नपुंसकता प्रदूषित विकास और गाँव

सभी छायाचित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

प्रदूषित दिल्ली!!

देश की राजधानी दिल्ली को देश की जनता राजनीति के पवित्र धर्मस्थल की तरह सम्मान देती है| उसे दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर का दर्जा दिया जा रहा है| दिल्ली में सारे ऑटो टैक्सी सबको तो गैस पर चलवा रहे है| प्रदूषण फ़ैलाने वाले हर मिल और कारखाने को दिल्ली के बाहर निकलवा दिया गया है| बाहर से आने वाले हर ट्रक, टैक्सी पर टोल लगा दिया गया है|

मगर कहते हैं न, जब दुनिया में सब गन्दा दिखाई देने लगे तो अपने अन्दर झाँक लेना चाहिए| दिल्ली का भी यही हाल है| दिल्ली से दुनिया गन्दी, पिछड़ी, गरीब, नजर आती हैं| अगर दिल्ली अपने अन्दर झांके तो दिल्ली की हवा इतनी गन्दी कि साँस न ले पायें, दिल्ली इतनी पिछड़ी कि खुद को साफ़ न कर पाए और इतनी गरीब की साफ़ हवा भी न खरीद पाए|

दिल्ली में आदमी के पास घर हो या न हो गाड़ी होनी चाहिए| एक गाड़ी भले ही वो रोज मेट्रो पर पार्क हो जाए मगर दिखावे का गुरूर हो पूरा हो| दिल्ली के लोग टहलने भी गाड़ी से जाते है| हर घर में दो चार गाड़ियाँ मिल जाएँगी| अगर शादी ब्याह दावत या कोई भी सामाजिक काम हो तो घर का हर सदस्य जाये या न जाये गाड़ी जरूर भेजी जाती है|

अगर दिल्ली के प्रदूषण की बात की जाये तो अगर फालतू कारें हटा ली जाएँ तो ट्रैफिक भी कम हो और प्रदूषण भी| सबसे पहली बात दिल्ली में हर जगह पार्किंग का दाम बेहद कम हैं या अवैध पार्किंग के ऊपर कोई कार्यवाही नहीं होती| दिल्ली के हर कॉलोनी में सड़कें शाम ढलते ही पार्किंग में तब्दील हो जातीं हैं| इस जबरन और अवैध पार्किंग व्यस्था पर उसी प्रकार नाक मूंह सकोड़ने की जरूरत है जिस प्रकार अवैध बस्तियों और झुग्गी – बस्तियों के बारे में किया जाता है|

जब तक कोई खरीददार अपने घर में में निजी क्षेत्र में पार्किंग की व्यस्था न दिखा दे तब तक उसे कर खरीदने की अनुमति नहीं होनी चाहिए और हर कार के लिए अलग अलग पार्किंग की व्यवस्था न होने पर भी कार लेने की अनुमति नहीं होनी चाहिए| कंपनी आदि के नाम पर खरीदीं गयीं कारों के लिए भी सामान व्यवस्था होनी चाहिए| पार्किंग क्षेत्र का वेरिफिकेशन करने के लिए उसी प्रकार से कंपनी सेक्रेटरी या अन्य प्रोफेशनल्स को जिम्मेदारी दी जा सकती है जिस प्रकार से कंपनी के रजिस्टर्ड ऑफिस के वेरिफिकेशन के लिए दी गयी है| सड़क पर पार्क की जाने वाली गैर व्यवसायिक गाड़ियों से बाजार दर पर कम से कम महीने भर का किराया वसूला जाना चाहिए|

व्यावसायिक वाहनों और पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्हीकल को कुछ छूट दे जा सकती है क्योकि वो न सिर्फ देश के सकल उत्पाद में योगदान देते है बल्कि यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाते हैं|

पुनःश्च –भारत में अधिकतर कार या तो दहेज़ में आती है या कर्जे में| अतः निजी कारों को हेयदृष्टि से देखे जाने की महती आवश्यकता है|