पाठशाला पढाई के लिए नहीं है


“शिक्षे, तुम्हारा नाश हो, तुम नौकरी के हित बनी|”

अगर होते, मैथली शरण गुप्त अवश्य सोचते| क्या उन्होंने उनका श्राप सत्य हुआ? आज भारत के शिक्षित लोग रोजगारपरक नहीं माने जा रहे – अनियोज्य हैं, अप्रयोज्य हैं|

किन्हीं माता-पिता से पूछिए| पाठशाला का चयन कैसे करते हैं – निकटता, बेहतरीन भवन, वातानुकूलन, गैर-पाठ्य-गतिविधि, सुरक्षा, नगर-भ्रमण, परीक्षा-परिणाम, आवागमन, यातायात, सब कुछ गिना देंगे| शिक्षा और शिक्षक के अलावा|

हालत है कि निजी क्षेत्र के विद्यालयों में कम वेतन वाले निरुत्साही शिक्षक भरे पढ़े हैं और योग्य छात्र-छात्राएं भरे पड़े हैं| सरकारी विद्यालय अयोग्य छात्र-छात्राओं, निरुत्साही माता-पिता, और लोभी शिक्षकों की भेंट चढ़े हुए हैं| मैं बहुत से सरकारी शिक्षकों को जानता हूँ, जो पढ़ाने जाते हैं मगर जानते हैं उनके पढ़ाने-न-पढ़ाने से छात्र के माता-पिता को फर्क नहीं पढ़ता| उनका पैसा गैर-पाठशाला शिक्षक के पास जाने को व्याकुल है| यह अलग बात कि दोष सरकारी शिक्षक को जाता है|

इसके ऊपर से सरकार है, निरी-निकम्मी| अगर बच्चों को मतदान का अधिकार होता तो आदतन अनुपस्तिथ रहने वाले छात्रों के दबाब में ये शिक्षा को राष्ट्रद्रोही कृत्य घोषित कर देते|

अब तो पाठशाला पढाई के लिए नहीं है| पाठशाला में, मध्याह्न भोजन के अलावा सब कुछ पढाई से बच्चों को दूर रखने का पवित्र प्रयास है|

हर दिन हल्ला रहता है, बच्चों को पर्यावरण सिखाओ, देशप्रेम सिखाओ, भाईचारा सिखाओ, ईश-भक्ति सिखाओ, धर्म-कर्म, माता-पिता का सम्मान सिखाओ, संस्कार दो, ये सिखाओ वो सिखाओ| कुल मिलकर पढाई के अलावा सब कुछ सिखाओ| कुल मिलाकर बच्चों को संस्कार- संस्कृति देने सिखाने का काम परिवार से निकल कर पाठशाला के गले पड़ गया है| परिवार, मात-पित क्या करें – वेतन की गुलामी और टेलिविज़न का आराम?

अभी समाचार है, आंध्रप्रदेश में पाठशाला में “अम्माकू वन्दनं” होगा| भाई, बच्चों को पढ़ा-लिखा लो| उनमें अच्छा पढ़ने –लिखने की रूचि जगा लो| बाकि काम घर में होने दो| अगर कोई शंका है तो उनके माँ-बाप को साल में दो हफ्ते पढ़ा लो| इस प्रकार की संस्कृति – संस्कार बच्चे देखकर सीखते हैं, सीख भी लेंगे|

 

अक्षर ज्ञान: चूल्हा नीचे चूल्हा


आज मेरा ढाई साल का बेटा स्कूल में पहली बार कलम पकड़ेगा| अपना बचपन याद आया|

मेरा स्कूल पाँच साल की आयु में शुरू हुआ था| माँ ने घर पर ही सौ तक गिनतियाँ, दस तक पहाड़े और हिंदी अंग्रेजी वर्णमाला याद करा दी थी| साथ में उर्दू वर्णमाला को लेकर एक कविता भी थोड़ी बहुत याद थी| बाकि कुछेक कविता याद थीं| मगर तख्ती से अपना वास्ता केवल इतना था कि वो गेंद – बल्ला (क्रिकेट) खेलने के लिए उम्दा थी|

जब स्कूल पहुंचे तो तख्ती का हमेशा के लिए बल्ला बन गया| और एचबी की पेंसिल और पच्चीस पैसे की कॉपी ने बाजी मार ली| कॉपी के कागजों से हवाई जहाज बनाना हमें आता था, मगर स्कूल के पहले हफ्ते में बारिश का जोर था तो स्कूल में आया ने हमें कागज की नाव बनाना सिखा दिया| आया जल्दी ही हमारी दोस्त और अध्यापक दोनों हो गईं| दरअसल हमारी टीचर गाँव नाते से चाची लगती थीं तो लाड़ – प्यार में हम पढ़ते नहीं थे और आया दोस्त थी तो वो खुद पढने का नाटक कर कर पढ़ाती थीं|

अब आया तख्ती पर पढ़ी थी और कागज पर लिखना उन्हें आता नहीं था तो तख्ती और कलम एक बार फिर से जिन्दगी में वापस आये|

चूल्हा नीचे चूल्हा मतलब उ
चूल्हा नीचे चूल्हा मतलब छोटा उ

पहले हफ्ते में चुल्हा बनाना सिखाया गया, जिसे आप आज अंग्रेजी का उल्टा C या लेता हुआ U कह सकते हैं| उसके बाद उ और ऊ की बारी आईं| मेरे लिए पढ़ने और लिखने पढने की वर्णमाला कुछ दिन अलग रहीं| उ ऊ अ आ अं अः ओ औ इ ई ए ऐ
आया ने शायद दो माह में स्वर लिखना सिखाये|

चूल्हे के नीचे चूल्हा बना कर उ बना और उ के ऊपर कुते की दुम लगा कर ऊ| अ और आ के बीच भी कुछ कहानियां थी जो याद नहीं रहीं| मगर याद है जब दो बहुओं में लड़ाई हो गयी तो एक एक ने सीधा और दूसरी ने उल्टा चूल्हा बना दी थी जिससे इ बन गया था|

बाद में जब आया ने क ख ग घ की जगह सबसे पहले व और ब सिखाना चाहा तो उसको कुछ भी सिखाने से मना कर दिया गया और क ख ग घ से शुरू किया गया| मगर जब भी मुझे लिखने में दिक्कत होती तो आया ही मेरी मदद करती|

लिए कटोरा हाथ … स्कूल चले हम…|


स्कूल चले हम
लिए कटोरा हाथ
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
हाड़ तोड़ते बाप
कमर तोड़ती मैया 
स्कूल चले हम|
 
बाप के हाथ लकीरें 
माँ की आँख आंसू
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
लिए कटोरा हाथ.. स्कूल चले हम..
लिए कटोरा हाथ.. स्कूल चले हम..
पेट बाँध कर सोये 
पेट पकड़ कर जागे 
स्कूल चले हम|
 
दाल भात का सपना 
थाली में हो अपना 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
साहब जी का नोट 
नेता जी का वोट 
स्कूल चले हम|
 
भूख हमारी जात
नंग हमारी पात 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
कखगघ से क्या लेना 
जोड़ घटाव लेकर भागे 
स्कूल चले हम|
 
मास्टर पूछें जात 
बड़के मारें लात 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
देश दरिद्दर क्या जानें 
ईश्वर अल्लाह क्या मानें 
स्कूल चले हम|
 
पोखर पतली दाल 
कंकड़ चुभता भात
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||
 
साहब बाबू डटकर खाते 
जिम जाकर कमर घटाते 
स्कूल चले हम|
 
माँ बोलीं डटकर खाना 
भूखे लौट न आना 
स्कूल चले हम|
 
                        स्कूल चले हम
                        लिए कटोरा हाथ
                        स्कूल चले हम||