा है? तुम लाशों का वो ढेर हो जिस पर राजनीति के अघोरी अपनी साधना करते है| राजनीति की देवी जो बलि मांगती है, उस बलि का पवित्र बकरा तुम हो| तुम्हारा नाम बलि के प्रसाद की तरह टुकड़े टुकड़े बाँट दिया जायगा| ये मुल्क तुम्हारे नाम की बोटियाँ चबाकर तुम्हे याद करेगा|

तुम्हें याद करना एक रस्मी कवायद है| नेता तुम्हारी इन यादों को हर चुनाव में वोट के बदले बेच देगा| खरीदेगा कुछ जज़्बात, कुछ वोट, कुछ कुर्सियाँ और कुछ दिनों की सत्ता|

तुम्हारे नाम पर रोज नई तख्तियां लगेंगी| कुछ इमारतों में तुम्हारे नाम की कुछ इबारतें धूल खाया करेंगी| तुम्हारे नाम की कुछ सड़कों को सरकार अपने जूतों से और सरकारी गाड़ियाँ अपने पहियों से रौंदा करेंगी| तुम्हारे नाम पर नाम वाले पुल अपनी सरकारी रेत के साथ ढह जाया करेंगे, मानों नश्वर संसार का सार उन्हीं में निहित है|

नहीं, मैं रोता नहीं हूँ ओ मरने वाले| मैं हँसता भीं नहीं हूँ ओ जाने वाले| तुम्हारे नाम पर में अपने आंसुओं के कुछ जाम पीता हूँ| मैं तुम्हारी कब्र पर सोना चाहता हूँ| आओ, मुझे अपनी बाहों में ले लो|

मैं सो जाऊं, जब वो तुम्हें पुकारे, तुम्हारे नाम पर शोक गीत गायें, तुम्हारे नाम पर सदका करें| मैं सो जाऊं जब तुम उठो और बेचैनी से अपनी कब्र के ऊपर बैठ कर रोने लगो| मैं सो जाऊं जब तुम्हारा नाम झूठी जुबान पर आये| मैं सो जाऊं जब मैं तुम्हारी कब्र पर झूठा चिराग़ रोशन करूँ|

मैं सो जाऊं जब बैसाखी आये|

अनुच्छेद ३७० और आतंकवाद

कानून का कोई भी विद्यार्थी यह मानेगा कि भारतीय संविधान के बारे में आपको कुछ पता हो या न पता को मूल अधिकारों के बारे में पता होना चाहिए| परन्तु मूल अधिकारों के बारे में जानने वाले भारतीय अनुच्छेद ३७० को जानने वाले भारतियों से कम होंगे| मामला वाही है कि अपने सुख दुःख से अधिक इंसान दूसरे के संभावित सुखों से परेशान रहता है|

इन दिनों जब भी अनुच्छेद ३७० की बात आती है, इसे किसी न किसी रूप में आतंकवाद से जोड़ दिया जाता है| अज्ञान या अतार्किकता यह है कि ऐसा प्रचारित होता रहा है कि इसका लाभ मात्र राज्य के एक प्रखंड में रहने वाले एक धार्मिक समुदाय को मिला है| मैं नहीं जानता की आखिर उस प्रखंड के अन्य वर्ग और अन्य प्रखंड के निवासी इसका लाभ क्यों नहीं ले सकते| इस से

मजे की बात यह है कि जिस जम्मू कश्मीर राज्य से यह अनुच्छेद जुड़ा हुआ है, वह इस प्रकार के विशेष प्रावधान वाला अकेला राज्य नहीं है| कई अन्य राज्यों को भी अन्य अनुच्छेदों के अंतर्गत विशेष अधिकार मिले हुए हैं|

अब अगर हम आतंकवाद के मुद्दे पर बात करें तो भारत में बहुत से राज्य किसी न किसी प्रकार के आतंकवाद से जूझ रहे हैं| मध्य और पूर्वी भारत में नक्सलवाद है| उत्तरपूर्व में भी अलग अलग प्रकार से आतंकवाद मौजूद है| परन्तु कश्मीर और पंजाब के आतंकवाद की गूँज दिल्ली में सबसे सुनाई देती है| जी हाँ पंजाब में आज आतकवाद नहीं है| इस राज्य को कोई संवैधानिक विशेष अधिकार नहीं था| राज्य भले ही तकनीकि रूप से अल्पसंख्यक धार्मिक समूह से सम्बन्ध रखता हो परन्तु उन्हें बहुसंख्यक भारतीय आज अपनेपन से देखते हैं|

कश्मीर और पंजाब के आतंकवाद की समानता देखते हैं –

  • भारत पाकिस्तान सीमा
  • सीमावर्ती राज्य
  • धार्मिक अल्पसंख्यक
  • विदेशी धन
  • पाकिस्तानी समर्थन
  • मूल रूप से प्राकृतिक संसाधन में धनी क्षेत्र
  • प्रारंभिक दिनों में केंद्र में कांग्रेस का शासन
  • सरकार की राजनीतिक और कूटनीतिक गलतियाँ
  • हिन्दूवादी/ राष्ट्रवादी राजनीतिक दलों के अलगाववादियों से बनते बिगड़ते लुकाछिपी सम्बन्ध
  • स्थानीय असंतोष
  • आतंकवाद को प्रारंभिक तौर पर स्थानीय समर्थन
  • स्वतंत्र देश की मांग
  • अनियंत्रित पुलिस/सेन्य कार्यवाहियां
  • हर किसी अपराधी को आतंकवादी घोषित करने की पुलिसिया प्रवृत्ति
  • निर्दोष और आम नागरिकों पर दोनों और से निशाना
  • मानव अधिकार उलंघन

दोनों आतंकवाद का एक जैसा गठन साफ़ दिखाई देता है| जबकि पंजाब कोई विशेष दर्जा प्राप्त नहीं था जबकि जम्मू कश्मीर को खास संविधानिक दर्जा प्राप्त है| इसलिए अनुच्छेद ३७० को जम्मू कश्मीर आतंकवाद के लिए दोषी नहीं माना जाना चाहिए| अनुच्छेद ३७० को हटाना केवल आतंकवादियों के हित में काम करेगा कि भारत अपने संविधानिक वचन का पालन करने से पीछे हट रहा है|

हमें समस्या के राजनीतिक हल के लिए प्रयास किये जाने चाहिए| ऐरे गैरे अपराधियों को आतंकवादी कहने के स्थान पर उन्हें कानूनी तौर पर सजाएं दी जाएँ| स्थानीय नागरिकों के साथ सकारात्मक सम्बन्ध बनाये जाएँ| इन सुझावों में कुछ नया नहीं है| इन्हें भारत पंजाब, मिजोरम आदि राज्यों में आतंकवाद के विरुद्ध अजमाया जा चुका है|

चुनावी खच्चर

चुनावी खच्चर वह निरुद्देश्य निष्क्रिय प्राणी है जिसके होने न होने से चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ता और वह चुनाव से बहुत कुछ प्राप्त करने की आशा करने से निराश रहता है| यह प्रायः मध्यवर्गीय मानसिकता से त्रस्त आयकरदाता होता है जिसके अनुसार देश का सारा सरकारी काम खासकर कर्ज माफ़ी और घोटाला उस के आयकर पैसे से चलता है| इसे प्रायः बिना बिल का सामान खरीदने की जुगाड़ करते, अनावश्यक रूप से रिश्वत देते, जुगाड़ भिड़ा कर मंहगे विद्यालयों में बच्चों का दाखिला कराने के बाद उन्हें लठ्ठ मार मार कर कोचिंग क्लास जाने के लिए विवश करते देखा जा सकता है| यह सड़क किनारे मूतते हुए नारा लगाता है – इस देश का कुछ नहीं हो सकता| अपनी बहन बेटी की सहेलियों के संग अश्लील हरकतें करने या करने के हसीन सपने देखते हुए यह अपनी माँ बहन की इज्जत बचाने की आशा में उन्हें ताले में बंद करने कोशिश करता है|

चुनावी खच्चर दुनिया भर की बड़ी बड़ी बातें बनाने के बाद, चाय और पान तम्बाकू की दुकान और अपने दफ़्तर की कोफी मशीन के किनारे पर खड़ा होकर घंटो बेमतलब बहस करने के बाद बड़े लीचड़ तरीके से घोषणा करता है – सब एक जैसे हैं, मैं तो इसलिए वोट डालने नहीं जाता|

चुनावी खच्चरों की तादाद देश की आबादी में लगभग तीस से चालीस फ़ीसदी मानी जाती है| हर चुनाव में मतदान केंद्र से अनुपस्तिथ रहे लोगों ने इनकी संख्या ९५ प्रतिशत तक होती है| चुनाव के दिन आसपास के इलाकों में तफ़रीह पर चले जाना पक्के चुनावी खच्चरों का विशिष्ठ लक्षण माना जाता है| हाँ, यह सामाजिक माध्यमों पर करें मतदान – देश महान जैसे नारे जरूर प्रेषित कर देता है| इन्हें चुनावी क़ानून के नाम पर सिंगापुर की याद आती रहती है कि वहां मतदान न करने पर सजा मिल सकती हैं|

चुनावी खच्चर को देशप्रेम से प्रेम होता है| चुनावी खच्चरों की औलादें अक्सर आस्ट्रेलिया कनाडा आदि देशों की वीज़ा कतारों में खड़े होकर और बाद में उन देशों में भारतीय सांस्कृतिक कार्यक्रम में जाकर देशप्रेम का अनूठा परिचय देते हैं| यहूदियों का देश इस्रायल इनका स्वर्ग और यहूदियों का दुश्मन हिटलर इन के बहुमत का इष्टदेव माना जाता हैं|

चुनावी खच्चर को कभी पता नहीं होता कि वह और उसके जैसे दूसरे चुनावी खच्चर अगर किसी ईमानदार निर्दलीय उम्मीदवार को अपना मत दे दें तो वह ईमानदार कर्मठ आदमी देश के काम आ सके|

चुनावी खच्चर खुद भी चुनाव नहीं लड़ता – उसे पता है उसके साथ के दूसरे चुनावी खच्चर उसे अपना मत नहीं देंगे|

चुनावी खच्चर को विशवास रहता है कि उसका मालिक, अधिकारी, शिक्षक, और बाप गधा है और अक्सर किसी असली गधे यानि बाहुबली, धर्मगुरु, फिल्म अभिनेता को यह अपना असली घोड़ा मान लेता है|

बुलावा गुजिया का

अगर मैं आप को गुजिया खाने का बुलावा दे रहा हूँ तो शायद आप भारतीय संस्कृति से पूरी तरह परिचित नहीं हैं| अगर आप को त्यौहार पर पकवान खाने का बुलावा देना पड़े तो आप या तो बाहरी व्यक्ति हैं या गाय, कुत्ते, कौवे, चींटी, पितर, भूत, प्रेत जिन्न| अगर आप भारतीय या भारत प्रेमी हैं तो चले आइये गले मिलने और गुजिया क्या घर में जो कुछ रूखा सूखा होगा पाइयेगा|

यह बुलावा गुजिया बनवाने के लिए मेरे घर आने का है| अपना चकला बेलन साथ लाइए| होली के दो चार गीत भी याद कर कर आइये| होली सिर्फ रंग नहीं है| होली बाजार से गुजिया खरीदकर ले आने की औचारिकता का नाम भी नहीं है| समय के साथ हम सब यह करने लगे हैं, मगर यह अपने आप से और अपनी सामाजिक संस्कृति से खिलवाड़ है|

उन एक मंजिला मकानों की छतें कंधे से कन्धा मिलाकर खड़ी होतीं| पड़ोसी की रसोई से केवल खुशबू आपके आँगन तक नहीं आती थी, आपके लिए दिल खोल बुलावा लाती थी| खुशियाँ सिर्फ परिवार के साथ चुपचाप ढ़ाबे पर खाना खाने का नाम नहीं थीं| वरक, पापड़ और न जाने क्या क्या मिलकर बना करता था| माँ गरीब पड़ोसियों के घर रवा सूजी की गुजियाँ उतने चाव से बनवा आतीं जितने चाव से वो हमारे घर मेवा मखाने की गुजियाँ बनवाने आतीं| दोनों के अपने स्वाद थे| हम बच्चे सूजी की गुजियाँ मांग कर लाते और दूध में गला कर उसकी खीर बना कर खाते| हर घर पकवान का स्वाद अलग होता, अलग मजा होता और अलग अलग वाह वाह होती| आज कितना नीरस है हर दूकान एक सा पकवान|

सुबह से नहीं, हफ्ते भर पहले से बुलावा लगता| दिन तय रहता| दूध वाले से अतिरिक्त दूध का दिन भी सब तय रखते| बाजार में मावा कम हो जाए मगर घरों में दूध बराबर आता –  दो पैसे से दूधिये अमीर नहीं बना करते| बड़े कमरे या बरामदे में जमीन पर गद्दे और चादर बिछतीं| मोहल्ले भर के चकले बेलन सजते| औरतें होली गातीं आतीं और उनके बीच रसिया छिड़ता| कभी कभी हंसी मजाक हदें छूने लगता और दिल उछालें भरता| बच्चे बारी बारी से गुजियाँ सुलाते| बाद में गुजियाँ सिंकना शुरू होती तो पूरे मोहल्ले बंटा करतीं|

नोट – यह आलेख बाजार से लाई गुजिया खाते हुए अपराध बोध में लिखा गया हो सकता है, आप भी इन भावनाओं को साँझा कर सकते हैं|

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