विक्रम नायक के लोग

विक्रम नायक से बात करते समय आपको जिन्दगी के किरमिच (canvas)  का वो हिस्सा दिखाई देता है, जिसे आप जिन्दगी भर ‘अर्जुन की आँख’ बनने के फेर में नजरअंदाज कर देते हैं| विक्रम जिन्दगी को कितना करीब से बारीकी से और ‘दोनों आँखों’ से देखते हैं, उसकी बानगी आपको उन रेखाचित्रों में मिल जाएगी जिन्हें तमाम ‘लप्रेकों’ में मूल पाठ से दो कदम आगे या पीछे रचा गया है|

मेरे हाथ में विक्रम नायक की वो पुस्तिका है, जो ‘बिन मांगे मोती मिले’ की तर्ज पर मुझे उपहार में दी थी| मैं आज लेखक, चित्रकार, फिल्मकार, अभिनेता, निर्देशक, और मित्र को भूल कर उस कार्टूनिस्ट की बात करना चाहता हूँ जो इस संग्रह में है|

संग्रह के मुखपृष्ठ पर हाथी देश का नक्शा है, जिसे आँख पर पट्टी बांधे लोग महसूस कर रहे हैं| किताब के अन्दर एक पन्ने पर गाँधीजी की मूर्ति के नीचे एक बच्चा सेब खाने की कोशिश कर रहा है – वही आई-फ़ोन वाला|

‘सेव टाइगर’ के वक्त में ‘सेव फार्मर’ की बात भी हैं| लोग उस अर्थतंत्र को भी देखते है जिसमें आम जनता के दिनभर परिश्रम करने से खास जनता के घर में दौलत आती है| यह वो देश है जिसमें हम सबको हजारों अधिकार हैं, उन अधिकारों को प्राप्त करने के लाखों तरीकें हैं और अधिकारों का हनन करने वाले कर्तव्य का पाठ पढ़ाते मिलते हैं|

मैं एक पन्ने पर रुक गया हूँ, आंकड़ों में एक भूख कम हो गई है, सरकार भुखमरी मिटा रही है न| जी हाँ, एक भूख मर गई है – भुखमरी से|

एक सरकारी नहर हैं, नेताजी को उसमें तैराकी का मन किया तो लव लश्कर के साथ पहुंचे| देखा तो एक चरवाहे की भेड़ें नहर में चर रहीं हैं| अब, जब गाँव में बाढ़  आएगी तभी तो नहर में पानी आएगा न| चरवाहा कुछ ऐसा ही नेताजी को समझाने की कोशिश कर रहा है|

अरे, इस पन्ने पर कुछ कुत्ते बैठे हैं, बीच में रखी हड्डी को लेकर चर्चा हो रही है| जब आम सहमति बन जाएगी तो हड्डी पर कार्यवाही होगी| विक्रम तो नहीं बताते मगर लगता है, इन कुत्तों ने कुछ दिन पहले ‘किसी’ को काट लिया होगा|

अरे याद आया, गांधीजी के तीन बन्दर थे न| वही जो कहीं गायब हो गए थे| अब नया बन्दर आया है, जिसके कानों पर एअर-फ़ोन, आँखों पर चमकीला चश्मा और मूँह में ड्रिंक लगा हुआ है| उसे अब अच्छा दीखता हैं, अच्छा ही सुनाई देता है और अच्छा ही स्वाद आता है|

एक जमाना था जब जनता राशन की लाइन में घंटों खड़ी रहती थी और राशन नहीं मिलता था, अब अच्छे दिन आ गए हैं| जनता अब कुर्सियों पर बैठ कर इन्तजार करती है|

यह सब एक बानगी है, विक्रम नायक के लोगों की|

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इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं

तीसरा लप्रेक “इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं” सामने है| यह पुस्तक रवीश कुमार के लप्रेक “इश्क़ में शहर होना” और गिरीन्द्रनाथ झा के “इश्क़ में माटी सोना” से कई मायनों में भिन्न है|

अगर मैं विक्रम नायक के शब्द उधार लूँ, तो यह परिपक्व नादानियों की कहानियां हैं| इन कहानियों में विनीत कुमार की स्त्री – पुरुष सम्बन्ध और प्रेम सम्बन्ध के परिपक्व समझ और उनके अन्तरंग विवरण से उनका साम्य उजागर होता है| अधिकतर कहानियों में महिला पात्र स्पष्टतः मुखर हैं| यह कहानियां प्रेम की उस बदलती इबारत की कहानियां है जिसमें स्त्री सजीव, बुद्धिमान, बुद्धिजीवी और सुस्पष्ट है| यहाँ स्त्री समाज के सभी सरोकारों के साथ समान तल पर खड़ी है| पुरुष पात्रों में नए बदलते समीकरणों के प्रति एक लाचारगी, बेपरवाही और नादानी भी झलक जाती है| विनीत कुमार के लप्रेक हल्के – फुल्के होते – होते गंभीर हैं और अपने संवादों के कारण दूर तक मार करते हैं| विनीत कुमार का लप्रेक केवल डिजिटल रोमांस नहीं है बल्कि खुदरा प्यार की थोक खबर है, इसमें उस इक्क की बात है जो मरता हैं| विनीत कुमार इस न मरते इश्क़ को मारते – मारते जीने और जीते जाने की लघुकथा है|

विनीत कुमार उस युवा वर्ग से हैं जो जानता – समझता है, “काफ़ी हाउस में पैसे किसी के भी लगें, कलेजा अपना ही कटता है”| विनीत कुमार का इश्क़ के ब्रेकअप की मौजूदगी में अंकुरित होता और अपनी सभी शर्तों – समर्पणों – और समझदारी में फलता – फूलता है| कहानियाँ अपनी लघुता में सम्पूर्ण हैं और उनके संवाद ज़ुबान पर चढ़ जाते हैं| दो एक संवाद यहाँ प्रस्तुत हैं:

“ब्रेकअप के बाद रिश्तों – यादों को दफ़नाने के लिए अलग से कब्र नहीं खोदने पड़ते”

“जिस शख्स को लोकतंत्र के बेसिक कायदे से प्यार नहीं वो प्यार के भीतर के लोकतंत्र को जिन्दा रख पायेगा?”

“लाइफ में स्ट्रगल के बदले स्टेटस आ जाए तो किसी एक के एक्साइटमेंट को मरना ही होता है”

“उम्र तो मेरी ढल गई न, शौक तो उसी उम्र में ठिठका रहा”

लप्रेक में इश्क़ के बाद सबसे महत्वपूर्ण है, चित्रांकन – विक्रम नायक द्वारा अंकित चित्र कहानियाँ| तीसरे लप्रेक में विक्रम नायक और विनीत कुमार के बीच भाव पूरी भावना के साथ व्यक्त हुए हैं| विक्रम कहानियों को पूरी निष्ठा के साथ पकड़ पाए हैं| लप्रेक में पहली बार मुखपृष्ठ पर इश्क़ अपनी शिद्दत के साथ इसी पुस्तक में आया है| पृष्ठ VIII पर विक्रम अपनी इस रचना की प्रेम – प्रस्तावना एक छोटे से चित्र से रचते हैं| अधिकतर पृष्ठों पर चित्र कहनियों के साथ साम्य रखते हुए अपनी कहानी स्पष्ट और एक कदम आगे बढ़ कर कहते हैं| पृष्ठ 7, 13, 15, 54, 57, 65, 74, आदि पर मेरी कुछ पसंदीदा चित्र कहानियाँ हैं, इसके अलावा भी अनेक बखूबी से चित्रित लप्रेक मौजूद हैं|

“इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं” में इश्क़ के बहुत से नमूने हैं, वह वाला भी जिससे आप आजकल में मिले थे|

इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं -  चित्र  राजकमल प्रकाशन

इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं – चित्र राजकमल प्रकाशन

पुस्तक: इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं
श्रृंखला: लप्रेक
कथाकार: विनीत कुमार
चित्रांकन: विक्रम नायक
प्रकाशक: सार्थक – राजकमल प्रकाशन
संस्करण: जनवरी 2016
पृष्ठ: 85
मूल्य: रुपये 99
ISBN: 978 – 81 -267 – 2899 – 2

इश्क़ का माटी होना

“लप्रेक” युवा प्रवासियों और महानगरीय स्वप्नरत युवाओं में लोकप्रिय साधारण साहित्य है जिसमे उबाऊ साहित्यिक हिंदी पंडिताऊपन नहीं बल्कि प्रेम का नया नजरिया है| लप्रेक श्रृंखला की दूसरी पुस्तक मेरे हाथ में है  – “इश्क़ में माटी सोना”| यह रवीश कुमार के लप्रेक “इश्क़ में शहर होना” से भिन्न है और अलग पाठ का आग्रह रखती है| दोनों लप्रेक में विक्रम नायक अपने रेखाचित्रों के सशक्त परन्तु नवीन कथापाठ के साथ उपस्तिथ हैं|

गिरीन्द्रनाथ कॉफ़ी के झाग में जिन्दगी खोजने की कथा कहते हैं, गिरीन्द्रनाथ जिन्दगी की कथा को जोतते हुए कहते हैं| गिरीन्द्रनाथ कहीं भी रेणु नहीं हुए हैं मगर रेणु का रूपक उनके समानांतर चलता है| गिरीन्द्रनाथ रवीश भी नहीं हुए है मगर रवीश की शैली से अलग समानांतर चलते हैं| अगर आप रेणु और रवीश के लिए गिरीन्द्रनाथ को पढ़ते हैं तो आप ख़ुद से न्याय कर पाते| गिरीन्द्रनाथ चकना और दिल्ली के भरम जीते तोड़ते और जीते हैं|

गिरीन्द्रनाथ अपने लप्रेक में छूटे हुए गाँव चनका के साथ दिल्ली में जीते हुए अपनी प्रेम यात्रा में गाँव को दिल्ली के साथ जीने चले जाते हैं| गिरीन्द्रनाथ अपने अनुभव के प्रेम की गाथा कह रहे हैं, यह भोगा हुआ यथार्थ है| उनके यहाँ प्रेम संबल की तरह खड़ा है, उनका मेरुदंड है, साथ ही उलाहना और सहजीवन है| परन्तु गिरीन्द्रनाथ के लप्रेक में प्रेम ही नहीं है, प्रेम के बहाने बहुत कुछ है|

लप्रेक में विक्रम नायक सशक्त और समानांतर कथा कहते हैं| वह गिरीन्द्रनाथ के कथन से अधिक पाठ को समझते हैं और रचते हैं| विक्रम केवल पूरक नहीं हैं बल्कि अपनी समानांतर गाथा चित्रित करते हैं| आप गिरीन्द्रनाथ को पढ़ कर जानते हैं कि नायिका आधुनिक और स्वतंत्र है परन्तु आप विक्रम नायक के रेखाचित्रों के माध्यम से ही पुष्टि पाते हैं कि गिरीन्द्रनाथ की नायिका प्रायः भारतीय परिधान पहनती है| बहुत से विवरण हैं जहाँ विक्रम नायक लप्रेक के पूरक हैं परन्तु वह कई स्थान पर स्वयं के रचनाकार को उभरने देते हैं| विक्रम के चित्र अपनी स्वयं की कथा कहते जाते हैं – उनमें गंभीरता, व्यंग, कटाक्ष है|

पृष्ठ 3 पर विक्रम जब सपनों की पोटली से उड़ते हुए सपनों को किताब में सहेज कर रखते हैं तो वो पूरक हैं या समानांतर, कहना कठिन है| पृष्ठ 6, 12, 13, 49, 80 जैसे कई पृष्ठों पर विक्रम और गिरीन्द्र को साथ साथ और अलग अलग पढ़ा – समझा जा सकता है| कहीं कहीं विक्रम आगे बढ़कर तंज करते हैं, (जैसे पृष्ठ 21, 56, 70)| विक्रम लेखक को शब्द देते है (जैसे पृष्ठ 80, 81)|

कुल मिला कर यह पुस्तक गिरीन्द्रनाथ के लिए माटी बन जाने के प्रक्रिया है, वो माटी जो सोना उगलती है|

पुस्तक: इश्क़ में माटी सोना

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चित्र: राजकमल प्रकाशन के वेबसाइट स

श्रृंखला: लप्रेक
कथाकार: गिरीन्द्रनाथ झा
चित्रांकन: विक्रम नायक
प्रकाशक: सार्थक – राजकमल प्रकाशन
संस्करण: दिसंबर 2015
पृष्ठ: 88
मूल्य: रुपये 99
ISBN: 978 – 81 -267 – 2837 – 4

विक्रम नायक का शहर

रवीश कुमार कह रहे है, किताब जितनी मेरी है उतनी ही विक्रम नायक की भी है| जब किताब खोली तो विक्रम नायक सबसे पीछे दिखाई दिए तो मैंने उन्हें आगे करते हुए, पीछे से किताब पढ़ना शुरू किया|

यूँ क़ुतुब मीनार पर दूरबीन लगी है, इश्क़ दूर जाना चाहता है, दूर तलक जाना चाहता है|

किताब शुरुआत में जंतर मंतर सी लगती है और अन्ना महसूस होते हैं लवपाल की चाहत मेट्रो सी लगती है| जब मेट्रो वैशाली के जंगल में प्रवेश करती है मंगल कलश के बराबर रखा दीपक उम्मीद सा लगता है| बारीकी से पकड़ा गया है, उस वैशाली से इस वैशाली तक का सफ़र|

अन्ना, रैली, मीडिया पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली के बीच प्रेम पसीज रहा है| प्रेम का झंडा छितरा रहा है, दिमाग का पर्चा उड़ रहा है मगर जोड़ा नहीं बन पा रहा है| मैं अभिभूत हूँ अभिव्यक्ति पर|

बाइक वाला चित्र गूगल ग्लास हो गया है| साऊथ दिल्ली आँखों में बस गयी है और बाइक हकीकत की ओर जा रही है| साथ जा रहे है मगर साथ भी तो नहीं जा रहे, मगर जो तो रहे ही हैं| जोरबाग छूट रहा है, मगर दिल्ली मुड़ कर भी तो नहीं देखने देती| दिल्ली शतरंज ही तो नहीं है, दिल्ली में प्यादे नहीं खेलते|
दिल्ली की निगाहें आपको देखती नहीं है तो अकेले भी तो नहीं छोड़तीं| सीसीटीवी कैमरे हों या ऑटो| दिल्ली एक पिंजड़ा ही तो है जिसे आप पकड़ना चाहते हो और जहाँ से आप उड़ जाना चाहते हो| दिल्ली जहाँ कोई आप नहीं आता मगर हर कोई देख लेना चाहता है|

कुल मिला कर दिल्ली के तमाम पुल फ्लाईओवर और मेट्रो दिल्ली को जोड़ ही नहीं पाते| दिल्ली दिल सी तो लगती है मगर रहती दिल्ली ही है| दिल ऑटो सा छोटा है, फुर्र हो जाना चाहता है|

मैं विक्रम नायक की नजर से दिल्ली देख रहा हूँ| उनकी दिल्ली इश्क़ नहीं है, दिल्ली इश्क़ हो जाना चाहती है| मैं आखिरी चित्र तक पहुँच गया हूँ| दिल्ली शहर नहीं दिल्ली हो गई है| यह चित्र विक्रम नायक की दिल्ली का भव्य दुखद प्रारूप है| मैं इस चित्र एक अलग किताब की घुटन महसूस करता हूँ, मगर यही एक कौने ने रवीश कुमार अपने हस्ताक्षर कर देते हैं| यहाँ मेट्रो की आवाजाही में प्रेम लप्रेक हो रहा है| मुखपृष्ठ पर रवीश हाशिये पर है| आखिर जिस प्रेम को वो लिख रहें हैं, वो खुद हाशिये पर ही तो खड़ा है| रवीश कुमार का प्रेम करावल नगर सा ही महसूस हो रहा है| अब रवीश कुमार को पढूंगा मगर लिखूंगा नहीं| मैं बुराड़ी नहीं होना चाहता|

पुनश्च:
विक्रम नायक के लोगों के लिए किताब रोहिणी है, रवीश कुमार वालों के लिए द्वारिका| जिन्हें दोनों को पढ़ना है, उनके लिए जोरबाग| मगर पढ़ने से पहले अगर पैदल ही कनॉट प्लेस से चांदनी चौक का चक्कर लगा आयें, तो किताब रायसीना हिल्स सी लगने लगेगी|