ईश्वर पर सुंदरराजन की हत्या का आरोप


 

मृत्यु जीवन की अंतिम सच्चाई है, इसे कभी न तो झुठलाया जा सकता है| परन्तु मृत्यु के पीछे के कारण कई बार बेहद महत्वपूर्ण ही जाते है| एक सामान्य मृत्यु सदैव स्वागत योग्य है| बीमारी और दुर्घटना में मृत्यु सदैव दुःखद है| परन्तु हत्या आदि सदा ही मृत्यु के दुःखद कारण है, जिन्हें अभी भी प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता| यह न केवल मानव समाज में एक अपराध है बल्कि सभी धर्म इसे पाप मानकर इसका विरोध करते है| इस मानव समाज में हत्या केवल हथियार से नहीं होती वरन मानसिक आदि अनेकानेक प्रकार से भी की जाती है| परन्तु न्याय के हित में अपराधी को दिया गया मृत्युदण्ड सामान्यतः हत्या अथवा पाप में नहीं गिना जाता है|

अभी कल ही श्रीमान सुंदरराजन जी की मृत्यु हुई है| चिकत्सकीय दृष्टि से यह एक स्वभाविक मृत्यु है परन्तु धर्म के ठेकेदार अपनी दूकान चलाने और अंधविश्वास फैलाने के लिए इसे ईश्वर द्वारा सुंदराजन को दिया गया दंड बता रहे है| वह लोग इसे ईश्वर द्वारा की गयी हत्या के रूप में प्रचारित कर रहे है|

कारण:

१.      सुंदरराजन जी ने हिन्दुओ की वैष्णव शाखा के देवता श्रीपद्मनाभास्वामी के थिरुअनंतापुरम स्थित मंदिर के खजाने को देश की आम जनता के लिए खुलवाने का सफल प्रयास किया|

२.      उन्होंने इस सम्बन्ध में राष्ट्र के उच्चतम न्यायालय में अपनी याचिका दी थी|

३.      उच्चतम न्यायालय ने इस याचिका को न्यायसंगत मन था|

४.      उच्चतम न्यायालय में सदा ही देश भर के विभिन्न इष्टदेवता अपनी याचिकाए लगाते रहे है| यह इष्टदेव नयायालय में विश्वास जताते, न्याय मांगते और प्राप्त करते रहे है|

५.      इस समय भी “रामलला विराजमान” इसी नयायालय की शरण में है| इस प्रकार यदि कोई भी धार्मिक व्यक्ति नायालय में विश्वास नहीं रखता तो वह न केवल न्यायालय की अवमानना व् मानहानि कर रहा है बल्कि उस न्यायालय में विश्वास रखने वाले ईश्वर की ईश निंदा भी कर रहा है|

६.      श्री सुंदरराजन केवल याचिकाकर्ता थे, मंदिर के उस खजाने को खुलवाने का कार्य न्यायालय ने किया था| यदि न्यायालय याचिका को न्यायसंगत नहीं मानता तब सुंदरराजन कुछ भी नहीं कर सकते थे|

७.      मंदिर की संपत्ति ईश्वर द्वारा अपने भक्तो द्वारा प्राप्त की गयी थी, ईश्वर को उस धन का क्या करना था? यह संपत्ति ईश्वर ने भक्तो की आवश्यकता के सयम में प्रयोग करने के लिए ही रखी होगी|

८.      इस मंदिर का इतिहास रहा है की पहले भी मंदिर की संपत्ति के जनहित में प्रयोग किया गया है| वैसे भी मंदिर में रखा धन मंदिर के सारनाथ बना सकता है, सबका नाथ नहीं|

९.      इस समय न्यायालय उस संपत्ति को लूटने के लिए नहीं गिनवा रहा था वरन किसी भी दुरूपयोग को रोकने और जनहित में प्रयोग करने में ही प्रयास रत था|

१०.  इस प्रकार श्री सुंदरराजन द्वारा किया गया कार्य किसी भी प्रकार के अपराध या पाप की गिनती में नहीं आता|

११.  यदि ईश्वर इस खजाने को छुपा कर बैठा रही तो यह हिन्दू धर्मं के अपरिग्रह के नियम के विरुद्ध है| क्या ईश्वर अपने नियम के विरुद्ध जा सकता है?

१२.  ईश्वर किसी को अपराध या पाप की सजा दे तो माना जाए| यदि बिना अपराध, बिना हारी – बीमारी, बिना दुर्घटना किसी को ईश्वर मार दे तो यह हत्या में ही तो गिना जाएगा|

१३.  अतः जो लोग श्री सुंदरराजन के मृत्यु के लिए ईश्वर को जिम्मेदार ठहरा रहे है तो वह ईशनिंदा कर रहे है|

१४.  हो सकता है की कुछ लोगो का ईश्वर इस प्रकार का हत्यारा हो, ऐसा ईश्वर मेरा ईश्वर नहीं हो सकता, में नास्तिक होने ही पसंद करूँगा|

अंत में, मुझे विश्वास है कि श्री सुंदरराजन की मृत्यु उनकी उम्र पूरी होने पर हुई है, उनके आत्मा को शांति और देश की जनता को बुद्धि मिले|