प्रदूषण का साल

दिल्ली में साल २०१७ प्रदूषण का साल रहा| हर साल बढ़ते प्रदूषण के लिए दिल्ली वाले नई नई दलीलें पेश करते हैं| इस दलीलों का कुल जमा मतलब यह होता है कि प्रदूषण का कारण दूसरे हैं, वो नहीं| इन दलीलों में दिल्ली वाले यह भूल जाते हैं कि प्रदूषण से बीमार पड़ना और मरना उनको है; दूसरों को नहीं|

मुझे साल २००५ में पहली बार बोला गया कि दिल्ली छोड़ कर किसी प्राकृतिक जगह में चले जाओ| मगर बहुत से कारण रहे, यह नहीं हो पाया| उस समय मुझे लाइलाज खाँसी का मरीज बताया गया| खैर, खाँसी का होमियोपैथी में इलाज हुआ और जो थोड़ा बहुत बचा था उसे देशी नुस्खे ने दूर कर दिया| दिल्ली में रहना आजकल एक अग्नि परीक्षा है| आज सुबह रोज इस उम्मीद में मोबाइल पर प्रदूषण का स्तर देखता हूँ कि शायद कम हो, मगर होता नहीं|

दशहरा के साथ जो ठंडक, उत्सव, मौज-मस्ती के जो दिन शुरू होते हैं वो मेरे लिए पस्ती के दिन बनने लगते हैं| नाक ढंकने के लिए कपड़े से लेकर मास्क तक का इंतजाम शुरू होने लगता है| फिर भी कुछ न कुछ चूक होती है| फ़िजाओं में फैला जहर कहीं न कहीं फेफड़ों तक पहुँचता ही है|

पिछले तीन हफ्ते से खाँसी से हाल बुरा रहा| बिना मास्क के घर से निकलने पर गले में खारिश और सीने में जलन होने लगती है| खाँसी से कमर टूट जाती है कई बार| इस दिसंबर में कमर में दर्द रहा| आज भी है| आँखों में जलन तो अब कहने की बात नहीं| यह सब शायद अकेले मुझे होता है| अगर बाकी लोगों को होता तो वो भी आवाज उठाते| अगर वो लोग गूंगे हैं, तो अपने बुढ़ापे तक बहरे और अंधे होने से कोई नहीं रोक सकता|

आप किसी भी राजनीतिक पार्टी से हों, पूछें तो सही पार्टी से क्या कर रहे हो उस देश या राज्य में जहाँ सत्ता में हो| अगर भाजपाई हो तो पूछो कि अगर सारा दोष राज्य का है तो उनकी दिल्ली सरकार बर्खास्त क्यों नहीं हो रही| अगर आप-पार्टी से हैं तो पूछे कि क्या कदम उठे| अगर राजनीति में गधे हो तो पूछो सब सरकारों से कि क्या कर रहे हो? कांग्रेस और कम्युनिस्ट से भी पूछो की सत्ता और विपक्ष में रहकर पर्यावरण पर तुम्हारे सरोकार क्या थे और हैं?

मगर मरने तक हम अपनी अपनी पार्टी को बचायेंगे, अपने अपने त्योहारों की कुरीतियों को बचायेंगे, अपने अपने धंधे के गंद छिपाएंगे| और किसी दिन खांसते खांसते एक गूंगी बहरी मौत मर जायेंगे|

जी तो पा नहीं रहे, आइये मिलकर मरें|

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बदला लेने वाला न्याय

अजीब मनस्तिथि है| तलवार दम्पति की रिहाई से कोई खुश नहीं दिखाई देता| हर तरफ एक अजब सा मातम है| हर किसी को बिटिया को न्याय न मिलने का दुःख है|

लोग इस रिहाई से इसलिए दुःखी नहीं कि किसी के दोषी होने पर विश्वास है, बल्कि उन्हें आरुषि तलवार की हत्या का जल्द से जल्द बदला लेना हैं| बड़े मुश्किल से उन्हें कोई मिला था जिसे दोष दिया जा सकता था| शक के बिना पर किसी पर भी ऊँगली उठाई जा सकती है| अगर आपकी पुलिस व्यवस्था नाकारा हो, तब भी किसी न किसी तो तो न्याय के कठघरे में खड़ा करना ही होगा| अंधेर नगरी में क्या न्याय नहीं होता होगा|

न्याय; बदला लेने की आदिम जंगली गैर मानवीय प्रवृत्ति परिष्कृत प्रक्रिया का सभ्य – सुसंस्कृत नाम है और अब तो इसपर आधुनिकता का ठप्पा भी है| कर्मफल के आधार पर न्याय तो प्रकृति स्वयं करती है| या फिर क़यामत के दिन ईश्वर ख़ुद न्याय करता है| परन्तु किसने देखा कर्मफल? किसने देखी क़यामत?

न्याय इसी जन्म में इसी धरती पर जल्द से जल्द सब निपटा देने का नाम है| न्याय और बदला लेने की प्रक्रिया में मामूली सा अंतर है| न्याय प्रायः सबूत मांगता है और बदला शायद ही सबूत की कद्र करता हो| न्याय में न्यायाधीश को अपनी निजी भावना से ऊपर उठाना होता है और बदले में निजी भावना सर चढ़कर बोलती है| जरूरी नहीं बदला लेने के लिए आपके किसी प्रियजन या प्रियसम्पत्ति का कोई नुक्सान हुआ हो| आप अनजान मुल्क के अनजान पत्थर के टूटने पर भी अपने पुराने मित्र से बदला ले सकते हैं|

बदला लेने की भावना किसी अदालती कार्यवाही की मोहताज नहीं होती| बदला केवल शक की बिना पर या अपने पक्षपात लिया सा सकता है| कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह शक किसी षड्यंत्र ने पैदा किया है या अपने सर से काम के बोझ से परेशान पुलिस या न्याय व्यवस्था ने| बदले की भावना पुलिस और न्याय प्रशासन की उन्नति में बाधा होती है और उसपर जल्दी परिणाम लाने का दबाब डालती है| यह दबाब ही किसी न किसी निर्दोष को फंसा देने के लिए प्रशासन को मजबूर करती है| आप सही न्याय होते नहीं मात्र न्याय होते देखना चाहते हैं| आप टेलीविजन के किसी रियल्टी शो की तरह घटनाओं को देखते और प्रतिक्रिया देने लगते हैं| ऐसे में हर व्यक्ति दूसरों के लिए न्यायाधीश बन जाता है और बड़े बड़े फ़ैसले पान की दुकान, सोशल मीडिया और ख़बरिया चैनल पर होने लगते हैं| आपका सरोकार नहीं कि पुलिस को सबूत मिले या नहीं, दोष सिद्ध हुआ या आपके दबाब में आरोपों को जस का तस मान लिया गया|  आप अपने रियल्टी शो में बदला पूरा करना चाहते हैं, भले ही आरोपी दोषी हो या न हो|

जब आप ऐसे न्याय पर खुश होते हैं तब असल आरोपी आपके घर में बैठकर किसी न किसी दिन आपको निशाना बनाने की तैयारी कर रहा होता है|

साहित्य के उत्सव

साहित्यक समारोहों के प्रति जनता प्रायः निर्लिप्त भाव रखती रही है| साहित्य समारोह भी प्रायः आलोचकों, समालोचकों, पुरस्कार प्रदाताओं के वो परिपाटी बने रहे जिनमें आम जनता आम की गुठली की तरह निष्प्रयोज्य होती है| अपने इस संभ्रांत रवैये के कारण हाल के वर्षों में साहित्य समारोह हाशिये पर चले गए हैं और उत्सवों, जश्नों और फेस्टिवल ने ले ली है| उत्तर भारत में ठण्ड के आते ही शादियों के साथ साथ साहित्य और सांस्कृतिक उत्सवों का मौसम भी शुरू हो जाता है|

यह उत्सव, भारत के तीज त्योहारों की तरह समाज के हर वर्ग के लिए कुछ न कुछ समेटे रखते हैं| यहाँ साहित्य और उपसाहित्यिक गतिविधियाँ होती हैं| गंभीर साहित्य चर्चा को अक्सर मुख्य पंडाल अलग स्थान मिलता है| जिन समारोह में गंभीर साहित्य मुख्य पंडाल में होता हैं, वहां भीड़ प्रायः वहां नहीं होती| भले ही साहित्यकार इस प्रकार की स्तिथि को साहित्य विरोधी मानते हैं परन्तु भीड़ साहित्य से बहुत दूर नहीं होती| आप भीड़ से हमेशा गंभीर साहित्य से जोड़े हुए नहीं रख सकते| लोकप्रिय पंडाल प्रायः फिल्मकारों, पत्रकारों, से भरे महसूस होते हैं क्योंकि मीडिया में इनकी खबरें देने और पढ़ने वाले बहुत होते हैं| लोकप्रिय पंडाल में गायन, वादन और नृत्य का समां बंधा रहता हैं जिसमें फिल्म भी एक विधा है| नाटकीय प्रस्तुतियां – कथा पाठन, नृत्य नाटिकाएं, आदि होती हैं मगर प्रायः रंगमंच इन उत्सवों का भाग नहीं होता|

मेरी समझ में भोजन संस्कृति को जानने समझने का उचित माध्यम हैं और आजकल अधिकतर उत्सव इस पहलू पर ध्यान दे रहे हैं| सांस्कृतिक पहलू के अलावा भी भोजन दो प्रकार से महत्वपूर्ण हैं, एक तो उत्सव में जुटी हुई भीड़ को उत्सव से दूर न जाने देने के लिए उनका पेट भरे रखना होता है दूसरा लाभ में मामूली सी हिस्सेदारी से उत्सव का खर्च भी कुछ हद तक पूरा जा सकता है| आम जनता के लिए तरह तरह के खाने और जायके तक एक ही स्थान पर पहुँच भी बड़ी बात है|

किताबें किसी भी साहित्य उत्सव का केंद्र होती हैं| जहाँ साहित्य किताबों के बिना बेमानी है| साहित्य उत्सव आम जनता साहित्यिक किताबों से जुड़ने का पुस्तक मेलों के मुकाबले अधिक उचित अवसर प्रदान करते हैं| यहाँ लोग सीधे सीधे किताबों से जुड़ते हैं, उनके बारे में हुई चर्चा से प्रभावित होते हैं और उन्हें साहित्य के परिदृश्य में देख समझ पाते हैं| हाल में साहित्येतर सांस्कृतिक गतिविधियों और भोजन के अलावा साहित्येतर सांस्कृतिक सामिग्री को भी इन उत्सवों में जगह मिलने लगी है| यह बाजार का साहित्य उत्सवों पर अतिक्रमण नहीं है वरन एक दुसरे से लाभ उठाने का प्रयास है|

इन उत्सवों में साहित्यिक संभ्रांतों का स्वांत सुखी वर्चस्व जरूर समाप्त हुआ है, मगर यह समाज के उच्च मध्यवर्ग का अपनी जड़ों से आज भी जुड़े होने का भ्रम कायम करने का माध्यम भी हैं| जश्न – ए अदब और जश्न – ए – रेख्ता जैसे उर्दू भाषी उत्सवों में भीड़ भडाका जनता की भाषा आश्चर्यजनक रूप से अंग्रेजी है| लोग उर्दू के नजाकत और नफासत की बातें उर्दू में नहीं बल्कि बनावटी अमरीकी लहज़े की अंग्रेजी में करते हैं| ग़ालिब का ज़िक्र करते समय उनके शेरोशायरी का ग्लेमर जेहन में उछालें मारता है, की ग़ालिब को लेकर उनकी समझ|

जिस उत्सव में जितने कार्यक्रम समानांतर चलते हों, वह उतना बड़ा उत्सव है| मगर लोगों के जमावड़े को बुलाना, उसे जमाये रखना, जिमाये रखना, और ज़ज्बा बनाये रखना अपने आप में बड़ी बात है|

कोवलम तट

जब अनजान लोग किसी अनजान जगह तलाश में जाते हैं तो कुछ पक्का पता नहीं चलता कि उसी जगह पहुंचे जहाँ जाना था या कुछ नई ख़ोज हुई| कोवलम तट पर हमारी यात्रा भी कुछ इस तरह ही थी| अपने वयस्त कार्यक्रम के दौरान कुछ घंटे चुराए गए और दोस्तों का एक समूह बिना किसी शोध – ख़ोज के टैक्सी में सवार होकर चल पड़ा| कष़ाकूटम से हमें ले जाने वाला टैक्सी चालक हिंदी और अंग्रेजी लगभग न के बराबर समझता था| हम कोवलम में उसके अनुसार मुख्य स्थान जुमा मस्जिद के पास तट पर उतारे गए| कोवलम के प्रसिद्ध तटों से अलग हम आम देशी जनता से भरे तट पर थे| कुछ स्थानीय लोग तफरीह कर रहे थे और बाकि मछली पकड़ने में व्यस्त थे|

तट पर भीड़ बहुत थी| होटल लीला (halcyon castle)और जुमा मस्जिद के उत्तर में ऊँची चट्टानों और लहरों की आँख मिचौनी के बीच हम चट्टानों के निकट जा विराजे| इन चट्टानों के लिए लिखा हुआ था कि संभल कर चढ़ें| यह भारी भरकम पत्थर थे जिनपर तेज लहरें आकर अपना जोर अजमाती थीं| यहाँ शांति थी| चट्टानों के दूसरी ओर एक रिसोर्ट में का समुद्र तट था जिसमें विदेशी सैलानियों की बहुसंख्या थी|

चट्टानों की तरफ शुरुआत में वहां एक छोटी मोटी संरचना थी, जिसे झंडियाँ लगा कर किसी साधारण दरगाह का रूप दिया गया था| मैं और मेरे दो मित्र सुन्दर नजारों के लिए अपनी किस्मत अजमाने इन चट्टानों पर चढ़े और यह अच्छा काम हमने किया| एक तो छोटी मोटी मगर कठिन चढ़ाई का लुफ्त मिला, दूसरा वहां समुद्र की लहरें और आवाज तेज थी| पत्थरों से टकराती लहरें तेज उठतीं गिरतीं थीं| हम यहाँ बैठ गए और दूर तक समुन्दर उछालें लेता था| छिपता हुआ सूरज रंग और नज़ारे बदल रहा था| इसे लिखा नहीं जा सकता| मैंने अपने घर फ़ोन कर कर पिता, पत्नी और बेटे को सीधा प्रसारण कर डाला| मेरा बेटा चट्टानों पर मेरे चढ़ने उतरने का कौशल देख खुश था| शायद यह ग्रोव तट कहलाता है|

उसके दक्षिण में विश्व प्रसिद्ध लाइटहाउस तट और हवा तट हैं| केरल पर्यटन का समुद्र तट रिसोर्ट उत्तर में शोभायमान है|

 

आसमान की ओर

आसमान की ओर जाते हुए हम क्या करते हैं? आसमान की ओर जाना, उड़ जाना मानव का सदियों पुराना सपना है| आज भी पहली बार उड़ पाना करोड़ों लोगों के लिए एक उदास सपने की तरह है| भारत में हर उड़ान आज भी किसी न किसी ऐसे शख्स को लिए जाती है जो आसमान की उड़ान का आदी न हुआ हो| बहुत से लोगों के लिए यह सपना अभी हक़ीकत नहीं बनता| जिनके लिए यह हक़ीकत हो जाता है उनके मिज़ाज बदले नज़र आते हैं|

हम सब सड़क पर चलते हुए साधारण होते हैं और एक बात कार में बैठकर अपने आप को औकात का बाप समझने लगते हैं| मैं अपनी साईकिल पर चलते हुए महसूस करता हूँ कि बिना हेलमेट चलने पर पीछे से आने वाली कारें अधिक हो- हल्ला करतीं हैं और उनके सवार एक साईकिल सवार कीड़े को मसल देना चाहते हैं| जबकि यही लोग ख़ुद पैदल चलते हैं तो अक्सर रवैया बदल लेते हैं| यह सब आसमान में उड़ने वालों पर भी होता है, मगर ट्रेनों की तरह उड़ाने भी बहुत अधिक नखरा दिल में पैदा करतीं| मगर फिर भी व्यवहार में ख़म आ जाना मानव चरित्र का लक्षण है|

सुबह की उड़ाने अक्सर हमें अधिक चिंतित करतीं हैं| एक दिन पहले से हमारी सोच उड़ना शुरु कर देती है, जो किसी भी लम्बी यात्रा में होता है| मगर हवाई यात्रा में समय पर पहुंचना बहुत मायने रखता है| हवाई यात्रा की ख़ुशी को सुरक्षा जांच अक्सर थोड़ा धरातल की ओर ले जाती है| आप एक दिन पहले से उल्टा हिसाब लगाना शुरू कर देते हैं| पौन घंटा पहले आपको दिए गए गेट पर पहुंचना होता है| उस से पहले सुरक्षा जांच की लम्बी होती जा रही कतारें| घरेलू उड़ानों में सुरक्षा जांच आज भी आपके पंद्रह मिनट आराम से ले लेती हैं| इस बीच लगभग हम सब सामान्य सुविधाओं का प्रयोग करना चाहते हैं| चेक-इन काउंटर पर आपको लगभग पंद्रह मिनट लगते हैं| वयस्त हवाई अड्डों पर डिपार्चर टर्मिनल में टेक्सी से उतरने के बाद लगभग पांच से पंद्रह मिनट लगते हैं| कुल मिलाकर वयस्त हवाई अड्डों पर आपको कम से कम दो घंटा पहले हवाईअड्डे पर पहुंचना होता है| घर से हवाईअड्डे की दूरी हम भारतीय अन्य सभी दूरियों की तरह घंटों में नापते ही हैं|

मन में अक्सर सुबह की उड़ान पकड़ने की चिंता रहती है| इस कारण नींद न आना और नींद आ जाने पर समय पर खुल न पाना चिंता का कारण बन जाता है|

आजकल वेब- चेकइन भी एक अलग पीड़ा है – करें या न करें| वेब – चेकइन में अक्सर पैसे से मिलने वाली सीटें हमें विंडो पर मुफ्त मिल जाती हैं| अक्सर आसमान में खाना पीना भी आसमान छूता है| तो घर के कुछ खाकर जाने की चिंता भी रहती ही है|

अगर आपकी उड़ान १००० किलोमीटर से कम दूरी की है तो क्या कहने| यह शानदार है कि आपको बोर होने का मौका नहीं मिलेगा और अगर आप उड़ान में कुछ काम जैसे – नींद लेना करना चाहते हैं तो भूल जाइएगा|

 

दिल्ली का प्रदूषण पर्व

दिल्ली में साल भर प्रदूषण का स्तर ख़तरे की सभी सीमाओं से कई गुना ऊपर रहता है| लेकिन दिल्ली वाले ठहरे आँख के अंधे कान के कच्चे| न कोई सही चीज आसानी से दीखे, न कोई सही बात आसानी से सुनाई दे| जब तक प्रदूषण से सूरज दिखना बंद न हो जाए तब तक दिल्ली वालों को प्रदूषण समझ नहीं आता| यह उच्चतम प्रदूषण भी दिल्ली वालों के लिए एक पर्व हो गया गया है| बच्चों की स्कूल से छुट्टी, अमीरी में कहीं बाहर घुमने निकल जाना, या एयरप्योरिफायर लगाकर घर में मस्त फ़िल्में देखना| अब तो यह सालाना जलसा हो गया है कि होगा ही होगा| दिल्ली सरकार और भारत सरकार इस पर्व पर कुछ मनोरंजक समाधान पेश करेंगे| यही सब है, और क्या?

वैसे तो प्रदूषण दिल्ली वालों की दीखता नहीं और दिख भी जाए तो हमारे पास बहुत सारे हास्यास्पद समाधान है| जैसे – पंजाब हरियाणा वाले पिराली जला रहे हैं हैं; दिल्ली के गरीब लोग कचरा जला रहे हैं; भवन निर्माण मजदूर धूल उड़ा रहे हैं| हद होती हैं दिल्लीपन की|

प्रदूषण का यह प्रदूषण उच्चस्तर दिल्ली से सामान्य स्तर प्रदूषण से २० से ३०% अधिक ही होता है| सामान्यतः दिल्ली का प्रदूषण स्तर ३०० होता है और दिल्लीवालों का प्रदूषण सहनशीलता स्तर ४०० होता है, जो वैज्ञानिक रूप से पर्यावरण की मृत्यु का परिचायक है| यह प्रदूषणस्तर दिल्लीपन को हास्यास्पद बनाता है| इस स्तर पर दिल्ली की जनता, राज्य सरकार और कभी कभी दिल्ली की भारत सरकार भी जग जाती है| यह जगना इस तरह का है कि कोई नशेड़ी नींद से जागकर नशे में बक बक कर रहा हो|

दिल्ली प्रदूषण के सामान्य प्रमुख कारक भी कम हास्यास्पद नहीं है:

  1. दिल्ली का स्थलमध्य होना: भारत के अधिकतर बड़े शहर समुद्र के काफ़ी निकट हैं, इसलिए प्रदूषण दिल्ली में फंस जाता हैं|
  2. जनसंख्या: प्रति वर्ग किलोमीटर में रहने वाला जनसंख्या घनत्व दिल्ली में इतना अधिक है कि दिल्ली शहर वर्ग प्रतिकिलोमीटर अधिक कार्बन डाई ओक्साइड छोड़ता है| दिल्ली में घरेलू प्रदूषण करक गैस स्टोव, फ्रिज, कूड़ा, हीटर, वातानुकूलन, आदि का घनत्व भी काफ़ी अधिक है|
  3. कूड़ादान: दिल्ली कूड़े का प्रबंधन आजतक ठीक से नहीं कर पाती| यहाँ स्वच्छता का मतलब है किसी मैदान में पेड़ के सूखे पत्तों पर झाड़ू लगाते हुए फ़ोटो खींचना|
  4. जनयातायात साधन: दिल्ली वाले सरकार से यह नहीं पूछते कि बसें इतनी कम क्यों हैं? कॉलोनियों के अन्दर रिक्शे क्यों बंद हैं? मेट्रो का अंतराल कम क्यों हैं? दिल्लीपन में शरीफ़ दिल्ली वालों को मजबूर करता है कि दस हज़ार माहना से भी अधिक खर्चा अपने सर पर डालो और कार ले आओ, भले ही द्वार पर खड़ी रहे| सुरक्षा की संवैधानिक और सार्वभौमिक जिम्मेदारी भी सरकार का उत्तरदायित्व कम से कम दिल्ली में नहीं खड़ा करती|
  5. आस पड़ोस का प्रदूषण: दिल्ली को विकास चाहिए, दिल्ली को सुविधाएँ चाहिए मगर इस विकास की कीमत अदा करने की जिम्मेदारी झारखण्ड, छत्तीसगढ़, या कोई और पिछड़ा राज्य उठाये| मगर भाई प्रदूषण तो हवा के साथ आएगा ही| और विकास की मार झेलता हुया ग़रीब रोजगार की तलाश में दिल्ली ही तो भागेगा ही|

मगर कोई नहीं पूछता की वास्तविक क्या हैं, इनका क्या निदान है और उसमें खुद उसका क्या योगदान होगा और सरकार की अब तब और आगे की उत्तरदायिता क्या है?

खैर छोड़िये, प्रदूषण पर राजनीति करते हैं जब तक दिल्ली वाले खुद प्रदूषण से न मर जाएँ|

बापू की दिल्ली बिल्ली

गबरू नौजवान अपनी शाहना अकड़-धकड़ के साथ चला आ रहा है| उसकी चाल में गजब की मस्ती है मगर चहरे पर लगता है कि बदलते वक़्त ने थोड़ी पस्ती ला दी है| दूर सामने मैदान में दो तीन बूढ़े किसी बात पर संजीदगी से गुफ्तगू कर रहे है| बाद पेचीदा लगती है; नौजवान ने मन ही मन सोचा| वो दूर से ही मामला समझना चाहता है मगर काला कुहासा कुछ देखने नहीं देता| गौर से देखने पर महसूस होता है, बूढ़े मिलकर खों खों खांस रहे है| खांसना भी दिल्ली शहर में गुफ्तगू करने के सलीकों में शुमार होने लगा है|

“क्या इसी कालिख भरे मुल्क के लिए जिए मरे थे?” नौजवान बूढों की तरफ़ बढ़ते हुए सर झटकता है|

उसे अपनी तरफ आता देख बूढ़े शांत होने लगे| पीढ़ियों में सोच का फ़र्क यूँहीं तो नहीं जाता|

“क्या बापू! आज क्या कोई हड़ताल है?” नौजवान ने कुछ परेशानी और कुछ हमदर्दी से पूछा|

मजबूत कद काठी वाला बूढ़ा खों खों कर हंसने लगा|

“अब न वोट क्लब है न जंतर मंतर। हड़ताल करने पर पड़ते हैं हंटर।“ जैकिट वाले बूढ़े ने उदास लहजे में कहा|

“मामला क्या है, कुछ नहीं तो बापू अपनी समाधि पर ही जाकर बैठ जाइएगा|” नौजवान ने मजाकिया मगर इज्जतदार लहजे में कहा|

“आप क्यों नहीं कोई धमाका कर लेते, बरखुरदार?” मजबूत कद काठी वाला बूढ़ा बोला|

“ब्राउन ब्रिटिश से क्या लड़ें? साँस लेना दूभर हो चुका है| अब तो फ़िजाओं में स्वदेशी गर्द और गंदगी है|” नौजवान मायूस लहज़े से कहने लगा| दिल के दर्द से कहिये कि फैफड़े के दर्द से, नौजवान के गले से खों खों के दबी आवाज़ धमाके होने लगे| तीनों बूढों की खाँसी और बढ़ गई|

बापू धरने पर बैठने की जगह ढूंढ रहे थे कि बिना साँस फुलाएं बैठ सके। जगह न मिली दिल्ली में| बिल्ली बने और मास्क पहन लिया ज़नाब।

Delhi pollution (c) vikram nayak