अल्प–सफल पठानकोट बचाव

किसी भी हमले या आतंकवादी हमले की स्तिथि में सुरक्षा बलों को, गुप्तचरों और उनके मार्फ़त सरकार बहादुरों को ही यह पता होता है कि इस हमले की आक्रमकता को देखते हुए सफलता का मापदंड क्या होना चाहिए|

पठानकोट बचाव में सबसे बड़ी असफलता यह है कि न सिर्फ “सफल लक्ष्य” को पहले से ही जान –पहचान लिया गया बल्कि उसके पूरा होते ही “पीठ ठोंको – शाबासी दो” अभियान भी शुरू हो गया| लेकिन यही पठानकोट बचाव की असफलता है क्योंकि सरकार बहादुरों के बधाई संदेशों के बाद हमला जारी था और दुनिया में सरकार बहादुरों और भारत का मखौल बन रहा था|

कारण बहुत सीधा सरल है; हमने सरकार बहादुर ने अपने सामने पूर्ण आत्म- विश्वास के साथ बेहद सुस्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया और उसमें किसी प्रकार के परिस्तिथि जन्य बदलाव की कल्पना या आशंका भी नहीं की| सरकार बहादुर ने यह माना कि सबकुछ किसी लोकप्रिय विडियो गेम की तरह से चलेगा और काम ख़त्म| सरकार बहादुरों ने इस पूर्वनिर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद यह समय लगाने की भी जरूरत नहीं समझी कि जमीनी हकीकत को एक बार जाँच लिया जाये| यदि यह किया गया होता तो कम से कम अति-उत्साह से बचा जाता और आलोचना से भी|

सबसे पहले यह बात सुस्पष्ट होनी चाहिए कि गुप्तचर सूचना का बहुत पुख्ता होना, जैसा कुछ नहीं होता और आप वास्तविक घटनाक्रम की कोई पटकथा पूर्णतः पूर्व निर्धारित नहीं कर सकते| दूसरा आपको पटकथा के अनुसार सब कुछ या बहुत कुछ चलने पर भी, दो – तीन बार जमीनी हकीकत मालूम करनी चाहिए|

जनसामान्य और सामान्य सैनिक को हमेशा सरल गणित आता है, हमलावरों के मुकाबले बचावदल में जान की हानि कम होनी चाहिए| यह सरल गणित सैन्य और जन मनोविज्ञान का मूल है| कम से कम नुकसान के साथ लक्ष्य प्राप्त करने का और उसके लिए योजना बनाने काम सैन्य – असैन्य नेतृत्व का है, सैनिक का नहीं| अगर इसमें सफलता नहीं मिलती तो यह एक असफलता है|

इस बात को सफलता के तौर पर प्रस्तुत करने क प्रयास हो रहा है कि वहां पठानकोट एयरबेस में मौजूद परिवारों या जहाजों को नुक्सान नहीं हुआ| इस पैमाने पर सफलता और असफलता नहीं आकीं जा सकती| यदि इस प्रकार का नुकसान किसी पूर्व चेतावनी या सूचना के बिना होता है तो उसे असफलता नहीं कहा जा सकता और साथ ही यदि यह नुकसान पूर्व सूचना के बाद भी होता है तो यह असफलता नहीं होती, शर्मनाक होता| क्योंकि पठानकोट हमले की पूर्व सूचना थी, तो इस बात को सफलता के और पर नहीं, संतोष के तौर पर देखा जा सकता है|

यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि किसी भी आत्मघाती आतंकवादी हमले में आतंकवादियों की असफलता नगण्य नहीं होती| उनका लक्ष्य मात्र अपने शिकार को अपने में उलझाना, उसका जितना हो सके नुक्सान करना और मर जाना होता है| अगर हम, आतकवादियों, उनके सहयोगियों और परिवारों के विचारों को समझे तो आत्मघाती आतंकवादी हमलावर की असफलता मात्र उसका जिन्दा पकड़ा जाना और अंतिम असफलता उसका हृदय परिवर्तन होना ही है|

आयें, भविष्य के लिए कुछ सीखें और कुछ पुख्ता योजनायें बनायें|

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अनगढ़ दाढ़ी और भेदभावी पूर्वधारणाएँ

1इतनी बुरी तरह से जन मानस में घर कर चुकीं हैं कि जब तक खुद उसका शिकार नहीं होते, हमें इस भेदभाव का बोध नहीं होता|

अभी हाल में मैंने अपने शौक के लिए दाढ़ी बढ़ाने का निर्णय लिया| अब मेरी नई नवेली अनगढ़ दाढ़ी को भी बन ने संवरने की जरूरत होती है| इस से पहले कि कैंची अपना काम करती, मैंने सोशल मीडिया 2पर एक फोटो डाल दिया| उस पर आई टिप्पणियाँ हमारे समाज के पूर्वधारणाएं खुलकर सामने रखतीं हैं|

इन टिप्पणियों की मानें तो अनगढ़ दाढ़ी में आप खतरनाक अपराधी, गैंगस्टर, आतंकवादी, जिहादी, मुस्लिम, सिख, या फिर घने – बुद्धिजीवी ही हो सकते हैं|

मुझे यह मानने में दिक्कत नहीं हैं की अनगढ़ दाढ़ी बदसूरत लग सकती है| परन्तु क्या अनगढ़ दाढ़ी को अपराध या धर्म से जोड़ा जाना उचित है?