आरक्षित अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण न दिए जाने का मुद्दा जोरों पर है| यह नया मुद्दा नहीं है| पिछले साठ सत्तर सालों से यह मुद्दा उठता रहा है| सरकारी पत्राचार होता रहा है| स्थानीय सवर्ण हिन्दू हमेशा इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण के विरोध में रहे हैं| वास्तव में मुस्लिम समुदाय को इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण से कोई फ़र्क नहीं पड़ता|

जातिगत आरक्षण के मुद्दे का सरकारी पत्राचार से बाहर आना कई परिकल्पनाओं पर आधारित है:

  1. इस विश्वविद्यालय में मुस्लिम तबके के लिए आरक्षण है|
  2. जातिगत आरक्षण से विश्वविद्यालय में लगभग आधे लोग उस आरक्षित तबके होंगे जो हिन्दू है या कम से कम सरकारी कागजों में हिन्दू माना जाता है|
  3. मुद्दा उठाने वालों को तात्कालिक राजनीतिक लाभ मिलेगा|

यह विश्वविद्यालय वास्तव में कोई धार्मिक या जातिगत आरक्षण नहीं देता| पचास प्रतिशत का आंतरिक छात्रों के लिए दिया जाने वाला आरक्षण और गैर मुस्लिम समुदाय का यहाँ पढने की इच्छा न रखना इस को मुस्लिम बहुल विश्वविद्यालय बनाने का काम बखूबी करता है|

यहाँ पढाई वास्तव में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर शुरू होती है और यह छात्र आगे चलकर पचास प्रतिशत आरक्षण का लाभ पाते कहते हैं| ज़ाहिर हैं, प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर अधिकतर छात्र मुस्लिम परिवारों से होते हैं| इनमें भी अधिकतर छात्रों के परिवार के परिवार खानदानी तौर पर यहाँ के छात्र हैं| इसके बाद बची हुई सीटों के लिए खुला मैदान है| देश विदेश का हर सुखी संभ्रांत मुस्लिम परिवार अपने बच्चों को यहाँ पढ़ाने ले लिए दस दस साल से मेहनत का रहा होता है| उनके जेहन और यह गिने चुने विकल्प में होता हैं, जहाँ उनके बच्चे सुरक्षित होंगे| इस सोच में उनका दोष नहीं है न ही वो डरपोक हैं, यह असुरक्षा की भावना उनपर लादी गई है|

अभी तक इस विश्वविद्यालय में पढने वाले हिन्दू भी मुस्लिमों की तरह परिवार के परिवार पढ़ते रहे हैं| इसका कारण यह है कि सांप्रदायिक ताकतों के द्वारा खड़े किये गए पारस्परिक अविश्वास के चलते अन्य हिन्दू परिवार यहाँ अपने बच्चों को पढ़ने नहीं भेजते| साथ ही अलीगढ़ में दंगों की संख्या भले ही बहुत कम हो अलीगढ़ के बाहर लोग इसे इसी तरह देखते हैं कि यहाँ मानो बहुत लम्बा गृहयुद्ध चल रहा हो|

इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण मांगने वालों का एक भ्रम (बल्कि गणित) यह भी है कि जातिगत आरक्षण की लाभार्थी जातियां हिन्दू हैं| ध्यान देने की बात यह है कि बड़ी संख्या में मुस्लिम जातियाँ भी आरक्षण का पात्र हैं और उनकी जनसंख्या भी कम नहीं है| यदि इस विश्वविद्यालय में जातिगत आरक्षण आता भी है तो आरक्षण का पात्र मुस्लिम तबका बड़ी संख्या में अपना हक ज़माने में कामयाब रहेगा| अगर आप विश्विद्यालय के मुस्लिम बहुमत को तोड़ना चाहते हैं तो ऐसा नहीं होगा| वास्तव में अगड़े और पिछड़े मुस्लिमों में आपस में मेलजोल का नेक काम होगा| अगर इस गणित को ध्यान से समझें तो धरातल पर राजनैतिक झुकाव में कोई परिवर्तन यह मुद्दा नहीं ला सकता|

हाँ, नुक्सान में कौन रहेगा? कुछ सवर्ण हिन्दू परिवार|

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आरक्षण पर पारस्परिक कुतर्क

आरक्षण के समर्थन या विरोध में वाद –विवाद करते रहना धर्म, राजनीति, क्रिकेट और खाने-पीने के बाद भारतियों का प्रिय शगल है| मुझे आरक्षण की मांग मूर्खता और उसका विरोध महा-मूर्खता लगती है| सीधे शब्दों में कहूँ तो आरक्षण के पक्ष-विपक्ष में खड़े राजनीतिक दल या राजनेता भारत और किसी भी भारतवासी के हितेषी नहीं हो सकते| अगर आप चाहें, यह आगे न पढ़ें|

मेरे इस आलेख पर इस बात का कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आरक्षण का प्रस्ताव अपने आप में उचित था या नहीं| हालाँकि मुझे पारदर्शिता के हित में अपनी निजी राय रख देनी चाहिए| मुझे लगता है, जब तक समाज में असमानता है –आरक्षण की आवश्यकता है|

प्रख्यात कुतर्क है कि आरक्षण का देश के विकास पर कुप्रभाव पड़ता है| परन्तु सभी जानते हैं कि अपेक्षागत तौर पर कम आरक्षण वाले हिंदीभाषी राज्य अधिक आरक्षण वाले दक्षिणी राज्यों से बेहद कम विकास कर पाए हैं| एक कारण यह है कि दक्षिणी राज्यों में आरक्षण और उसका सही अनुपालन अधिक बड़े जन समुदाय को आगे बढ़ने की प्रेरणा देने में सफल रहा है| दक्षिणी राज्यों में विश्विद्यालयों और सरकारी नौकरियों में आरक्षित और अनारक्षित प्रतिभागियों के योग्यता सूची में अंतिम आने वाले प्रतिभागीयों के योग्यतांक का अंतर लगातार घट रहा है| दक्षिणी राज्यों में अधिकतर प्रतिभागियों को आरक्षण अथवा बिना आरक्षण लगभग बराबर का संघर्ष करना पड़ रहा है| जबकि उत्तरी और पश्चिमी राज्यों में योग्यता प्रदर्शन की खाई बरक़रार है|

आरक्षण के समर्थन (और नई मांग) या विरोध में खड़े होने वाली भीड़ को देखें| भीड़ के अधिकतर सदस्य वो निरीह प्राणी होते हैं जो शायद किसी प्रतियोगी परीक्षा में दस प्रतिशत अंक भी न ला पायें| जब इस प्रकार के उग्र प्रदर्शन होते हैं उस समय उनके सभी योग्य जातिभाई सरकारी या निजी क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का लाभ उठाने का उचित प्रयास कर रहे होते हैं|

जातिगत भेदभाव के विपरीत, सभी वर्गों से नए नए उद्यमी आगे आ रहे हैं| व्यापार के साथ साथ बड़े उद्योगों में भले ही सवर्णों और अन्य धनपतियों ने आधिपत्य कायम किया है, छोटे और मझोले उद्योगों में हमेशा की तरह शूद्र कही गई जातियों का आधिपत्य है| ध्यान देने की बात है कि प्रायः सभी उत्पादक और सेवा प्रदाता जातियाँ प्राचीन काल से शूद्र के रूप में वर्गीकृत होती रहीं हैं| दुःखद यह है कि इनमें अपने पारंपरिक कार्यों के प्रति वही घृणा भर दी गई है, जो सवर्ण सदा से उन कार्यों से करते रहे थे|

अब, आइये मुख्य मुद्दे पर आते हैं|

रोजगार सुधार

आरक्षण समर्थक और विरोधी दोनों ही वर्ग सरकारी नौकरी के लालच में एक दूसरे से लड़ रहे हैं| कोई नहीं देखता कि सभी उत्पादक रोजगारों के मुकाबले सरकारी क्षेत्र में बहुत कम अवसर हैं| साथ में, बड़े और विदेशी उद्योगों और संस्थानों के दबाव में आवश्यक सरकारी पद भी नहीं भरे जा रहे| लागत कम करने के नाम पर सरकारी क्षेत्र को मानव संसाधन विहीन करने की परंपरा चल रही है|  इस नाते प्रथम दृष्टया आरक्षण अप्रभावी हो रहा है| वास्तव में मांग होनी चाहिए कि सरकारी गैर सरकारी क्षेत्रों में सभी खाली पद समय पर भरे जाएँ| अनावश्यक निजीकरण न हो| कोई भी व्यक्ति अपने कार्यालय में विवश होकर या लालच में भी आठ घंटे से अधिक समय न बिताये| ओवरटाइम की व्यवस्था समाप्त हो| पूरे साल में कोई भी व्यक्ति अगर दो हजार घंटे पूरे कर ले उसे साल भर के सभी लाभ एक घंटे भी बिना कार्यालय जाए बाकि बचे हुए समय में मिलें| आप देखेंगे कि देश में न सिर्फ रोजगार बढ़ जायेगा बल्कि कार्यालय में जीवन काटते लोग, वास्तविक जिन्दगी जी पाएंगे|

विकास

यदि देश में समुचित विकास हो तो कोई कारण नहीं कि सभी रोजगार योग्य युवाओं को रोजगार न मिले| सोचिये अगर किसी समय एक लाख पदों के लिए भर्ती होनी हो और रोजगार योग्य कुल युवा भी एक लाख के आसपास हों| ऐसे में किसे आरक्षण की जरूरत होगी? जब भी कोई राजनेतिक दल आरक्षण के समर्थन या विरोध में कोई बात कहता है, वास्तव में वह विकास के प्रति अपनी द्रष्टिहीनता की घोषणा करता है| यही कारण है कि विकास का नारा लगाने वाले बड़े बड़े तुम्मन खां नेता आरक्षण का तुरुप  नारा अपनी वाणी में बनाये रखते हैं| ध्यान रहे की विकास किसी सरकारी फीताकाट योजना से नहीं आएगा, वरन उच्च शिक्षित युवाओं द्वारा प्रतियोगी माहौल में आगे बढ़कर काम करने से आएगा|

आपको को आश्चर्य होगा, मगर मुझे बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के अलावा कोई भी राजनेता सच में आरक्षण विरोधी नहीं लगा|

आरक्षण और कुशलता

आरक्षण के विरोध में सबसे अधिक मजबूत तर्क है कि आरक्षण योग्य लोगों को योग्य लोगों से अधिक तरजीह देता है| हाल में कोलकाता में पुल ढ़हने के बाद भी आरक्षण को सोशल मीडिया में कोसा गया| क्या यह तर्क सत्य है?

आरक्षण का समर्थन या विरोध इस तथ्य को नजरअंदाज करता है कि संसाधन, अवसर या विकास की कमी आरक्षण को जन्म देती है| जब समाज के सभी लोगों में संसाधन नहीं बांटे जा सकें तब उनको किसी न किसी अनुपात में सभी लोगों को मुहैया कराया जाना होता है| अन्यथा ताकतवर तबका कमजोर तबके तक संसाधन नहीं पहुँचने देता| इस से कमजोर तबका या तो हीनता से ग्रस्त पस्त होकर पशु तुल्य हो जाता है या अपनी पूरी ताकत से उठकर संसाधन की लूट में शामिल हो जाता है| आरक्षण या राशनिंग न होने से ताकतवर तबका सफेदपोश तरीकों से सीमित संसाधन पर कब्ज़ा करता है तो कमजोर स्याह तरीकों से|

आरक्षण के बाबजूद मध्यप्रदेश में ताकतवर माने जाने वाले तबकों के बीच भी व्यापम घोटाले जैसे सफेदपोश तरीके सामने आयें हैं तो बहुत से लोग मानते हैं कि नक्सलवाद आदि कमजोर तबके का संसाधन के लिए संघर्ष है| आरक्षण या संसाधन की कमी के कारण उत्पन्न समस्याओं का हल संसाधन की उपलब्धता को सभी प्राकृतिक नियमों के अन्दर रहकर यथा – संभव पूरा करना ही हो सकता है|

आईये मूल प्रश्न पर लौटें| भारत में शिक्षा और रोजगार के अधिकतर क्षेत्रों में गिरावट को आरक्षण से जोड़कर देखा जाता है| भारत में आरक्षण तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा पिछड़े और आती पिछड़े वर्ग को आरक्षण दिए जाने से पहले काफी कम था और “योग्य” लोगों के बहुमत का सरकार और संस्थानों पर कब्ज़ा था| परन्तु, उस से पहले विकास की दर बहुत कम थी| पिछले बीस सालों में आरक्षित पदों पर आये लोग अब आकर महत्वपूर्ण पदों पर आना शुरू हुए हैं|

मैं इस सन्दर्भ में चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी के पेशेवर क्षेत्रों का उदाहरण दूंगा| यह दोनों व्यवसाय आरक्षण विहीन हैं और आरक्षण के अधिकारी लोग इन व्यवसायों में बहुत कम संख्या में हैं| यह पेशेवर लोग उद्यमों के सही रास्ता दिखाने और गलत कार्य करने से रोकने के लिए तैयार किये जाते हैं| मगर इन व्यवसायों से इनका उपभोक्ता वर्ग संतुष्ट नहीं माना जाता| सरकार, विनियामक संस्थाएं, निवेशक आदि इनके कार्यों को सिर्फ कानूनी प्रक्रिया की तरह देखते हैं| इन पेशों में लगे पुराने लोग, लगातार गिरते स्तर पर जोर देते हैं, जबकि आरक्षण का इसमें दूर तक कोई हाथ नहीं है|

एक दूसरा सवाल भी है| सभी मानते हैं कि सरकारी विद्यालयों में पढाई और अस्पताल में ईलाज ठीक से नहीं होता| इसके लिए आरक्षित तबके तो दोषी मान कर चला जाता है| मगर उन क्या इन सरकारी विद्यालयों और अस्पतालों में ५०% संख्या “योग्य” गैर आरक्षित लोगों की नहीं होती| वो लोग क्यों काम या कहें अच्छा काम नहीं करते| मेरे विचार से यह सिर्फ सर्वव्यापी मुफ़्तखोरी की समस्या है|

आरक्षण का मुद्दा और मांग करते हुए केवल उन लोगों देखा जाता है, जो न तो आरक्षण ख़त्म होने पर और न ही उनकी जाति को आरक्षण मिलने पर प्रतियोगिता में सफल हो सकते हैं| कर्मठ और योग्य लोग अपने लिए गिनी चुनी सरकारी नौकरियों के बाहर भी रोजगार खोज लेते हैं, शेष सरकारी नौकरी न मिलने का दोष आरक्षण को देते हैं|

जातिवादी शिक्षा व्यवस्था

बचपन में हम सवर्णों का वास्ता जाति और इसके अभिशाप से नहीं पड़ता| जब हम घर से निकलकर विद्यालय जाते हैं तो पहली बार इसका पता लगता है|

क्या घरों – मुहल्लों में जाति नहीं होती? दिल्ली मुम्बई महानगरों में जाति का प्रकोप मुहल्लों और कॉलोनियों में शायद कम ही दीखता हैं मगर अधिकांश नगरों – महानगरों में मोहल्ले ही जाति के आधार पर बने होते हैं| सवर्ण इलाकों में दलित और अन्य धर्म का रहना मुश्किल है| इसलिए बच्चों को जाति का सीधा भान नहीं होता| भारतीय शहरों में इलाकों के जाति और धर्म के नाम पर होते रहें हैं| हमारे शहरों में ब्राह्मणपुरी, बनियापाड़ा, तमोलीपाड़ा आदि जाति आरक्षित इलाक़े हैं| आज भी नए इलाकों में जाति का प्रकोप बना हुआ है और सवर्ण – पिछड़ा – दलित – उच्चमुस्लिम – निम्नमुस्लिम का प्रकोप बना हुआ है और थोड़ा अंतर यह है कि उसमें सवर्णों में आपसी जाति भेदभाव का स्थान आर्थिक भेदभाव ने ले लिया है|

जिनका बचपन या जीवन बचपन जीवन सवर्ण इलाकों में ही बीता हैं, उन्हें दलित लोगों से कोई विशेष वास्ता नहीं पड़ता| पारस्परिक संवाद का कोई साधन या पारस्परिक व्यवसायिक सम्बन्ध विकास और सवर्णों के गौर सवर्ण व्यवसायों में आने के साथ लगभग समाप्त हो चुके हैं| बहुत से कामों में आज लोग, सभ्यता या मजबूरी के कारण जाति नहीं देखते जैसे ढ़ाबे पर खाना खाना|

विद्यालय और व्यवसाय, जीवन में परिवार और नाते रिश्तों के बाहर पारस्परिक सामाजिक संवाद का अवसर प्रदान करते हैं| सरकारी नौकरियों में सकारात्मक आरक्षण के कारण पारस्परिक संवाद बना है, परन्तु निजी क्षेत्र में नकारात्मक आरक्षण (भेदभाव भी पढ़ सकते हैं) के कारण सवर्ण संस्थाओं में सवर्ण और दलित संस्था में दलित बहुसंख्या[1] काम करती है| निजी क्षेत्र में मजदूरों की नियुक्ति में जरूर जाति भेद कम हैं, मगर मध्यवर्गीय दृष्टि क्षेत्र के बाहर मजदूरों में आपसी जातिवाद और जातिगत गुटबाजी होती है|

विद्यालयों में पारस्परिक सामाजिक संवाद उस कच्ची उम्र में होता है, जहाँ यह जाने अनजाने में हमारे अंतर्मन पर दुष्प्रभाव छोड़ता है| सवर्ण क्षेत्रों में रहने पलने के बाद मेरे लिए भी इस भेदभाव का पाठ कक्षा 6 में मिला था| जहाँ अधिकतर हिन्दू – मुस्लिम सवर्ण और पिछड़े पहले सेक्शन में थे और हिन्दू मुस्लिम दलित तीसरे में| दूसरा सेक्शन सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ों के लिए था| अधिकतर शिक्षक सवर्ण थे और पहले सेक्शन के अलावा कहीं और पढ़ाना उनके लिए महापाप था| अंतरजातीय वार्तालाप गुरुजन के क्रोध को भड़का सकता था| मुझे कई बार यह बताया गया कि जाटवों या कुरैशियों से बात करने से जुबां ख़राब हो जाती है, आप संस्कृतनिष्ठ हिंदी या गाढ़ी उर्दू की जगह अबे – तबे बोलना शुरू कर सकते हैं| मजे की बात है की अबे तबे की भाषा में हमारे गुरुजन जाटवों या कुरैशियों से कहीं अधिक माहिर थे| भेदभाव का पहला पाठ यही था| आज भी स्तिथि नहीं बदली है, केवल बहाने बदल गए हैं| आज अछूत के स्थान पर साफ़ – सफाई, भाषा, गाली – गलौज, या कोई और बहाना लगाया जाता है|

पापा के स्थानांतरण के बाद जब नए स्कूल पहुँचे तो वहाँ हर सेक्शन में लगभग बराबर अनुपात में सभी सामाजिक वर्ग थे मगर…| उसका एक राजनीतिक कारण था, स्थानीय पूर्व सांसद दलित वर्ग से थे और केंद्र में मंत्री रहे थे| मगर सवर्ण और दलित प्रायः आपस में बात नहीं करते थे| कक्षा में सबसे आगे शहरी सवर्ण, उसके बाद ग्रामीण सवर्ण, फिर पिछड़े, फिर शहरी और ग्रामीण दलित थे| इसमें कुछेक अपवाद थे जैसे पूर्व सांसद महोदय का भतीजा अपने एक दो मित्रों से साथ अपनी पसंद की जगह पर बैठता था, वह प्रायः शहरी सवर्णों से पंगा नहीं लेता था और बाकी लोग उससे| मेरे और उसके जैसे दो – तीन लोग ही कक्षा में उन छात्रों में से थे जो जाति सीमा के बाहर हर किसी से बात करते थे| अन्य लोगों से संवाद प्रायः फब्तियों, गालियों, नारेबाजी और “जातिसूचक शब्दों” में होते थे|

जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं; सवर्णों को दलित वर्ग तो निशाना बनाने का एक और हथियार मिल गया| जिसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया तीव्र थी मगर जल्दी ही आर्थिक सुधारों में उसे थाम लिया| अब आर्थिक विकास के कारण होशियार छात्र प्रायः जातिगत आरक्षण को लेकर चिंता नहीं करते| आजकल कम पढ़ने वाले सवर्ण छात्र ही प्रायः दलितों और अन्य आरक्षित वर्गों से कटुता रखते हैं| भले ही अभी यह अपेक्षा से कम है, परन्तु दलित छात्रों में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ी है और पढाई – लिखाई का स्टार भी| परन्तु, विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में सबसे अधिक भेदभाव आज भी शिक्षक वर्ग की तरफ से आता है|

हैदराबाद विश्वविद्यालय में शोधार्थी रोहित वेमुला की आत्महत्या के कारण उठे सवालों के तात्कालिक कारणों से हटकर अगर हम भारतीय शिक्षा व्यवस्था में झांके तो हमारे विश्वविद्यालय सामंती परंपरा के संवाहक हैं| हमारे गुरुजन (और दुर्भाग्य से नवगुरुजन भी) यथा – योग्य चरणवंदना के आधार पर अपने गुरूर की सत्ता को गर्वानुभूति से संचालित कर रहे हैं| शोधार्थी तो वैसे ही बंधुआ हो जाता है, जिसके आगे गुरु घंटाल अपनी गौण – गुरुता सिद्ध करने में लगे रहते हैं| अगर छात्र सामाजिक या आर्थिक तौर पर नीचे पायदान है तो यह बंधुआ – शोधार्थी उनके लिए जन्म- जन्मान्तर का दास हो जाता है| एक शोधार्थी का सामाजिक आन्दोलन में सक्रिय होना विरोधी संगठन के लिए मात्र विरोध होता है परन्तु गुरु – सत्ता के लिए अपने इन्द्रासन पर आघात के समान होता हैं| डोलता हुआ इन्द्रासन शील, शालीनता, साधना और समाधि के नष्ट होने से ही ठिकता है|

[1] भारत के सकल उत्पाद का अधिकांश छोटे और मझौले उद्यमियों से आता हैं जिनका सञ्चालन अधिकतर पिछड़े और दलितों के हाथ में है|

आरक्षण का उत्तर

अभी हाल में जब मैंने आरक्षण के पक्ष में अपने विचार रखे तो उसके विरोध में मिलने वाले विचारों में पिछले साठ साल से चल रहे आरक्षण पर इस प्रकार टिप्पणियाँ की गईं मानों यह आरक्षण मनु महाराज के ब्राहमण आरक्षण से अधिक लम्बा चल रहा हो|

जिस प्रकार भारत में आरक्षण पर हाँ और न चल रही है मुझे लगता है कि अगली एक सहस्त्राब्दि आरक्षण को चलना चाहिए| क्या आरक्षण का असली कारण सामाजिक पिछड़ापन मात्र है?

नहीं, देश में शिक्षा और नौकरियों के अवसर बहुत कम हैं| इन सीमित अवसरों में यदि आरक्षण न मिले तो पिछड़े वर्ग को अवसर कदापि न मिल पायें|

हमें आरक्षण को ख़त्म करते से पहले राष्ट्र के विकास पर ध्यान देना होगा, जिससे हर किसी के लिए शिक्षा और रोजगार के पर्याप्त अवसर हों| आरक्षण समग्र विकास में अपनी भूमिका निभा रहा है| दो उदहारण हैं:

पहला: मौर्य काल से मुग़ल काल तक, अर्थात अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति था| परन्तु, समृद्धि का सारा लाभ सवर्णों (मुस्लिम सवर्ण भी) के पास था| जबकि देश के सारे उद्योग आदि बुनकर, बढई, लोहार, चर्मकार, जैसे तमाम पिछड़े और शुद्र वर्ग के हाथ में था| अंग्रेजों में भारतीय विकास और समृद्धि की इस कमज़ोरी को समझा और मर्म पर प्रहार किया| वर्तमान आरक्षण इस गलती को ठीक करने का प्रयास कर रहा है| दुर्भाग्य से भारत का सवर्ण और आरक्षित वर्ग का क्रीमीलेयर आरक्षण के लाभ को सबसे निचले तबके तक नहीं पहुँचने देना चाहता|

दूसरा: जब हम ट्रेन में जाते है तो अपना अपना आरक्षण कराते हैं| अगर आपको लगता है इस ट्रेन आरक्षण की आवश्यकता इसलिए है कि आप आराम से यात्रा कर सकें तो आप गलत हैं| ट्रेन में आरक्षण करने के क्रम में बहुत से लोग यात्रा से वंचित रह जाते हैं| उनके लिए यात्रा की कोई सुनिश्चितता नहीं होती| कारण: कम ट्रेनें, कम सीटें, अर्थात संसाधन की कमी| जबकि यदि संसाधन पर्याप्त हों तो सभी लोग यात्रा कर सकते हैं और आरक्षण की आवश्यकता केवल सीट की सुनिश्चितता के लिए होगी न कि यात्रा की|

आरक्षण के सही उत्तर संसाधन का विकास है|