नपुंसकता प्रदूषित विकास और गाँव

सभी छायाचित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

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पुश्तेनी गाँव की यात्रा

शहर में पले बढ़े बाबू साहब लोग गाँव – देहात के बारे में इस तरह बात करते हैं जैसे किसी जंगल की बात कर रहे हों| हम एक अनपढ़, असभ्य, अविकसित, लोक की कल्पना करते हैं जिसमें घासफूस खाने वाले जानवर आदमखोर आदमियों के साथ रहते है|

गाँव का एक अलग लोक होता है| परन्तु हमारी कल्पनाशीलता उस कच्चे माल से बनती है जिसे गाँव से आने वाले लोग अनजाने में ही हमें दे जाते हैं| बड़ी बड़ी ऊँची इमारतें, कंक्रीट की सड़कें, फ्लाईओवर, ब्लीच और क्रीम से नहाये हुए चिकने चुपड़े चहरे उन्हें शहर में परीलोक का आभास देते हैं| भौचक ग्रामीण अक्सर उन बातों और चीजों के बारे में बताते हैं जो शायद उनके पास नहीं होतीं हैं|

जब तक शहरी लोग गाँव नहीं जाते तब तक हमें उन बातों और चीजों का अहसास नहीं होता जो शहर में नहीं बचीं है|

अक्सर हम शहर की भागदौड़, भीड़, अकेलेपन और बनावट को दुत्कारना चाहते है और यह चीजें गाँव से लौटें पर खटकने लगतीं है|

लगभग पंद्रह वर्ष पहले मैं उस गाँव में गया था जहाँ आजादी के समय पुरखों की जमींदारी हुआ करती थी| गाँव में कुल जमा सत्तर घर थे, शायद चालीस से भी कम घरों में खेतीबाड़ी का काम होता था| दस घरों के लोग सरकारी नौकरी और मास्टरी की नौकरी में थे| बाकी के घरों में अन्य काम थे, जिन्हें हम प्रायः छोटा मोटा काम कहते हैं|

गाँव में एक चीज बहुत थी; प्रेम| हमारे गाँव में घुसते ही हमारे आने की खबर सारे गाँव को लग चुकी थी| सोशल नेटवर्क आज के फेसबुक और ट्विटर से तगड़ा था| जिन लोगों को हमारे उस गाँव से रिश्ते के बारे में नहीं पता था वो शर्मिंदा होकर किस्से सुन रहे थे और गाँव में हमारे परिवार के पुराने निशान पहचान रहे थे| हम गाँव के बीचों बीच के बड़े घेर में बैठे थे और किसी एक घर के मेहमान नहीं थे| हर घर में कुछ न कुछ हमारे लिए पक रहा था| जो लोग हमारे पुराने पडोसी थे उनमे खींचा तान थी कि कों हमने दोपहर का भोजन कराएगा| हमने नाश्ते का तो इतना ही पता है की हमने खाया कम बिगाड़ा ज्यादा; मगर दोपहर खाना हमने तीन घरों में खाया|

लेकिन सबसे मजेदार बात थी पानी!!

जी हाँ, हमें गाँव का पानी बहुत पसंद आया उसमें एक खारी – मीठा सा स्वाद था| हम उस पानी को पीकर तृप्त हो जाना चाहते थे| जब बहुत पी चुके तो हमने उस पानी की तारीफ करनी शुरू कर दी| मगर जो लड़की हमें पानी पिलाने पर लगी हुई थी वो हँसते हँसते लोट पॉट ही गयी, “शहर वाले तो बहुत सीधे होते हैं, खारे भारी पानी में चीनी मिला कर पिलाया जा रहा है|”

आज की शहरी भाषा में कहें तो “एक्स्ट्रा रिच मिनरल वाटर”!!