गृहकार्यालय

अंग्रेजी का ऑफिस मुझे अनावश्यक ही महत्वपूर्ण बना दिया गया शब्द लगता है| ऑफिस की आवश्यकता पैदा करना मानवीय असह्ष्णुता का उदहारण है| लम्बे समय तक राजा रंक व्यापारी किसान सब अपने अपने घर से काम करते थे|

हिंदी का शब्द कार्यालय अधिक महत्वपूर्ण है – कार्यालय – कार्य का घर| घर का वह भाग जहाँ बैठकर आप जीविका के लिए कार्य व्यवहार करते हैं| मुझे यह परिभाषा उपयुक्त लगती है|

भारत में पुराने पुराने रईसों की पुरानी पुरानी कोठियां आज तक इस बात का प्रमाण दे रहीं हैं कि बड़े बड़े रोजगार प्रदाता अपने घर में ही अपना कार्यालय बनाये रहे| बाद में जब लोगों ने मिल कर काम करना शुरू किया होगा बाद में जब समस्या उत्पन्न हुई होगी कि किसके घर बैठा जाए|

पुराना प्रश्न है, हम किसी के दरवाजे क्यों जाएँ? कोई दूसरे का नौकर नहीं बनना चाहता|

जब से मैंने अपना काम खुद प्रारंभ किया मुझे घर से काम करना ही उचित जान पड़ा| इसके कई कारण रहे –

  • घर से कार्यालय आने जाने में समय बर्बाद न करना;
  • बचे समय का सदुपयोग;
  • शारीरिक थकान में कमी;
  • वाहन से उत्पन्न वायु, ध्वनि एवं प्रकाश प्रदुषण में कमी;
  • राष्ट्र को विदेशी मुद्रा की बचत; एवं
  • कार्यालय के लिए होने वाले अतिरिक्त खर्च में कमी|

पुराने घरों में दो बैठकों की व्यस्था होती थी| पहली बैठक व्यावसायिक आगंतुकों के लिए होती थी पर बाद में यह बैठक मर्दाना बैठक में बदल गई| दूसरी बैठक पारवारिक मित्रों के लिए थी परन्तु यह समय के साथ जनाना बैठक बन गई| समाज में महिलाओं की उठती परन्तु सीमित सामाजिक भूमिका के समय में यह वर्गीकरण व्याप्त रहा| आज जब समाज में महिला-पुरुष की स्तिथि बराबरी पर आने जा रही है मुझे लगता है कि दोनों बैठकें फिर से व्यावसायिक बैठक और पारवारिक बैठक में बदल जाए तो बेहतर है| व्यावसायिक बैठक में आप जीविका अर्जित करते रहें|

कंपनियों और अन्य व्यावसायिक संगठनों के लिए गृहकार्यालय का विचार सरल नहीं है, उनके लिए कार्यालय से गृहकार्य ले जाने की व्यवस्था हो सकती है|

(कोरोनावायरस के कारण गृहकार्यालय विश्वभर में चर्चा हो रही है)

किराए का पंछी

माँ अक्सर कहतीं थीं, दुनिया किराए का घर है, एक दिन चले जाना है| अजीब था यह निष्कर्ष| जिनके घर अपने होते हैं वो क्या घर नहीं छोड़ते? या कि दुनिया नहीं छोड़ते?

किरायेदार को मोह नहीं होता| किस का मोह| मोह तो मकान मालिक का काम है| जो खुद खड़े होकर मकान ने ईंट गारा लगवाए उस का मोह देखते ही बनता है, मकान क्या उस में जड़ी हुई एक लोहे की एक कील भी नहीं छोड़ना|

किराए के मकान में पैदा होना भी अजीब अनुभव है| आपका लंगोटिया यार भी आपकी किराएदारी का उलहाना रखता है| दीन दुनिया के बहुत से व्यवहार मकान मालिकों में निपट जाते हैं और किरायेदार दूर दूर से अपना पड़ोस देखता रहता है| लम्बे अरसे तक रहने वाले किराएदार अच्छे चाल चलन के बूते कभी पास पड़ोस कुछ रिश्ते बना लेते हैं| यह रिश्ता खतरे की तरह देखा जाता है|

किराएदार का तो अपने मकान के दर-ओ-दीवार से भी कोई रिश्ता नहीं होता| घर गृहस्थी का कोई बड़ा सामान किराएदार नहीं ले पाते| मकान सजाने के सपने अक्सर पूरे नहीं होते| छत पर ईरानी फ़ानूस टांगने का सपना देखना किस किराएदार को नसीब होता है| मकान के हर कोने से पराएपन गूँज सुनाई देती है| दूसरी मंजिल पर रहने वाले किरायदार के बच्चे रस्सी कूद क्या लंगड़ी टांग भी खेलने के लिए गली नुक्कड़ का किनारा ढूंढते नजर आते हैं| पुरानी फिल्मों में किराएदार की बेचारगी की सही बानगी मिलती थी|

जिन दिनों सरकारी नौकरियां तरकारी की तरह बहुतायत में होती थीं तो सरकारी नौकरी वाले किरायेदार अक्सर अपनी अलग दुनिया बनाकर रखते थे| उन नौकरियों के दिन अलग होते थे| केवल सरकारी किरायेदार का रुतवा मालिक मकान के रुतबे से बड़ा होता था|

किराएदार अक्सर खलनायक माने जाते हैं जो मकानों पर कब्ज़ा कर लेते हैं, बेचारा दुकान मकान मालिक दो चार जिन्दगी अपने पुश्तेनी मकान को खाली कराने के लिए दीवानी कचहरी के चक्कर काटता है| मामला कभी भी सत्र न्यायालय भी जाने का अंदेशा बना रहता है|

बंद कानों वाली दुनियाँ

दीवारों के कान होते हैं| जो कुछ नहीं सुनना चाहिए, सब सुन लेतीं हैं| दीवारों के चार छः मुँह भी होते हैं, जो कुछ सुन लेतीं हैं, गा गाकर दुनियाँ को सुना देतीं हैं| दुनियाँ दीवारों के कानों सुनीं बातें खूब सुनती है|

मगर यह दुनियाँ तो बहरी है| कौन किसी की सुनता हैं यहाँ? न मैं न तुम – कोई नहीं| सारी दुनियाँ अकेली और उदास है| कौन यहाँ किसी का दुःख बाँटने बैठा है? कोई किसी का कन्धा थपथपाने वाला नहीं, कोई गले लगाने वाला नहीं, कोई पीठ पर हाथ रखने वाला नहीं| दुनियाँ हजार हजार कोठरियों का बंद पिंजड़ा है| इन सभी कोठरियों को हवा की जरूरत है| खुलनी चाहिए कई खिड़कियाँ दस दिशाओं में| कुछ खुले आसमान कुछ तारों भरी रात कुछ हरे मैदान कुछ झम-झमझमाती हुई बारिश|

वक़्त के पीछे भागती इस दुनियाँ में कोई इंसान नहीं रहता छोटी छोटी कोठरियाँ रहतीं हैं| बंद डिब्बे – जो शायद ही कभी खुलते हैं – कहते हैं तो झरोके की तरह हवा की किसी हल्के फुल्के झोंके से| खुलने से डरने वाले डिब्बे – खुली और तेज हवा में चटकनियाँ चढ़ा लेते हैं|

बस, मेट्रो, ट्रेन, हवाई जहाज, स्टेडियम, और सारी दिल्ली में होने वाले तमाम समारोह खुली हवा लेकर आते हैं और हमें बुलाते हैं| मगर क्या वहाँ इंसान जाते हैं?

यूँ ही टैक्सी में बैठे बैठे मैंने कान पर फुसफुसिया लगाये गाने सुन रहा था| चालक ने अचानक पूछा, आप भी श्रीमान बंद डिब्बा निकले| सुनाई तो नहीं दिया – महसूस हुआ – उसने कुछ कहा है| धीरे से कान से फुसफुसिया हटाया और सड़क की तरफ देखने लगा| चालक ने फिर पूछा, झिरी से झाँक रहे हैं? मुस्कुरा दिया| लगा हवा का कोई हल्का सा झोंका है| चलो, अपनी जिन्दगी के इस बंद डिब्बे का एक छोटा सा झरोका खोल लिया जाए| यूँ ही कुछ यूँ ही सी बातचीत शुरू हुई| गाड़ी और बातचीत चलती रही – चालीस किलोमीटर|

कई बार सोचता हूँ – फ़िल्में, गाने, किताबें, क्या हैं ये सब? जब सारी दुनियाँ बाहें फैलाये खड़ी हो अपने कान क्यों बंद कर लेता हूँ मैं? दुनियाँ का दरवाज़ा खोलने की चाबी खुद अपने कान में लगानी होती है|

दुनियाँ आँख से नहीं कान से देखी जाती हैं, आँख सिर्फ़ यह बतातीं हैं कि देखना कब और कहाँ है?

मैं अक्सर टैक्सी में होता हूँ तो एक छोटी दुनिया बना लेता हूँ, जिसमे मेरा और चालक का सारा जहाँ थोड़ी देर के लिए सिमट आता है|

हम देखेंगे: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

पहले प्रस्तुत है मूल रचना का हिंदी भावानुवाद जिसे श्री विपुल नागर ने किया है:

 

हम देखेंगे

निश्चित है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वचन मिला है
जो वेदों में लिख रखा है

जब अत्याचार का हिमालय भी
रुई की तरह उड़ जाएगा
हम प्रजाजनों के कदमों तले
जब पृथ्वी धड़ धड़ धड़केगी
और शासक के सर के ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
जब स्वर्गलोक सी पृथ्वी से
सब असुर संहारे जाएँगे
हम दिल के सच्चे और वंचित
गद्दी पर बिठाए जाएँगे
सब मुकुट उछाले जाएँगे
सिंहासन तोड़े जाएँगे
बस नाम रहेगा ईश्वर का
जो सगुण भी है और निर्गुण भी
जो कर्ता भी है साक्षी भी
उठेगा “शिवोऽहम्” का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज करेगा ब्रह्म-पुरुष
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

हम देखेंगे!

मूल उर्दू रचना देवनागरी लिपि में: 

हम देखेंगे

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

वो दिन कि जिस का वादा है

जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है

जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिराँ

रूई की तरह उड़ जाएँगे

हम महकूमों के पाँव-तले

जब धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर

जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी

जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से

सब बुत उठवाए जाएँगे

हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम

मसनद पे बिठाए जाएँगे

सब ताज उछाले जाएँगे

सब तख़्त गिराए जाएँगे

बस नाम रहेगा अल्लाह का

जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी

जो मंज़र भी है नाज़िर भी

उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो|

क्या इस रचना का विरोध उचित है?

सत्ता के सिंहासन पर

सत्ता के सिंहासन पर हर युग में रावण आएंगे

रामायण के हर मंचन में पुतले ख़ूब जलाएंगे||

नाम धर्म की बातें होंगी, कर्म कांड अपनाएंगे,

कर्मयोग को करने वाले सत्यनाशी कहलायेंगे||

सिंहासन के चारण चार देशभक्त हो जायेंगे,

देश कर्म को करने वाले देश निकाले जायेंगे||

बातों की बारिश में राष्ट्र कर्म बह जायेंगे|

पापकर्म को करने वाले गंगा खूब नहायेंगे||

गंगा जमुना के पानी जब कलुषित हो जायेंगे,

जल प्रदूषण करने वाले पूण्यपुरुष कहलायेंगे||

भूखे पेट सोने वाले राष्ट्र बोझ कहलायेंगे,

कर चोरों के सिर पर स्वर्ण मुकुट शोभायेंगे||

संसद की इन प्राचीरों से राजा जोर लगायेंगे,

सोने की हर लंका को रावण खुद खा जायेंगे||

जलता देश – आधार और नागरिकता

देश जलता है धूआँ धूआँ| क्या यह अचानक है? क्या देश को जलने की अनुमति दी जा सकती है? जब देश अपनी उत्पादकता के सबसे नीचे पायदान पर हो तो तब क्या इस प्रकार के अराजक माहौल को पैदा होने की अनुमति दी जा सकती है? जिस समय देश गरीबी और बेरोजगारी के सबसे ख़राब पायदान पर खड़ा है, उस समय हम विदेशियों को नागरिकता देने की घोषणा कर रहे हैं| यह सब उस समय हो रहा है जब लाखों लोग विदेशी कहकर अस्थाई जेलों में बंद कर दिए गए हैं और उन में से कुछ को सरकार नागरिकता देना चाहती है, बाकी लोगों का सरकार क्या करेगी उसे खुद नहीं पता|

राष्ट्रीय नागरिकता पंजी कोई आसाम में लागू होने के साथ पूरे भारत में क्यों नहीं लागू हुई मुझे यह पूछना है| शेष भारत में हमने हास्यास्पद आधार/अद्वितीय पहचान संख्या को चुना| आखिर क्यों हमने  देश के सभी वैध अवैध वासियों को आधार उपलब्ध कराया? क्या यह देश के संसाधनों की बर्बादी नहीं थी? साथ ही हमने आधार के हित में जो तर्क दिए वो भी आज तक गलत साबित हुए हैं जैसे सरकारी योजनाओं के लाभ के सीधे हस्तांतरण की बात| यह अलग बात हैं कि हमें दुश्मनों की सुविधा के लिए देश के नागरिकों और निवासियों का पूरा बायोमेट्रिक्स डाटा तैयार कर दिया है| आधार अभी तक ऐसा ताला साबित हुआ है जिससे सुरक्षित की जाने वाले संपत्ति का कुल मूल्य कम था| आधार पूरी तरह से संसाधनों तकनीक जनविश्वास और जनसहयोग के दुरूपयोग का मामला है| आखिर में नागरिकता पंजी के समय में आधार पर प्रश्न क्यों कर रहा हूँ?

क्योंकि सरकार और ठेकेदारों की नीयत किसी सही कानून और निष्कर्ष पर पहुँचने की नहीं है| सरकार नागरिकता कानून और नागरिकता पंजीकरण को उसी प्रकार के भावनात्मक नारेबाजी में प्रयोग करना चाहती है जैसा आधार  या अन्य पुरानी योजनाओं का दुरूपयोग सरकारें करती रहीं हैं|

नागरिकता पंजीकरण के बारे में हास्यास्पद तर्क पिछले कई दशकों से सरकारें दे रहीं हैं –  कि यह नाम मात्र का राष्ट्रीय हैं और सरकार समर्थक सत्ता बने रहने तक उस पर अंधविश्वास भी करते रहे हैं| अगर यह राष्ट्रीय नहीं है तो चिंता का पहला विषय होना चाहिए क्योंकि असम में अपनी नागरिकता साबित न कर पाने वाले लोग अन्य राज्यों में आकर बस सकते थे और बसे भी हैं| असम में मात्र वह लोग ही रुके जिन्हें या तो अपनी नागरिकता साबित करने की क्षमता पर यकीन था या उनके पास बहार संसाधन अन्य राज्यों में आने के संसाधन नहीं थे या फिर वह जिन्हें सरकार पर यकीन था की उनकी सुधबुध ली जाएगी| लाखों अवैध साबित हुए हिन्दू आप्रवासी इस तीसरी कतार में आते हैं| वर्तमान सरकार ने अपने इस नवीनतम (पहले ये कांग्रेस के साथ माने जाते थे) वोटबैंक का हित साधने के लिए नागरिकता संशोधन क़ानून भी पारित किया|

इस का दोहरा विरोध है| पहला विरोध आसाम में है| यह आसाम समझौते और उच्चतम न्यायालय के आदेश की अवहेलना का मार्ग खोलता है और उन लोगों को जिन्हें आसाम से निकाला जाना था आसाम में बनाए रखने का रास्ता देता है| साथ ही यह आसाम के सामान रूप से अवैध मुस्लिम आप्रवासियों को संकट में, देश में और बंदीघर में बनाये रखता है| यह भेदभाव पूर्ण और देश के लिए दुर्भाग्य पूर्ण है|

दूसरा इस नागरिकता संशोधन कानून को दूरगामी प्रभाव के स्थान पर तात्कालिक राजनैतिक लाभ के हिसाब से बनाया गया है| यहाँ तक कि ऐतिहासिक उदाहरणों का भी ध्यान नहीं रखा गया है| श्रीलंका और म्यान्मार में हिन्दूओं पर अत्याचार के मामले बांग्लादेश के मुकाबले अधिक माने जाते हैं मगर इन दोनों देशों के हिन्दुओं का ध्यान नहीं रखा गया है| साथ ही यूगांडा जैसी स्थितियों से निपटने का कोई उपाय नहीं किया गया है जबकि फ़िजी और कई अन्य देशों के भारतीय मूलक हिन्दू मुस्लिम खतरनाक परिस्तिथियों में रहने के लिए मजबूर हैं|आप यह तर्क दे सकते हैं कि हम दुनिया की ठेकेदारी नहीं ले सकते मगर इन देशों में रहने वाले भारतीय मूलक हिन्दू मुस्लमान भारत भूमि के ही मूल निवासी हैं|

हिन्दुत्ववादी तत्व अक्सर यह कहते हैं कि हिन्दूओं के लिए भारत के अलावा कोई देश नहीं तो मुझे उनकी अधकचरी समझ पर दया आती हैं| दूसरा यह गैर भारतीय हिन्दुओं पर उनके अपने देश के प्रति देशभक्ति पर शंका जताता है| किसी को गैर भारतीय हिन्दुओं की उनके अपने देश के प्रति देशभक्ति पर शक करने और उनको बिना किसी प्रमाण भारत भक्त मानने का कोई आधार नहीं| यह इस प्रकार है कि मक्का मदीना सऊदी अरब में होने से कोई मुस्लिम सऊदी का देशभक्त नहीं हो जाता वरन सऊदी अरब के अलावा किसी मुस्लिम राष्ट्र का अस्तित्व नहीं होता और प्राचीन भारत भी कभी टुकड़ों में नहीं बंटा होता| यह बात माननी चाहिए कि जो भारत में रह रहा हैं उसका स्वभावतः भारत से प्रेम होगा| यह भी समझना चाहिए कि देश में मौजूद किसी कमी के प्रति इशारा करने से कोई देशद्रोही नहीं हो जाता|

नागरिकता कानून में कई अजीब पेंच हैं| क्या कोई पाकिस्तानी या बंगलादेशी देशभक्त हिन्दू भारत में जासूसी के इरादे से भारत नहीं आ सकता? क्या कोई पाकिस्तानी या बंगलादेशी देशभक्त मुस्लिम धर्म परिवर्तन कर कर पीड़ित होने का नाटक कर जासूसी के इरादे से भारत नहीं आ सकता?

दूसरा एक प्रश्न भी है – अगर “हमारे मेहुल भाई” के नाम से “सज्जन” भारत के नागरिक होने के सबूत नहीं देते तो उनके प्रत्यावर्तन पर इसका क्या असर होगा (नोट – वह पहले ही नागरिकता त्याग चुके हैं)| क्या विजय माल्या की नागरिकता ख़त्म होने से उनके प्रत्यावर्तन पर कोई असर होगा?  लेकिन इससे सम्बंधित एक प्रश्न और भी है| अगर कोई अप्रवासी भारतीय जो लम्बी अवधि के रोजगार वीजा पर विदेश में हैं और नागरिकता पंजी में नाम लिखाने के लिए पूरे सबूत जुटाने में असफल रहता है तो उसकी नागरिकता और वीजा पर क्या असर होगा?

अभी के लिए इतना ही|

धृतराष्ट्र के पुत्र

||एक||

धृतराष्ट्र के सौ पुत्र!

मैं हजारों देखता हूँ,

दृष्टि दिगन्त दुःख है,

गान्धारी पीड़ा धारता हूँ||

||दो||

राज्य प्रासाद के प्रांगण में

चौपड़ नहीं बिछती सदा,

शत-पञ्च के बहुमत से

कौरव विजयी होते रहे||

||तीन||

जो सत्य के साथ हों,

पांच गाँव माँगें सदा,

हस्तिनापुर की जय हो,

पाण्डव करें पुकार,

एकलव्य क्या कहे

क्या धर्म आधार||

 

-ऐश्वर्य मोहन गहराना