संस्कृत समस्या

मेरे लिए संस्कृत बचपन में अंकतालिका में अच्छे अंक लाने और मातृभाषा हिंदी को बेहतर समझने का माध्यम रही थी| बाद में जब संस्कृत सहित अपनी पढ़ी चारों भाषाओँ को आगे पढ़ने की इच्छा हुई तब रोजगार की जरूरतों ने उसे पीछे धकेल दिया| यदा कदा संध्या-हवन के लायक संस्कृत आती ही थी और पुरोहित तो मुझे बनना नहीं था| फिर भी संस्कृत पढ़ने की इच्छा ने कभी दम नही तोड़ा| जिन दिनों अलीगढ़ के धर्मसमाज महाविद्यालय में अध्ययनरत था संस्कृत पढ़ने की पूनः इच्छा हुई| उसी प्रांगण में धर्मसमाज संस्कृत महाविद्यालय भी था, जो प्रवेश आदि की जानकारी लेने पहुँचा| जानकारी देने वाले को दुःख हुआ कि मैं मुख्यतः धर्मग्रन्थ पढ़ने के लिए नहीं बल्कि कालिदास, शूद्रक, पंचतंत्र आदि साहित्य को पढने के संस्कृत सीखना चाहता था| उनका तर्क था कि यह सब तो अनुवाद से पढ़े जा सकते हैं| संस्कृत में कामसूत्र पढ़ना तो कदाचित उनके लिए पातक ही था| उनके अनुसार धर्मग्रन्थ पढ़कर अगर अपना जीवन और संस्कृत पाठ सफल नहीं किया तो जीवन और जीवन में संस्कृत पढ़ना व्यर्थ है|

विकट दुराग्रह है संस्कृत पढ़ाने वालों का भी| वेद –पुराण तक समेट दी गई संस्कृत एक गतिहीन अजीवित भाषा प्रतीत होती है| संस्कृत के बहुआयामी व्यक्तित्व को दुराग्रहपूर्ण हानि पहुंचाई जा रही है| एक ऐसी भाषा जिसमें जीवन की बहुत सारे आयामों पर साहित्य उपलब्ध है| संस्कृत को केवल धर्म तक समेट देना, उन लोगों को संस्कृत से दूर कर देता है जिन्हें धर्म में थोड़ा कम रूचि है|

अभूतपूर्व समर्थन के चलते संस्कृत विलुप्त होने की आशंकाओं से जूझ रही भाषाओँ में अग्रगण्य है| आपको मेरा आरोप विचित्र लगेगा और है भी| संस्कृत को समर्थन देने वालों का संस्कृत के प्रति एक धार्मिक दुराग्रह है| वह संस्कृत का प्रचार चाहते हैं और शूद्रों, मलेच्छों, यवनों, नास्तिकों के संस्कृत पढने के प्रति आशंकाग्रस्त भी रहते हैं| यह दुराग्रह संस्कृत को धर्म विशेष की भाषा सीमित भाषा बनाने का | कार्यकर रहा है| अन्यथा संस्कृत को समूचे भारत की भाषा बनाया जा सकता था|

समाचार है कि दिल्ली विश्वविद्यालय को अपने संस्कृत पाठ्यक्रम के लिए छात्र नहीं मिल सके हैं| कैसे मिलें? शिक्षक ने नाम पर दुराग्रही अध्यापक हैं| रोजगार ने नाम पर केवल अध्यापन, अनुवाद और पुरोहिताई है| आप आत्मसुखायः किसी को पढ़ने नहीं देना चाहते| संस्कृत पाठ्यक्रम में साहित्यिक गतिविधियों पर जब तक अध्यापक और छात्र ध्यान नहीं देंगे, यह पाठ्यक्रम नीरस बना ही रहेगा| जिसको पुरोहिताई, धर्म-मर्म आदि में रूचि है उनके लिए अन्य कुछ विश्वविद्यालय बेहतर विकल्प हैं|

यद्यपि आजकल सामाजिक माध्यमों में संस्कृत का प्रचार प्रसार करने के लिए भी कुछ गुणीजन समय निकालकर काम कर रहे हैं| परन्तु जब तक संस्कृतपंडितों के संस्कृत मुक्त नहीं होती, अच्छे दिन अभी दूर हैं|

 

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समाज में संस्कृत

प्राचीन भारतीय भाषा संस्कृत को लेकर भारतीय विशेषकर उच्चवर्ग मानसिक रूप से लगाव रखता है| जिन लोगों को किसी भी भारतीय भाषा में बात करने में शर्म आती हैं वो भी संस्कृत का जिक्र आते ही अपने ह्रदय में राष्ट्र, धर्म, संस्कृति, और संस्कार के झंडे बुलंद करने लगते हैं| मगर अगर भारतीय जनसंख्या के अनुपात में देखें तो जनसँख्या का नगण्य हिस्सा के लिए ही संस्कृत  मातृभाषा है| मुट्ठी भर भारतीय इसे समझ बोल सकते हैं| बहुसंख्य के लिए संस्कृत गायत्री मंत्र या किसी और गुरुमंत्र की भाषा मात्र है| अधिकांश “काले अक्षर भैस बराबर – यजमान” पंडितजी के सही गलत उच्चारण में बोली गई संस्कृत में वेद – पुराण मन्त्रों से अपना इहलोक और परलोक “सुधार” लेते हैं और ॐ जय जगदीश हरे या कोई फ़िल्मी आरती गाकर या सुनकर संतुष्टि प्राप्त करते हैं|

सरकारी हिंदी और धार्मिक संस्कृत की भारत में दशा इनके पोंगा प्रचारों, अनुष्ठानों और समारोहों के कारण जनता से कोसों दूर है| सरकारी हिंदी का बनावटीपन उसकी विनाशगाथा है| मगर संस्कृत का दुर्भाग्य है कि यह धर्म के ठेकेदारों के कब्जे में है और विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी इसके शिक्षक संस्कृत को धर्मग्रंथों से अलग कर कर नहीं देख पाते| उनके लिए संस्कृत वेद पुराण की भाषा से अधिक कुछ नहीं है| भर्तहरि बाणभट्ट, जयदेव, जैमनि, कालिदास, आदि उनके लिए संस्कृत का नहीं, सामान्य ज्ञान – अज्ञान का विषय है| आचार्यों के दीर्घबुद्धि में यह नहीं आता कि जब भाषा को साहित्य से अलग कर दिया जाय तो वह बूढी हो जाती है और जनता से कटकर मृत|

मगर संस्कृत की दुनिया में सब कुछ पंडिताऊ अंधकार ही नहीं है, जन साधारण का उजाला भी है:

देखिये सुनिए नीचे दिए गए चलचित्र –

 

 

 

 

वेद में विज्ञान

“विज्ञान जो बता रहा है वो सब वेदों में है, मगर वेदों में कहाँ है, पंडितजी को नहीं मालूम… अथ सत्य कथा||”

अभी कुछ दिन पहले जब यह वाक्य मैंने फेसबुक पर डाला तो अति विचित्र प्रतिक्रिया हुई| मेरा आशय पण्डित जी पर टिपण्णी करना था और इसका छद्म उद्देश्य उन सभी तथाकथित धर्मगुरुओं और पदाधिकारियों पर टिपण्णी करना था जिन्हें हम पण्डित, स्वामी, संत, मोलाना, हाजी, काज़ी, पादरी, भंते आदि आदि कहते हैं| इस आलेख में आगे जब भी पण्डित जी शब्द प्रयोग हो तो उसमें यह सभी धार्मिक पदाधिकारीगण सम्मलित होंगे|

अधिकतर धार्मिक पदाधिकारियों की समस्या है कि उन्हें अपने धर्मग्रन्थ की मूल भाषा न के बराबर आती है| कुछ पण्डित लिपि तो पढ़ सकते है, मगर भाषा नहीं| अर्थात संस्कृत, अरबी, पाली, हिब्रू आदि का उच्चारण मात्र कर सकते हैं मगर अर्थ नहीं| प्रायः इन सभी का ज्ञान साधन इनके बड़े धार्मिक नेताओं की खोखली भाषणबाजी ही होती है या कभी कभी सस्ते किस्म के गुटखे या टीकाएँ|

हास्य इस बात से भी उत्पन्न होता है कि आज की पीढ़ी को दोष देकर हाथ झाड़ लिए जाते हैं कि “आज की पीढ़ी संस्कृत, पाली, प्राकृत, अरबी या हिब्रू नहीं पढ़ती”| मगर पिछले दो हजार वर्षों में इतनी सारी पीढ़ियों ने यह सब भाषाएँ और धर्म ग्रन्थ पढ़ कर विज्ञान के क्षेत्र में कौन से तीर मार लिए|

आज के समय में कोई भी धर्मग्रन्थ हजार – दो हजार वर्ष में कम पुराना नहीं है मगर विज्ञान का विकास पिछले दो सौ वर्षों में ही हुआ है| यह वही समय है जबसे संस्कृत, पाली, प्राकृत, अरबी या हिब्रू आदि महान भाषाएँ पढ़ना कम हुआ  है| मेरे जैसे गिने चुने लोग अवश्य ही शौक में पुरानी भाषाओँ को पढ़ लेते हैं|

अब बात करते हैं धर्म ग्रंथों में विज्ञान होने की| जो भी विद्वान धर्म ग्रंथों को वैज्ञानिक ग्रन्थ मानते हैं वह धर्म ग्रंथों का अपमान कर रहे हैं| धर्म ग्रंथों का उद्देश्य मनुष्य को आध्यात्मिकता की ओर ले जाना हैं और विज्ञान मात्र भौतिकता और सृष्टि पर मानव की विजय का अभियान मात्र है| यह सही है कि धर्मग्रंथों में कुछेक वैज्ञानिक बातें मिल सकती हैं मगर वह केवल प्रसंगवश आयीं हैं| धर्मिक कथाओं में विज्ञान ढूँढना धर्म के उद्देश्य से भटकना है| उपवेदों में गणित और आयुर्वेद भी इसलिए हैं कि उनकी आध्यात्मिक स्वस्थ जीवन में आवश्यकता है, उनका भौतिक लाभ से कोई सम्बन्ध नहीं है|

आज जो लोग अपने अपने धर्मग्रन्थ में विज्ञान होने की बात कर रहे हैं वह मात्र भौकिकतावादी पीढ़ी को बरगला रहे है जिस से उनकी दुकान उन लोगों में भी चलती रहे जिनकी आध्यात्मिकता में कोई रूचि नहीं है|

यदि कोई आपसे अपने धर्मग्रन्थ में विज्ञान की बात करे तो संभल जाएँ, उसे अपनी दुकान में दिलचस्पी है धर्म और विज्ञान में नहीं|