आज की रात सोने दो

मैं तुमसे कहता हूँ

फिर की बातें फिर ही करना,

क्या पता, कल सुबह काली हो,

क्या पता, कल की सुबह काली हो|

आज की रात सोने दो||

 

नींद की क्यारी में

सपनों के बीज बोने दो,

क्या पता, उन्नीदी बंजर हो,

क्या पता, समय की गोद सूनी हो|

आज की रात सोने दो||

 

बिखरा हुआ सपना मेरा,

नींद में तो खिलने दो|

क्या पता, आँखों में मंदी हो,

क्या पता, आँखों पर हदबंदी हो,

आज की रात सोने दो||

 

कल की झूठी आशा में,

ये मंजर धुंधला न खोने दो|

क्या पता, कल घोर निराशा हो,

क्या पता, कल उन्नत आशा हो,

आज की रात सोने दो||

 

 

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मुर्दा ख़यालात

तड़पते हुए पीले पन्नों पर उबलती सुर्ख़ स्याही का दरिया न बाँध;

सुन, मेरे मुर्दा ख़यालात में गुलज़ार का आना जाना हो जायेगा|

 

नीले रंग का समंदर को यूँ आसमां में न उलीच उँगलियों से;

सुन, सलमा सितारों सी साड़ी पहन के निकली मरना हो जायेगा|

 

बिना बहर की ग़ज़ल सी जिन्दगी में रेख्ता की रौनक़ न देख;

सुन, मरे दिल के इक झगड़े में फिर इश्क़ का रगड़ा हो जायेगा|

 

अगले जनम में हमारी मुलाकातों के झूठे वादे न कर इस कदर;

सुन, तेरी इबादतों में मेरे मरने का बेजार अफ़साना हो जायगा|

 

इंसान की तरह खोखले इस आसमान में सुराख़ की बातें न कर;

सुन, पत्थर उछाल तो तपाकर खूब जरा कि आफ़ताब हो जायेगा|

शौर्य अङ्ग दीनदयाल

शौर्य अङ्ग दीनदयाल के बारे में आप ने सुना।

नहीं नहीं, नहीं सुना होगा। कोई है भी नहीं इस नाम का। मगर जिस तरह साम्प्रदायिक उन्माद है, व्यक्ति के धर्म/सम्प्रदाय से देशप्रेम निर्धारित हो रहा है यह आम अस्तित्व में आ सकता है।

उन्मादी तत्व सकते में हैं, ये औरंगजेब कौन है? ये औरंगजेब नाम वाला कैसे देशभक्त हो सकता है। एक तो मुस्लिम, ऊपर से इतना ख़तरनाक हिन्दू विरोधी नाम। शायद सरकार ने गलत नाम लिख दिया होगा।

हालात यह है कि निजी बातचीत में उन्मादी लोग औरंगजेब को शौर्य चक्र मिलना अपनी प्रिय सरकार का चुनावी दाँव पेच तक बता दे रहे हैं। क्या उनकी प्रिय सरकार वही सब कर रही है, जो पहले की तुष्टिकरण सरकार करती थी? फिर फ़र्क क्या रहा? क्या फ़ायदा हुआ आपको सरकार बदलने का। अपनी प्रिय सरकार पर तो भरोसा रखिये।

हालात ही ऐसे हैं। आम लोगों की दुनिया अक्सर अपनी गली मोहल्ले और नाते रिश्तेदारों के आगे नहीं होती। प्रायः हमारे गली मोहल्ले और नाते रिश्तेदार हमारी अपनी जाति के होते है। यह जरूर है कि नई कॉलोनियों में सवर्ण, दलित, और मुस्लिम जैसे थोड़ा बड़ा समूह रहता है, एक जाति के मोहल्ले कम हुए हैं, पर अभी हैं।ऐसे में दूसरी जाति और धर्म तो लगभग पराई दुनिया की तरह होते हैं। जिन से हम मिले नहीं कभी तो अविश्वास बना रहता है।

यह अविश्वास औए बढ़ रहा है। आपसी संवाद तो अब घर परिवार नाते रिश्तेदारी में भी सामाजिक नहीं रह गया, सोशल मीडिया ज्यादा हो गया है। संवाद की कमी ने अफवाह और कही-सुनी ने ले ली है।

मुस्लिम होना ही गलत हो गया है। लोगों को नहीं समझ आता कि अकबर का सेनापति हिन्दू और राणा प्रताप का सेनापति मुस्लिम कैसे हो सकता है। मात्र दिमाग़ी फितूर के चलते नाम बदल जा रहे हैं। जगहों के, योजनाओं के और शायद लोगों के भी। यह सब आज से नहीं हो रहा, पिछले चार पाँच साल से नहीं हो रहा। यह लंबी प्रक्रिया है, काम से कम पचास साल का इतिहास है इसके पीछे।

अब औरंगजेब को लीजिये। देश के लिए लड़ा। मुस्लिम था इसलिए साम्प्रदयिक तत्वों को भरोसा नहीं हो रहा। मुस्लिम होने के साथ उसका नाम और बड़ी अड़चन है। उन्हें लगता है कि कहीं न कहीं वो या उसके मातापिता मुग़ल शासक औरंगजेब की तरह हिन्दू विरोधी होंगे। यह अलग बात कि शासक औरंगजेब का हिन्दू विरोधी होना भी बहस का मुद्दा रहा है। ख़ुद शासक औरंगजेब का सेनापति हिन्दू था।

हाल में दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम अब्दुल कलाम मार्ग रख दिया गया। यह उन्मादियों के दिमाग में बुरा मुसलमान बनाम अच्छा मुसलमान का द्वंद था। ऐतिहासिक तथ्य जहां हैं वहीं रहेंगे। इसकी परिणति कहाँ होगी किसी को नहीं पता। आज बुरे तालिबान अच्छे तालिबान, बुरे मुसलमान अच्छे मुसलमान, मुसलमान हिन्दू, बुरे हिन्दू अच्छे हिन्दू तक कहीं भी जा सकती है।

धर्म से अगर इंसान का बुरा इंसान या अच्छा इंसान होना तय हो जाता तो न रामायण होती न महाभारत। न रावण, न कौरव।

इन दिनों जिस तरह के हालात है, इस औरंगजेब को देशभक्त मानने के लिए साम्प्रदायिक उन्मादियों के पास एक ही सरल तरीका है। नाम बदल देना। क्या उसका नाम शौर्य अंग दीनदयाल रख दिया जाए?

औरंगजेब को शौर्य चक्र मिलने का यह मौका सटीक मौका है कि हम साम्प्रदायिक उन्माद से बाहर आएं।

बादल

मौसम अजब है या गजब है!!

तुमको पता है क्या? क्या सोचना है तुम्हारा? अंदर बेचैनी है या बेक़रारी? कुछ कहा भी नहीं जा सकता। कह सकना आसान नहीं होता। महसूस कर रहा हूँ। तुम्हें भी महसूस हो रहा होगा न?

तुम्हारी चुप्पी वाचाल है, बहुत। कहती तो बहुत है, सुनती है या नहीं! नहीं जानता मैं।

सुबह से फुहार पड़ रही है। फ़ुहार पड़ना मौसम का जादू है। अल सुबह की फ़ुहार, भोर से पहले की फ़ुहार, अग्नि का रूप है या जल का? किसी कवि के लिए कहना मुश्किल। वैज्ञानिकों के पास दिमाग़ नहीं होता, कलपुर्जा होता है। उन से क्या पूछना?

जब घर से निकला था, लोदियों के बाग़ से आती कुछ एक पंछियों की पुकार बताती थी कि प्रेम का समय है, मिलन की बेला है, सृष्टि के सृजन का, जीवन के नव कलेवर का मुहूर्त हुआ जाता है। दिन निकलने ही तो वाला है और दिल्ली सोई हुई है अभी।

लगता था डोली को कुशल कहार लिए जाते हों। मन पुकार था, कार की खिड़कियाँ खुली रखने के लिए। मन पर काबू रखना अच्छी बात नहीं, है न! बाहर झाँकता रहा।

जब आप सड़क पर धीरे धीरे धीर धरे चलना चाहते है, भीड़ नहीं होती। हवाई अड्डे तक के दर्जन भर किलोमीटर मिलीमीटर में बदल जाते हैं। मन कह रहा था न मुझ से – दूरी को लंबाई में नापना पश्चिम वालों की मूर्खता है और वक़्त में नापना पूर्व वालों की।

हवाई अड्डे पर कितनी उदासी होती है। लगता है रोबोट हैं सब। सॉरी, प्लीज् एक्सक्यूज़ थैंक्स जैसे बेमानी शब्द हवा में तैरते हैं जैसे तोते बोलते हैं। याद आती थी बहुत, हवाओं की।

हवा में उठने के बाद कितना अलग हो जाता है सब। ऊपर और नीचे फोहे और फाहे तैर रहे थे। उन के बीच हम टँगे हुए। काले सफेद में भी प्रकृति कितना रच देती है। काले सफेद में भी कितनी रंगतें हैं। इनमें कितने सारे रंग भी तो हैं, रंगतें तो अनगिनत महसूस होती हैं। पता है न तुम को, तुम्हारी हर साँस में अलग खुशबू होती है। क्या तुम्हें पता होगा? तुम्हें क्या पता होगा?

दिल्ली से चेन्नई तक बादलों की अनगिनत रंगतें देखता था, रंग उमड़ घुमड़ आते थे। मन फ़ुहार बन कर बरस रहा था, बरसों की यादें आतीं थी। जब माघों में पानी बरसा करता था। जब सावन में बहारें आतीं थीं। जब मन में मल्हारें आतीं थीं।

सीट बेल्ट को हर पल बाँधना पड़ता था। सुरबाला को डर था शायद मैं उड़ न जाऊँ। या शायद वह भी उड़ रही होगी, कौन जाने? उसके चेहरे को बनावट के कई लेप ढके हुए था। अच्छा भी था। मैं बादलों को पढ़ना चाहता था।

वो शब्द बन कर उड़ते थे, ग़ज़ल बन कर बहते थे, गीत बनकर गुनगुनाते थे, हवा बन कर गुदगुदाते थे, बहार बन कर आते थे, अजनबी बन कर जाते थे, याद बन कर बस जाते थे, सपने बन कर छिप जाते थे, नींद बनकर विलीन हो जाते थे। बादल पर बहारें बहती थी, कागों की कहानी कहती थी, कोयल की वाणी रहती थी, रागों की रवानी होती थी।

जहाज के अंदर आकाशवाणी होती थी, मौसम का हाल ख़राब है। मैं सोचता था, उन्हें मेरे और तुम्हारे मन का पता कैसे चल जा रहा है?

काश, तुम साथ होते तो बादल छूने निकल जाता। तुम साथ ही तो थे, बादल छू रहा था मैं।

हमारा ताज़ा खाना

हम भारतियों को ताज़ा खाने का बड़ा शौक होता है| ताजी हरी सब्जियां और फल हमें निहायत पसंद होते हैं| ताज़ा खाने की तो जिद इतनी कि बासोड़े का त्यौहार भी बहुत से परिवारों में ताज़ा पकवान और मिठाइयों के साथ मनाया जाता है| ताज़ा पानी का शौक इतना कि दोपहर की कड़ी धूप में भी कूएं और चापाकल से दो बाल्टी पानी निकलने के बाद ताज़ा पानी पीने और उसमे नहाने का शौक हमने पूरा ख़ूब पूरा किया है|

मेरे पिता जी तो ताज़ा सब्जियों के इतने शौकीन हैं कि कुछ दिन पहले तक हर रोज मंडी जाकर सब्जियां खरीदना उनका प्रिय शगल था| हमारा तो पता ही पूछ लीजिये, पते में ही सब्जी मंडी लिखा आता है| हमारे फ्रिज में जरूरत से दो गुनी मात्रा में ताज़ा सब्जियाँ मिल जातीं थीं जिन्हें उनकी माताजी दो एक दिन के बाद पास पडौस में भिजवा देतीं और घरेलू नौकरों के घर में भी जाती रहतीं| जिन लोगों के पास समय नहीं होता वो लोग हफ्ते भर की ताजी हरी सब्जियां एक बार में ही फ्रिज में लाकर सजा देते हैं| मेरी ससुराल में भी तो रोजाना ताजी सब्ज़ी आत्ती है| क्या मजाल कि कोई बासी सब्जी चौके के अन्दर चली जाए| जब भी ये नाचीज दामाद ससुराल पहुँचता है तो उसके स्वागत में पकी पकाई ताजी सब्जियां हफ्ते दो हफ्ते से जीजा की दीवानी साली की तरह फ्रिज की आरामगाह में इन्तजार करती नज़र आतीं हैं| अगर इसे आप गप्प समझना चाहें तो समझें मगर कहानी हर घर में यही है|

हिन्दुस्तानी फ्रिज वो जादुई मशीन है जिसमें रखा खाना बासा नहीं होता| बहुत सी ताजी चीज़े हमारे फ्रिज में अपनी सेहतमंदी तारीख़ के हफ्ते दो हफ्ते बाद तक भी मिल जाती है| हमारा बस चले तो खुद तरोताजा रहने के लिए फ्रिज में बैठ जाएँ| शायद ज्यादातर भारतीय इसी मानसिकता के चलते अपने वातानुकूलन को बर्फ की मानिंद ठंडा रखते हैं| अब हमारे टीवी को देख लीजिये सभी की सभी प्रेमिका पात्र हर समय ताज़ा नजर आतीं है|

अब यह कहानी छोड़िये, पुराना किस्सा बताते हैं| उस ज़माने में न फ्रिज था न कोल्ड स्टोरेज| खाना पकता, खाया जाता और गौ माता, बैल मामा, कुत्ते चाचा, चींटी चाची, भैसिया मौसी, कौए बाबा की भेंट चढ़ाया जाता| और नहीं तो मंदिर के पेटू पण्डित जी के थाली किसी न किसी शगुन-अपशगुन के नाम पर निकाल दी जाती| कुछ नहीं तो पड़ोस की चटोरी चाची को कैसा बना है पूछने के लिए भेज दी जाती| वो ये जानते हुए भी उन्हें कोई ब्लोग नहीं लिखना बल्कि बचा ख़ुचा निपटाना है, उसे प्रेम से खा कर तारीफ़ का तरन्नुम गा देतीं| न कीटाणु, न विषाणु, न बासापन, न महक न पेटदर्द; रिश्तों की मिठास बरक़रार| जो चौके में बनता था दिन छिपने तक निपटा दिया जाता| पक्का खाना कहे जाने वाले पकवानों के अलावा एक रात गुजरने के बाद शायद कुछ भीं न खाया जाता| अब तो कच्चा खाना कोई जानता नहीं, बिना पकाई सलाद और सब्जियों की कच्चा खाना समझ लिया जाता है|*

अब देखिये, बासे का राज है| बसोड़े के अलावा शायद ही कोई दिन जाता हो कि कुछ न कुछ बासा न खाया जाता हो| तुर्रा यह कि भोजन की बर्बादी न करने का नाम दिया जाता है, भले ही बिजली और पेट बर्बाद होता रहे| नाप तौलकर बनाने में तो हिसाब गड़बड़ा जाता है|

इससे पहले कि मेरा लिखा आपको बासा लगने लगे, कुछ ताज़ा ताज़ा तारीफ करते जाइये|

*खाना मतलब जो रसोई में पक चुका  हो, बाकि तो फल सलाद सब्जियां है, खाना नहीं|

दक्षिण भारतीय खाना – दिल्ली बनाम चेन्नई

दिल्ली में बहुत से लोगों को लगता है चेन्नई में या तो लोगों को दक्षिण भारतीय खाना बनाना नहीं आता या उनको गलत भोजनालय ले जाया गया| कारण है गलत मसालों का प्रयोग|

दिल्ली में रहकर बिना छुरी कांटे दक्षिण भारतीय खाने की बात सोचना कठिन है| चेन्नई मैं छुरा कांटा तो क्या चम्मच भी कोई शायद ही प्रयोग करता हो| हर भोजनालय में चम्मच मांगते है वेटर समझ जाता है कि बाबू बिहारी (हिंदी भाषी) है| वैसे ज्यादातर वेटर बिहार, उड़ीसा, और बंगाल से मालूम होते हैं|

मुख्य बात तो यह कि दिल्ली में मिलने वाला दक्षिण भारतीय खाना कम से कम दक्षिण भारत का खाना तो नहीं कहा जाना चाहिए| एक महीना चेन्नई और हफ्ते भर त्रिवेंद्रम रहने के बाद मुझे तो कम से कम यही लगता है| मुझे ऐसा लगता है कि किसी गुमनाम उत्तर भारतीय ने अपना धंधा चमकाने के लिए दिमागी घोड़े दौड़ा कर दक्षिण भारतीय खाने पर किताब लिख मारी हो और दिल्ली के बाकि लोग उसे पढ़कर खाना बनाने में लगे हैं| भला बताइए कोई रोज रोज अरहर में सरसों का तड़का डालकर सांभर बनाता अहि क्या? मगर ऐसा दिल्ली में संभव है| चेन्नई आने से पहले मुझे पता न था कि मूंग दाल से भी सांभर बन सकती है| दिल्ली और चेन्नई के सांभर मसलों के बीच तो विन्ध्याचल का पूरा पठार दीवार बनकर खड़ा है| मसाला डोसा ऐसा मामला भी चेन्नई में कम दिखाई देता है| दिल्ली में पायसम तो शायद खीर की सगी बहन लगती है, मगर यहाँ तो खीर और पायसम में मामा – फूफी का रिश्ता लगता है|

दोनों जगह नारियल चटनी का स्वाद बदल जाता है| इसमें नारियल के ताज़ा होने का भी योगदान होगा|

मुझे याद है कि दिल्ली में एक मित्र ने बोला था मुझे चेन्नई में लोगों को ठीक से दक्षिण भारतीय खाना बनाना नहीं आता|

जैसा कि मैं पिछली पोस्ट में लिख चुका हूँ, खाने पर स्थानीय रंग हमेशा चढ़ता ही है| दिल्ली शहर में आलू टिक्की बर्गर, पनीर – टिक्का पिज़्ज़ा और तड़का चौमिन यूँ ही तो नहीं बिकते|

चेन्नई में उत्तर भारतीय खाना

लगभग दस साल पहले की बात है| हम पांडिचेरी और चेन्नई से लौटे थे कि एक मित्र मिलने चले आये| पहले तो उनकी चिंता थी कि हमने हफ्ते भर रोज उत्तर भारतीय खाना कैसे ढूंढा| हमने कहा कि हम हमेशा स्थानीय खाना ही पसंद करते हैं| इसपर उन्होंने कहा कि केले के पत्ते पर खाने की बात ही निराली है और दूसरी बातों की तरफ रुख किया| काश में बता पाता कि चेन्नई में उत्तर भारतीय खाना भी केले के पत्ते पर मिल जाता है|

इस बार, एक महीने के चेन्नई प्रवास में खाने को लेकर कई नए अनुभव हुए| उनमें से एक था चेन्नई के एल्दम्स रोड पर उत्तर भारतीय खाना| उस शाम में उत्तर भारतीय खाने की बहुत इच्छा थी| उसी एल्द्म्स रोड पर पंजाबी रसोई का खाना मुझे बहुत नहीं भाया था| मुझे सोचना पड़ रहा था कि क्या वो वाकई पंजाबी खाना है|

बहुत दिन दक्षिण भारतीय खाना खाने के बाद, अपने घर ब्रज का खाना दिख जाये तो क्या बात हो| मैंने जैसे ही भोजनालय में प्रवेश किया अलीगढ़ के आसपास बोली जाने वाली ब्रज मिश्रित हिंदी सुनाई दी| पकवान सूची देखे बिना ही खाना यहीं खाया जाए का अटल निर्णय लिया गया| घरेलू खाने की उम्मीद में भूख दोगुनी हो चुकी थी| भोजन में क्या क्या है दिखने से बढ़िया था, थाली मंगा ली जाए| तो पेश – ए – खिदमत है थाली| यह थाली उसके बाद कई शाम गाँव – घर और देश की याद का परदेश में सहारा बनी|

तीन रोटी, एक बड़ा कटोरा चावल, पापड़, दाल अरहर, आलू शोरबा, बूंदी रायता, और बेंगन आलू टमाटर| थाली में तीन रोटियां, किसी भी उत्तर भारतीय के लिए दुःख का सबब है| ब्रज क्षेत्र में तीन रोटियां एक साथ प्रायः मृत्यु उपरांत होने वाले संस्कार में परोसी जाती हैं| केले के गोल कटे पत्ते पर एक बड़ा कटोरा चावल और चावल एक ऊपर मैदा का जीरा वाला पापड़| परोसने का ख़ालिस दक्षिण भारतीय तरीका| एक बड़ा कटोरा उबला चावल रात एक खाने में खाना ब्रज में कभी न हो| दाल अरहर में हींग जीरा और सरसों के तेल का तड़का तो न था, नारियल तेल तला प्याज टमाटर भले ही रहा हो| आलू शोरबा का भी यही हाल था – न सरसों का तेल न देशी घी| बूंदी रायता ठीक था, मगर ब्रज के स्वाद के हिसाब से कम खट्टा, कम तीखा| सूखी सब्जी रोज बदल जाती थी इसलिए उस पर कोई टिपण्णी नहीं करूंगा| इस थाली को मैं पांच में से पूरे चार अंक दूंगा|

कुछ भी सही यह खाना उत्तर भारतीय खाना न सिर्फ आसपास रहने वाले उत्तर भारतियों बल्कि दक्षिण भारतीय लोगों में भी पसंद किया जा रहा था| उत्तर भारतीय खाने के शोकीन थाली तो खैर नहीं लेते थे मगर यहाँ के खाने और चाट-पकौड़ी की ठीक ठाक मांग थी| खाने डिलीवर करने वाली कम्पनियों के कारिंदे लगातार आवाजाही करते रहते हैं|