कूँए से हरे समंदर तक

कूँए के मेंढ़क होना, हिंदी का वो मुहावरा है जिसे हम सब पर प्रयोग किया जा सकता है| हम सब किसी न किसी अर्थ में अपने अपने कूँए खोद लेते हैं| बचपन में हम अपने परिवार और घर के बाहर अक्सर देख नहीं पाते| फिर बड़े होते होते अपने रहने और पढ़ने के शहरों को जानने का मौका मिलता हैं| फिर भी हम अक्सर उन शहरों को पूरा जान समझ नहीं पाते| जितना भी आप घूमते फिरते हैं, लोगों से मिलते हैं तो लगता है कितनी विविधता है, एक ही शहर में सबके अपने अपने कितने ही जहाँ बसते हैं| जाति, धर्म और भाषा की बहुलता यूँ तो अक्सर शहरों को बाँटतीं हैं, मगर यह शहर में विविधता भी बनाये रखती हैं| अगर दुरूपयोग न किया जाए, यह विविधता शहर को सौन्दर्य देती हैं| मेरे शहर अलीगढ़ को देखें, ब्राह्मणों, वैश्यों, जैनों, कायस्थों, मुसलमानों और अन्य जातियों सबके अलग अलग मोहल्ले रहे हैं| आप हर मोहल्ले में, यहाँ तक कि अलग अलग गलियों में भी भाषा और संस्कृति की विविधता देख सकते हैं| अलीगढ़ के ही ऊपरकोट और लालडिग्गी इलाके में उर्दू का रंग जमीन- आसमान अलग है| आज पढ़ाई लिखाई के साथ गाढ़ी उर्दू का चलन जरूर है| जमीन की उर्दू में ब्रज की रंगत है तो पढ़ी लिखी उर्दू अरबी – संस्कृत का चोला पहनती है| यही हाल पुराने और नए शहर की हिंदी का है|

हमारे देश में घर घर में खाना-पीना बदल जाता है| हर कोस पर पानी और चार कोस पर बानी बदलना तो हमारी सांस्कृतिक विविधता और गतिशीलता का पर्याय है| यह सब जानने समझने की इच्छा होने लगती है – Travel inspiration|

World traveller, जब तक आप अपने कूएं से बाहर नहीं निकलते, आप घृणा करते हैं, आपको दूसरे के काम, संस्कृति, विचार गलत लगते हैं| आपका सांस्कृतिक आदान प्रदान नहीं होता| अपनी रोज-मर्रा की जिन्दगी में जितना जाना जाए, जान लेना चाहिए| क्या पता जो इस जन्म में जो हमारा अनजाना सा पड़ोसी है, उसे जन्नत में दोस्त बनाना पड़ जाए| जब मैंने अपने शहर को जानने का सिलसिला शुरू किया तो लगने लगा कि जब एक शहर में इतना सब जानने समझने और मिलने जुलने के लिए है तो दुनिया में कितना कुछ होगा – शायद इस जन्म से बहुत ज्यादा|

जिन भील – भिलाला आदिवासियों को महानगरीय लोग जंगलवासी सोचकर भाव नहीं देते उनके सांस्कृतिक रंग मुझे आश्चर्यचकित कर देते हैं| निर्गुण मूर्तियों के सामने सर झुकाते हैं तो मूर्ति-पूजक + रेतीले टीलों से लेकर बर्फीले पहाड़ तक दुनिया में प्रकृति अनूठे रंग भरती है| समंदर की लहरें और शीतल पवन के झोंके अलग अलग तरीके से आपपर अपना प्यार उड़ेलते हैं| हाड़-माँस के रंग-रूप बदलते हैं मगर मन अन्दर से मिलते जुलते हैं| जिन्हें आप निर्धन निरीह समझते हैं, उनकी संस्कृति अक्सर बहुत बड़ी और धनी होती है| so I love the world.

मुझे मिलना जुलना और उससे भी अधिक अलग अलग संस्कृति और उप-संस्कृति को समझना पसंद है| कई बार कई चीजें अपनी सीमित तर्क शक्ति के साथ समझ नहीं आती या गलत समझ आती हैं| अनेकों बार महीने लग जाते हैं समझते समझते| कभी मांसाहार समझ नहीं आता तो कहीं शाकाहार में रंग रूप, कंद- मूल, के झगड़े|  कभी ध्यान दिया है, हर शहर में गोलगप्पे का पानी अपने अलग स्वाद में होता है| पानी का स्वाद बदल जाता है तो मसालों का मिश्रण भी| हर स्वाद को समझना, हर रंग को जीना ही जिन्दगी है| घूमते फिरते ही मुझे आलू-गोभी और आलू-गोभी-मसाले की सब्जी अंतर समझ आया| जलेबी हमेशा लाल-गुलाबी नहीं होती|

इस यात्रा में मुझे तरह तरह के लोग मिल रहे हैं| बहुत अलग अलग आचार-विचार, रहन-सहन, भाषा-संस्कृति लतें-आदतें जानने समझने को मिलती हैं| कुछ पसंद आतीं हैं कुछ नहीं| सबको समझना जीना और जिन्दगी है| कुछ अच्छा बुरा नहीं| बस इतना है कि आप स्वीकार कर पाते हैं या नहीं| मगर आप समंदर में हैं, हजारों आती जाती लहरें है| आप गोते लगाते और हिचकोले खाते आगे बढ़ रहे हैं|

पहाड़ चारों ओर से आपको घेर कर गले मिलते हैं तो समंदर बाहें फैलाए| रेत आपको अपने रंग में रंग देता है तो झरने आपका अंतर्मन भिगो देते हैं| आपका परिदृश्य फैलता जाता है| जी हाँ, आप अपने घर को दुनिया समझने की जगह दुनिया को घर समझने लगते है|

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