कन्ने भाई!!


कन्ने भाई जब बचपन में बड़े होने लगे तो उन्हें सिगरेट के धुंए से छल्ले बनाने की जबरदस्त महारत हुई, मगर साहब सिगरेट का धुआं हवा में विलीन होता देख कर कन्ने भाई को जीवन की क्षणभंगुरता का अहसास होता और उनका उसूल बन गया जो करना है वो आज नहीं अभी कर लो, इसी वक्त| सब जानते हैं कन्ने भाई दिल के बहुत साफ़ हैं और घर, घर तो इतना साफ़ रखते हैं कि मजाल क्या उनके घर के कूड़ेदान में भी आपको बित्तीभर कूड़ा मिल जाए|

कन्ने भाई यारों के यार हैं| उनकी खासियत है पान से इश्क़ और गंदगी से बड़ी नफरत| गंदगी देखकर उनको इतनी घिन चढ़ती है कि वो उसपर थूके बिना नहीं रहते| एक बार नगरमहापालिका का गंदा घिनौना कूड़ेदान दूर से देख कर ही उन्हें इतनी घिन मची कि उन्होंने खुद अपने पैर पर ही थूक दिया| जब भी कोई पुराना यार मिले और फिजूल की कोई बात छिड़े तो फिर तो कन्ने भाई सड़क किनारे थूक थूक कर अपने गुस्से का इजहार करते है| इसका फायदा ये है कि अपनी पाक साफ़ मीठी जुबान से कोई गलत शब्द भी नहीं बोलना पड़ता और नफरत भी बाहर निकलती रहती है|

एक बार कन्ने भाई, मिनिस्ट्री में काम से गए| कुछ लें दें की बात रही होगी| बस वहां से निकले और और सीढ़ियों पर अपनी घिन का इजहार कर दिया| कामचोर चपरासी ने बकझक की तो उसको सफाई अभियान का ऐसा ज्ञान दिया कि उसने अपना तबादला दुसरे ऑफिस में करा लिए|

कन्ने भाई, महानगर में रियल एस्टेट के किंग नहीं तो किंग मेकर तो जरूर हैं| शहर की हर गली हर कूचे में उनके निशान लगे हैं| निशान लगाने के लिए उन्हें कोई निशाना नहीं लगाना होता जहाँ मन हुआ जब हुआ जितना हुआ, निशान लगा दिया| निशान लगाने के उनके अपने अचूक तरीके हैं|

कन्ने भाई को बस आवारा कुत्तों से बड़ा डर लगता है| हुआ यूँ कि कन्ने भाई को दक्षिणी इलाके में एक बढ़िया प्लाट दिखाई दिया| मौके की जगह थी| सोचा जरा प्लाट में जाकर उसका ठीक से मुआयना किया जाये और अपना निशान भी लगा दिया जाये| कन्ने भाई निशाना लगा ही रहे थे, मगर गलती से उन्होंने ठीक उसी जगह निशाना लगा दिया, जहाँ उनके पीछे खड़े आवारा कुत्ते ने अभी अभी अपना निशान लगाया था| बैठे बैठे के इंजेक्शन लगवाने का झंझट लग गया| तब से कन्ने भाई निशाना लगाने से पहले आस पास देख लेते है कि कहीं कोई आवारा कुत्ता तो नहीं है| एक बार किसी पागल सिपाही ने उन्हें इंडिया गेट के पास निशाना लगाते हुए पकड़ लिया था| सिरफिरे को लगा होगा कि कहीं कन्ने भाई अब इंडिया गेट में कोई कॉलोनी न बनवा दें| उस वक्त कन्ने भाई के साले ने उस सिपाही को सौ रुपये देकर बात संभाली मगर लालची सिपाही… शायद उस सिपाही को मालूम नहीं था कि कन्ने भाई को कोई गलत बात बर्दाश्त नहीं है| वो रिश्वत ले और कन्ने भाई थूकें भी नहीं|

जब कन्ने भाई सत्तासीवीं बार दीवार फ़िल्म देख कर लौट रहे थे तो एक दीवार पर लिखा था, पेशाब करना मना है| कन्ने भाई ने कभी अपने बाप की नहीं सुनी, ये कौन कद्दू था? कन्ने भाई ने ऐसा निशाना लगाया कि बस| बाद में कन्नी भाभी, उन्हें लिए लिए पीर फ़कीर कराती फिरीं, सुना है वो किसी पूजास्थल की दीवार थी| तब से कन्ने भाई को हर जगह अवैध कब्जा करने वाले देवी देवता पीर फ़कीर से नफरत सी हो गई है| अब कन्ने भाई, इन्हें बिलकुल नहीं बख्शते|

बात जो भी हो कन्ने भाई ने जहाँ भी निशान लगाया हो, किसी न किसी दिन उस जगह के सितारे जरूर बुलंद हुए| इसकी लम्बी कहानी फिर कभी|

टिपण्णी: यह पोस्ट The Great Indian Litterbug – Times of India के सहयोग से इंडीब्लॉगर द्वारा किये गए आयोजन के लिए लिखी गई है|