सुनसान सड़क पर

सुनसान सड़क पर

देर शाम

टहलते हुए

गुनगुना रहा था

कोई पुराना प्रेम गीत

.

लाठी लहराते

सामने से आते

सिपाही ने

दूर से

कान के

पास कुछ पीछे

ललचाती लम्पट तीखी

नजर से

किया कुछ

बलात्कार सा

.

अचानक

अचानक

सहमी मरियल सी

श्याम वर्ण किशोरी ने

पीछे से कसकर

कंधे पर

पकड़ा

कान में

शब्द से आये

बचा लीजिये

निगल जायेगा

हाथ थाम लिए

दिल थम गया

.

मोड़ से

गुजर कर

सांसे ली गयीं

लड़की झुकी

मेरी ओर

आँखे नम थीं

चेहरा रक्तहीन

.

अचानक

अचानक

हाथ उठा

उसके बांये

स्तन पर

यंत्रवत जड़ दिए

अपने हस्ताक्षर

.

राहत थी

आँखों में

हल्की पड़ती चमक

ने जैसे कहा हो

शुक्रिया श्रीमान

अस्मिता बख्श दी

.

अचानक

अचानक

पौरुष ने कहा

कलंक

निरे नपुंसक

.

अचानक

अचानक

रात को

आँख खुल गयी

चढ़ा हुआ था

तकिये पर

.

.

(कवि हूँ या नहीं हूँ| कविता करने का न वादा है, न दावा है| चित्र यद्यपि मेरा नहीं हैं मगर इस चित्र को भी कृपया “शब्द समूह” के साथ या बाद अवश्य पढ़े|)

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क्या तुम पुरुष विश्ममित्र??

परिहास हास, विनय अनुनय,
गायन वादन, नृत्य अभिनय|

हे तपस्वी तेजोमय व्यवहारी,
मेनका बारम्बार हार कर हारी||१||

किया न तुमने सम्मान सत्कार,
दिया न नासिका कर्तन उपहार|

क्रोध काम संसार लोभ मोह,
किस किस का किया विछोह||२||

तुच्छ नीच स्त्री अधर्म,

देव लोक का वैश्या कर्म|

इन्द्र दूती सर्वनाश तुम्हारी,
विश्वामित्र इन्द्र[i] पर भारी||३||

स्त्री पड़ी तपस्या पर भारी,
मान श्रम परिश्रम सब संहारी|

छोड़ तपस्या तप पदवी भारी,
विश्वामित्र मुनि बने संसारी||४||

मेनका विश्वामित्र

मेनका विश्वामित्र

यह स्त्री भी क्या प्रेम पात्र,
ताडन तोडन, मरण वज्रपात|

प्रेमपाश में पड़े पुरुष मात्र,
कर न सके तुम घात आघात||५||

कपट कूट, धोखा षड़यंत्र,
देवलोक दिव्य यन्त्र मन्त्र|

इन्द्राचार छोड़ भूल मेनका,
भूली हाल मन का तन का||६||

नव जीवन ने ली अंगड़ाई,
पुत्री शकुंतला घर में आई|

कटु जीवन की कटु सच्चाई,
माता पिता का संग न पाई||७||

क्या जीवन सन्देश तुम्हारा,
पुरुषीय अहंकार सब हारा|

स्त्री वैश्या भोग निमित्त,
परन्तु लगाया तुमने चित्त||८||

काम पीड़ा का व्याधि अतिरोग,
विषद बल वासना बलात्कार|

विश्वास श्रृद्धा स्त्री जीवन सार,
आमोद प्रमोद आहार विहार||९||

कर न सके एक बलात्कार,
तुमने चुना कौन सा चित्र?
नव भारत का प्रश्न एक,
क्या तुम पुरुष विश्ममित्र||१०||

(कुछ दिन पहले मैंने पौरुष का वीर्यपात लेख लिखा था, आज लोग रावण ही हो जांये तो भी बहुत कुछ सुधर सकता है|  लोगों ने रावण का चरित्र हनन तो कर लिया पर आशय नहीं समझा| अभी हाल में बलात्कार क्यों में इन्द्र का जिक्र कुछ लोगों को क्रुद्ध कर गया, मगर वो तथ्य मैंने पैदा नहीं किया; बड़े बड़े ग्रंथों में लिखा है| देश भर में बहुत सारा मंथन चिंतन हो रहा हैं और मैं भी अलग नहीं हो पाता हूँ| मैंने ब्रह्मचर्य का मुद्दा कई बार उठाया हैं, ब्रह्मचर्य का अर्थ पौरुषहीन या प्रेमहीन हो जाना नहीं हैं| जिस देश काल में लोग प्रेम, कामुक प्रेम, प्रेम वासना और बलात्कार में अंतर नहीं कर पा रहे हों, वहाँ सिर खपाना कहाँ तक उचित है?)

रेखाचित्र http://vintagesketches.blogspot.in/2009/09/menaka-vishwamitra.html से लिया गया है|


[i]  सामान्यतः इन्द्र का तात्पर्य देवराज इन्द्र से ही है परन्तु शरीर की समस्त इन्द्रियों से स्वामी मन अथवा हृदय को भी इन्द्र कहा गया हैं| यहाँ पर दोनों अर्थ उचित हैं परन्तु मेरा इस स्थान पर इन्द्र शब्द का प्रयोग मन के लिए है| प्रसंगवश, बता दूँ कि कुछ लोग कामेन्द्रिय को भी इन्द्र के रूप में निरुपित करते हैं|

बलात्कार क्यों??

 

परिवार

* स्त्री ने अपनी पांच साल की बेटी को कहा; “अपने कपड़े ठीक कर कर बैठा कर, लड़कों की निगाह खराब हो जाती है|”

      बेटी कुछ नहीं समझी, डर गयी| बेटा समझा अगर मेरी निगाह खराब होने में लड़की का दोष होगा|

* स्त्री ने बेटे को बादाम दूध देकर बोला; “पी ले बेटा तुझे बड़े होकर मर्द बनना है|”

      बेटा मर्द बनने में लग गया|

* स्त्री ने स्कूल से बेटी से कहा; “बड़ी हो रही है कुछ शर्म लिहाज सीख ले| लड़कों का क्या? ये तो खुले सांड होते है|

एक इंसान को पता लगा कि उसकी असली जात खुले सांड है|

* पुरुष ने सड़क पर किसी नन्ही बच्ची को छेड़ते हुए बेटे को देख कर घर आकर स्त्री से कहा; “तुम्हारा बेटा अब बड़ा हो रहा है|” स्त्री हँस दी; “हाँ, अब उसकी शिकायतें आने लगीं है|

      बेटा बड़ा होनेलगा|

* पुरुष ने बेटी से कहा; तू उन लोगों की बातों पर ध्यान देगी तो वो ऐसा तो करेंगे ही|

* पुरुष में बेटी को बोला; “बेटा! तुम अपनी तरफ भी ध्यान दो, ताली एक हाथ से नहीं बजती|”

* स्त्री में पड़ोसन से कहा; “तुम्हारी बेटी कुछ कम है क्या? और ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती|”

* पुरुष में अपनी बेटी को घर में घुसते ही पीट दिया; “साली हरामजादी’ क्या कर कर आई थी कि पान की दूकान पर लड़के तुझ पर छींटे उछाल रहे थे|”

* स्त्री में लड़कियां छेडकर घर आए बेटे को बिना डांटे, खाने खाने को दे दिया|

* स्त्री ने बेटी से कहा; “सुन अगर किसी लड़के में तेरी तरफ देखा भी तो मैं तुझे दीवार में चिनवा दूंगी|”

      बेटी ने समझा नहीं समझा, “मर्द” बेटे ने जरूर समझ लिया|

 

देश और समाज

  • सभी लड़कियां तय की गयी वर्दी पहन कर आएँगी; लड़के ….. कोई बात नहीं|
  • लड़कियों को सभ्य कपड़े पहनने चाहिए, वर्ना लड़कों का ईमान खराब होता है|
  • जब उन गालियों को समाज में स्वीकृति होती है, जिनमें स्त्री, माँ बहन बेटी, के साथ बलात्कार की बात होती है|
  • जब स्त्री का अस्तित्व समाज में मात्र योनि और स्तन तक सिमटा दिया जाता है| अधिक दुर्भाग्य यह है कि कोई उन पवित्र अंगों को जन्मदाता और बचपन में दूध पिलाने वाले अंग के रूप में आदर नहीं देना चाहता|
  • जब अपने भाई या पुरुष-मित्र से साथ घुमती लड़की को कमेन्ट किया जाता है; “हमें भी देख लो हम में क्या कांटे लगे है” कोई भी इस कमेन्ट पर कुछ नहीं कहता|
  • जब पिता अपने बेटों को ये नहीं कहता कि मर्द होने का मतलब लड़की का दिल जीतना है, शरीर पर जोर दिखाना नहीं|
  • जब लड़कियों को पर्दा करना पड़ता है कि किसी की बुरी नजर न पड़े|
  • जब लड़कियां खुद को बाजार में बिकने वाली चीज बनाने लगती है|
  • जब देश में क़ानून नेता जी के घर की पहरेदारी करता है और आम जनता को रात में घर में छिप जाने के लिए कहा जाता है|
  • जब समाज बलात्कार को “लड़की कि इज्जत लूटना” कहता है| उन दरिंदों का “ईमान-इज्जत-इंसानियत” खोना नहीं|
  • जब अदालत में लड़की को अपने बलात्कार का गवाह बनना पड़ता है जबकि किसी मुर्दे को अपनी मौत की गवाही नहीं देती पड़ती|
  • जब देश में मुक़दमे दसियों साल तक अदालत में झूलते रहते है|
  • जब देश की आम जनता पुलिस को देश का सबसे बड़ा अपराधी संगठन मानती है और एक अदने से जेब कतरे से भी पंगा नहीं लेना चाहती क्योंकि वो पुलिस का सगा छोटा भाई है|
  • जब देश में कड़े क़ानून किताबों में शोभा बढ़ाते है और उनका पालन नहीं होता|
  • जब किसी के शक की बिना पर बलात्कारी को छोड़ा जाता है और उसी शक की बिना पर पीडिता को अपराधी मान लिया जाता है|
  • जब हम बलात्कार में पीड़ित और अपराधी का देश, धर्म, जाति, काम, देखते है|
  • जब हम अपनी सेना या अपने प्रिय जन द्वारा किये बलात्कार को देख सुन कर चुप रहते है या चुपचाप सहते हैं|
  • जब हम बलात्कारी और पीडिता की शादी करने के बारे में एक पल भी सोचते हैं|
  • जब हम बलात्कारी को देश के आम नागरिक जैसे सभी अधिकार देते है; जबकि किसी और दिवालिया या पागल को ऐसे अधिकार नहीं होते|


देश और देवता

 

  • जब “देवराज” इन्द्र तपस्वी गौतम की सती पत्नी अहिल्या का बलात्कार करते है; अहिल्या से दुश्मनी के लिए नहीं वरण गौतम से इर्ष्या के कारण; शायद कोई इन्द्र के इस कुकृत्य की निंदा नहीं करता|
  • जब अहिल्या के बलात्कार का शिकार हो जाने पर पति गौतम अहिल्या को श्राप देते है| जो श्राप अहिल्या को पत्थर बना सकता है वो इंद्र को नाली का कीड़ा क्यों नहीं बनाता|
  • जब राम अहिल्या को सम्मान देकर पत्थर से वापस स्त्री बनाते है और उन्ही राम का भक्त हम इस देश के वासी बलात्कार पीडिता को पत्थर बनाने में लगे रहते हैं|
  • देश में राम राज्य का सपना स्त्री को अहिल्या / शबरी जैसा आदर देने के लिए नहीं वरन स्त्री को सीता जैसा वनवास देने के लिए देखा जाता है|
  • जब हर साल रावण को जलाने वाला समाज/देश ये भूल जाता है की रावण ने राक्षस होकर भी अपहृत सीता के साथ कोई बलात्कार या छेड़खानी जैसी कोई घटिया हरकत नहीं की थी|

अंत में मैं कहना कहता हूँ; जब समाज में कोई भी गलत बात होती है तो मुझे भी देखना चाहिए क्या मैंने तो इस समाज में ये गलत बात होने में कोई योगदान नहीं दिया| कोई गलत बात कहकर, सहकर||

मैं आज खुद के होने पर शर्मिंदा हूँ||

 

 

 

पौरुष का वीर्यपात

 

किसी समय इस भारत देश के किसी क्षेत्र में रावण नाम का एक राजा रहता था| उसके तप और प्रताप से देवता भी डर कर थर थर कांपते थे| कहते हैं, दुर्भाग्य से उसे अपने आप पर घमंड हो गया था| अपनी बहन के प्रणय निवेदन को ठुकरा दिए जाने से नाराज होकर रावण ने राम की पत्नी का अपहरण कर लिया था| इस अपराध की सजा के तौर पर रावण को अपनी और अपने सभी प्रियजनों की जान गवाँनी पड़ी| परन्तु आज के सन्दर्भ में विशेष बात यह है कि रावण ने सीता को अशोक वाटिका में सुरक्षित रखा और कई प्रणय निवेदन किये| अति विशेष बात ये है कि उसने असहाय सीता से किसी भी प्रकार से अनुचित सम्बन्ध जबरन बनाने की कोई कोशिश नहीं की| मैं रावण के इस आत्म नियंत्रण, ब्रह्मचर्य और असहाय स्त्री के प्रति आदर की भावना और शक्ति को ह्रदय से नमन करता हूँ|

इस समय देश भर विशेषकर हरियाणा राज्य में लगातार जारी बलात्कारों के बारे में देश भर में एक दबी दबी सी चर्चा है| कोई स्त्री के कपड़ो को दोष देता है तो कोई उसके भाग्य को| कोई भी राम और रावण के आदर्श को नहीं देखता| एकनिष्ट राम पत्नी के प्रेम से बंधे है और दूसरे सम्बन्ध के बारे में नहीं सोचते| रावण असहाय स्त्री को भी सम्मान देता है] न कपड़ो का प्रश्न, न आयु, न जाति, न धर्म, न कर्म, न वर्ग, न मूल, न निवास, कैसा भी निम्न कोटि का तर्क कुतर्क नहीं| राम बलात्कार पीड़ित अहिल्या का आदर करते है| राम मर्यादा के नाम पर अपनी पत्नी को वन भेज देते है पर क्या राम बलात्कारी देवराज इन्द्र का आदर करते है या बलात्कार पीड़ित पत्नी का परित्याग करने वाले गौतम को गले लगाते है?

दुर्भाग्य है, इस देश में राम राज्य नहीं है| ये तो देवलोक की निर्लज्ज इन्द्रसभा है, जहां स्त्री को देवदासी और अप्सरा बनकर नाचना पड़ता है| स्त्री भोग्या है, अधम है|  राम का आदर्श कहाँ है? राम का मंदिर क्या केवल अयोध्या में ही बनेगा; जन मानस से मन मंदिर में नहीं?

एक और बात|

ब्रह्मचर्य के व्रत के बारे में बात होती है| ब्रहमचर्य कोई स्त्री का सतीत्व नहीं कि कोई इन्द्र गौतम का भेष रख कर आये और नष्ट कर दे| क्या इस पुरुष बहुल समाज में ब्रह्मचर्य की बात नहीं होनी चाहिए? क्या पुरुष को अपने पौरुष की कटिबद्ध होकर रक्षा नहीं करनी चाहिए? स्त्री को परदे में रखने की बात करने वालो, क्या तुम अपनी आँखों पर पलकों का पर्दा नहीं गिरा सकते| सोच लो, वीर्यपात तुम्हारा ही होना है; सोच लो, पौरुष तुम्हारा खंडित होता है; सोच लो, ब्रह्मचर्य तुम्हारा ही नष्ट होता है| पहले अपना इहलोक और परलोक सम्हालो|

हतभाग्य!! वो निर्लज्ज पंचायत बैठ कर स्त्री की योनि पर पहरा दे रही है|